Lulla Family

अंग 250

अंग
250
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गउड़ी बावन अखरी महला 5 ॥
सलोकु ॥
गुरदेव माता गुरदेव पिता गुरदेव सुआमी परमेसुरा ॥
गुरदेव सखा अगिआन भंजनु गुरदेव बंधिप सहोदरा ॥
गुरदेव दाता हरि नामु उपदेसै गुरदेव मंतु निरोधरा ॥
गुरदेव सांति सति बुधि मूरति गुरदेव पारस परस परा ॥
गुरदेव तीरथु अंम्रित सरोवरु गुर गिआन मजनु अपरंपरा ॥
गुरदेव करता सभि पाप हरता गुरदेव पतित पवित करा ॥
गुरदेव आदि जुगादि जुगु जुगु गुरदेव मंतु हरि जपि उधरा ॥
गुरदेव संगति प्रभ मेलि करि किरपा हम मूड़ पापी जितु लगि तरा ॥
गुरदेव सतिगुरु पारब्रहमु परमेसरु गुरदेव नानक हरि नमसकरा ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। गउड़ी बावन अखरी महला 5 ॥ श्लोक॥ गुरू ही मां है। गुरू ही पिता है (गुरू ही आत्मिक जन्म देने वाला है)। गुरू मालिक प्रभू का रूप है। गुरू (माया के मोह का) अंधकार नाश करने वाला मित्र है। गुरू ही (तोड़ निभाने वाला) संबंधी व भाई है। गुरू (असली) दाता है जो प्रभू के नाम का उपदेश देता है। गुरू का उपदेश ऐसा है जिस का असर (कोई विकार आदि) गवा नहीं सकते। गुरू शांति सत्य और बुद्धि का स्वरूप है। गुरू एक ऐसा पारस है जिसकी छोह पारस की छोह से श्रेष्ठ है। गुरू (सच्चा) तीर्थ है। अमृत का सरोवर है। गुरू के ज्ञान (-जल) का स्नान (सारे तीर्थों के स्नानों से) बहुत श्रेष्ठ है। गुरू करतार का रूप है। सारे पापों को दूर करने वाला है। गुरू विकारी लोगों (के हृदय) को पवित्र करने वाला है। जब से जगत बना है गुरू शुरू से ही हरेक युग में (परमात्मा के नाम का उपदेश-दाता) है। गुरू का दिया हुआ हरि-नाम मंत्र जप के (संसार-समुंद्र के विकारों की लहरों से) पार लांघ जाते हैं। हे प्रभू ! मेहर कर। हमें गुरू की संगति दे। ता कि हम मूर्ख पापी उसकी संगति में (रह के) तर जाएं। गुरू परमेश्वर पारब्रहम् का रूप है। हे नानक ! हरी के रूप गुरू को (सदा) नमस्कार करनी चाहिए। 1।
सलोकु ॥
आपहि कीआ कराइआ आपहि करनै जोगु ॥
नानक एको रवि रहिआ दूसर होआ न होगु ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ सारी जगत रचना प्रभू ने खुद ही की है। स्वयं ही करने की स्मर्था वाला है। हे नानक ! वह आप ही सारे जगत में व्यापक है। उससे बिना कोई और दूसरा नहीं। 1।पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ओअं साध सतिगुर नमसकारं ॥
आदि मधि अंति निरंकारं ॥
आपहि सुंन आपहि सुख आसन ॥
आपहि सुनत आप ही जासन ॥
आपन आपु आपहि उपाइओ ॥
आपहि बाप आप ही माइओ ॥
आपहि सूखम आपहि असथूला ॥
लखी न जाई नानक लीला ॥1॥
करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥
तेरे संतन की मनु होइ रवाला ॥ रहाउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ उस निरंकार को नमस्कार है जो स्वयं ही गुरू रूप धारण करता है। जो जगत के आरम्भ में भी स्वयं ही था। अब भी स्वयं ही है। जगत के अंत में भी स्वयं ही रहेगा। (जब जगत की हस्ती नहीं होती) निरा एकल-स्वरूप भी वह स्वयं ही होता है। स्वयं ही अपने सूक्ष्म-स्वरूप में टिका होता है। तब अपनी शोभा सुनने वाला भी स्वयं खुद ही होता है। अपने आप को दिखाई देते स्वरूप में लाने वाला भी स्वयं ही है। स्वयं ही (अपना) पिता है। स्वयं ही (अपनी) माँ है। अन-दिखते और दिखते स्वरूप वाला खुद ही है। हे नानक ! (परमात्मा की ये जगत-रचना वाला) खेल बयान नहीं किया जा सकता। 1। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! मेरे पर मेहर कर। मेरा मन आपके संत जनों के चरणों की धूड़ बना रहे।
सलोकु ॥
निरंकार आकार आपि निरगुन सरगुन एक ॥
एकहि एक बखाननो नानक एक अनेक ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक। आकार-रहित परमात्मा स्वयं ही (जगत-) अकार बनाता है। वह स्वयं ही (निरंकार रूप में) माया के तीनों स्वभावों से परे रहता है। और जगत रचना रच के माया के तीनों गुणों वाला हो जाता है। हे नानक ! प्रभू अपने एक स्वरूप से अनेकों रूप बना लेता है। (पर ये अनेक रूप उससे अलग नहीं हैं)। यही कहा जा सकता है कि वह एक खुद ही खुद है। 1।
पउड़ी ॥
ओअं गुरमुखि कीओ अकारा ॥
एकहि सूति परोवनहारा ॥
भिंन भिंन त्रै गुण बिसथारं ॥
निरगुन ते सरगुन द्रिसटारं ॥
सगल भाति करि करहि उपाइओ ॥
जनम मरन मन मोहु बढाइओ ॥
दुहू भाति ते आपि निरारा ॥
नानक अंतु न पारावारा ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ पगुरमुख बनने के वास्ते प्रभू ने जगत-रचना की है। सारे जीव-जंतुओं को अपने एक ही हुकम-धागे में परो के रखने में स्मर्थ है। प्रभू ने अपने अदृष्य रूप से दृष्टमान जगत रचा है। माया के तीनों रूपों का अलग-अलग विस्तार कर दिया है। हे प्रभू ! तूने सारी (अनेकों) किस्में बना के जगत उत्पक्ति की है। जनम-मरन का मूल जीवों के मन का मोह भी तूने ही बढ़ाया है। पर आप स्वयं इस जनम-मरन से अलग है। हे नानक ! (कह) प्रभू के इस छोर व उस छोर का अंत नहीं पाया जा सकता। 2।
सलोकु ॥
सेई साह भगवंत से सचु संपै हरि रासि ॥
नानक सचु सुचि पाईऐ तिह संतन कै पासि ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सलोक- (जीव जगत में हरी नाम का वणज करने आए हैं) जिनके पास परमात्मा का नाम-धन है। हरी के नाम की (वणज करने के लिए) पूँजी है। वही शाहूकार हैं। वही धनवान हैं। हे नानक ! ऐसे संत-जनों से ही नाम-धन व आत्मिक पवित्रता हासिल होती है। 1।
पवड़ी ॥
ससा सति सति सति सोऊ ॥
सति पुरख ते भिंन न कोऊ ॥
सोऊ सरनि परै जिह पायं ॥
सिमरि सिमरि गुन गाइ सुनायं ॥
संसै भरमु नही कछु बिआपत ॥
प्रगट प्रतापु ताहू को जापत ॥
सो साधू इह पहुचनहारा ॥
नानक ता कै सद बलिहारा ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पवड़ी- वह परमात्मा सदा स्थिर रहने वाला है। सदा स्थिर रहने वाला है। उस सदा स्थिर व्यापक प्रभू से अलग हस्ती वाला और कोई नहीं। जिस मनुष्य को प्रभू अपनी शरण में लेता है। वही (शरण में) आता है। वह मनुष्य प्रभू का सिमरन करके उसकी सिफत सालाह करके औरों को भी सुनाता है। कोई संशय। सहम। कोई भटकना उस मनुष्य पर अपना जोर नहीं डाल सकता। (क्योंकि उसे हर जगह प्रभू ही प्रभू दिखता है) उसे हर जगह प्रभू का ही प्रताप प्रत्यक्ष दिखता है। जो मनुष्य इस आत्मिक अवस्था पर पहुँचता है। उसे साधू जानो। हे नानक ! (कह) मैं उससे सदा सदके हूँ। 3।
सलोकु ॥
धनु धनु कहा पुकारते माइआ मोह सभ कूर ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ (हे भाई !) क्यूं हर वक्त धन इकट्ठा करने के लिए चीखते-पुकारते रहते हैं? माया का मोह तो झूठा ही है (इस धन ने सदा साथ नहीं निभना)।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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