अंग
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गउड़ी
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माइआ बंधन टिकै नाही खिनु खिनु दुखु संताए ॥
माइआ बंधन टिकै नाही खिनु खिनु दुखु संताए ॥
नानक माइआ का दुखु तदे चूकै जा गुर सबदी चितु लाए ॥3॥
मनमुख मुगध गावारु पिरा जीउ सबदु मनि न वसाए ॥
माइआ का भ्रमु अंधु पिरा जीउ हरि मारगु किउ पाए ॥
किउ मारगु पाए बिनु सतिगुर भाए मनमुखि आपु गणाए ॥
हरि के चाकर सदा सुहेले गुर चरणी चितु लाए ॥
जिस नो हरि जीउ करे किरपा सदा हरि के गुण गाए ॥
नानक नामु रतनु जगि लाहा गुरमुखि आपि बुझाए ॥4॥5॥7॥
नानक माइआ का दुखु तदे चूकै जा गुर सबदी चितु लाए ॥3॥
मनमुख मुगध गावारु पिरा जीउ सबदु मनि न वसाए ॥
माइआ का भ्रमु अंधु पिरा जीउ हरि मारगु किउ पाए ॥
किउ मारगु पाए बिनु सतिगुर भाए मनमुखि आपु गणाए ॥
हरि के चाकर सदा सुहेले गुर चरणी चितु लाए ॥
जिस नो हरि जीउ करे किरपा सदा हरि के गुण गाए ॥
नानक नामु रतनु जगि लाहा गुरमुखि आपि बुझाए ॥4॥5॥7॥
हिन्दी अर्थ: माया के (मोह के) बंधनों के कारण मनुष्य का मन (एक जगह) टिकता नहीं। (हरेक किस्म का) दुख इसे हर वक्त कलेश देता है। हे नानक ! माया के मोह से पैदा हुआ दुख तभी खत्म होता है जब मनुष्य गुरू के शबद में अपना चित्त जोड़ता है। 3। हे प्यारी जिंदे ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य मूर्ख और उजड्ड ही रहता है। वह गुरू के शबद को अपने मन में नहीं बसाता। हे जिंदे ! माया (के मोह) का चक्कर उसे (सही जीवन-राह से) अंधा कर देता है (इस वास्ते वह) परमात्मा (के मिलाप) का रास्ता नहीं ढूँढ सकता। गुरू की मर्जी के मुताबिक चले बिना मनुष्य हरी के मिलाप का रास्ता नहीं ढूँढ सकता (क्योंकि) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सदा अपने आप को बड़ा प्रगट करता रहता है (और उसके अंदर सेवक वाली निम्रता नहीं आ सकती)। (दूसरी तरफ) परमात्मा के सेवक-भगत गुरू के चरणों में चित्त जोड़ के सदा सुखी रहते हैं। (पर। हे जिंदे ! किसी के वश की बात नहीं) जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं दया करता है। वही सदा परमात्मा के गुण गाता है। हे नानक ! परमात्मा का नाम ही जगत में (असल) कमाई है। इस बात की सूझ परमात्मा स्वयं ही (मनुष्य को) गुरू की शरण में ला के देता है। 4। 5।
मेरै मनि बैरागु भइआ जीउ किउ देखा प्रभ दाते ॥
रागु गउड़ी छंत महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरै मनि बैरागु भइआ जीउ किउ देखा प्रभ दाते ॥
मेरे मीत सखा हरि जीउ गुर पुरख बिधाते ॥
पुरखो बिधाता एकु स्रीधरु किउ मिलह तुझै उडीणीआ ॥
कर करहि सेवा सीसु चरणी मनि आस दरस निमाणीआ ॥
सासि सासि न घड़ी विसरै पलु मूरतु दिनु राते ॥
नानक सारिंग जिउ पिआसे किउ मिलीऐ प्रभ दाते ॥1॥
इक बिनउ करउ जीउ सुणि कंत पिआरे ॥
मेरा मनु तनु मोहि लीआ जीउ देखि चलत तुमारे ॥
चलता तुमारे देखि मोही उदास धन किउ धीरए ॥
गुणवंत नाह दइआलु बाला सरब गुण भरपूरए ॥
पिर दोसु नाही सुखह दाते हउ विछुड़ी बुरिआरे ॥
बिनवंति नानक दइआ धारहु घरि आवहु नाह पिआरे ॥2॥
हउ मनु अरपी सभु तनु अरपी अरपी सभि देसा ॥
हउ सिरु अरपी तिसु मीत पिआरे जो प्रभ देइ सदेसा ॥
अरपिआ त सीसु सुथानि गुर पहि संगि प्रभू दिखाइआ ॥
खिन माहि सगला दूखु मिटिआ मनहु चिंदिआ पाइआ ॥
दिनु रैणि रलीआ करै कामणि मिटे सगल अंदेसा ॥
बिनवंति नानकु कंतु मिलिआ लोड़ते हम जैसा ॥3॥
मेरै मनि अनदु भइआ जीउ वजी वाधाई ॥
घरि लालु आइआ पिआरा सभ तिखा बुझाई ॥
मिलिआ त लालु गुपालु ठाकुरु सखी मंगलु गाइआ ॥
सभ मीत बंधप हरखु उपजिआ दूत थाउ गवाइआ ॥
अनहत वाजे वजहि घर महि पिर संगि सेज विछाई ॥
बिनवंति नानकु सहजि रहै हरि मिलिआ कंतु सुखदाई ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरै मनि बैरागु भइआ जीउ किउ देखा प्रभ दाते ॥
मेरे मीत सखा हरि जीउ गुर पुरख बिधाते ॥
पुरखो बिधाता एकु स्रीधरु किउ मिलह तुझै उडीणीआ ॥
कर करहि सेवा सीसु चरणी मनि आस दरस निमाणीआ ॥
सासि सासि न घड़ी विसरै पलु मूरतु दिनु राते ॥
नानक सारिंग जिउ पिआसे किउ मिलीऐ प्रभ दाते ॥1॥
इक बिनउ करउ जीउ सुणि कंत पिआरे ॥
मेरा मनु तनु मोहि लीआ जीउ देखि चलत तुमारे ॥
चलता तुमारे देखि मोही उदास धन किउ धीरए ॥
गुणवंत नाह दइआलु बाला सरब गुण भरपूरए ॥
पिर दोसु नाही सुखह दाते हउ विछुड़ी बुरिआरे ॥
बिनवंति नानक दइआ धारहु घरि आवहु नाह पिआरे ॥2॥
हउ मनु अरपी सभु तनु अरपी अरपी सभि देसा ॥
हउ सिरु अरपी तिसु मीत पिआरे जो प्रभ देइ सदेसा ॥
अरपिआ त सीसु सुथानि गुर पहि संगि प्रभू दिखाइआ ॥
खिन माहि सगला दूखु मिटिआ मनहु चिंदिआ पाइआ ॥
दिनु रैणि रलीआ करै कामणि मिटे सगल अंदेसा ॥
बिनवंति नानकु कंतु मिलिआ लोड़ते हम जैसा ॥3॥
मेरै मनि अनदु भइआ जीउ वजी वाधाई ॥
घरि लालु आइआ पिआरा सभ तिखा बुझाई ॥
मिलिआ त लालु गुपालु ठाकुरु सखी मंगलु गाइआ ॥
सभ मीत बंधप हरखु उपजिआ दूत थाउ गवाइआ ॥
अनहत वाजे वजहि घर महि पिर संगि सेज विछाई ॥
बिनवंति नानकु सहजि रहै हरि मिलिआ कंतु सुखदाई ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी छंत महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (आपके दर्शन के बिना) मेरे मन में व्याकुलता पैदा हो रही है। (बता) मैं आपको कैसे देखूँ? हे मेरे दातार प्रभू !- हे मेरे मित्र ! हे मेरे साथी ! हे हरी ! हे सबसे बड़े ! हे सर्व व्यापक ! हे सृजनहार जीउ ! आप सर्व-व्यापक हैं। आप सबको पैदा करने वाले हैं। आप ही लक्ष्मी-पति हैं (आपसे विछुड़ के) हम व्याकुल हो रही हैं। (बता) हम आपको कैसे मिलें? (हे जिंदे ! जो जीव-सि्त्रयां) अहं त्याग के (अपने) हाथों से सेवा करती हैं। (अपना) सिर (गुरू के) चरणों में रखती हैं। और (अपने) मन में (प्रभू के) दर्शन की आस रखती हैं। उन्हें हरेक साँस के साथ (वह याद रहता है) उन्हें दिन रात (किसी भा समय) एक घड़ी भर। एक पल भर। एक महूरत भर वह प्रभू नहीं भूलता। हे नानक ! (कह) हे दातार प्रभू ! (हम जीव आपके बिना) प्यासे पपीहे की तरह (तड़प रहे) हैं। (बता) आपको कैसे मिलें?। 1। हे प्यारे कंत जीउ ! सुन। मैं एक विनती करती हूँ। आपके चमत्कार-तमाशे देख-देख के मैं ठॅगी गई हूँ। (आपके चमत्कार-तमाशों ने) मेरा मन मोह लिया है मेरा तन (हरेक इंद्रिय) मोहे गए हैं। (पर अब ये) जीव-स्त्री (इन चमत्कार-तमाशों से) उदास हो गई है। (आपके मिलाप के बिना इसे) धैर्य नहीं आ सकता। हे सब गुणों के मालिक पति-प्रभू ! आप दया का घर हैं। आप सदा जवान हैं। आप सारे गुणों से भरपूर हैं। हे सारे सुखों के दाते पति ! (आपके में कोई) दोश नहीं। मैं मंद-कर्मण्य स्वयं ही आपसे विछुड़ी हुई हूँ। हे नानक ! (कह) हे प्यारे पति ! (ये जीव-स्त्री) विनती करती है। आप मेहर कर के इसके हृदय घर में आ बस। 2। जो मुझे प्रभू से मिलाप कराने वाला संदेशा दे। मैं उस मित्र-प्यारे को अपना मन भेट कर दूँ। अपना शरीर (हृदय) अर्पित कर दूँ। (ये) सारे देश (ज्ञानेंद्रियां) भेट कर दूँ। अपना सिर उसके हवाले कर दूँ। (जिस जीव-स्त्री ने) साध-संगति की बरकति से अपना सिर गुरू के हवाले कर दिया।गुरू ने उसे हृदय में बस रहा परमात्मा दिखला दिया; एक छिन में ही उस जीव-स्त्री का सारा ही (प्रभू से विछोड़े का) दुख दूर हो गया। (क्योंकि) उसे मन की मुराद मिल गई। वह जीव-स्त्री (प्रभू चरणों में जुड़ के) दिन रात आत्मिक आनंद पाती है। उसके सारे चिंता-फिक्र मिट जाते हैं। नानक विनती करता है, (जो जीव-स्त्री साध-संगति का आसरा ले के अपने आप को गुरू के हवाले करती है उसे) पति प्रभू मिल जाता है और वह पति प्रभू ऐसा है। जैसा हम सारे जीव (सदा) ढूँढते रहते हैं। (वही है जिससे हम सारे मिलने की चाहत रखते हैं)। 3। मेरे मन में (अब) चाव बना रहता है। मेरे अंदर वह आत्मिक हालत प्रबल बनी हुई है कि मेरा दिल हुलारे ले रहा है। हे सहेलियो ! (जब का) मेरे हृदय घर में सुंदर प्यारा प्रभू पति आ बसा है। मेरी सारी (माया की) तृष्णा मिट गई है। (जबसे) सोहणा प्यारा ठाकुर गोपाल मुझे मिला है। मेरी सहेलियों ने (मेरे ज्ञानेंद्रियों ने) खुशी के गीत गाना शुरू कर दिए हैं। मेरे इन मित्रों-संबन्धियों को (मेरी ज्ञानेंद्रियों को) चाव चढ़ा रहता है और (मेरे अंदर से) कामादिक वैरियों का नाम-निशान मिट गया है। मैंने प्रभू पति के साथ सेज बिछा ली है। (मैंने अपने दिल को प्रभू की याद के साथ जोड़ दिया है)। अब मेरे हृय में बिन बजाए बाजे बज रहे हैं (मेरे हृदय में लगातारवह उल्लास बना रहता है जो बजते बाजों को सुन के अनुभव करते हैं।) नानक विनती करता है, जिस जीव-स्त्री को सारे सुखों का दाता प्रभू पति मिल जाता है। वह आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। 4। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २४७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।