सलोक ॥ मति पूरी परधान ते गुर पूरे मन मंत ॥ जिह जानिओ प्रभु आपुना नानक ते भगवंत ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ जिन मनुष्यों के मन में पूरे गुरू का उपदेश बस जाता है। उनकी अक्ल (जीवन राह की) पूरी (समझ वाली) हो जाती है। वह (औरों को भी शिक्षा देने में) माहिर व माने पहचाने हो जाते हैं। जिन्होंने प्यारे प्रभू के साथ गहरी सांझ बना ली है। वे भाग्यशाली हैं। 1।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- जिस मनुष्य ने ईश्वर का ये भेद पा लिया (कि वह सदा अंग-संग है) वह साध-संगति में मिल के (इस पाए भेद के बारे में) पूरा यकीन बना लेता है। उसके हृदय में दुख और सुख एक समान प्रतीत होने लग पड़ते हैं (क्योंकि ये उसे अंग-संग बसते प्रभू द्वारा आए दिखते हैं। इस वास्ते) वह दुखों से आई घबराहट और सुखों से आई बहुत खुशी में फंसने से बच जाता है। वह उसके संग भी है और माया के प्रभाव से परे भी। उसे व्यापक प्रभू हरेक हृदय में बसता दिखता है (ईश्वर की सर्व-व्याप्तता के यकीन से पैदा हुए) आत्मिक रस से उसे ऐसा सुख मिलता है कि हे नानक ! माया उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। 42।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मित्रो ! हे सज्जनो ! सुनो। परमात्मा का नाम जपे बिना माया के बंधनों से छुटकारा नहीं मिलता। हे नानक ! जो लोग गुरू की चरणी पड़ते हैं। उनके (माया के मोह के) बंधन काटे जाते हैं। 1।
पवड़ी ॥ यया जतन करत बहु बिधीआ ॥ एक नाम बिनु कह लउ सिधीआ ॥ याहू जतन करि होत छुटारा ॥ उआहू जतन साध संगारा ॥ या उबरन धारै सभु कोऊ ॥ उआहि जपे बिनु उबर न होऊ ॥ याहू तरन तारन समराथा ॥ राखि लेहु निरगुन नरनाथा ॥ मन बच क्रम जिह आपि जनाई ॥ नानक तिह मति प्रगटी आई ॥43॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: पवड़ी- मनुष्य (माया के मोह के बंधनों से छुटकारा पाने के लिए) कई तरह के यत्न करता है। पर परमात्मा का नाम जपे बिना बिल्कुल कामयाबी नहीं हो सकती। जिन प्रयत्नों से (इन बंधनों से) खलासी हो सकती है। वो प्रयत्न यही हैं कि साध-संगति करो। हर कोई (माया के बंधनों से) बचने के तरीके (अपने मन में) धारता है। पर उस प्रभू का नाम जपे बिना खलासी नहीं हो सकती। आप खुद ही जीवों को (संसार-समुंद्र में से) पार उतारने के लिए जहाज है। आप ही तैराने के समर्थ है। (हे भाई ! प्रभू दर पे प्रार्थना ही करनी चाहिए कि) हे जीवों के नाथ ! हम गुण-हीनों को बचा ले। हे नानक ! जिन लोगों के मन में बचनों में व कर्मों में प्रभू खुद (माया के मोह से बचने वाली) सूझ पैदा करता है। उनकी मति उज्जवल हो जाती है (और वे बंघनों से बच निकलते हैं)। 43।
सलोकु ॥ रोसु न काहू संग करहु आपन आपु बीचारि ॥ होइ निमाना जगि रहहु नानक नदरी पारि ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (हे भाई !) किसी और से गुस्सा ना करो। (इसकी जगह) अपने आप को विचारो (आत्मचिंतन करो) (खुद को सुधारो। कि किसी से झगड़ने में अपना क्या-क्या दोष है)। हे नानक ! अगर आप जगत में धैर्य-स्वभाव वाला बन के रहे। तो प्रभू की नजर से इस संसार समुंद्र में से पार लांघ जाएगा (जिसमें क्रोध की बेअंत लहरें बह रही हैं)। 1।
पउड़ी ॥ रारा रेन होत सभ जा की ॥ तजि अभिमानु छुटै तेरी बाकी ॥ रणि दरगहि तउ सीझहि भाई ॥ जउ गुरमुखि राम नाम लिव लाई ॥ रहत रहत रहि जाहि बिकारा ॥ गुर पूरे कै सबदि अपारा ॥ राते रंग नाम रस माते ॥ नानक हरि गुर कीनी दाते ॥44॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- सारी दुनिया जिस गुरू की चरण धूड़ होती है। आप भी उसके आगे अपने मन का अहंकार दूर कर। आपके अंदर से क्रोध के संस्कारों का लेखा समाप्त हैं जाए। हे भाई ! इस जगत रण-भूमि में और प्रभू की हजूरी में तभी कामयाब होंगे। जब गुरू की शरण पड़ कर प्रभू के नाम में सुरति जोड़ेगा। विकार सहजे सहजे दूर हो जाते हैं- पूरे गुरू के बेअंत शबद में जुड़ने से वे प्रभू के नाम के प्यार में रंगे रहते हैं। हे नानक ! जिन लोगों को गुरू ने हरी नाम की दाति दी है।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (साधारण तौर पर हमारे) इस शरीर में लालच, झूठ विकारों और रोगों का ही जोर रहता है; (पर) हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक जीवन देने वाला हरी नाम रस पी लिया। वह आत्मिक आनंद में टिका रहता है। 1।
पउड़ी ॥ लला लावउ अउखध जाहू ॥ दूख दरद तिह मिटहि खिनाहू ॥ नाम अउखधु जिह रिदै हितावै ॥ ताहि रोगु सुपनै नही आवै ॥ हरि अउखधु सभ घट है भाई ॥ गुर पूरे बिनु बिधि न बनाई ॥ गुरि पूरै संजमु करि दीआ ॥ नानक तउ फिरि दूख न थीआ ॥45॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मुझे यकीन है कि अगर किसी को (प्रभू के नाम की) दवा दी जाए। एक क्षण में ही उसके (आत्मिक) दुख-दर्द मिट जाते हैं। जिस मनुष्य को अपने हृदय में रोग-नाशक प्रभू का नाम प्यारा लगने लग पड़े। सपने में भी कोई (आत्मिक) रोग (विकार) उसके नजदीक नहीं फटकता। हे भाई ! हरी नाम दवा हरेक के हृदय में मौजूद है। पर पूरे गुरू के बिना (इस्तेमाल का) तरीका कामयाब नहीं होता। हे नानक ! पूरे गुरू ने (इस दवाई के इस्तेमाल के लिए) परहेज नीयत कर दिया है। (जो मनुष्य उस परहेज अनुसार दवाई लेता है) उसे मुड़ (कोई विकार) दुख छू नहीं सकता। 45।
सलोकु ॥ वासुदेव सरबत्र मै ऊन न कतहू ठाइ ॥ अंतरि बाहरि संगि है नानक काइ दुराइ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! परमात्मा सब जगह मौजूद है। किसी भी जगह उसका अस्तित्व ना हो ऐसा नहीं हैं। सब जीवों के अंदर व चारों तरफ प्रभू अंग-संग है। (उससे) कुछ भी छुपा हुआ नहीं हो सकता। 1।
पउड़ी ॥ ववा वैरु न करीऐ काहू ॥ घट घट अंतरि ब्रहम समाहू ॥ वासुदेव जल थल महि रविआ ॥ गुर प्रसादि विरलै ही गविआ ॥ वैर विरोध मिटे तिह मन ते ॥ हरि कीरतनु गुरमुखि जो सुनते ॥ वरन चिहन सगलह ते रहता ॥ नानक हरि हरि गुरमुखि जो कहता ॥46॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- किसी के साथ भी (कोई) वैर नहीं करना चाहिए। हरेक शरीर में परमात्मा समाया हुआ है परमात्मा पानी में धरती में (जॅरे-जॅरे में) व्यापक है। पर किसी विरले ने ही गुरू की कृपा से (उस प्रभू तक) पहुँच हासिल की है। उनके मन में से वैर-विरोध मिट जाते हैं। 46। जो उसकी सिफत सालाह सुनते हैं। परमात्मा जाति-पाति, रूप रेख से न्यारा है (उसकी कोई जाति पाति कोई रूप रेखा बयान नही की जा सकती)। हे नानक ! गुरमुख मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर उस हरी को सिमरते हैं।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सलोकु ॥ जिन मनुष्यों के मन में पूरे गुरू का उपदेश बस जाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।