Lulla Family

अंग 245

अंग
245
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर आगै करउ बिनंती जे गुर भावै जिउ मिलै तिवै मिलाईऐ ॥
आपे मेलि लए सुखदाता आपि मिलिआ घरि आए ॥
नानक कामणि सदा सुहागणि ना पिरु मरै न जाए ॥4॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: (हे माँ !) मैं गुरू के आगे विनती करती हूँ – हे गुरू ! अगर आपको मेरी विनती ठीक लगे। तो जैसे भी हैं सके मुझे (प्रीतम-प्रभू) मिला। (हे माँ !) सारे सुखों का देने वाला प्रीतम प्रभू (जिसको मिलाता है) स्वयं ही मिला लेता है। उसके हृदय घर में खुद ही आ के मिल लेता है। हे नानक ! वह जीव-स्त्री सदा के लिए भाग्यशाली हो जाती है क्योंकि उसका (ये प्रभू-) पति ना कभी मरता है ना ही उससे विछुड़ता है। 4। 2।
गउड़ी महला 3 ॥
कामणि हरि रसि बेधी जीउ हरि कै सहजि सुभाए ॥
मनु मोहनि मोहि लीआ जीउ दुबिधा सहजि समाए ॥
दुबिधा सहजि समाए कामणि वरु पाए गुरमती रंगु लाए ॥
इहु सरीरु कूड़ि कुसति भरिआ गल ताई पाप कमाए ॥
गुरमुखि भगति जितु सहज धुनि उपजै बिनु भगती मैलु न जाए ॥
नानक कामणि पिरहि पिआरी विचहु आपु गवाए ॥1॥
कामणि पिरु पाइआ जीउ गुर कै भाइ पिआरे ॥
रैणि सुखि सुती जीउ अंतरि उरि धारे ॥
अंतरि उरि धारे मिलीऐ पिआरे अनदिनु दुखु निवारे ॥
अंतरि महलु पिरु रावे कामणि गुरमती वीचारे ॥
अंम्रितु नामु पीआ दिन राती दुबिधा मारि निवारे ॥
नानक सचि मिली सोहागणि गुर कै हेति अपारे ॥2॥
आवहु दइआ करे जीउ प्रीतम अति पिआरे ॥
कामणि बिनउ करे जीउ सचि सबदि सीगारे ॥
सचि सबदि सीगारे हउमै मारे गुरमुखि कारज सवारे ॥
जुगि जुगि एको सचा सोई बूझै गुर बीचारे ॥
मनमुखि कामि विआपी मोहि संतापी किसु आगै जाइ पुकारे ॥
नानक मनमुखि थाउ न पाए बिनु गुर अति पिआरे ॥3॥
मुंध इआणी भोली निगुणीआ जीउ पिरु अगम अपारा ॥
आपे मेलि मिलीऐ जीउ आपे बखसणहारा ॥
अवगण बखसणहारा कामणि कंतु पिआरा घटि घटि रहिआ समाई ॥
प्रेम प्रीति भाइ भगती पाईऐ सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
सदा अनंदि रहै दिन राती अनदिनु रहै लिव लाई ॥
नानक सहजे हरि वरु पाइआ सा धन नउ निधि पाई ॥4॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 3 ॥ (भाग्यशाली है वह) जीव-स्त्री (जिसका मन) परमात्मा के नाम में बेधा रहता है। जो परमात्मा के प्यार में अडोलता में टिकी रहती है। और जिसके मन को सुंदर प्रभू ने मोह रखा है। (उस जीव-स्त्री की) मेरे तेर आत्मिक अडोलता में खतम हो जाती है। वह जीव-स्त्री प्रभू पति को मिल जाती है। गुरू की मति ले के वह आत्मिक रंग भोगती है। (माया के मोह में फस के मनुष्य का) ये शरीर झूठ ठॅगी फरेब से नाको नाक भरा रहता है और जीव पाप कमाता रहता है। पर गुरू शरण पड़ने से जीव प्रभू की भगती करता है। जिसकी बरकति से इसके अंदर आत्मिक अडोलता की रौंअ पैदा हो जाती है (और सारे किए पाप विकार दूर हो जाते हैं) प्रभू भगती के बगैर (विकारों की) मैल दूर नहीं होती। हे नानक ! (वह) जीव-स्त्री प्रभू पति की प्यारी बन जाती है। जो अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर लेती है। 1। जो जीव स्त्री गुरू के प्रेम-प्यार में टिकी रहती है। वह प्रभू पति को मिल जाती है। वह अपने अंदर अपने हृदय में (प्रभू-पति को) बसाती है और सारी जिंदगी-रूपी रात सुख में गुजारती है। जो जीव-स्त्री अपने अंदर प्रभू का निवास-स्थान ढूँढ लेती है। गुरू की मति ले के (प्रभू के गुणों को) विचारती है। वह प्रभू-पति के मिलाप का आत्मिक आनंद पाती है। जिस जीव-स्त्री ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस दिन रात पीया है। वह अपने अंदर से मेर-तेर को खत्म कर देती है। हे नानक ! गुरू के अथाह प्यार की बरकति से वह जीव-स्त्री सदा स्थिर प्रभू-पति में विलीन रहती है और भाग्यशाली बन जाती है। 2। हे अति प्यारे प्रीतम जी ! मेहर करके (मेरे हृदय में) आ बसो। (भाग्यशाली है वह) जीव-स्त्री जो सदा स्थिर प्रभू के नाम से व गुरू के शबद से अपने आत्मिक जीवन को सुंदर बना के (प्रभू दर पे) विनती करती है जो जीव-स्त्री सदा स्थिर प्रभू के नाम से गुरू के शबद से अपने जीवन को खूबसूरत बना लेती है। वह अपने अंदर से अहंकार दूर कर लेती है। गुरू की शरण पड़ कर वह अपने सारे कारज सवार लेती है। वह जीव-स्त्री गुरू की दी हुई विचार (के उपदेश) की बरकति से उस परमात्मा के साथ सांझ पा लेती है जो हरेक युग में ही सदा कायम रहने वाला है। (पर) अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री काम वासना में दबी रहती है। मोह में फंस के दुखी होती है। वह किस के आगे जा के (अपने दुखों की) पुकार करे? (कोई उसका ये दुख दूर नहीं कर सकता)। हे नानक ! अति प्यारे गुरू के बिना अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री (प्रभू-चरणों में) स्थान हासिल नहीं कर सकती। 3। (एक तरफ जीव-स्त्री) मूर्ख है अंजान है भोली है (कि विकारों की लपटों से बचना नहीं जानती) और गुण-हीन है। (दूसरी तरफ) प्रभू-पति अपहुँच है और बेअंत है (ऐसी अवस्था में। ऐसी जीव-स्त्री का प्रभू-पति से मिलाप कैसे हो?)। यदि प्रभू स्वयं ही (जीव-स्त्री को) मिलाए तो मिलाप हो सकता है। वह खुद ही (जीव-सि्त्रयों की भूलें गलतियां) बख्शने वाला है। प्यारा प्रभू-कंत जीव-स्त्री के अवगुण माफ करने के समर्थ है। और वह हरेक शरीर में बस रहा है (इस तरह सब के गुण-अवगुण जानता है)। सतिगुरू ने ये शिक्षा दी है कि वह कंत-प्रभू। प्रेम-प्रीति से प्राप्त होता है भगती भाव से मिलता है। हे नानक ! (जो जीव-स्त्री गुरू की इस शिक्षा पर चलती है) वह हर वक्त दिन रात आनंद में रहती है। वह हर समय (प्रभू-चरणों में) सुरति जोड़े रखती है, आत्मिक अडोलता में टिक के वह प्रभू-पति से मिल जाती है। उस जीव-स्त्री ने, जैसे दुनिया के नौ के नौ खजाने हासिल कर लिए हों। 4। 3।
गउड़ी महला 3 ॥
माइआ सरु सबलु वरतै जीउ किउ करि दुतरु तरिआ जाइ ॥
राम नामु करि बोहिथा जीउ सबदु खेवटु विचि पाइ ॥
सबदु खेवटु विचि पाए हरि आपि लघाए इन बिधि दुतरु तरीऐ ॥
गुरमुखि भगति परापति होवै जीवतिआ इउ मरीऐ ॥
खिन महि राम नामि किलविख काटे भए पवितु सरीरा ॥
नानक राम नामि निसतारा कंचन भए मनूरा ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 3 ॥ माया (के मोह) का लबालब भरा समुंद्र अपना जोर डाल रहा है। इसमें से तैरना बहुत ही मुश्किल है, (हे भाई !) कैसे इसमें से पार लंघा जाए? हे भाई ! परमात्मा के नाम को जहाज बना। गुरू के शबद को मल्लाह बना के (उस जहाज) में बैठा। यदि मनुष्य परमात्मा के नाम-जहाज में गुरू के शबद-मल्लाह को बैठा दे। तो परमात्मा स्वयं ही (माया के सरोवर से) पार लंघा देता है। (हे भाई !) इस दुश्वार माया-सरोवर में यूँ ही पार लांघ सकते हैं। गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा की भगती प्राप्त हो जाती है। इस तरह दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए माया की ओर से अछोह हो जाते हैं। हे नानक ! परमात्मा के नाम की बरकति से (सारे) पाप एक छिन में कट जाते हैं। (जिसके काटे जाते हैं। उसका) शरीर पवित्र हो जाता है। परमात्मा के नाम से ही (माया-सरोवर से) पार लांघ सकते हैं औार लोहे की मैल (जंग लगा लोहे) (जैसा नकारा हुआ मन) सोना बन जाता है। 1।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे माँ !) मैं गुरू के आगे विनती करती हूँ – हे गुरू ! अगर आपको मेरी विनती ठीक लगे।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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