गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 3 ॥ (हे काजी!) अपने (रोजमर्रा के) हरेक कर्म को जमीन बना, (इस कर्म-भूमि में) गुरू के शबद का बीज डाल, सिमरन से पैदा होने वाली आत्मिक सुंदरता का पानी (उस कर्म-भूमि में) सदा देता रह। किसान (जैसा उद्यमी बन), (आपकी इस किरसानी में) श्रद्धा (की खेती) उगेगी। हे मूर्ख ! सिर्फ इस तरीके से समझ आएगी कि बहिश्त क्या है और दोजक क्या।1। (हे काजी!) ये ना समझना कि सिर्फ बातों से ही (रॅब) मिल जाता है। अगर (बेईमानियां करके इकट्ठे किये हुए) धन के अहंकार में टिके रहे, अगर (कामातुर हो के) रूप की शोभा में (मन जुड़ा रहा) तो (बाहर से की गई मजहब की बातें कुछ नहीं सवार सकतीं)। इस तरह मानव जन्म बेकार चला जाता है।1।रहाउ। (जब तक) शरीर के अंदर विकारों का कीचड़ है, और ये मन (उस कीचड़ में) मेंढक (बन के रहता है), (कीचड़ में उगे हुए) कमल के फूल की कद्र (इस मेंढक मन) को नहीं पड़ सकती (हृदय में बसते प्रभू की सूझ नहीं आ सकती)। (भंवरा आ के कमल फूल पर गुँजार डालता है, पर कमल फूल के पास ही कीचड़ में मस्त मेंढक फूल की कद्र नहीं जानता) गुरू भंवरा सदैव (हरि सिमरन का) उपदेश करता है, पर ये मेंढक-मन उस उपदेश को नहीं समझता, इसे ऐसी समझ ही नहीं।2। (हे काजी! जब तक) ये मन माया के रंग में ही रंगा हुआ है (मजहबी किताब के मसले) सुनने सुनाने बे-असर हैं। वही बंदे मालिक-रॅब की नजर में हैं, वही बंदे उसकी नजर में प्यारे हैं जिन्होंने पूरी श्रद्धा से उसको सिमरा है।3। (हे काजी!) आप तीस रोजे़ गिन के रखता है, पाँच नमाजों को साथी बनाता है। (पर, ये सब कुछ दिखावे के लिए करता है, ता कि) शायद इस तरीके से लोग मुझे उच्छा मुसलमान कहने लग जाएं। पर, नानक कहता है (हे काजी!) जीवन के सही रास्ते पर चलना चाहिए, आप (ठगी फरेब करके) माल-धन क्यूँ इकट्ठा कर रहा है? (आप निरी बाते करके लोगों को खुश करता है, पर अंदर से धन के लालच में और काम वासना में अंधा हुआ पड़ा है,ये रास्ता आत्मिक मौत का है)।4।27।
सिरीरागु महला 1 घरु 4 ॥ सोई मउला जिनि जगु मउलिआ हरिआ कीआ संसारो ॥ आब खाकु जिनि बंधि रहाई धंनु सिरजणहारो ॥1॥ मरणा मुला मरणा ॥ भी करतारहु डरणा ॥1॥ रहाउ ॥ ता तू मुला ता तू काजी जाणहि नामु खुदाई ॥ जे बहुतेरा पड़िआ होवहि को रहै न भरीऐ पाई ॥2॥ सोई काजी जिनि आपु तजिआ इकु नामु कीआ आधारो ॥ है भी होसी जाइ न जासी सचा सिरजणहारो ॥3॥ पंज वखत निवाज गुजारहि पड़हि कतेब कुराणा ॥ नानकु आखै गोर सदेई रहिओ पीणा खाणा ॥4॥28॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 4 ॥ जिस मालिक ने सारा जगत प्रफुल्लित किया है, जिस ने सारे संसार को हरा-भरा किया है, जिसने पानी और मिट्टी (विरोधी तत्व) इकट्ठे करके रख दिए हैं, वह सृजनहार धन्य है (उसकी सिफत सलाह करो), वही (असल) मालिक है (मौत का मालिक भी वही है, विरोधी तत्वों वाली खेल आखिर खत्म होनी है, और वही खत्म करता है)।1। हे मुल्ला ! मौत (का डर) हरेक के सिर पर है, इस वास्ते रॅब से ही डरना चाहिए (रॅब के डर में रहना ही फबता है। अर्थात, रॅब के डर में रहने से मौत का डर दूर हो सकता है)।1।रहाउ। (सिर्फ मजहबी किताबें पढ़ लेने से असली काजी-मुल्ला नहीं बन सकते) तभी आप अपने आप को मुल्ला समझ और तभी काजी, जब आप रॅब के नाम के साथ गहरी सांझ पा लेगा (और मौत का डर खत्म कर लेगा, नही तो) चाहे आप कितनी ही (मजहबी किताबें) पढ़ जाएं (मौत फिर भी नहीं टलेगी), जब स्वास पूरे हो जाते है, कोई यहां रह नहीं सकता।2। वही मनुष्य काजी है जिसने स्वैभाव त्याग दिया है, और जिसने उस रॅब के नाम को अपनी जिंदगी का आसरा बनाया है। जो अब भी है, आगे भी रहेगा। जो ना जन्मता है ना ही मरता है। जो सदा कायम रहने वाला है और सभ को पैदा करने वाला है।3। (हे काजी!) आप पाँचों वक्त नमाज़ पढ़ता है, आप कुरान व अपनी अन्य मजहबी किताबें भी पढ़ता है (फिर भी स्वार्थ में बंधा रह के मौत से डरता है)। नानक कहता है (हे काजी!) जब मौत आवाज देती है तो दाना-पानी यहीं का यहीं धरा धराया रह जाता है (सो, मौत के डर से बचने के लिए रॅब के डर में टिका रह)।4।28।
सिरीरागु महला 1 घरु 4 ॥ एकु सुआनु दुइ सुआनी नालि ॥ भलके भउकहि सदा बइआलि ॥ कूड़ु छुरा मुठा मुरदारु ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥1॥ मै पति की पंदि न करणी की कार ॥ हउ बिगड़ै रूपि रहा बिकराल ॥ तेरा एकु नामु तारे संसारु ॥ मै एहा आस एहो आधारु ॥1॥ रहाउ ॥ मुखि निंदा आखा दिनु राति ॥ पर घरु जोही नीच सनाति ॥ कामु क्रोधु तनि वसहि चंडाल ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥2॥ फाही सुरति मलूकी वेसु ॥ हउ ठगवाड़ा ठगी देसु ॥ खरा सिआणा बहुता भारु ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥3॥ मै कीता न जाता हरामखोरु ॥ हउ किआ मुहु देसा दुसटु चोरु ॥ नानकु नीचु कहै बीचारु ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥4॥29॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 4 ॥ मेरे साथ एक कुत्ता (लोभ) है, दो कुत्तियां (आशा और तृष्णा) हैं। प्रत्येक सुबह होते ही ये आहार हेतु भौंकने लग जाते हैं। (मेरे हाथ में) झूठ रूपी छुरा है, मैं माया में ठगा जा रहा हूँ (और पराया हक) मुरदार (खाता हूँ)। हे करतार! मैं सहंसियों वाले रूप में रहता हूँ ।1। हे पति-प्रभू ! ना मैं आपकी नसीहत पे चलता हूँ, ना मेरी करनी बढ़िया है, मैं सदा डरावने विगड़े रूप वाला बना रहता हूँ। आपका जो नाम सारे संसार को पार लंघाता है मुझे अब सिर्फ यही आस है यही आसरा है कि (वह मुझे भी पार लंघा लेगा)।1।रहाउ। मैं दिन-रात मुंह से (दूसरों की) निंदा करता रहता हूँ, मैं नीच और नीची असलीयत वाला हो गया हूँ, पराया घर ताकता हूँ। मेरे शरीर में काम व क्रोध जैसे चण्डाल बस रहे हैं। हे करतार! मैं साहंसियों वाले रूप में ही घूमता फिरता हूँ।2। मेरा ध्यान इस तरफ रहता है कि लोगों को किसी ठॅगी में फसाऊँ। और मैंने फकीरों वाला लिबास पहना हुआ ह। मैंने ठॅगी काअड्डा बनाया हुआ है, देश को ठॅग रहा हूँ। (ज्यों ज्यों) मैं बहुत चतुर बनता हूँ, पापों का और और भार (अपने सिर पर उठाता जाता हूँ)। हे करतार! मैं सांसियों वाला रूप धारण किये बैठा हूँ।3। हे करतार ! मैंने आपकी दातों की कद्र नहीं जानी, मैं पराया हक खाता हूँ। मैं विकारी हूँ, मैं (आपका) चोर हूँ, आपके सामने मैं किस मुंह से हाजिर होऊँगा? मंदकर्मी नानक यही बात कहता है, हे करतार! मैं तो सांहसीं रूप में जीवन व्यतीत कर रहा हूँ।4।29।
सिरीरागु महला 1 घरु 4 ॥ एका सुरति जेते है जीअ ॥ सुरति विहूणा कोइ न कीअ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 4 ॥ जितने भी जीव हैं (इन सबके अंदर) एक परमात्मा की ही बख्शी हुई सूझ काम कर रही है, (परमात्मा ने) कोई भी ऐसा जीव पैदा नहीं किया जिसे सूझ से वंचित रखा हो।
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्री राग महला 1 घरु 3 ॥ (हे काजी!) अपने (रोजमर्रा के) हरेक कर्म को जमीन बना, (इस कर्म-भूमि में) गुरू के शबद का बीज डाल, सिमरन से पैदा होने वाली आत्मिक सुंदरता का पानी (उस कर्म-भूमि।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।