Lulla Family

अंग 260

अंग
260
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोकु ॥
हउ हउ करत बिहानीआ साकत मुगध अजान ॥
ड़ड़कि मुए जिउ त्रिखावंत नानक किरति कमान ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ माया-ग्रसित मूर्ख बेसमझ मनुष्यों की उम्र इसी बहाव में बीत जाती है कि मैं बड़ा होऊँ। हे नानक ! अहंकार के आसरे किए गलत कामों (के संस्कारों) के कारण। अहंकार का काँटा चुभ-चुभ के ही उनकी आत्मिक मौत हो जाती है। जैसे कोई प्यासा (पानी के बगैर मरता है। वे आत्मिक सुख के बगैर तड़फते हैं)। 1।
पउड़ी ॥
ड़ाड़ा ड़ाड़ि मिटै संगि साधू ॥
करम धरम ततु नाम अराधू ॥
रूड़ो जिह बसिओ रिद माही ॥
उआ की ड़ाड़ि मिटत बिनसाही ॥
ड़ाड़ि करत साकत गावारा ॥
जेह हीऐ अहंबुधि बिकारा ॥
ड़ाड़ा गुरमुखि ड़ाड़ि मिटाई ॥ निमख माहि नानक समझाई ॥47॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (मनुष्य के अंदर अहंकार के काँटे की) चुभन गुरू की संगति में ही मिटती है (क्योंकि संगत में प्रभू का नाम मिलता है और) हरी-नाम का सिमरन सारे धार्मिक कर्मों का निचोड़ है। जिस मनुष्य के हृदय में सुंदर प्रभू आ बसे। उसके अंदर से अहंकार के काँटे की चुभन अवश्य नाश हो जाती है। मिट जाती है। ये अहंकार वाली चुभन (रड़क अपने अंदर) वही मूर्ख माया-ग्रसित लोग अपने अंदर कायम रखते हैं। जिनके हृदय में अहंकार वाली बुद्धि से उपजी बुराई टिकी रहती है। (पर) हे नानक ! जिन्होंने गुरू की शरण पड़ कर अहंकार वाली चुभन दूर कर ली। उन्हें गुरू आँख की एक झपक में ही आत्मिक आनंद की झलक दिखा देता है। 47।
सलोकु ॥
साधू की मन ओट गहु उकति सिआनप तिआगु ॥
गुर दीखिआ जिह मनि बसै नानक मसतकि भागु ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मन ! (अगर अहंकार की चुभन से बचना है। तो) गुरू का आसरा ले। अपनी दलीलबाजियां और समझदारियां छोड़। हे नानक ! जिस मनुष्य के मन में गुरू की शिक्षा बस जाती है। उसके माथे पर अच्छे लेख (उघड़े समझो)। 1।
पउड़ी ॥
ससा सरनि परे अब हारे ॥ सासत्र सिम्रिति बेद पूकारे ॥
सोधत सोधत सोधि बीचारा ॥
बिनु हरि भजन नही छुटकारा ॥
सासि सासि हम भूलनहारे ॥
तुम समरथ अगनत अपारे ॥
सरनि परे की राखु दइआला ॥
नानक तुमरे बाल गुपाला ॥48॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- अब हार के आपकी शरण पड़े हैं। (पंडित लोग) स्मृतियों-शास्त्रों। वेद (आदि धर्म पुस्तकें) ऊँची ऊँची पढ़ते हैं। पर बहुत विचार विचार के इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि हरी नाम के सिमरन के बिना (अहंकार की चुभन से) छुटकारा नहीं हो सकता। हे गोपाल ! हम जीव हर सांस के साथ भूलें करते हैं। आप हमारी भूलों को बख्शने योग्य है। आपके गुण गिने नहीं जा सकते। आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। हे दयालु ! शरण पड़े की लाज रख (और हमें अहंकार के काँटे की चुभन से बचाए रख)। हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर। और कह) हे गोपाल ! हम आपके बच्चे हैं। 48।
सलोकु ॥
खुदी मिटी तब सुख भए मन तन भए अरोग ॥
नानक द्रिसटी आइआ उसतति करनै जोगु ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ जब मनुष्य का अहंकार दूर हो जाता है। तब इसे आत्मिक आनंद मिलता है (जिसकी बरकति से) इसके मन और तन पुल्कित (नरोए) हो जाते हैं। हे नानक ! (अहंकार के मिटते ही) मनुष्य को वह परमात्मा हर जगह दिखने लगता है। जो वाकई सिफत-सलाह का हकदार है। 1।
पउड़ी ॥
खखा खरा सराहउ ताहू ॥
जो खिन महि ऊने सुभर भराहू ॥
खरा निमाना होत परानी ॥
अनदिनु जापै प्रभ निरबानी ॥
भावै खसम त उआ सुखु देता ॥
पारब्रहमु ऐसो आगनता ॥
असंख खते खिन बखसनहारा ॥
नानक साहिब सदा दइआरा ॥49॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मैं उस प्रभू की सिफत सालाह मन लगा के करता हूँ। जो एक छिन में उन (हृदयों) को (भले गुणों से) लबालब भर देता है। जो पहले (गुणों से) वंचित थे। (खुदी मिटा के जब) आदमी अच्छी तरह निर-अहंकार हो जाता है तो हर वक्त वासना-रहित परमात्मा को सिमरता है। (इस तरह) पति प्रभू को प्यारा लगने लगता है। प्रभू उसे आत्मिक सुख बख्शता है। हे नानक ! पारब्रहम बड़ा बेअंत है (बेपरवाह है)। मालिक प्रभू सदा ही दया करने वाला है। वह जीवों के अनगिनत पाप छण मात्र में बख्श देता है। 49।
सलोकु ॥
सति कहउ सुनि मन मेरे सरनि परहु हरि राइ ॥
उकति सिआनप सगल तिआगि नानक लए समाइ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मेरे मन ! मैं आपको सच्ची बात बताता हूँ। (इसे) सुन। परमात्मा की शरण पड़। हे नानक ! सारी ही दलीलबाजियां व समझदारियां छोड़ दे। (सरल स्वभाव हो के आसरा लेगा तो) प्रभू आपको अपने चरणों में जोड़ लेगा। 1।
पउड़ी ॥
ससा सिआनप छाडु इआना ॥
हिकमति हुकमि न प्रभु पतीआना ॥
सहस भाति करहि चतुराई ॥
संगि तुहारै एक न जाई ॥
सोऊ सोऊ जपि दिन राती ॥
रे जीअ चलै तुहारै साथी ॥
साध सेवा लावै जिह आपै ॥
नानक ता कउ दूखु न बिआपै ॥50॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- हे मेरे अंजान मन ! चालाकियां छोड़। परमात्मा चालाकियों से व हुकम करने से (भाव। अकड़ दिखाने से) खुश नहीं होता। अगर आप हजारों किस्मों की चालाकियां भी करेगा। एक चालाकी भी आपकी मदद नहीं कर सकेगी (प्रभू की हजूरी में आपके साथ नहीं जाएगी। मानी नहीं जा सकेगी)। हे मेरी जिंदे ! बस ! उस प्रभू को ही दिन-रात याद करती रह। प्रभू की याद ने ही आपके साथ जाना है। (पर ये सिमरन वही कर सकता है जिसे प्रभू खुद गुरू के दर पर लाए) हे नानक ! जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं गुरू की सेवा में जोड़ता है। उस पर कोई दुख कलेश जोर नहीं डाल सकता। 50।
सलोकु ॥
हरि हरि मुख ते बोलना मनि वूठै सुखु होइ ॥
नानक सभ महि रवि रहिआ थान थनंतरि सोइ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ उस हरी का जाप मुंह से करने से जब वह मन में आ बसता है। तो आत्मिक आनंद पैदा होता है। हे नानक ! वह प्रभू सब जीवों में व्यापक है। हरेक जगह में मौजूद है। 1।
पउड़ी ॥
हेरउ घटि घटि सगल कै पूरि रहे भगवान ॥
होवत आए सद सदीव दुख भंजन गुर गिआन ॥
हउ छुटकै होइ अनंदु तिह हउ नाही तह आपि ॥
हते दूख जनमह मरन संतसंग परताप ॥
हित करि नाम द्रिड़ै दइआला ॥ संतह संगि होत किरपाला ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मैं सब जीवों के शरीर में देखता हूँ कि परमात्मा स्वयं ही मौजूद है। परमात्मा का अस्तित्व सदा से ही है। वह जीवों के दुख नाश करने वाला है, ये सूझ गुरू का ज्ञान देता है (गुरू के उपदेश से ये समझ पैदा होती है)। मनुष्य का अहम् समाप्त हो जाता है। मन में आनंद पैदा हो जाता है। मन में से अहंकार का अभाव हो जाता है। वहां प्रभू स्वयं आ बसता है। संतों की संगति की बरकति से मनुष्य के जनम-मरन के दुख नाश हो जाते हैं। प्रेम से दयाल प्रभू का नाम अपने हृदय में टिकाता है और जो मनुष्य संत जनों की संगति में रहता है प्रभू उस पर कृपा करता है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सलोकु ॥ माया-ग्रसित मूर्ख बेसमझ मनुष्यों की उम्र इसी बहाव में बीत जाती है कि मैं बड़ा होऊँ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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