Lulla Family

अंग 261

अंग
261
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ओरै कछू न किनहू कीआ ॥
नानक सभु कछु प्रभ ते हूआ ॥51॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (उस मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि) परमात्मा से उरे और कोई कुछ भी करने के लायक नहीं। ये सारा जगत-आकार परमात्मा से ही प्रगट हुआ है। 51।
सलोकु ॥
लेखै कतहि न छूटीऐ खिनु खिनु भूलनहार ॥
बखसनहार बखसि लै नानक पारि उतार ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! (कह) हम जीव छिन छिन भूलें करने वाले हैं। अगर हमारी भूलों का हिसाब किताब हो। तो हम किसी भी तरह इस भार से सुर्खरू नहीं हो सकते। हे बख्शिंद प्रभू ! आप खुद ही हमारी भूलें बख्श। और हमें (विकारों के समुंद्र में डूबतों को) पार लगा। 1।
पउड़ी ॥
लूण हरामी गुनहगार बेगाना अलप मति ॥
जीउ पिंडु जिनि सुख दीए ताहि न जानत तत ॥
लाहा माइआ कारने दह दिसि ढूढन जाइ ॥
देवनहार दातार प्रभ निमख न मनहि बसाइ ॥
लालच झूठ बिकार मोह इआ संपै मन माहि ॥
लंपट चोर निंदक महा तिनहू संगि बिहाइ ॥
तुधु भावै ता बखसि लैहि खोटे संगि खरे ॥
नानक भावै पारब्रहम पाहन नीरि तरे ॥52॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मनुष्य ना-शुक्रगुजार है, गुनाहगार है, होछी मति वाला है। परमात्मा से बेगाना हो के रहता है। जिस प्रभू ने ये जिंद और शरीर दिए हैं, उस अस्लियत को पहचानता ही नहीं। माया कमाने की खातिर दसों दिशाओं में (माया) तलाशता फिरता है। पर जो प्रभू दातार सब कुछ देने के काबिल है, उसे आँख झपकने जितने समय के लिए भी मन में नहीं बसाता। लालच-झूठ-विकार और माया का मोह- बस ! यही धन मनुष्य अपने मन में संभाले बैठा है। जो विषयी हैं,चोर हैं, महा निंदक हैं, उनकी संगति में इसकी उम्र बीतती है। (पर। हे प्रभू !) यदि आपको ठीक लगे तो आप खुद ही खोटों को खरों की संगति में रख के बख्श लेता है। हे नानक ! अगर परमात्मा को ठीक लगे तो वह (विचारों से) पत्थर दिल हो चुके लोगों को नाम-अमृत की दाति दे कर (विकारों की लहरों में डूबने से) बचा लेता है। 52।
सलोकु ॥
खात पीत खेलत हसत भरमे जनम अनेक ॥
भवजल ते काढहु प्रभू नानक तेरी टेक ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! हम जीव मायावी पदार्थ ही खाते-पीते, और माया के रंग तमाशों में हंसते खेलते अनेकों जूनियों में भटकते आ रहे हैं। हमें आप स्वयं ही संसार समुंद्र में से निकाल। हमें आपका ही आसरा है। 1।
पउड़ी ॥
खेलत खेलत आइओ अनिक जोनि दुख पाइ ॥
खेद मिटे साधू मिलत सतिगुर बचन समाइ ॥
खिमा गही सचु संचिओ खाइओ अंम्रितु नाम ॥
खरी क्रिपा ठाकुर भई अनद सूख बिस्राम ॥
खेप निबाही बहुतु लाभ घरि आए पतिवंत ॥
खरा दिलासा गुरि दीआ आइ मिले भगवंत ॥
आपन कीआ करहि आपि आगै पाछै आपि ॥
नानक सोऊ सराहीऐ जि घटि घटि रहिआ बिआपि ॥53॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मनुष्य मायावी रंगों में मन परचाता परचाता अनेकों जूनियों में से गुजरता दुख पाता आता है। अगर गुरू मिल जाए। अगर गुरू के बचनों में चित्त जुड़ जाए। तो सारे दुख कलेश मिट जाते हैं। जिसने (गुरू दर से) क्षमा का स्वभाव ग्रहण कर लिया। नाम-धन इकट्ठा किया। नाम अमृत को अपनी आत्मिक खुराक बनाया उस पर परमात्मा की बड़ी मेहर होती है। वह आत्मिक आनन्द-सुख में टिका रहता है। जिस मनुष्य ने (गुरू से जाच सीख के सिफत सालाह का) वणज-व्यापार (सारी उम्र) भर निभाया। उसने लाभ कमाया। वह (भटकना से बच के) अडोल मन हो जाता है और आदर कमाता है। गुरू ने उसे और अच्छी दिलासा दी। और वह भगवान के चरणों में जुड़ा। (पर ये सब प्रभू की मेहर है)। हे प्रभू ! ये सारा खेल तूने ही किया है। अब भी आप ही सब कुछ कर रहा है। लोक-परलोक में जीवों का रक्षक आप स्वयं ही है। हे नानक ! जो प्रभू हरेक शरीर में मौजूद है। सदा उसी की ही सिफत सालाह करनी चाहिए। 53।
सलोकु ॥
आए प्रभ सरनागती किरपा निधि दइआल ॥
एक अखरु हरि मनि बसत नानक होत निहाल ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे प्रभू ! हे कृपा के खजाने ! हे दयाल ! हम आपकी शरण आए हैं। हे नानक ! (कह) जिनके मन में एक अविनाशी प्रभू बसता रहता है। उनका मन सदा खिला रहता है। 1।
पउड़ी ॥
अखर महि त्रिभवन प्रभि धारे ॥
अखर करि करि बेद बीचारे ॥
अखर सासत्र सिंम्रिति पुराना ॥
अखर नाद कथन वख्याना ॥
अखर मुकति जुगति भै भरमा ॥
अखर करम किरति सुच धरमा ॥
द्रिसटिमान अखर है जेता ॥
नानक पारब्रहम निरलेपा ॥54॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- ये तीनों भवन (सारा ही जगत) प्रभू ने अपने हुकम में ही रचे हैं। प्रभू के हुकम के अनुसार ही वेद रचे गए, और विचारे गए। सारे शास्त्र-स्मृतियां और पुराण प्रभू के हुकम का प्रगटावा हैं। इन पुराणों-शास्त्रों और स्मृतियों की कीर्तन कथा और व्याख्या भी प्रभू के हुकम का ही ज़हूर हैं। दुनिया के डरों-भरमों से निजात ढूँढनी भी प्रभू के हुकम का प्रकाश है। (मानस जन्म में) करनेयोग्य कामों की पहिचान करनी आत्मिक पवित्रता के नियमों की तलाश- ये भी प्रभू के हुकम का ही दृश्य है। हे नानक ! जितना भी ये दिखाई दे रहा संसार है। ये सारा ही प्रभू के हुकम का सरगुण स्वरूप है। पर (हुकम का मालिक) प्रभू खुद (इस सारे पसारे के) प्रभाव से परे है। 54।
सलोकु ॥
हथि कलंम अगंम मसतकि लिखावती ॥
उरझि रहिओ सभ संगि अनूप रूपावती ॥
उसतति कहनु न जाइ मुखहु तुहारीआ ॥
मोही देखि दरसु नानक बलिहारीआ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ अपहुँच हरी के हाथ में (हुकम रूप) कलम (पकड़ी हुई) है। (सब जीवों के) माथे पर (अपनी हुकम रूपी कलम से जीवों के किए कर्मों अनुसार लेख) लिखे जा रहा है। वह सुंदर रूप वाला प्रभू सब जीवों के साथ (ताने बाने की तरह) मिला हुआ है (इस वास्ते कोई लेख गलत नहीं लिखा जाता)। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! मुझसे अपने मुँह से आपकी उपमा बयान नहीं की जा सकती। आपका दर्शन करके मेरी जिंद मस्त हैं रही है। सदके सदके हैं रही है। 1।
पउड़ी ॥
हे अचुत हे पारब्रहम अबिनासी अघनास ॥
हे पूरन हे सरब मै दुख भंजन गुणतास ॥
हे संगी हे निरंकार हे निरगुण सभ टेक ॥
हे गोबिद हे गुण निधान जा कै सदा बिबेक ॥
हे अपरंपर हरि हरे हहि भी होवनहार ॥
हे संतह कै सदा संगि निधारा आधार ॥
हे ठाकुर हउ दासरो मै निरगुन गुनु नही कोइ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- हे नानक ! (अरदास कर और कह) हे कभी ना डोलने वाले परमात्मा ! हे नाश रहित प्रभू ! हे जीवों के पाप नाश करने वाले ! हे सारे जीवों में व्यापक पूर्ण प्रभू ! हे जीवों के दुख दूर करने वाले ! हे गुणों के खजाने ! हे सब के साथी ! (और फिर भी) आकार-रहित प्रभू ! हे माया के प्रभाव से अलग रहने वाले ! हे सब जीवों के आसरे ! हे सृष्टि की सार लेने वाले ! हे गुणों के खजाने ! जिसके अंदर परख करने की ताकत सदा कायम है ! हे परे से परे प्रभू ! आप अब भी मौजूद है। आप सदा के लिए कायम रहने वाला है। हे संतों के सदा सहाई ! हे निआसरों के आसरे ! हे सृष्टि के पालक ! मैं आपका छोटा सा दास हूँ। मैं गुण-हीन हूँ। मेरे में कोई गुण नहीं।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (उस मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि) परमात्मा से उरे और कोई कुछ भी करने के लायक नहीं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English