गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जो हृदय शुभ-गुणों के खजाने हरी-नाम अंमृत से भरे रहते हैं। उनके अंदर एक ऐसा आनंद बना रहता है जैसे एक-रस सब किस्मों के बाजे एक साथ मिल के बज रहे हों। 36।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ जिस मनुष्य की इज्जत गुरू पारब्रहम ने रख ली। उस ने ठगी मोह विकार (आदि) त्याग दिए। हे नानक ! (इस वास्ते) उस पारब्रहम को सदा आराधना चाहिए जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसकी हस्ती का इस पार उस पार (छोर) नहीं ढूँढा जा सकता। 1।
पउड़ी ॥ पपा परमिति पारु न पाइआ ॥ पतित पावन अगम हरि राइआ ॥ होत पुनीत कोट अपराधू ॥ अंम्रित नामु जपहि मिलि साधू ॥ परपच ध्रोह मोह मिटनाई ॥ जा कउ राखहु आपि गुसाई ॥ पातिसाहु छत्र सिर सोऊ ॥ नानक दूसर अवरु न कोऊ ॥37॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- हरी प्रभू अपहुँच है। उसकी हस्ती का अंदाजा नहीं लग सकता। विकारों में गिरे हुए लोगों को पवित्र करने वाला है। अंत नहीं पाया जा सकता। करोड़ों ही वह अपराधी पवित्र हो जाते हैं जो गुरू को मिल के प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम जपते हैं। आपकी सिफत सालाह की बरकति से उसके अंदर से ठॅगी-फरेब-मोह आदि विकार मिट जाते हैं। हे सृष्टि के मालिक ! जिस मनुष्य की आप खुद रक्षा करता है। हे नानक ! प्रभू शाहों का शाह है। वही असल छत्र धारी है। कोई और दूसरा उसकी बराबरी करने के लायक नहीं। 37।
सलोकु ॥ फाहे काटे मिटे गवन फतिह भई मनि जीत ॥ नानक गुर ते थित पाई फिरन मिटे नित नीत ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! अगर अपने मन को जीत लें। (वश में कर लें) तो (विकारों पर) जीत प्राप्त हो जाती है। माया के मोह के बंधन काटे जाते हैं। और (माया के पीछे की) भटकना समाप्त हो जाती है। जिस मनुष्य को गुरू से मन की अडोलता मिल जाती है। उसके जनम मरन के चक्कर सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। 1।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) आप अनेकों जूनियों में भटकता आया है। अब आपको संसार में ये मानस जनम मिला है। जो बड़ी मुश्किल से ही मिला करता है। (अगर आप अब भी विकारों के बंधनों में फंसा रहा। तो) ऐसा (सुंदर) मौका फिर नहीं मिलेगा। (हे भाई !) अगर आप प्रभू का नाम जपेगा। तो माया वाले सारे बंधन काटे जाएंगे। बार बार जनम मरन का चक्कर नहीं रह जाएगा। केवल एक परमात्मा का नाम जपा कर। (पर) हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर और कह) हे सृजनहार प्रभू ! (माया-ग्रसित जीव के वश की बात नहीं)। आप स्वयं कृपा कर। और इस बिचारे को अपने चरणों में जोड़ ले। 38।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! (अरदास कर और कह) हे पारब्रहम ! हे दीनों पर दया करने वाले ! हे धरती के पालनहार ! मेरी विनती सुन। (मुझे सबुद्धि दे कि) गुरमुखों की चरण धूड़ ही मुझे अनेकों सुखों, धन-पदार्थों व अनेकों रसों के भोग के बराबर प्रतीत हो। 1।
पउड़ी ॥ बबा ब्रहमु जानत ते ब्रहमा ॥ बैसनो ते गुरमुखि सुच धरमा ॥ बीरा आपन बुरा मिटावै ॥ ताहू बुरा निकटि नही आवै ॥ बाधिओ आपन हउ हउ बंधा ॥ दोसु देत आगह कउ अंधा ॥ बात चीत सभ रही सिआनप ॥ जिसहि जनावहु सो जानै नानक ॥39॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- असल ब्राहमण वो हैं। जो ब्रहम (परमात्मा) के साथ सांझ डालते हैं। असल वैश्णव वे हैं जो गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक पवित्रता के फर्ज को पालते हैं। वह मनुष्य शूरवीर जानो जो (बनाए हुए वैरियों का खुरा खोज मिटाने की जगह) अपने अंदर से दूसरों का बुरा मांगने का स्वभाव का निशान मिटा दे। (जिस ने ये कर लिया) दूसरों की ओर से चितवी बुराई उसके पास नहीं फटकती। (पर मनुष्य) खुद ही अपने अहंकार के बंधनों में बंधा रहता है (और दूसरों के साथ उलझता है। अपने द्वारा की ज्यादती का ख्याल तक नहीं आता। किसी भी नुकसान का) दोष अंधा मनुष्य औरों पर लगाता है। (पर) हे नानक ! (ऐसा स्वाभाव बनाने के लिए) निरी ज्ञान की बातें और समझदारियों की पेश नहीं चलती। (प्रभू के आगे अरदास कर और कह) हे प्रभू ! जिसे आप इस सुचॅजे जीवन की सूझ बख्शता है वही समझता है। 39।
सलोकु ॥ भै भंजन अघ दूख नास मनहि अराधि हरे ॥ संतसंग जिह रिद बसिओ नानक ते न भ्रमे ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (हे भाई ! सब पापों के) हरने वाले को अपने मन में याद रख। वही सारे डरों को दूर करने वाला है। वही सारे पापों दुखों का नाश करने वाला है। हे नानक ! सतसंग में रह के जिन मनुष्यों के हृदय में हरी आ टिकता है। वह पापों विकारों की भटकना में नहीं पड़ते। 1।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- इसके पीछे भटकने की बाण मिटा दो। (हे भाई !) जैसे सपना है (जैसे सपने में कई पदार्थों से मेल जोल होता है पर जागते ही वह साथ समाप्त हो जाता है)। वैसे ही इस सारे संसार का साथ है। (इस माया के चोज-तमाशों की खातिर) स्वर्गीय जीव, मनुष्य, देवी, देवते दुखी होते (सुने जाते) रहे और ब्रहमा जैसे योग साधना में माहिर जोगी, साधक, भटक रहे है (धरती के) लोग (मायावी पदार्थों की खातिर) भटक-भटक के धोखे में आते चले आ रहे हैं। ये माया एक ऐसा महा-मुश्किल (समुंद्र) है (जिस में) तैरना बहुत ही कठिन है। जिन लोगों ने गुरू की शरण पड़ कर (माया के पीछे की) भटकना। सहम व मोह (को अपने अंदर से) मिटा लिया। हे नानक ! उन्होंने सबसे श्रेष्ठ आत्मिक आनंद हासिल कर लिया है। 40।
सलोकु ॥ माइआ डोलै बहु बिधी मनु लपटिओ तिह संग ॥ मागन ते जिह तुम रखहु सु नानक नामहि रंग ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ मनुष्य का मन कई तरीकों से माया की खातिर ही डोलता रहता है। माया के साथ ही चिपका रहता है। हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर और कह) हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप निरी माया ही मांगने से रोक लेता है वह आपके नाम से प्यार पा लेता है। 1।
पउड़ी ॥ ममा मागनहार इआना ॥ देनहार दे रहिओ सुजाना ॥ जो दीनो सो एकहि बार ॥ मन मूरख कह करहि पुकार ॥ जउ मागहि तउ मागहि बीआ ॥ जा ते कुसल न काहू थीआ ॥ मागनि माग त एकहि माग ॥ नानक जा ते परहि पराग ॥41॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- बेसमझ जीव हर वक्त (माया ही माया) मांगता रहता है (ये नहीं समझता कि) सबके दिलों की जानने वाला दातार (सब पदार्थ) दिए जा रहा है। उसने सब कुछ एक ही बार में दे दिया हुआ है (उसकी दी दातें तो कभी खतम होने वाली ही नहीं हैं।) हे मूर्ख मन ! आप क्यूं सदा माया के वास्ते गिड़गिड़ा रहा है? (हे मूर्ख !) आप जब भी मांगता है (नाम के बिना) और और चीजें ही मांगता रहता है। जिनसे कभी किसी को भी आत्मिक सुख नहीं मिला। हे नानक ! (कह, हे मूर्ख मन !) अगर तूने मांग मांगनी ही है तो प्रभू का नाम ही मांग। जिसकी बरकति से आप मायावी पदार्थों की मांग से ऊपर उठ जाए। 41।
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जो हृदय शुभ-गुणों के खजाने हरी-नाम अंमृत से भरे रहते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।