भगति वछल पुरख पूरन मनहि चिंदिआ पाईऐ ॥ तम अंध कूप ते उधारै नामु मंनि वसाईऐ ॥ सुर सिध गण गंधरब मुनि जन गुण अनिक भगती गाइआ ॥ बिनवंति नानक करहु किरपा पारब्रहम हरि राइआ ॥2॥ चेति मना पारब्रहमु परमेसरु सरब कला जिनि धारी ॥ करुणा मै समरथु सुआमी घट घट प्राण अधारी ॥ प्राण मन तन जीअ दाता बेअंत अगम अपारो ॥ सरणि जोगु समरथु मोहनु सरब दोख बिदारो ॥ रोग सोग सभि दोख बिनसहि जपत नामु मुरारी ॥ बिनवंति नानक करहु किरपा समरथ सभ कल धारी ॥3॥ गुण गाउ मना अचुत अबिनासी सभ ते ऊच दइआला ॥ बिसंभरु देवन कउ एकै सरब करै प्रतिपाला ॥ प्रतिपाल महा दइआल दाना दइआ धारे सभ किसै ॥ कालु कंटकु लोभु मोहु नासै जीअ जा कै प्रभु बसै ॥ सुप्रसंन देवा सफल सेवा भई पूरन घाला ॥ बिनवंत नानक इछ पुनी जपत दीन दैआला ॥4॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) अगर भक्ति से प्यार करने वाले पूर्ण पुरख का नाम मन में बसा लें। तो मन में चितवा हुआ हरेक मनोरथ पा लिया जाता है। वह हरी नाम माया के मोह के अंधे कूएँ के अंधकार में से निकाल लेता है। (हे मेरे मन !) देवते। करामाती जोगी। शिव जी के दास-देवते। देवतों के गवईए। ऋषि लोग और अनेकों ही भक्त जन उसी परमात्मा के गुण गाते आ रहे हैं। नानक विनती करता है, हे प्रभू पातशाह ! मेहर कर (कि मैं भी आपका नाम सदा सिमरता रहूँ)। 2। हे (मेरे) मन ! पारब्रहम् परमेश्वर को याद रख। जिसने सब में अपनी सक्ता टिकाई हुई है। जो करुणामय है। सब ताकतों वाला है। सब का मालिक है। और जो हरेक शरीर का सबकी जिंद का आसरा है। जो प्राण मन तन और जिंद देने वाला है। बेअंत है। अपहुँच है। और अपार है। जो शरण पड़ने वाले की सहायता करने के काबिल है। जो सब ताकतों का मालिक है सुंदर है और सारे विकारों का नाश करने वाला है। हे मन ! मुरारी प्रभू का नाम जपते ही सारे रोग। सारे फिक्र। सारे ऐब नाश हो जाते हैं। नानक विनती करता है, हे सब ताकतों के मालिक ! हे सबमें अपनी सक्ता टिकाने वाले प्रभू ! (मुझ पर) मेहर कर (मैं भी आपका नाम सदा सिमरता रहूँ)। 3। हे (मेरे) मन ! आप उस पारब्रहम् के गुण गा। जो सदा अटल रहने वाला है। जो कभी नाश नहीं होता। जो सबसे ऊूंचा है और दया का घर है। जो सारे जगत को पालने वाला है। जो स्वयं ही सब कुछ देने के काबिल है। जो सब की पालना करता है। (हे मेरे मन !) वह परमात्मा हरेक जीव पर दया करता है। हरेक के दिल की जानने वाला है। बड़ा ही दयालु और पालना करने वाला है। जिस मनुष्य के हृदय में वह प्रभू आ बसता है। उसके अंदर से लोभ मोह और दुखदाई (काँटे के समान चुभता रहने वाला) मौत का सहम दूर हो जाता है। (हे मन !) जिस मनुष्य पर प्रभू-देव जी अच्छी तरह प्रसन्न हो जाएं। उसकी की हुई सेवा को फल लग जाता है। उसकी की मेहनत सफल हो जाती है। नानक विनती करता है, गरीबों पर दया करने वाले परमात्मा का नाम जपने से इच्छा पूरी हो जाती है। 4। 3।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे सहेलिए ! (हे सत्संगी सज्जन ! मेरी विनती) सुन (आ।) मिल के भजन करें (और) कंत-प्रभू को (अपने ऊपर) खुश कर लें। अहंकार दूर करके (और कंत-प्रभू की) भक्ती को ठॅग-बूटी बना के (इस बूटी के साथ उस प्रभू-पति को) गुरू के उपदेश द्वारा (गुरू के उपदेश पर चल के) मोह लें। हे सहेली ! उस भगवान की ये सुंदर मर्यादा है कि यदि वह एक बार प्रेम वश हो जाए तो फिर कभी छोड़ के नहीं जाता। हे नानक ! (जो जीव कंत-प्रभू की शरण आता है) उस जीव को वह पवित्र (जीवन वाला) बना देता है (उसके पवित्र आत्मिक जीवन को वह प्रभू) बुढ़ापा नहीं आने देता। मौत नहीं आने देता। उसके सारे सारे डर व नर्क (बड़े से बड़े दुख) दूर कर देता है। 1। हे सहेलिए ! (हे सत्संगी सज्जन ! मेरी) ये भली विनती (सुन। आ) ये सलाह पक्की करें (कि) आत्मिक अडोलता में प्रभू-प्रेम में टिक के (अपने अंदर से) छल-फरेब दूर करके गोबिंद (की सिफत सालाह) के गीत गाएं। आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम से गोविंद के गुण गाने से छल फरेब विकार आदि मिट जाते है (गोबिंद की सिफत सालाह करने से। अंदर से विकारों की) खह खह झगड़े और अन्य सारे कलेष मिट जाते हैं (माया के पीछे मन की) दौड़-भाग समाप्त हो जाती हैं। मन में चतवा हुआ फल प्राप्त हो जाता है। हे नानक ! (कह, हे सत्संगी सज्जन !) पारब्रहम् पूर्ण परमेश्वर का नाम (सदा) सिमरना चाहिए। 2। (हे सहेलिए !) मैं सदा चाहत करती रहती हूँ और सुखना सुखती रहती हूँ (कि) हे प्रभू ! मेरी आस पूरी कर। मैं आपके दर्शनों के लिए उतावली हुई आपको हर जगह तलाशती फिरती हूँ। (हे सहेलीये ! प्रभू की) खोज कर कर के मैं संत-जनों का साथ (जा) ढूँढती हूँ (साध-संगति ही उस प्रभू का) मेल कराती है जो सारी ताकतों का मालिक है और जो सब में व्यापक है। हे नानक ! (कह) हे माँ ! (जो मनुष्य साध-संगति में मिलते हैं) उन्हें ही देव-लोक का मालिक और सारे सुख देने वाला प्रभू मिलता है वही मनुष्य बहुत भाग्यशाली हैं। 3। हे सहेलिए ! (साध-संगति की बरकति से अब) मैं (सदा) अपने प्रभू पति के साथ आ बसती हूँ। मेरा मन उस हरी के साथ हिल-मिल गया है। मेरा तन (हृदय) उस हरी के साथ एक-मेक हो गया है। हे सहेलिए ! सुन। (अब) मुझे नींद भी प्यारी लगती है। (क्योंकि। सपने में भी) मुझे अपना प्यारा पति मिलता है। उस मालिक प्रभू ने मेरी भटकना दूर कर दी है। मेरे अंदर अब शान्ति बनी रहती है। मैं आत्मिक अडोलता में टिकी रहती हूँ। (मेरे अंदर उसकी ज्योति की) रोशनी हो गई है (जैसे सूर्य की किरणों से) कमल-फूल खिल जाता है (वैसे ही उसकी ज्योति के प्रकाश से मेरा हृदय खिला। प्रसन्न-चित्त रहता है)। हे नानक ! (कह, हे सहेलिए ! साध-संगति की बरकति से) मैंने अंतरजामी प्रभू-पति ढूँढ लिया है। और (मेरे सिर का) ये सुहाग कभी दूर होने वाला नहीं। 4। 4। 2। 5। 11।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) अगर भक्ति से प्यार करने वाले पूर्ण पुरख का नाम मन में बसा लें।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।