मोहन तेरे ऊचे मंदर महल अपारा ॥
मोहन तेरे सोहनि दुआर जीउ संत धरम साला ॥
धरम साल अपार दैआर ठाकुर सदा कीरतनु गावहे ॥
जह साध संत इकत्र होवहि तहा तुझहि धिआवहे ॥
करि दइआ मइआ दइआल सुआमी होहु दीन क्रिपारा ॥
बिनवंति नानक दरस पिआसे मिलि दरसन सुखु सारा ॥1॥
मोहन तेरे बचन अनूप चाल निराली ॥
मोहन तूं मानहि एकु जी अवर सभ राली ॥
मानहि त एकु अलेखु ठाकुरु जिनहि सभ कल धारीआ ॥
तुधु बचनि गुर कै वसि कीआ आदि पुरखु बनवारीआ ॥
तूं आपि चलिआ आपि रहिआ आपि सभ कल धारीआ ॥
बिनवंति नानक पैज राखहु सभ सेवक सरनि तुमारीआ ॥2॥
मोहन तुधु सतसंगति धिआवै दरस धिआना ॥
मोहन जमु नेड़ि न आवै तुधु जपहि निदाना ॥
जमकालु तिन कउ लगै नाही जो इक मनि धिआवहे ॥
मनि बचनि करमि जि तुधु अराधहि से सभे फल पावहे ॥
मल मूत मूड़ जि मुगध होते सि देखि दरसु सुगिआना ॥
बिनवंति नानक राजु निहचलु पूरन पुरख भगवाना ॥3॥
मोहन तूं सुफलु फलिआ सणु परवारे ॥
मोहन पुत्र मीत भाई कुटंब सभि तारे ॥
तारिआ जहानु लहिआ अभिमानु जिनी दरसनु पाइआ ॥
जिनी तुधनो धंनु कहिआ तिन जमु नेड़ि न आइआ ॥
बेअंत गुण तेरे कथे न जाही सतिगुर पुरख मुरारे ॥
बिनवंति नानक टेक राखी जितु लगि तरिआ संसारे ॥4॥2॥
पतित असंख पुनीत करि पुनह पुनह बलिहार ॥
नानक राम नामु जपि पावको तिन किलबिख दाहनहार ॥1॥
जपि मना तूं राम नराइणु गोविंदा हरि माधो ॥
धिआइ मना मुरारि मुकंदे कटीऐ काल दुख फाधो ॥
दुखहरण दीन सरण स्रीधर चरन कमल अराधीऐ ॥
जम पंथु बिखड़ा अगनि सागरु निमख सिमरत साधीऐ ॥
कलिमलह दहता सुधु करता दिनसु रैणि अराधो ॥
बिनवंति नानक करहु किरपा गोपाल गोबिंद माधो ॥1॥
सिमरि मना दामोदरु दुखहरु भै भंजनु हरि राइआ ॥
स्रीरंगो दइआल मनोहरु भगति वछलु बिरदाइआ ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी महला 5 ॥ हे मन को मोह लेने वाले प्रभू !आपके ऊँचे मंदिर हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।