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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 246 · गउड़ी

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246
गउड़ी
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  1. इसतरी पुरख कामि विआपे जीउ राम नाम की बिधि नही जाणी ॥
  2. गुर की सेवा करि पिरा जीउ हरि नामु धिआए ॥

गुरु अमर दास जी · छंत · राग गउड़ी

इसतरी पुरख कामि विआपे जीउ राम नाम की बिधि नही जाणी ॥

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इसतरी पुरख कामि विआपे जीउ राम नाम की बिधि नही जाणी ॥
मात पिता सुत भाई खरे पिआरे जीउ डूबि मुए बिनु पाणी ॥
डूबि मुए बिनु पाणी गति नही जाणी हउमै धातु संसारे ॥
जो आइआ सो सभु को जासी उबरे गुर वीचारे ॥
गुरमुखि होवै राम नामु वखाणै आपि तरै कुल तारे ॥
नानक नामु वसै घट अंतरि गुरमति मिले पिआरे ॥2॥
राम नाम बिनु को थिरु नाही जीउ बाजी है संसारा ॥
द्रिड़ु भगति सची जीउ राम नामु वापारा ॥
राम नामु वापारा अगम अपारा गुरमती धनु पाईऐ ॥
सेवा सुरति भगति इह साची विचहु आपु गवाईऐ ॥
हम मति हीण मूरख मुगध अंधे सतिगुरि मारगि पाए ॥
नानक गुरमुखि सबदि सुहावे अनदिनु हरि गुण गाए ॥3॥
आपि कराए करे आपि जीउ आपे सबदि सवारे ॥
आपे सतिगुरु आपि सबदु जीउ जुगु जुगु भगत पिआरे ॥
जुगु जुगु भगत पिआरे हरि आपि सवारे आपे भगती लाए ॥
आपे दाना आपे बीना आपे सेव कराए ॥
आपे गुणदाता अवगुण काटे हिरदै नामु वसाए ॥
नानक सद बलिहारी सचे विटहु आपे करे कराए ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: (माया के मोह के प्रभाव में) स्त्री और मर्द काम-वासना में फसे रहते हैं। परमात्मा के नाम सिमरन की जाच नहीं सीखते। (माया के मोह में फसे जीवों को अपने) माता-पिता-पुत्र-भाई (ही) बहुत प्यारे लगते हैं। (जिस सरोवर में) पानी नहीं। (पानी की जगह मोह है उस में) डूब के (नाको नाक फस के) आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। मोह रूपी पानी वाले माया-सरोवर में नाको नाक फस के जीव आत्मिक मौत ले लेते है और अपने आत्मिक जीवन को नहीं परखते-जाचते। (इस तरह) संसार में (जीवों को) अहंकार की भटकना लगी हुई है। जो भी जीव जगत में (जनम ले के) आता है वह (इस भटकना में) फसता जाता है। (इसमें से वही) बचते हैं जो गुरू के शबद को अपनी सोच-मण्डल में बसाते हैं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के परमात्मा का नाम उच्चारता है। वह खुद (इस माया-सरोवर से) पार लांघ जाता है। अपनी कुलों को भी पार लंघा लेता है। हे नानक! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है। वह गुरू की मति का आसरा ले के प्यारे प्रभू को मिल जाता है। 2। हे भाई! ये जगत (परमात्मा की रची हुई एक) खेल है (इस में) परमात्मा के नाम के बिना और कोई सदा कायम रहने वाला नहीं। हे भाई! परमात्मा का नाम-वणज ही सदा कायम रहने वाला है। अपहुँच और बेअंत परमात्मा का नाम-वणज ही सदा कायम रहने वाला धन है। ये धन गुरू की मति पर चलने से मिलता है। प्रभू की सेवा भक्ति, प्रभू चरणों में सुरति जोड़नी, ये सदा कायम रहने वाली (राशि) है (इसकी बरकति से अपने) अंदर से स्वैभाव दूर कर सकते हैं। हम अल्प-बुद्धि वालों को, मूर्खों को, माया के मोह में अंधे हुओं को सतिगुरू ने ही जीवन के सही रास्ते पर डाला है। हे नानक! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं और, वह हर वक्त परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। 3। (पर) हे भाई! (जीवों के वश कुछ नहीं। माया-सर में डूबने से बचाने वाला प्रभू स्वयं ही है) प्रभू खुद ही (प्रेरणा करके जीवों से काम) करवाता है (जीवों में व्यापक हो के) खुद ही (सब कुछ) करता है। प्रभू खुद ही गुरू के शबद में जोड़ के (जीवों के) जीवन सुंदर बनाता है। प्रभू खुद ही सत्गुरू मिलाता है। खुद ही (गुरू का) शबद बख्शता है। और खुद ही हरेक युग में अपने भक्तों को प्यार करता है। हरेक युग में हरि अपने भक्तों को प्यार करता है। खुद ही उनके जीवन को सँवारता है। खुद ही (उन्हें) भक्ति में जोड़ता है। वह खुद ही सबके दिल की जानने वाला और पहचानने वाला है। वह खुद ही (अपने भक्तों से अपनी) सेवा-भक्ति करवाता है। (हे भाई!) परमात्मा खुद ही (अपने) गुणों की दाति बख्शता है। (हमारे) अवगुण दूर करता है। और (हमारे) हृदय में (अपना) नाम बसाता है। हे नानक! (कहें, मैं) उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा से सदके जाता हूँ। वह खुद ही सब कुछ करता है और स्वयं ही सब कुछ कराता है। 4। 4।

गुरु अमर दास जी · छंत · राग गउड़ी

गुर की सेवा करि पिरा जीउ हरि नामु धिआए ॥

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गउड़ी महला 3 ॥
गुर की सेवा करि पिरा जीउ हरि नामु धिआए ॥
मंञहु दूरि न जाहि पिरा जीउ घरि बैठिआ हरि पाए ॥
घरि बैठिआ हरि पाए सदा चितु लाए सहजे सति सुभाए ॥
गुर की सेवा खरी सुखाली जिस नो आपि कराए ॥
नामो बीजे नामो जंमै नामो मंनि वसाए ॥
नानक सचि नामि वडिआई पूरबि लिखिआ पाए ॥1॥
हरि का नामु मीठा पिरा जीउ जा चाखहि चितु लाए ॥
रसना हरि रसु चाखु मुये जीउ अन रस साद गवाए ॥
सदा हरि रसु पाए जा हरि भाए रसना सबदि सुहाए ॥
नामु धिआए सदा सुखु पाए नामि रहै लिव लाए ॥
नामे उपजै नामे बिनसै नामे सचि समाए ॥
नानक नामु गुरमती पाईऐ आपे लए लवाए ॥2॥
एह विडाणी चाकरी पिरा जीउ धन छोडि परदेसि सिधाए ॥
दूजै किनै सुखु न पाइओ पिरा जीउ बिखिआ लोभि लुभाए ॥
बिखिआ लोभि लुभाए भरमि भुलाए ओहु किउ करि सुखु पाए ॥
चाकरी विडाणी खरी दुखाली आपु वेचि धरमु गवाए ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 3 ॥ हे प्यारी जिंदे! गुरू की सेवा करें (गुरू की शरण पड़ें। और) परमात्मा का नाम सिमरें। (इस तरह) आप अपने आप में से दूर नहीं जाएँगी (माया कें मोह की भटकना से बच जाएँगी)। (हे जिंदे!) हृदय घर में टिके रहने से परमात्मा मिल जाता है। जो जीव आत्मिक अडोलता में टिक के, सदा स्थिर प्रभू के प्रेम में जुड़ के सदा (प्रभू चरणों में) चित्त जोड़ता है। वह हृदय घर में टिका रह के परमात्मा को ढूँढ लेता है। (हे जिंदे!) गुरू की बताई हुई सेवा बहुत सुख देने वाली है (पर ये सेवा वही मनुष्य करता है) जिससे परमात्मा खुद कराऐ (जिसे खुद प्रेरणा करे)। (वह मनुष्य फिर अपने हृदय खेत में) परमात्मा का नाम ही बीजता है (वहाँ) नाम ही उगता है। वह मनुष्य अपने मन में सदा नाम ही बसाए रखता है। हे नानक! सदा स्थिर प्रभू में जुड़ के, प्रभू नाम में टिक के (मनुष्य लोक-परलोक में) आदर पाता है। (नाम सिमरन की बरकति से) पहले जन्म में किए कर्मों के संस्कारों के लेख मनुष्य के अंदर अंकुरित हो जाते हैं। 1। हे प्यारी जिंदे! परमात्मा का नाम मीठा है (पर ये आपको तभी समझ आएगी) जब आप चित्त जोड़ के (ये नाम-रस) चखेंगी। हे मेरी निष्कर्मण्य जीभ! परमात्मा के नाम का स्वाद चखें। और अन्य रसों के स्वाद त्याग दें। (पर जीभ के भी क्या वश?) जब परमात्मा को ठीक लगे। तभी जीभ सदा परमात्मा के नाम का स्वाद लेती है। और गुरू के शबद में जुड़ के सुंदर हो जाती है। (हे जिंदे!) जो मनुष्य नाम सिमरता है नाम में सुरति जोड़े रखता है। वह सदा आत्मिक आनंद पाता है। नाम की बरकति से उसके अंदर (नाम-रस की तमन्ना) पैदा होती है। नाम की बरकति से (उसके अंदर से और रसों की पकड़) दूर हो जाती है। नाम सिमरन की बरकति से वह सदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। (पर) हे नानक! परमात्मा का नाम गुरू की मति पर चलने से ही मिलता है। परमात्मा खुद ही अपने नाम की लगन पैदा करता है। 2। हे प्यारी जिंदे! (जैसे ये बेगानी नौकरी बड़ी दुखदाई होती है कि मनुष्य अपनी स्त्री को घर छोड़ के परदेस चला जाता है, वैसे ही परमात्मा को विसार के) और खुशामदें (बड़ी दुखदाई हैं क्योंकि) जीव स्त्री (अपना आंतरिक आत्मिक ठिकाना) छोड़ के जगह-जगह बाहर भटकती फिरती है। हे प्यारी जिंदे! माया के मोह में फंस के किसी ने कभी सुख नहीं पाया। मनुष्य माया के लोभ में फंस जाता है। (जब मनुष्य) माया के लोभ में फंसता है (तब माया की खातिर) भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ जाता है (उस हालत में ये) सुख कैसे पा सकता है? (हे जिंदे! माया की खातिर ये दर दर की खुशामद बहुत दुखदाई है) मनुष्य अपना आत्मिक जीवन (माया के बदले) बेच के अपना कर्तव्य छोड़ बैठता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 246 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।