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24
सिरी राग
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अमलु करि धरती बीजु सबदो करि सच की आब नित देहि पाणी ॥
सिरीरागु महला 1 घरु 3 ॥
अमलु करि धरती बीजु सबदो करि सच की आब नित देहि पाणी ॥
होइ किरसाणु ईमानु जंमाइ लै भिसतु दोजकु मूड़े एव जाणी ॥1॥
मतु जाण सहि गली पाइआ ॥
माल कै माणै रूप की सोभा इतु बिधी जनमु गवाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
ऐब तनि चिकड़ो इहु मनु मीडको कमल की सार नही मूलि पाई ॥
भउरु उसतादु नित भाखिआ बोले किउ बूझै जा नह बुझाई ॥2॥
आखणु सुनणा पउण की बाणी इहु मनु रता माइआ ॥
खसम की नदरि दिलहि पसिंदे जिनी करि एकु धिआइआ ॥3॥
तीह करि रखे पंज करि साथी नाउ सैतानु मतु कटि जाई ॥
नानकु आखै राहि पै चलणा मालु धनु कित कू संजिआही ॥4॥27॥
अमलु करि धरती बीजु सबदो करि सच की आब नित देहि पाणी ॥
होइ किरसाणु ईमानु जंमाइ लै भिसतु दोजकु मूड़े एव जाणी ॥1॥
मतु जाण सहि गली पाइआ ॥
माल कै माणै रूप की सोभा इतु बिधी जनमु गवाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
ऐब तनि चिकड़ो इहु मनु मीडको कमल की सार नही मूलि पाई ॥
भउरु उसतादु नित भाखिआ बोले किउ बूझै जा नह बुझाई ॥2॥
आखणु सुनणा पउण की बाणी इहु मनु रता माइआ ॥
खसम की नदरि दिलहि पसिंदे जिनी करि एकु धिआइआ ॥3॥
तीह करि रखे पंज करि साथी नाउ सैतानु मतु कटि जाई ॥
नानकु आखै राहि पै चलणा मालु धनु कित कू संजिआही ॥4॥27॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 3 ॥ (हे काजी!) अपने (रोजमर्रा के) हरेक कर्म को जमीन बना, (इस कर्म-भूमि में) गुरू के शबद का बीज डाल, सिमरन से पैदा होने वाली आत्मिक सुंदरता का पानी (उस कर्म-भूमि में) सदा देता रह। किसान (जैसा उद्यमी बन), (आपकी इस किरसानी में) श्रद्धा (की खेती) उगेगी। हे मूर्ख ! सिर्फ इस तरीके से समझ आएगी कि बहिश्त क्या है और दोजक क्या।1। (हे काजी!) ये ना समझना कि सिर्फ बातों से ही (रॅब) मिल जाता है। अगर (बेईमानियां करके इकट्ठे किये हुए) धन के अहंकार में टिके रहे, अगर (कामातुर हो के) रूप की शोभा में (मन जुड़ा रहा) तो (बाहर से की गई मजहब की बातें कुछ नहीं सवार सकतीं)। इस तरह मानव जन्म बेकार चला जाता है।1।रहाउ। (जब तक) शरीर के अंदर विकारों का कीचड़ है, और ये मन (उस कीचड़ में) मेंढक (बन के रहता है), (कीचड़ में उगे हुए) कमल के फूल की कद्र (इस मेंढक मन) को नहीं पड़ सकती (हृदय में बसते प्रभू की सूझ नहीं आ सकती)। (भंवरा आ के कमल फूल पर गुँजार डालता है, पर कमल फूल के पास ही कीचड़ में मस्त मेंढक फूल की कद्र नहीं जानता) गुरू भंवरा सदैव (हरि सिमरन का) उपदेश करता है, पर ये मेंढक-मन उस उपदेश को नहीं समझता, इसे ऐसी समझ ही नहीं।2। (हे काजी! जब तक) ये मन माया के रंग में ही रंगा हुआ है (मजहबी किताब के मसले) सुनने सुनाने बे-असर हैं। वही बंदे मालिक-रॅब की नजर में हैं, वही बंदे उसकी नजर में प्यारे हैं जिन्होंने पूरी श्रद्धा से उसको सिमरा है।3। (हे काजी!) आप तीस रोज़े गिनकर रखते हैं, पाँच नमाज़ों को साथी बनाते हैं। (पर, यह सब दिखावे के लिए करते हैं, ताकि) शायद इस तरीके से लोग मुझे उच्छा मुसलमान कहने लग जाएं। पर, नानक कहता है (हे काजी!) जीवन के सही रास्ते पर चलना चाहिए, आप ठगी और फरेब करके माल-धन क्यों इकट्ठा कर रहे हैं? (आप निरी बातें करके लोगों को खुश करते हैं, पर अन्दर से धन के लालच और काम-वासना में अन्धे हुए पड़े हैं,ये रास्ता आत्मिक मौत का है)।4।27।
सोई मउला जिनि जगु मउलिआ हरिआ कीआ संसारो ॥
सिरीरागु महला 1 घरु 4 ॥
सोई मउला जिनि जगु मउलिआ हरिआ कीआ संसारो ॥
आब खाकु जिनि बंधि रहाई धंनु सिरजणहारो ॥1॥
मरणा मुला मरणा ॥
भी करतारहु डरणा ॥1॥ रहाउ ॥
ता तू मुला ता तू काजी जाणहि नामु खुदाई ॥
जे बहुतेरा पड़िआ होवहि को रहै न भरीऐ पाई ॥2॥
सोई काजी जिनि आपु तजिआ इकु नामु कीआ आधारो ॥
है भी होसी जाइ न जासी सचा सिरजणहारो ॥3॥
पंज वखत निवाज गुजारहि पड़हि कतेब कुराणा ॥
नानकु आखै गोर सदेई रहिओ पीणा खाणा ॥4॥28॥
सोई मउला जिनि जगु मउलिआ हरिआ कीआ संसारो ॥
आब खाकु जिनि बंधि रहाई धंनु सिरजणहारो ॥1॥
मरणा मुला मरणा ॥
भी करतारहु डरणा ॥1॥ रहाउ ॥
ता तू मुला ता तू काजी जाणहि नामु खुदाई ॥
जे बहुतेरा पड़िआ होवहि को रहै न भरीऐ पाई ॥2॥
सोई काजी जिनि आपु तजिआ इकु नामु कीआ आधारो ॥
है भी होसी जाइ न जासी सचा सिरजणहारो ॥3॥
पंज वखत निवाज गुजारहि पड़हि कतेब कुराणा ॥
नानकु आखै गोर सदेई रहिओ पीणा खाणा ॥4॥28॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 4 ॥ जिस मालिक ने सारा जगत प्रफुल्लित किया है, जिस ने सारे संसार को हरा-भरा किया है, जिसने पानी और मिट्टी (विरोधी तत्व) इकट्ठे करके रख दिए हैं, वह सृजनहार धन्य है (उसकी सिफत सलाह करो), वही (असल) मालिक है (मौत का मालिक भी वही है, विरोधी तत्वों वाली खेल आखिर खत्म होनी है, और वही खत्म करता है)।1। हे मुल्ला ! मौत (का डर) हरेक के सिर पर है, इस वास्ते रॅब से ही डरना चाहिए (रॅब के डर में रहना ही फबता है। अर्थात, रॅब के डर में रहने से मौत का डर दूर हो सकता है)।1।रहाउ। (सिर्फ मजहबी किताबें पढ़ लेने से असली काजी-मुल्ला नहीं बन सकते) आप अपने को मुल्ला और काज़ी तभी समझिए जब रब के नाम के साथ गहरी साँझ पा लेंगे और मौत का डर दूर कर लेंगे। नहीं तो चाहे आप कितनी ही मज़हबी किताबें पढ़ जाएँ, मौत फिर भी नहीं टलेगी। जब श्वास पूरे हो जाते हैं, कोई यहाँ रह नहीं सकता।2। वही मनुष्य काजी है जिसने स्वैभाव त्याग दिया है, और जिसने उस रॅब के नाम को अपनी जिंदगी का आसरा बनाया है। जो अब भी है, आगे भी रहेगा। जो ना जन्मता है ना ही मरता है। जो सदा कायम रहने वाला है और सभ को पैदा करने वाला है।3। (हे काजी!) आप पाँचों वक्त नमाज़ पढ़ते हैं, क़ुरान और अपनी अन्य मज़हबी किताबें भी पढ़ते हैं, फिर भी स्वार्थ में बँधे रहकर मौत से डरते हैं। नानक कहता है (हे काजी!) जब मौत आवाज देती है तो दाना-पानी यहीं का यहीं धरा धराया रह जाता है (सो, मौत के डर से बचने के लिए रॅब के डर में टिका रह)।4।28।
एकु सुआनु दुइ सुआनी नालि ॥
सिरीरागु महला 1 घरु 4 ॥
एकु सुआनु दुइ सुआनी नालि ॥
भलके भउकहि सदा बइआलि ॥
कूड़ु छुरा मुठा मुरदारु ॥
धाणक रूपि रहा करतार ॥1॥
मै पति की पंदि न करणी की कार ॥
हउ बिगड़ै रूपि रहा बिकराल ॥
तेरा एकु नामु तारे संसारु ॥
मै एहा आस एहो आधारु ॥1॥ रहाउ ॥
मुखि निंदा आखा दिनु राति ॥
पर घरु जोही नीच सनाति ॥
कामु क्रोधु तनि वसहि चंडाल ॥
धाणक रूपि रहा करतार ॥2॥
फाही सुरति मलूकी वेसु ॥
हउ ठगवाड़ा ठगी देसु ॥
खरा सिआणा बहुता भारु ॥
धाणक रूपि रहा करतार ॥3॥
मै कीता न जाता हरामखोरु ॥
हउ किआ मुहु देसा दुसटु चोरु ॥
नानकु नीचु कहै बीचारु ॥
धाणक रूपि रहा करतार ॥4॥29॥
एकु सुआनु दुइ सुआनी नालि ॥
भलके भउकहि सदा बइआलि ॥
कूड़ु छुरा मुठा मुरदारु ॥
धाणक रूपि रहा करतार ॥1॥
मै पति की पंदि न करणी की कार ॥
हउ बिगड़ै रूपि रहा बिकराल ॥
तेरा एकु नामु तारे संसारु ॥
मै एहा आस एहो आधारु ॥1॥ रहाउ ॥
मुखि निंदा आखा दिनु राति ॥
पर घरु जोही नीच सनाति ॥
कामु क्रोधु तनि वसहि चंडाल ॥
धाणक रूपि रहा करतार ॥2॥
फाही सुरति मलूकी वेसु ॥
हउ ठगवाड़ा ठगी देसु ॥
खरा सिआणा बहुता भारु ॥
धाणक रूपि रहा करतार ॥3॥
मै कीता न जाता हरामखोरु ॥
हउ किआ मुहु देसा दुसटु चोरु ॥
नानकु नीचु कहै बीचारु ॥
धाणक रूपि रहा करतार ॥4॥29॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 4 ॥ मेरे साथ एक कुत्ता (लोभ) है, दो कुत्तियां (आशा और तृष्णा) हैं। प्रत्येक सुबह होते ही ये आहार हेतु भौंकने लग जाते हैं। (मेरे हाथ में) झूठ रूपी छुरा है, मैं माया में ठगा जा रहा हूँ (और पराया हक) मुरदार (खाता हूँ)। हे करतार! मैं सहंसियों वाले रूप में रहता हूँ ।1। हे पति-प्रभू ! ना मैं आपकी नसीहत पे चलता हूँ, ना मेरी करनी बढ़िया है, मैं सदा डरावने विगड़े रूप वाला बना रहता हूँ। आपका जो नाम सारे संसार को पार लंघाता है मुझे अब सिर्फ यही आस है यही आसरा है कि (वह मुझे भी पार लंघा लेगा)।1।रहाउ। मैं दिन-रात मुंह से (दूसरों की) निंदा करता रहता हूँ, मैं नीच और नीची असलीयत वाला हो गया हूँ, पराया घर ताकता हूँ। मेरे शरीर में काम व क्रोध जैसे चण्डाल बस रहे हैं। हे करतार! मैं साहंसियों वाले रूप में ही घूमता फिरता हूँ।2। मेरा ध्यान इस तरफ रहता है कि लोगों को किसी ठॅगी में फसाऊँ। और मैंने फकीरों वाला लिबास पहना हुआ ह। मैंने ठॅगी काअड्डा बनाया हुआ है, देश को ठॅग रहा हूँ। (ज्यों ज्यों) मैं बहुत चतुर बनता हूँ, पापों का और और भार (अपने सिर पर उठाता जाता हूँ)। हे करतार! मैं सांसियों वाला रूप धारण किये बैठा हूँ।3। हे करतार ! मैंने आपकी दातों की कद्र नहीं जानी, मैं पराया हक खाता हूँ। मैं विकारी हूँ, मैं (आपका) चोर हूँ, आपके सामने मैं किस मुंह से हाजिर होऊँगा? मंदकर्मी नानक यही बात कहता है, हे करतार! मैं तो सांहसीं रूप में जीवन व्यतीत कर रहा हूँ।4।29।
एका सुरति जेते है जीअ ॥
सिरीरागु महला 1 घरु 4 ॥
एका सुरति जेते है जीअ ॥
सुरति विहूणा कोइ न कीअ ॥
एका सुरति जेते है जीअ ॥
सुरति विहूणा कोइ न कीअ ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 4 ॥ जितने भी जीव हैं (इन सबके अंदर) एक परमात्मा की ही बख्शी हुई सूझ काम कर रही है, (परमात्मा ने) कोई भी ऐसा जीव पैदा नहीं किया जिसे सूझ से वंचित रखा हो।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 24 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।