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अंग 248

अंग
248
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गउड़ी महला 5 ॥
मोहन तेरे ऊचे मंदर महल अपारा ॥
मोहन तेरे सोहनि दुआर जीउ संत धरम साला ॥
धरम साल अपार दैआर ठाकुर सदा कीरतनु गावहे ॥
जह साध संत इकत्र होवहि तहा तुझहि धिआवहे ॥
करि दइआ मइआ दइआल सुआमी होहु दीन क्रिपारा ॥
बिनवंति नानक दरस पिआसे मिलि दरसन सुखु सारा ॥1॥
मोहन तेरे बचन अनूप चाल निराली ॥
मोहन तूं मानहि एकु जी अवर सभ राली ॥
मानहि त एकु अलेखु ठाकुरु जिनहि सभ कल धारीआ ॥
तुधु बचनि गुर कै वसि कीआ आदि पुरखु बनवारीआ ॥
तूं आपि चलिआ आपि रहिआ आपि सभ कल धारीआ ॥
बिनवंति नानक पैज राखहु सभ सेवक सरनि तुमारीआ ॥2॥
मोहन तुधु सतसंगति धिआवै दरस धिआना ॥
मोहन जमु नेड़ि न आवै तुधु जपहि निदाना ॥
जमकालु तिन कउ लगै नाही जो इक मनि धिआवहे ॥
मनि बचनि करमि जि तुधु अराधहि से सभे फल पावहे ॥
मल मूत मूड़ जि मुगध होते सि देखि दरसु सुगिआना ॥
बिनवंति नानक राजु निहचलु पूरन पुरख भगवाना ॥3॥
मोहन तूं सुफलु फलिआ सणु परवारे ॥
मोहन पुत्र मीत भाई कुटंब सभि तारे ॥
तारिआ जहानु लहिआ अभिमानु जिनी दरसनु पाइआ ॥
जिनी तुधनो धंनु कहिआ तिन जमु नेड़ि न आइआ ॥
बेअंत गुण तेरे कथे न जाही सतिगुर पुरख मुरारे ॥
बिनवंति नानक टेक राखी जितु लगि तरिआ संसारे ॥4॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे मन को मोह लेने वाले प्रभू !आपके ऊँचे मंदिर हैं। आपके महल ऐसे हैं कि उनका परला छोर नहीं दिखता। हे मोहन ! आपके दर पे आपके धर्म-स्थानों में आपके संत जन (बैठे) सुंदर लग रहे हैं। हे बेअंत प्रभू ! हे दयाल प्रभू ! हे ठाकुर ! आपके धर्म स्थानों में आपके संत जन सदा आपका कीर्तन गाते हैं। (हे मोहन !) जहाँ भी साध-संत एकत्र होते हैं वहां आपको ही ध्याते हैं। हे दया के घर मोहन ! हे सब के मालिक मोहन ! आप दया करके तरस करके गरीबों-अनाथों पर कृपा करता है। (हे मोहन !) नानक विनती करता है,आपके दर्शन के प्यासे (आपके संत जन) आपको मिल के आपके दर्शन का सुख प्राप्त करते हैं। 1। हे मोहन ! आपकी सिफत सालाह के बचन सुंदर लगते हैं, आपकी चाल (जगत के जीवों की चाल से) अलग है। हे मोहन जी ! (सारे जीव) सिर्फ आपको ही (सदा कायम रहने वाला) मानते हैं और सारी सृष्टि नाशवंत है। हे मोहन ! सिर्फ आप एक को (स्थिर) मानते हैं, सिर्फ आपको- जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। जो आप सबका पालणहार है और जिस आप ने सारी सृष्टि में अपनी सत्ता वरताई हुई है। हे मोहन ! आपको (आपके भक्तों ने) गुरू के बचनों द्वारा (प्यार-) वश किया हुआ है। आप सब का आदि है। आप सर्व-व्यापक है। आप सारे जगत का मालिक है। हे मोहन ! (सारे जीवों में मौजूद होने के कारण) आप स्वयं ही (उम्र भोग के जगत से) चला जाता है। फिर भी आप ही खुद सदा कायम रहने वाला है। तूने ही जगत में अपनी सत्ता पसारी हुई है। नानक विनती करता है, (अपने सेवकों की आप स्वयं ही) लाज रखता है। सारे सेवक-भगत आपकी ही शरण पड़ते हैं। 2। हे मोहन प्रभू !आपको साध-संगति ध्याती है। आपके दर्शन का ध्यान धरती है। हे मोहन प्रभू ! जो जीव आपको जपते हैं। अंत के समय मौत का सहम उनके नजदीक नहीं फटकता। जो एकाग्र मन से आपका ध्यान धरते हैं। मौत का सहम उन्हें छू नहीं सकता (आत्मिक मौत उन पर प्रभाव नहीं डाल सकती)। जो मनुष्य अपने मन से अपने बोलों से अपने कर्मों से आपको याद करते रहते हैं, वे सारे (मन-इच्छित) फल प्राप्त कर लेते हैं। हे सर्व-व्यापक ! हे भगवान ! वह मनुष्य भी आपका दर्शन करके ऊूंची समझ वाले हैं जाते हैं जो (पहले) गंदे-कुकर्मी व महामूर्ख होते हैं। नानक विनती करता है, हे मोहन ! आपका राज सदा कायम रहने वाला है। 3। हे मोहन प्रभू ! आप बहुत सुंदर फलीभूत है। आप बहुत बड़े परिवार वाला है। हे मोहन प्रभू ! पुत्र। भाईयों। मित्रों वाले बड़े-बड़े परिवार आप सारे के सारे (संसार समुंद्र से) पार लंघा देता है। हे मोहन ! जिन्होंने आपका दर्शन किया। उनके अंदर से तूने अहंकार दूर कर दिया। आप सारे जहान को तारने की स्मर्था रखने वाला है। हे मोहन ! जिन (भाग्यशालियों ने) आपकी सिफत सालाह की। आत्मिक मौत उनके नजदीक नहीं फटकती। हे सबसे बड़े ! सर्व-व्यापक प्रभू ! आपके गुण बेअंत हैं। बयान नहीं किए जा सकते। नानक विनती करता है, मैंने आपका ही आसरा लिया है। जिस आसरे की बरकति से मैं इस संसार समुंद्र से पार लांघ रहा हूँ। 4। 2।
गउड़ी महला 5 ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥
सलोकु ॥
पतित असंख पुनीत करि पुनह पुनह बलिहार ॥
नानक राम नामु जपि पावको तिन किलबिख दाहनहार ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सलोक। (इस नाम से) बारंबार कुर्बान हो। ये नाम अनगिनत विकारियों को पवित्र कर देता है। हे नानक ! परमात्मा का नाम जप। (जैसे) आग (घास के) तीलों को। (वैसे ही ये हरी नाम) पापों को जलाने की ताकत रखता है। 1। छंत।
छंत ॥
जपि मना तूं राम नराइणु गोविंदा हरि माधो ॥
धिआइ मना मुरारि मुकंदे कटीऐ काल दुख फाधो ॥
दुखहरण दीन सरण स्रीधर चरन कमल अराधीऐ ॥
जम पंथु बिखड़ा अगनि सागरु निमख सिमरत साधीऐ ॥
कलिमलह दहता सुधु करता दिनसु रैणि अराधो ॥
बिनवंति नानक करहु किरपा गोपाल गोबिंद माधो ॥1॥
सिमरि मना दामोदरु दुखहरु भै भंजनु हरि राइआ ॥
स्रीरंगो दइआल मनोहरु भगति वछलु बिरदाइआ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: छंद॥ हे मेरे मन ! आप राम नारायण गोबिंद हरी माधव (के नाम) को जप। हे मेरे मन ! आप मुकंद मुरारी की आराधना कर। (इस आराधना की बरकति से) मौत और दुखों की फाही काटी जाती है। (हे मन !) उस परमात्मा के सोहणे चरणों की आराधना करनी चाहिए। जो दुखों का नाश करने वाले हैं। जो गरीबों का सहारा हैं। जो लक्ष्मी का आसरा हैं। हे मन ! जमों का मुश्किल रास्ता। और (विकारों की) आग (से भरा हुआ संसार-) समुंद्र को रक्ती भर समय के नाम सिमरन से ही खूबसूरत बनाया जा सकता है। (हे मेरे मन ! इसलिए) दिन रात उस हरी के नाम को सिमरता रह। जो पापों को जलाने वाला है और जो पवित्र करने वाला है। नानक विनती करता है, हे गोपाल ! हे गोबिंद ! हे माधो ! मेहर कर (मैं आपका नाम हमेशा सिमरता रहूँ)। 1। हे मेरे मन ! उस प्रभू पातशाह दामोदर को सिमर। जो दुखों को दूर करने वाला है। जो डरों का नाश करने वाला है। जो लक्ष्मी का पति है। जो दया का श्रोत है। जो मन को मोह लेने वाला है। और भक्ति से प्यार करना जिसका मेहर भरा मूल स्वाभाव है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी महला 5 ॥ हे मन को मोह लेने वाले प्रभू !आपके ऊँचे मंदिर हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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