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अंग 25

अंग
25
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जेही सुरति तेहा तिन राहु ॥
लेखा इको आवहु जाहु ॥1॥
काहे जीअ करहि चतुराई ॥
लेवै देवै ढिल न पाई ॥1॥ रहाउ ॥
तेरे जीअ जीआ का तोहि ॥
कित कउ साहिब आवहि रोहि ॥
जे तू साहिब आवहि रोहि ॥
तू ओना का तेरे ओहि ॥2॥
असी बोलविगाड़ विगाड़ह बोल ॥
तू नदरी अंदरि तोलहि तोल ॥
जह करणी तह पूरी मति ॥
करणी बाझहु घटे घटि ॥3॥
प्रणवति नानक गिआनी कैसा होइ ॥
आपु पछाणै बूझै सोइ ॥
गुर परसादि करे बीचारु ॥
सो गिआनी दरगह परवाणु ॥4॥30॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: जैसी सूझ (प्रभू जीवों को देता है) वैसा ही जीवन रास्ता वे पकड़ लेते हैं। (उसी मिली सूझ अनुसार) जीव (जगत में) आते हैं और (यहां) से चले जाते हैं। ये मर्यादा चलाने वाला प्रभू खुद ही है।1। हे जीव! आप (अपनी अच्छी सूझ दिखाने के लिए) क्यूँ चालाकी करता है? वह परमात्मा ही (जीवों को सूझ) देता है और ले भी लेता है। रत्ती मात्र भी समय नहीं लगाता।1।रहाउ। हे मालिक प्रभू! सारे जीव आपके पैदा किये हुए हैं। सभी जीवों का आप ही पति है। (अगर जीव आपसे मिली सूझ अक्ल का गुमान भी करें फिर भी आप) गुस्से में नहीं आता (क्योंकि आखिर ये जीव आपके ही हैं)। हे मालक प्रभू ! अगर आप गुस्से में भी आये (तो किस पे आए ?) आप उनका मालिक है वो सारे आपके ही बनाये हुए हैं।2। (हे प्रभू!) हम जीव बड़बोले हैं, (आपसे मिली सूझ अकल पर मान करके अनेकों बार) फीके बोल बोल देते हैं। पर आप (हमारे कुबोलों को) मेहर की निगाह से परखता है। (गुरू के द्वारा बताए रास्ते पर चल के) जिस मनुष्य के अंदर ऊँचा आचरण बन जाता है उसकी सोच-समझ भी गंभीर हो जाती है (और वह बड़बोला नहीं बनता)। ऊँचे आचरण के बगैर आदमी की सूझ-बूझ भी नीची ही रहती है।3। नानक बेनती करता है, असल ज्ञानवान मनुष्य वह है जो अपने असल को पहचानता है, जो उस परमात्मा को ही (अक्लदाता) समझता है। जो गुरू की मेहर से (अपनी चतुराई छोड़ के बुद्धि-दाता प्रभू के गुणों का) विचार करता है। ऐसा ज्ञानवान मनुष्य प्रभू की हजूरी में कबूल हो जाता है।4।30।
सिरीरागु महला 1 घरु 4 ॥
तू दरीआउ दाना बीना मै मछुली कैसे अंतु लहा ॥
जह जह देखा तह तह तू है तुझ ते निकसी फूटि मरा ॥1॥
न जाणा मेउ न जाणा जाली ॥
जा दुखु लागै ता तुझै समाली ॥1॥ रहाउ ॥
तू भरपूरि जानिआ मै दूरि ॥
जो कछु करी सु तेरै हदूरि ॥
तू देखहि हउ मुकरि पाउ ॥
तेरै कंमि न तेरै नाइ ॥2॥
जेता देहि तेता हउ खाउ ॥
बिआ दरु नाही कै दरि जाउ ॥
नानकु एक कहै अरदासि ॥
जीउ पिंडु सभु तेरै पासि ॥3॥
आपे नेड़ै दूरि आपे ही आपे मंझि मिआनोु ॥
आपे वेखै सुणे आपे ही कुदरति करे जहानोु ॥
जो तिसु भावै नानका हुकमु सोई परवानोु ॥4॥31॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 4 ॥ हे प्रभू ! आप (एक) दरिया के (समान) है, मैं (आपके में रहने वाली) एक छोटी सी मछली हूं। मैं आपका आखिरी छोर नहीं ढूंढ सकती। (मेरी हालत) आप ही जानता है, आप ही (नित्य) देखता है। मैं (मछली और दरिया में) जहां देखती हूं उधर आप ही आप (दरिया ही दरिया) है। अगर मैं दरिया में से बाहर निकल जाऊँ, तो उस वक्त तड़फ के मर जाती हूं (मेरा जीवन आपके ही आसरे है)।1। (हे दरिया रूपी प्रभू! आपसे विछोड़ने वाले) ना मुझे माछी की समझ है, ना ही एसके जाल की (उनसे बचना मेरे बस की बात नहीं)। (आपसे बिछोड़ने के वास्ते) जब मुझे कोई (आत्मिक) दुख व्यापता है, तो मैं आपको याद करती हूं।1।रहाउ। हे प्रभू ! आप (इस जगत में) हर जगह मौजूद है। मैंने आपको कहीं दूर बसा हुआ समझा हुआ है (असलीयत ये है कि) जो कुछ मैं करता हूँ, वह आपकी हजूरी में ही कर रहा हूँ। आप सब कुछ देखता है। (फिर भी) मैं अपने किये काम से मुकर जाता हूँ। मैं ना उस काम में लगता हूँ जो आपको परवान हों, ना ही मैं आपके नाम में जुड़ता हूँ।2। हे प्रभू! जो कुछ आप मुझे देता है, मैं वही खाता हूँ। कोई और दरवाजा नहीं है जहां मैं जाऊँ (और सवाली बनूँ)। नानक सिर्फ इतनी विनती करता है कि ये जीवात्मा आपकी ही दी हुई हैये शरीर भी आपका ही दिया हुआ है, ये सब कुछ आपके ही आसरे रह सकता है।3। प्रभू खुद ही हरेक जीव के नजदीक है, खुद ही दूर भी है। खुद ही सारे जगत में मौजूद है। प्रभू खुद ही हरेक जीव की संभाल करता है, खुद ही हरेक की अरजोई सुनता है, खुद ही अपनी कुदरत से सत्ता से जगत को पैदा करता है। हे नानक! जो हुकम (हुक्म) उसको ठीक लगता है, वही हरेक जीव को कबूल करना पड़ता है।4।31।
सिरीरागु महला 1 घरु 4 ॥
कीता कहा करे मनि मानु ॥
देवणहारे कै हथि दानु ॥
भावै देइ न देई सोइ ॥
कीते कै कहिऐ किआ होइ ॥1॥
आपे सचु भावै तिसु सचु ॥
अंधा कचा कचु निकचु ॥1॥ रहाउ ॥
जा के रुख बिरख आराउ ॥
जेही धातु तेहा तिन नाउ ॥
फुलु भाउ फलु लिखिआ पाइ ॥
आपि बीजि आपे ही खाइ ॥2॥
कची कंध कचा विचि राजु ॥
मति अलूणी फिका सादु ॥
नानक आणे आवै रासि ॥
विणु नावै नाही साबासि ॥3॥32॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 4 ॥ प्रभू का पैदा किया हुआ जीव अपने मन में (माया का) क्या मान कर सकता है? (दुनिया के पदार्थों का) बटवारा (की ताकत) दातार प्रभू के अपने हाथ में है। उसकी मर्जी है कि धन पदार्थ दे या ना दे। पैदा किये जीव के कहने से कुछ नहीं बन सकता।1। परमात्मा सदा स्थिर रहने वाला है। उसे सदा स्थिर रहने वाला (अपना नाम) ही पसंद आता है। पर ज्ञानहीन जीव (माया की मलकियत के कारण) होछा है, सदा होछा ही रहता है (प्रभू को ये होछापन पसंद नहीं आ सकता)।1।रहाउ। जिस परमात्मा के (पैदा किये हुए यह) पेड़-पौधे हैं वह ही इन्हें सजावट देता है। जैसी वृक्षों की असलियत होती है वैसा ही उनका नाम पड़ जाता है। (वैसे ही उनमें फल-फूल पनपते हैं)। (इस तरह जैसी) भावना के फूल (किसी मनुष्य के अंदर है) उसी अनुसार उसको जीवन फल लगता है। (उसका जीवन बनता है)। हरेक इन्सान जो कुछ खुद बीजता है, खुद ही खाता है (जैसे कर्म करता है वैसा ही जीवन बनता है)।2। जिस मनुष्य के अंदर अन्जान मन (जीवन निर्माण करने वाला) राज-मिस्त्री (कारीगर) है, उसकी जीवन निर्माण की दीवार भी कच्ची (कमजोर) ही बनती है। उसकी अक्ल भी फीकी व उसका सारा जीवन भी फीका (बे-रसा) ही रहता है। (पर जीव के क्या बस?) हे नानक! अगर प्रभू खुद जीव के जीवन को सुधारे तोही सुधरता है। (वर्ना) प्रभू के नाम से वंचित रहके उसकी हजूरी में आदर नहीं मिलता।3।32।
सिरीरागु महला 1 घरु 5 ॥
अछल छलाई नह छलै नह घाउ कटारा करि सकै ॥
जिउ साहिबु राखै तिउ रहै इसु लोभी का जीउ टल पलै ॥1॥
बिनु तेल दीवा किउ जलै ॥1॥ रहाउ ॥
पोथी पुराण कमाईऐ ॥ भउ वटी इतु तनि पाईऐ ॥
सचु बूझणु आणि जलाईऐ ॥2॥
इहु तेलु दीवा इउ जलै ॥
करि चानणु साहिब तउ मिलै ॥1॥ रहाउ ॥
इतु तनि लागै बाणीआ ॥
सुखु होवै सेव कमाणीआ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 5 ॥ अछल माया, जिसको कोई छलने का यतन करे तो भी वह छली नहीं जाती। जिसको किसी की कटार कोई जख्म नहीं कर सकती (जिसे कोई मार नहीं सकता) – मालिक प्रभू की रजा इसी तरह की है (भाव, जगत में नियम ही ये है कि जहां नाम नहीं वहां मन माया के आगे डोल जाता है) के आगे लोभी जीव का मन डोल जाता है।1। (सिमरन के) तेल के बिना (आत्मिक जीवन का) दिया कैसे टहकता रह सकता है? (माया मोह की अंधेरी के झोके जीवात्मा को अडोल नहीं रहने देते) 1।रहाउ। धर्म पुस्तकों के हिसाब से जीवन बनाएं (ये हो तेल), परमात्मा का डर-ये शरीर (दिए, दीपक) में बाती डाल दें, परमात्मा के साथ गहरी सांझ (ये हो आग) के साथ जलाएं।2। ये नाम तेल हो, तभी इस जीवन का दीपक टहकता है। (हे भाई!) प्रभू के नाम का प्रकाश कर, तभी मालिक प्रभू के दर्शन होते हैं।1।रहाउ। (जिस मनुष्य को) इस शरीर में गुरू का उपदेश असर करता है। (प्रभू की) सेवा करने से (सिमरन करने से) उसको आत्मिक आनंद मिलता है।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैसी सूझ (प्रभू जीवों को देता है) वैसा ही जीवन रास्ता वे पकड़ लेते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।