अंग
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गउड़ी
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- हउ हउ करत बिहानीआ साकत मुगध अजान ॥
- ड़ाड़ा ड़ाड़ि मिटै संगि साधू ॥
- साधू की मन ओट गहु उकति सिआनप तिआगु ॥
- ससा सरनि परे अब हारे ॥ सासत्र सिम्रिति बेद पूकारे ॥
- खुदी मिटी तब सुख भए मन तन भए अरोग ॥
- खखा खरा सराहउ ताहू ॥
- सति कहउ सुनि मन मेरे सरनि परहु हरि राइ ॥
- ससा सिआनप छाडु इआना ॥
- हरि हरि मुख ते बोलना मनि वूठै सुखु होइ ॥
- हेरउ घटि घटि सगल कै पूरि रहे भगवान ॥
हउ हउ करत बिहानीआ साकत मुगध अजान ॥
सलोकु ॥
हउ हउ करत बिहानीआ साकत मुगध अजान ॥
ड़ड़कि मुए जिउ त्रिखावंत नानक किरति कमान ॥1॥
हउ हउ करत बिहानीआ साकत मुगध अजान ॥
ड़ड़कि मुए जिउ त्रिखावंत नानक किरति कमान ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ माया-ग्रसित मूर्ख बेसमझ मनुष्यों की उम्र इसी बहाव में बीत जाती है कि मैं बड़ा होऊँ। हे नानक ! अहंकार के आसरे किए गलत कामों (के संस्कारों) के कारण। अहंकार का काँटा चुभ-चुभ के ही उनकी आत्मिक मौत हो जाती है। जैसे कोई प्यासा (पानी के बगैर मरता है। वे आत्मिक सुख के बगैर तड़फते हैं)। 1।
ड़ाड़ा ड़ाड़ि मिटै संगि साधू ॥
पउड़ी ॥
ड़ाड़ा ड़ाड़ि मिटै संगि साधू ॥
करम धरम ततु नाम अराधू ॥
रूड़ो जिह बसिओ रिद माही ॥
उआ की ड़ाड़ि मिटत बिनसाही ॥
ड़ाड़ि करत साकत गावारा ॥
जेह हीऐ अहंबुधि बिकारा ॥
ड़ाड़ा गुरमुखि ड़ाड़ि मिटाई ॥ निमख माहि नानक समझाई ॥47॥
ड़ाड़ा ड़ाड़ि मिटै संगि साधू ॥
करम धरम ततु नाम अराधू ॥
रूड़ो जिह बसिओ रिद माही ॥
उआ की ड़ाड़ि मिटत बिनसाही ॥
ड़ाड़ि करत साकत गावारा ॥
जेह हीऐ अहंबुधि बिकारा ॥
ड़ाड़ा गुरमुखि ड़ाड़ि मिटाई ॥ निमख माहि नानक समझाई ॥47॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (मनुष्य के अंदर अहंकार के काँटे की) चुभन गुरू की संगति में ही मिटती है (क्योंकि संगत में प्रभू का नाम मिलता है और) हरी-नाम का सिमरन सारे धार्मिक कर्मों का निचोड़ है। जिस मनुष्य के हृदय में सुंदर प्रभू आ बसे। उसके अंदर से अहंकार के काँटे की चुभन अवश्य नाश हो जाती है। मिट जाती है। ये अहंकार वाली चुभन (रड़क अपने अंदर) वही मूर्ख माया-ग्रसित लोग अपने अंदर कायम रखते हैं। जिनके हृदय में अहंकार वाली बुद्धि से उपजी बुराई टिकी रहती है। (पर) हे नानक ! जिन्होंने गुरू की शरण पड़ कर अहंकार वाली चुभन दूर कर ली। उन्हें गुरू आँख की एक झपक में ही आत्मिक आनंद की झलक दिखा देता है। 47।
साधू की मन ओट गहु उकति सिआनप तिआगु ॥
सलोकु ॥
साधू की मन ओट गहु उकति सिआनप तिआगु ॥
गुर दीखिआ जिह मनि बसै नानक मसतकि भागु ॥1॥
साधू की मन ओट गहु उकति सिआनप तिआगु ॥
गुर दीखिआ जिह मनि बसै नानक मसतकि भागु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मन ! (अगर अहंकार की चुभन से बचना है। तो) गुरू का आसरा ले। अपनी दलीलबाजियां और समझदारियां छोड़। हे नानक ! जिस मनुष्य के मन में गुरू की शिक्षा बस जाती है। उसके माथे पर अच्छे लेख (उघड़े समझो)। 1।
ससा सरनि परे अब हारे ॥ सासत्र सिम्रिति बेद पूकारे ॥
पउड़ी ॥
ससा सरनि परे अब हारे ॥ सासत्र सिम्रिति बेद पूकारे ॥
सोधत सोधत सोधि बीचारा ॥
बिनु हरि भजन नही छुटकारा ॥
सासि सासि हम भूलनहारे ॥
तुम समरथ अगनत अपारे ॥
सरनि परे की राखु दइआला ॥
नानक तुमरे बाल गुपाला ॥48॥
ससा सरनि परे अब हारे ॥ सासत्र सिम्रिति बेद पूकारे ॥
सोधत सोधत सोधि बीचारा ॥
बिनु हरि भजन नही छुटकारा ॥
सासि सासि हम भूलनहारे ॥
तुम समरथ अगनत अपारे ॥
सरनि परे की राखु दइआला ॥
नानक तुमरे बाल गुपाला ॥48॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- अब हार के आपकी शरण पड़े हैं। (पंडित लोग) स्मृतियों-शास्त्रों। वेद (आदि धर्म पुस्तकें) ऊँची ऊँची पढ़ते हैं। पर बहुत विचार विचार के इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि हरी नाम के सिमरन के बिना (अहंकार की चुभन से) छुटकारा नहीं हो सकता। हे गोपाल ! हम जीव हर सांस के साथ भूलें करते हैं। आप हमारी भूलों को बख्शने योग्य हैं। आपके गुण गिने नहीं जा सकते। आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। हे दयालु ! शरण पड़े की लाज रख (और हमें अहंकार के काँटे की चुभन से बचाए रख)। हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर। और कह) हे गोपाल ! हम आपके बच्चे हैं। 48।
खुदी मिटी तब सुख भए मन तन भए अरोग ॥
सलोकु ॥
खुदी मिटी तब सुख भए मन तन भए अरोग ॥
नानक द्रिसटी आइआ उसतति करनै जोगु ॥1॥
खुदी मिटी तब सुख भए मन तन भए अरोग ॥
नानक द्रिसटी आइआ उसतति करनै जोगु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ जब मनुष्य का अहंकार दूर हो जाता है। तब इसे आत्मिक आनंद मिलता है (जिसकी बरकति से) इसके मन और तन पुल्कित (नरोए) हो जाते हैं। हे नानक ! (अहंकार के मिटते ही) मनुष्य को वह परमात्मा हर जगह दिखने लगता है। जो वाकई सिफत-सलाह का हकदार है। 1।
खखा खरा सराहउ ताहू ॥
पउड़ी ॥
खखा खरा सराहउ ताहू ॥
जो खिन महि ऊने सुभर भराहू ॥
खरा निमाना होत परानी ॥
अनदिनु जापै प्रभ निरबानी ॥
भावै खसम त उआ सुखु देता ॥
पारब्रहमु ऐसो आगनता ॥
असंख खते खिन बखसनहारा ॥
नानक साहिब सदा दइआरा ॥49॥
खखा खरा सराहउ ताहू ॥
जो खिन महि ऊने सुभर भराहू ॥
खरा निमाना होत परानी ॥
अनदिनु जापै प्रभ निरबानी ॥
भावै खसम त उआ सुखु देता ॥
पारब्रहमु ऐसो आगनता ॥
असंख खते खिन बखसनहारा ॥
नानक साहिब सदा दइआरा ॥49॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मैं उस प्रभू की सिफत सालाह मन लगा के करता हूँ। जो एक छिन में उन (हृदयों) को (भले गुणों से) लबालब भर देता है। जो पहले (गुणों से) वंचित थे। (खुदी मिटा के जब) आदमी अच्छी तरह निर-अहंकार हो जाता है तो हर वक्त वासना-रहित परमात्मा को सिमरता है। (इस तरह) पति प्रभू को प्यारा लगने लगता है। प्रभू उसे आत्मिक सुख बख्शता है। हे नानक ! पारब्रहम बड़ा बेअंत है (बेपरवाह है)। मालिक प्रभू सदा ही दया करने वाला है। वह जीवों के अनगिनत पाप छण मात्र में बख्श देता है। 49।
सति कहउ सुनि मन मेरे सरनि परहु हरि राइ ॥
सलोकु ॥
सति कहउ सुनि मन मेरे सरनि परहु हरि राइ ॥
उकति सिआनप सगल तिआगि नानक लए समाइ ॥1॥
सति कहउ सुनि मन मेरे सरनि परहु हरि राइ ॥
उकति सिआनप सगल तिआगि नानक लए समाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मेरे मन ! मैं आपको सच्ची बात बताता हूँ। (इसे) सुन। परमात्मा की शरण पड़। हे नानक ! सारी ही दलीलबाजियां व समझदारियां छोड़ दे। (सरल स्वभाव हो के आसरा लेगा तो) प्रभू आपको अपने चरणों में जोड़ लेगा। 1।
ससा सिआनप छाडु इआना ॥
पउड़ी ॥
ससा सिआनप छाडु इआना ॥
हिकमति हुकमि न प्रभु पतीआना ॥
सहस भाति करहि चतुराई ॥
संगि तुहारै एक न जाई ॥
सोऊ सोऊ जपि दिन राती ॥
रे जीअ चलै तुहारै साथी ॥
साध सेवा लावै जिह आपै ॥
नानक ता कउ दूखु न बिआपै ॥50॥
ससा सिआनप छाडु इआना ॥
हिकमति हुकमि न प्रभु पतीआना ॥
सहस भाति करहि चतुराई ॥
संगि तुहारै एक न जाई ॥
सोऊ सोऊ जपि दिन राती ॥
रे जीअ चलै तुहारै साथी ॥
साध सेवा लावै जिह आपै ॥
नानक ता कउ दूखु न बिआपै ॥50॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- हे मेरे अंजान मन ! चालाकियां छोड़। परमात्मा चालाकियों से व हुकम करने से (भाव। अकड़ दिखाने से) खुश नहीं होता। अगर आप हजारों किस्मों की चालाकियां भी करेगा। एक चालाकी भी आपकी मदद नहीं कर सकेगी (प्रभू की हजूरी में आपके साथ नहीं जाएगी। मानी नहीं जा सकेगी)। हे मेरी जिंदे ! बस ! उस प्रभू को ही दिन-रात याद करती रह। प्रभू की याद ने ही आपके साथ जाना है। (पर ये सिमरन वही कर सकता है जिसे प्रभू खुद गुरू के दर पर लाए) हे नानक ! जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं गुरू की सेवा में जोड़ता है। उस पर कोई दुख कलेश जोर नहीं डाल सकता। 50।
हरि हरि मुख ते बोलना मनि वूठै सुखु होइ ॥
सलोकु ॥
हरि हरि मुख ते बोलना मनि वूठै सुखु होइ ॥
नानक सभ महि रवि रहिआ थान थनंतरि सोइ ॥1॥
हरि हरि मुख ते बोलना मनि वूठै सुखु होइ ॥
नानक सभ महि रवि रहिआ थान थनंतरि सोइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ उस हरी का जाप मुंह से करने से जब वह मन में आ बसता है। तो आत्मिक आनंद पैदा होता है। हे नानक ! वह प्रभू सब जीवों में व्यापक है। हरेक जगह में मौजूद है। 1।
हेरउ घटि घटि सगल कै पूरि रहे भगवान ॥
पउड़ी ॥
हेरउ घटि घटि सगल कै पूरि रहे भगवान ॥
होवत आए सद सदीव दुख भंजन गुर गिआन ॥
हउ छुटकै होइ अनंदु तिह हउ नाही तह आपि ॥
हते दूख जनमह मरन संतसंग परताप ॥
हित करि नाम द्रिड़ै दइआला ॥ संतह संगि होत किरपाला ॥
हेरउ घटि घटि सगल कै पूरि रहे भगवान ॥
होवत आए सद सदीव दुख भंजन गुर गिआन ॥
हउ छुटकै होइ अनंदु तिह हउ नाही तह आपि ॥
हते दूख जनमह मरन संतसंग परताप ॥
हित करि नाम द्रिड़ै दइआला ॥ संतह संगि होत किरपाला ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मैं सब जीवों के शरीर में देखता हूँ कि परमात्मा स्वयं ही मौजूद है। परमात्मा का अस्तित्व सदा से ही है। वह जीवों के दुख नाश करने वाला है, ये सूझ गुरू का ज्ञान देता है (गुरू के उपदेश से ये समझ पैदा होती है)। मनुष्य का अहम् समाप्त हो जाता है। मन में आनंद पैदा हो जाता है। मन में से अहंकार का अभाव हो जाता है। वहां प्रभू स्वयं आ बसता है। संतों की संगति की बरकति से मनुष्य के जनम-मरन के दुख नाश हो जाते हैं। प्रेम से दयाल प्रभू का नाम अपने हृदय में टिकाता है और जो मनुष्य संत जनों की संगति में रहता है प्रभू उस पर कृपा करता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २६० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।