त्रास मिटै जम पंथ की जासु बसै मनि नाउ ॥ गति पावहि मति होइ प्रगास महली पावहि ठाउ ॥ ताहू संगि न धनु चलै ग्रिह जोबन नह राज ॥ संतसंगि सिमरत रहहु इहै तुहारै काज ॥ ताता कछू न होई है जउ ताप निवारै आप ॥ प्रतिपालै नानक हमहि आपहि माई बाप ॥32॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के मन में प्रभू का नाम बस पड़े। उसका जमों के रास्ते का डर मिट जाता है (मौत का सहम खत्म हो जाता है)। (हे भाई ! नाम की बरकति से) उच्च आत्मिक अवस्था हासिल करेगा। आपकी बुद्धि रौशन हैं जाएगी। प्रभू चरणों में आपकी सुरति टिकी रहेगी। धन-जवानी-राज किसी चीज ने भी आपके साथ नहीं जाना; सत्संग में रहके प्रभू का नाम सिमरा कर। बस ! यही अंत में आपके काम आएगा। (प्रभू का हैं के रह) जब प्रभू स्वयं दुख-कलेश दूर करने वाला (सिर पर) हैं तो कोई मानसिक कलेश नहीं रह सकता। हे नानक ! (कह) प्रभू खुद माता-पिता की तरह हमारी पालना करता है। 32।
सलोकु ॥ थाके बहु बिधि घालते त्रिपति न त्रिसना लाथ ॥ संचि संचि साकत मूए नानक माइआ न साथ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! माया-ग्रसित जीव माया की खातिर कई तरह की दौड़-भाग करते हैं। पर संतुष्ट नहीं होते। तृष्णा खत्म नहीं होती। माया जोड़-जोड़ के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। माया भी साथ नहीं निभती। 1।
पउड़ी ॥ थथा थिरु कोऊ नही काइ पसारहु पाव ॥ अनिक बंच बल छल करहु माइआ एक उपाव ॥ थैली संचहु स्रमु करहु थाकि परहु गावार ॥ मन कै कामि न आवई अंते अउसर बार ॥ थिति पावहु गोबिद भजहु संतह की सिख लेहु ॥ प्रीति करहु सद एक सिउ इआ साचा असनेहु ॥ कारन करन करावनो सभ बिधि एकै हाथ ॥ जितु जितु लावहु तितु तितु लगहि नानक जंत अनाथ ॥33॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- हे मूर्ख ! किसी ने भी यहाँ सदा बैठे नहीं रहना। क्यूँ पैर पसार रहा है? (क्यूँ माया के पसारे पसार रहा है?) आप सिर्फ माया वास्ते ही कई पापड़ वेल रहा है। अनेकों ठॅगी-फरेब कर रहा है। हे मूर्ख ! आप धन जोड़ रहा है। (धन की खातिर) दौड़-भाग करता है। और थक-टूट जाता है। पर अंत के समय ये धन आपकी जिंद के काम नहीं आएगा। (हे भाई !) गुरमुखों की शिक्षा ध्यान से सुन। परमात्मा का भजन कर। आत्मिक शान्ति (तभी) मिलेगी। सदा सिर्फ परमात्मा से (दिल से) प्रीति बना। यही प्यार सदा कायम रहने वाला है। हरेक सबब आपके हाथ में है। आप ही सब कुछ कर सकता है। (और जीव से) करवा सकता है। (पर) हे नानक ! (कह,हे प्रभू !) ये जीव बिचारे (माया के मुकाबले में बेबस) हैं। जिधर आप इन्हें लगाता है। उधर ही लगते हैं। 33।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! प्रभू के सेवकों ने ये देख लिया है (ये निश्चय कर लिया है) कि हरेक दाति प्रभू खुद ही देने वाला है (इस वास्ते वह माया की टेक रखने की बजाय) प्रभू के दीदार को (अपनी जिंदगी का) आसरा बना के श्वास-श्वास उसे याद करते हैं। 1।
पउड़ी ॥ ददा दाता एकु है सभ कउ देवनहार ॥ देंदे तोटि न आवई अगनत भरे भंडार ॥ दैनहारु सद जीवनहारा ॥ मन मूरख किउ ताहि बिसारा ॥ दोसु नही काहू कउ मीता ॥ माइआ मोह बंधु प्रभि कीता ॥ दरद निवारहि जा के आपे ॥ नानक ते ते गुरमुखि ध्रापे ॥34॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। एक प्रभू ही (ऐसा) दाता है जो सब जीवों को रिजक पहुँचाने के स्मर्थ है। उसके बेअंत खजाने भरे पड़े हैं। बाँटते हुए खजानों में कमी नहीं आती। जो सदा आपके सिर पर मौजूद है हे मूर्ख मन ! आप सदा दातार को क्यूँ भुलाता है ? पर हे मित्र ! किसी जीव को ये दोष भी नहीं दिया जा सकता (कि माया के मोह में फंस के आप दातार को क्यूं बिसर रहा है। दरअसल बात ये है कि जीव के आत्मिक जीवन की राह में) प्रभू ने खुद ही माया के मोह के बाँध बना रखे हैं। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! जिन लोगों के दिल में से आप खुद ही (माया के मोह की) चुभन दूर करता है। वह गुरू की शरण में पड़ कर माया की ओर से तृप्त हो जाते हैं (तृष्णा समाप्त कर लेते हैं)। 34।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मेरी जिंदे ! सिर्फ परमात्मा का आसरा ले। उस के बगैर किसी और (की सहायता) की उम्मीद छोड़ दे। हे नानक ! सदा प्रभू की याद मन में बसानी चाहिए। हरेक काम सफल हो जाता है। 1।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- यदि संतों की संगत में उठना-बैठना हो जाए। तो (माया की खातिर मन की बेसब्री वाली) भटकना मिट जाती है। (पर ये कोई आसान खेल नहीं। हे प्रभू !) जिस जीव पर आप अपने दर से मेहर करता है। उसके मन में जीवन की सही सूझ पड़ती है (और उसकी भटकना समाप्त होती है)। (उसे ये ज्ञान होता है) कि असल सच्चे शाहूकार वे हैं (जिनके पास) सदा स्थिर रहने वाला नाम-धन है। जो हरी-नाम की पूँजी का व्यापार करते हैं। उनके अंदर गंभीरता आती है। वे आदर सत्कार कमाते हैं। जो लोग हरी नाम (ध्यान से) कानों से सुनते हैं। हे नानक ! गुरू के द्वारा जिनके हृदय में प्रभू का नाम बसता है। उन्हें (लोक-परलोक में) मान-सम्मान प्राप्त होता है। 35।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! जिन लोगों ने काम काज करते हुए प्यार से प्रभू का नाम ही जपा है (कभी भी भूले नहीं) उन्हें पूरे गुरू ने परमात्मा अपने नजदीक दिखा दिया है। गुरू की संगति में रह के उन्हें घोर दुख नहीं होता। 1।
पउड़ी ॥ नंना नरकि परहि ते नाही ॥ जा कै मनि तनि नामु बसाही ॥ नामु निधानु गुरमुखि जो जपते ॥ बिखु माइआ महि ना ओइ खपते ॥ नंनाकारु न होता ता कहु ॥ नामु मंत्रु गुरि दीनो जा कहु ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- वे घोर दुखों के गड्ढे में नहीं पड़ते। जिनके मन में तन में प्रभू का नाम बसा रहता है जो लोग गुरू के द्वारा प्रभू नाम को सब पदार्थों का खजाना जान के जपते हैं। वह (फिर) आत्मिक मौत मरने वाली माया (के मोह) में (दौड़-भाग करते) नहीं खपते। उनके जीवन-सफर में (माया) कोई रोक नहीं डाल सकती। जिन्हें गुरू ने नाम मंत्र दे दिया।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस मनुष्य के मन में प्रभू का नाम बस पड़े।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।