लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 258 · गउड़ी

इस पृष्ठ पर
अंग
258
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · 11 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. निधि निधान हरि अंम्रित पूरे ॥
  2. पति राखी गुरि पारब्रहम तजि परपंच मोह बिकार ॥
  3. पपा परमिति पारु न पाइआ ॥
  4. फाहे काटे मिटे गवन फतिह भई मनि जीत ॥
  5. फफा फिरत फिरत तू आइआ ॥
  6. बिनउ सुनहु तुम पारब्रहम दीन दइआल गुपाल ॥
  7. बबा ब्रहमु जानत ते ब्रहमा ॥
  8. भै भंजन अघ दूख नास मनहि अराधि हरे ॥
  9. भभा भरमु मिटावहु अपना ॥
  10. माइआ डोलै बहु बिधी मनु लपटिओ तिह संग ॥
  11. ममा मागनहार इआना ॥

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

निधि निधान हरि अंम्रित पूरे ॥

अंग 257 से चला आ रहा अंश

निधि निधान हरि अंम्रित पूरे ॥
तह बाजे नानक अनहद तूरे ॥36॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! जो हृदय शुभ-गुणों के खजाने हरी-नाम अंमृत से भरे रहते हैं। उनके अंदर एक ऐसा आनंद बना रहता है जैसे एक-रस सब किस्मों के बाजे एक साथ मिल के बज रहे हों। 36।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

पति राखी गुरि पारब्रहम तजि परपंच मोह बिकार ॥

सलोकु ॥
पति राखी गुरि पारब्रहम तजि परपंच मोह बिकार ॥
नानक सोऊ आराधीऐ अंतु न पारावारु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ जिस मनुष्य की इज्जत गुरू पारब्रहम ने रख ली। उस ने ठगी मोह विकार (आदि) त्याग दिए। हे नानक! (इस वास्ते) उस पारब्रहम को सदा आराधना चाहिए जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसकी हस्ती का इस पार उस पार (छोर) नहीं ढूँढा जा सकता। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

पपा परमिति पारु न पाइआ ॥

पउड़ी ॥
पपा परमिति पारु न पाइआ ॥
पतित पावन अगम हरि राइआ ॥
होत पुनीत कोट अपराधू ॥
अंम्रित नामु जपहि मिलि साधू ॥
परपच ध्रोह मोह मिटनाई ॥
जा कउ राखहु आपि गुसाई ॥
पातिसाहु छत्र सिर सोऊ ॥
नानक दूसर अवरु न कोऊ ॥37॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हरी प्रभू अपहुँच है। उसकी हस्ती का अंदाजा नहीं लग सकता। विकारों में गिरे हुए लोगों को पवित्र करने वाला है। अंत नहीं पाया जा सकता। करोड़ों ही वह अपराधी पवित्र हो जाते हैं जो गुरू को मिल के प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम जपते हैं। आपकी सिफत सालाह की बरकति से उसके अंदर से ठॅगी-फरेब-मोह आदि विकार मिट जाते हैं। हे सृष्टि के मालिक! जिस मनुष्य की आप खुद रक्षा करते हैं। हे नानक! प्रभू शाहों का शाह है। वही असल छत्र धारी है। कोई और दूसरा उसकी बराबरी करने के लायक नहीं। 37।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

फाहे काटे मिटे गवन फतिह भई मनि जीत ॥

सलोकु ॥
फाहे काटे मिटे गवन फतिह भई मनि जीत ॥
नानक गुर ते थित पाई फिरन मिटे नित नीत ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक! अगर अपने मन को जीत लें। (वश में कर लें) तो (विकारों पर) जीत प्राप्त हो जाती है। माया के मोह के बंधन काटे जाते हैं। और (माया के पीछे की) भटकना समाप्त हो जाती है। जिस मनुष्य को गुरू से मन की अडोलता मिल जाती है। उसके जनम मरन के चक्कर सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

फफा फिरत फिरत तू आइआ ॥

पउड़ी ॥
फफा फिरत फिरत तू आइआ ॥
द्रुलभ देह कलिजुग महि पाइआ ॥
फिरि इआ अउसरु चरै न हाथा ॥
नामु जपहु तउ कटीअहि फासा ॥
फिरि फिरि आवन जानु न होई ॥
एकहि एक जपहु जपु सोई ॥
करहु क्रिपा प्रभ करनैहारे ॥
मेलि लेहु नानक बेचारे ॥38॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे भाई!) आप अनेकों जूनियों में भटकते आए हैं। अब आपको संसार में ये मानस जनम मिला है। जो बड़ी मुश्किल से ही मिला करता है। (अगर आप अब भी विकारों के बंधनों में फंसे रहे, तो) ऐसा (सुंदर) मौका फिर नहीं मिलेगा। (हे भाई!) अगर आप प्रभू का नाम जपेंगे, तो माया वाले सारे बंधन काटे जाएंगे। बार बार जनम मरन का चक्कर नहीं रह जाएगा। केवल एक परमात्मा का नाम जपा करें। (पर) हे नानक! (प्रभू के आगे अरदास करें और कहें) हे सृजनहार प्रभू! (माया-ग्रसित जीव के वश की बात नहीं)। आप स्वयं कृपा करें। और इस बिचारे को अपने चरणों में जोड़ लें। 38।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

बिनउ सुनहु तुम पारब्रहम दीन दइआल गुपाल ॥

सलोकु ॥
बिनउ सुनहु तुम पारब्रहम दीन दइआल गुपाल ॥
सुख संपै बहु भोग रस नानक साध रवाल ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक! (अरदास करें और कहें) हे पारब्रहम! हे दीनों पर दया करने वाले! हे धरती के पालनहार! मेरी विनती सुनें। (मुझे सबुद्धि दें कि) गुरमुखों की चरण धूड़ ही मुझे अनेकों सुखों, धन-पदार्थों व अनेकों रसों के भोग के बराबर प्रतीत हो। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

बबा ब्रहमु जानत ते ब्रहमा ॥

पउड़ी ॥
बबा ब्रहमु जानत ते ब्रहमा ॥
बैसनो ते गुरमुखि सुच धरमा ॥
बीरा आपन बुरा मिटावै ॥
ताहू बुरा निकटि नही आवै ॥
बाधिओ आपन हउ हउ बंधा ॥
दोसु देत आगह कउ अंधा ॥
बात चीत सभ रही सिआनप ॥
जिसहि जनावहु सो जानै नानक ॥39॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ असल ब्राहमण वो हैं। जो ब्रहम (परमात्मा) के साथ सांझ डालते हैं। असल वैश्णव वे हैं जो गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक पवित्रता के फर्ज को पालते हैं। वह मनुष्य शूरवीर जानें जो (बनाए हुए वैरियों का खुरा खोज मिटाने की जगह) अपने अंदर से दूसरों का बुरा मांगने का स्वभाव का निशान मिटा दे। (जिस ने ये कर लिया) दूसरों की ओर से चितवी बुराई उसके पास नहीं फटकती। (पर मनुष्य) खुद ही अपने अहंकार के बंधनों में बंधा रहता है (और दूसरों के साथ उलझता है। अपने द्वारा की ज्यादती का ख्याल तक नहीं आता। किसी भी नुकसान का) दोष अंधा मनुष्य औरों पर लगाता है। (पर) हे नानक! (ऐसा स्वाभाव बनाने के लिए) निरी ज्ञान की बातें और समझदारियों की पेश नहीं चलती। (प्रभू के आगे अरदास करें और कहें) हे प्रभू! जिसे आप इस सुचॅजे जीवन की सूझ बख्शते हैं वही समझता है। 39।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

भै भंजन अघ दूख नास मनहि अराधि हरे ॥

सलोकु ॥
भै भंजन अघ दूख नास मनहि अराधि हरे ॥
संतसंग जिह रिद बसिओ नानक ते न भ्रमे ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (हे भाई! सब पापों के) हरने वाले को अपने मन में याद रखें। वही सारे डरों को दूर करने वाला है। वही सारे पापों दुखों का नाश करने वाला है। हे नानक! सतसंग में रह के जिन मनुष्यों के हृदय में हरी आ टिकता है। वह पापों विकारों की भटकना में नहीं पड़ते। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

भभा भरमु मिटावहु अपना ॥

पउड़ी ॥
भभा भरमु मिटावहु अपना ॥
इआ संसारु सगल है सुपना ॥
भरमे सुरि नर देवी देवा ॥
भरमे सिध साधिक ब्रहमेवा ॥
भरमि भरमि मानुख डहकाए ॥
दुतर महा बिखम इह माए ॥
गुरमुखि भ्रम भै मोह मिटाइआ ॥
नानक तेह परम सुख पाइआ ॥40॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ इसके पीछे भटकने की बाण मिटा दें। (हे भाई!) जैसे सपना है (जैसे सपने में कई पदार्थों से मेल जोल होता है पर जागते ही वह साथ समाप्त हो जाता है), वैसे ही इस सारे संसार का साथ है। (इस माया के चोज-तमाशों की खातिर) स्वर्गीय जीव, मनुष्य, देवी, देवते दुखी होते (सुने जाते) रहे और ब्रहमा जैसे योग साधना में माहिर जोगी, साधक, भटक रहे है (धरती के) लोग (मायावी पदार्थों की खातिर) भटक-भटक के धोखे में आते चले आ रहे हैं। ये माया एक ऐसा महा-मुश्किल (समुंद्र) है (जिस में) तैरना बहुत ही कठिन है। जिन लोगों ने गुरू की शरण पड़ कर (माया के पीछे की) भटकना। सहम व मोह (को अपने अंदर से) मिटा लिया। हे नानक! उन्होंने सबसे श्रेष्ठ आत्मिक आनंद हासिल कर लिया है। 40।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

माइआ डोलै बहु बिधी मनु लपटिओ तिह संग ॥

सलोकु ॥
माइआ डोलै बहु बिधी मनु लपटिओ तिह संग ॥
मागन ते जिह तुम रखहु सु नानक नामहि रंग ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ मनुष्य का मन कई तरीकों से माया की खातिर ही डोलता रहता है। माया के साथ ही चिपका रहता है। हे नानक! (प्रभू के आगे अरदास करें और कहें) हे प्रभू! जिस मनुष्य को आप निरी माया ही मांगने से रोक लेते हैं वह आपके नाम से प्यार पा लेता है। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

ममा मागनहार इआना ॥

पउड़ी ॥
ममा मागनहार इआना ॥
देनहार दे रहिओ सुजाना ॥
जो दीनो सो एकहि बार ॥
मन मूरख कह करहि पुकार ॥
जउ मागहि तउ मागहि बीआ ॥
जा ते कुसल न काहू थीआ ॥
मागनि माग त एकहि माग ॥
नानक जा ते परहि पराग ॥41॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ बेसमझ जीव हर वक्त (माया ही माया) मांगता रहता है (ये नहीं समझता कि) सबके दिलों की जानने वाला दातार (सब पदार्थ) दिए जा रहा है। उसने सब कुछ एक ही बार में दे दिया हुआ है (उसकी दी दातें तो कभी खतम होने वाली ही नहीं हैं।) हे मूर्ख मन! आप क्यूं सदा माया के वास्ते गिड़गिड़ा रहे हैं? (हे मूर्ख!) आप जब भी माँगते हैं (नाम के बिना) और और चीजें ही माँगते रहते हैं। जिनसे कभी किसी को भी आत्मिक सुख नहीं मिला। हे नानक! (कहें, हे मूर्ख मन!) अगर आपने मांग मांगनी ही है तो प्रभू का नाम ही मांगें। जिसकी बरकति से आप मायावी पदार्थों की मांग से ऊपर उठ जाएँ। 41।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 258 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।