गउड़ी बावन अखरी महला 5 ॥
सलोकु ॥
गुरदेव माता गुरदेव पिता गुरदेव सुआमी परमेसुरा ॥
गुरदेव सखा अगिआन भंजनु गुरदेव बंधिप सहोदरा ॥
गुरदेव दाता हरि नामु उपदेसै गुरदेव मंतु निरोधरा ॥
गुरदेव सांति सति बुधि मूरति गुरदेव पारस परस परा ॥
गुरदेव तीरथु अंम्रित सरोवरु गुर गिआन मजनु अपरंपरा ॥
गुरदेव करता सभि पाप हरता गुरदेव पतित पवित करा ॥
गुरदेव आदि जुगादि जुगु जुगु गुरदेव मंतु हरि जपि उधरा ॥
गुरदेव संगति प्रभ मेलि करि किरपा हम मूड़ पापी जितु लगि तरा ॥
गुरदेव सतिगुरु पारब्रहमु परमेसरु गुरदेव नानक हरि नमसकरा ॥1॥
आपहि कीआ कराइआ आपहि करनै जोगु ॥
नानक एको रवि रहिआ दूसर होआ न होगु ॥1॥
ओअं साध सतिगुर नमसकारं ॥
आदि मधि अंति निरंकारं ॥
आपहि सुंन आपहि सुख आसन ॥
आपहि सुनत आप ही जासन ॥
आपन आपु आपहि उपाइओ ॥
आपहि बाप आप ही माइओ ॥
आपहि सूखम आपहि असथूला ॥
लखी न जाई नानक लीला ॥1॥
करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥
तेरे संतन की मनु होइ रवाला ॥ रहाउ ॥
निरंकार आकार आपि निरगुन सरगुन एक ॥
एकहि एक बखाननो नानक एक अनेक ॥1॥
ओअं गुरमुखि कीओ अकारा ॥
एकहि सूति परोवनहारा ॥
भिंन भिंन त्रै गुण बिसथारं ॥
निरगुन ते सरगुन द्रिसटारं ॥
सगल भाति करि करहि उपाइओ ॥
जनम मरन मन मोहु बढाइओ ॥
दुहू भाति ते आपि निरारा ॥
नानक अंतु न पारावारा ॥2॥
सेई साह भगवंत से सचु संपै हरि रासि ॥
नानक सचु सुचि पाईऐ तिह संतन कै पासि ॥1॥
ससा सति सति सति सोऊ ॥
सति पुरख ते भिंन न कोऊ ॥
सोऊ सरनि परै जिह पायं ॥
सिमरि सिमरि गुन गाइ सुनायं ॥
संसै भरमु नही कछु बिआपत ॥
प्रगट प्रतापु ताहू को जापत ॥
सो साधू इह पहुचनहारा ॥
नानक ता कै सद बलिहारा ॥3॥
धनु धनु कहा पुकारते माइआ मोह सभ कूर ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।