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अंग २४४ · गउड़ी

अंग
244
गउड़ी
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  1. हरि गुण सारी ता कंत पिआरी नामे धरी पिआरो ॥
  2. पिर बिनु खरी निमाणी जीउ बिनु पिर किउ जीवा मेरी माई ॥

हरि गुण सारी ता कंत पिआरी नामे धरी पिआरो ॥

अंग २४३ से चला आ रहा अंश

हरि गुण सारी ता कंत पिआरी नामे धरी पिआरो ॥
नानक कामणि नाह पिआरी राम नामु गलि हारो ॥2॥
धन एकलड़ी जीउ बिनु नाह पिआरे ॥
दूजै भाइ मुठी जीउ बिनु गुर सबद करारे ॥
बिनु सबद पिआरे कउणु दुतरु तारे माइआ मोहि खुआई ॥
कूड़ि विगुती ता पिरि मुती सा धन महलु न पाई ॥
गुर सबदे राती सहजे माती अनदिनु रहै समाए ॥
नानक कामणि सदा रंगि राती हरि जीउ आपि मिलाए ॥3॥
ता मिलीऐ हरि मेले जीउ हरि बिनु कवणु मिलाए ॥
बिनु गुर प्रीतम आपणे जीउ कउणु भरमु चुकाए ॥
गुरु भरमु चुकाए इउ मिलीऐ माए ता सा धन सुखु पाए ॥
गुर सेवा बिनु घोर अंधारु बिनु गुर मगु न पाए ॥
कामणि रंगि राती सहजे माती गुर कै सबदि वीचारे ॥
नानक कामणि हरि वरु पाइआ गुर कै भाइ पिआरे ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: जो जीव-स्त्री परमात्मा के नाम से प्यार डालती है परमात्मा के गुण (अपने हृदय में) संभालती है वह परमात्मा पति की प्यारी बन जाती है। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री के गले में परमात्मा का नाम रूपी हार पड़ा रहता है। वह जीव-स्त्री परमात्मा की प्यारी हो जाती है। 2। हे जीउ ! जो जीव स्त्री प्यारे पति प्रभू के बिना अकेली (सूना जीवन व्यतीत कर रही) है। वह गुरू के सहारा देने वाले शबद के बिना और ही प्यार में ठगी जा रही है। गुरू के शबद के बिना और कोई नहीं जो उसे दुष्तर (संसार समुंद्र) से पार लंघा सकता है। वह माया के मोह में (फसी) परेशान होती रहती है। जब जीव-स्त्री (माया के) झूठे मोह में परेशान होती है। तब (समझो कि) पति प्रभू से वह छुटॅड़ हुई पड़ी है। वह जीव-स्त्री परमात्मा पति का ठिकाना नहीं ढूँढ सकती। (पर) जो जीव स्त्री गुरू के शबद में रंगी रहती है। वह आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। वह हर वक्त (प्रभू चरणों में) लीन रहती है। हे नानक ! वह जीव स्त्री सदा (प्रभू पति के) प्रेम रंग में रंगी रहती है। उसे परमात्मा खुद (अपने चरणों में) मिलाए रखता है। 3। हे जीउ ! (प्रभू चरणों में) तब ही मिल सकते हैं। अगर प्रभू खुद ही मिला ले। परमात्मा के बिना (उसके चरणों में) और कौन मिला सकता है? (क्योंकि) हे जीउ ! अपने प्रीतम गुरू के बिना और कोई (हमारे मन की) भटकना दूर नहीं कर सकता। हे माँ ! अगर गुरू (जीव स्त्री के मन की) भटकना दूर कर दे। तो इस तरह (प्रभू चरणों में) मिल सकते हैं। तभी जीव स्त्री आत्मिक आनंद पाती है। गुरू की शरण पड़े बिना उसे (जीवन का सही) रास्ता नहीं मिल सकता। हे नानक ! जो जीव-स्त्री गुरू के शबद की बरकति से (प्रभू पति के गुणों को) अपने सोच-मण्डल में टिकाती है। वह प्रभू के प्रेम रंग में रंगी रहती है। और आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। गुरू के प्रेम में गुरू के प्यार में टिकने के कारण उस जीव-स्त्री का प्रभू पति से मिलाप हो जाता है। 4। 1।

पिर बिनु खरी निमाणी जीउ बिनु पिर किउ जीवा मेरी माई ॥

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गउड़ी महला 3 ॥
पिर बिनु खरी निमाणी जीउ बिनु पिर किउ जीवा मेरी माई ॥
पिर बिनु नीद न आवै जीउ कापड़ु तनि न सुहाई ॥
कापरु तनि सुहावै जा पिर भावै गुरमती चितु लाईऐ ॥
सदा सुहागणि जा सतिगुरु सेवे गुर कै अंकि समाईऐ ॥
गुर सबदै मेला ता पिरु रावी लाहा नामु संसारे ॥
नानक कामणि नाह पिआरी जा हरि के गुण सारे ॥1॥
सा धन रंगु माणे जीउ आपणे नालि पिआरे ॥
अहिनिसि रंगि राती जीउ गुर सबदु वीचारे ॥
गुर सबदु वीचारे हउमै मारे इन बिधि मिलहु पिआरे ॥
सा धन सोहागणि सदा रंगि राती साचै नामि पिआरे ॥
अपुने गुर मिलि रहीऐ अंम्रितु गहीऐ दुबिधा मारि निवारे ॥
नानक कामणि हरि वरु पाइआ सगले दूख विसारे ॥2॥
कामणि पिरहु भुली जीउ माइआ मोहि पिआरे ॥
झूठी झूठि लगी जीउ कूड़ि मुठी कूड़िआरे ॥
कूड़ु निवारे गुरमति सारे जूऐ जनमु न हारे ॥
गुर सबदु सेवे सचि समावै विचहु हउमै मारे ॥
हरि का नामु रिदै वसाए ऐसा करे सीगारो ॥
नानक कामणि सहजि समाणी जिसु साचा नामु अधारो ॥3॥
मिलु मेरे प्रीतमा जीउ तुधु बिनु खरी निमाणी ॥
मै नैणी नीद न आवै जीउ भावै अंनु न पाणी ॥
पाणी अंनु न भावै मरीऐ हावै बिनु पिर किउ सुखु पाईऐ ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 3 ॥ हे मेरी माँ ! पति प्रभू के मिलाप के बिना मेरी जीवात्मा बहुत कंगाल सी रहती है। प्रभू पति से मेल के बिना मेरे अंदर आत्मिक जीवन नहीं आ सकता। (हे माँ !) प्रभू पति के बिना मेरे अंदर शांति नहीं आती। मुझे अपने शरीर पर कोई कपड़ा नहीं सुहाता। (हे माँ !) कपड़ा शरीर पर तभी सुहाता है जब मैं प्रभू पति को भा जाऊँ। (पर। हे माँ !) गुरू की मति पर चलने से ही प्रभू में चित्त जुड़ सकता है। जब जीव-स्त्री गुरू की शरण पड़ती है। तब वह सदा वास्ते भाग्यशाली बन जाती है। (इस वास्ते। हे माँ !) गुरू की गोद में टिके रहना चाहिए। (हे माँ !) जब गुरू के शबद में (मेरा चित्त) जुड़ता है। तब मैं प्रभू पति को मिल पड़ती हूँ। (हे माँ !) प्रभू का नाम ही जगत में (असल) कमाई है। हे नानक ! जीव स्त्री जब परमात्मा के गुण अपने हृदय में बसाती है। तब वह प्रभू पति को प्यारी लगने लग पड़ती है। 1। वह जीव स्त्री अपने प्रभू पति के मिलाप में आत्मिक आनंद भोगती है (क्योंकि) (हे मेरी माँ !) जो जीव-स्त्री गुरू के शबद को अपने सोच मण्डल में टिकाती है। वह दिन रात प्रभू पति के प्रेम रंग में रंगी रहती है। गुरू के शबद को विचार मण्डल में संभालती है वह अपने अंदर से अहंकार दूर कर लेती है। (हे सत्संगी सहेलियो ! आप भी) इस प्रकार प्रभू प्यारे को मिलो। (हे माँ !) वह जीव स्त्री हमेशा भाग्यशाली है। सदा प्रभू पति के प्रेम रंग में रंगी रहती है। जो सदा स्थिर प्रभू के नाम में प्रेम करती है। हे सहेलियो ! अपने गुरू को मिल के रहना चाहिए (गुरू से ही) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल ले सकते हैं। (जिसे ये नाम-जल मिल जाता है वह अपने अंदर से) मेर-तेर को समाप्त कर देती है। हे नानक ! उस जीव-स्त्री ने पति प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया। उसने सारे दुख भुला लिए। 2। (हे माँ !) जो जीव-स्त्री प्रभू पति (की याद) से टूट जाती है। वह माया के मोह में (फंस के और पदार्थों को) प्यार करने लग पड़ती है। वह झूठे और कूड़ पदार्थों की वणजारन झूठे मोह में लगी रहती है। झूठे मोह में ठॅगी जाती है। पर जो जीव-स्त्री गुरू की मति को (अपने हृदय में) संभालती है। वह झूठे मोह को (अपने अंदर से) दूर कर लेती है। (और इस तरह) अपना जन्म व्यर्थ नहीं गवाती। वह जीव स्त्री गुरू के शबद को संभालती है। सदा स्थिर प्रभू में लीन हो जाती है और अपने अंदर से अहंकार को खत्म कर देती है। वह परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसा लेती है - वह ऐसा आत्मिक श्रृंगार करती है। हे नानक ! सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम जिस जीव-स्त्री का जीवन आसरा है। वह जीव-स्त्री आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। 3। हे मेरे प्रीतम प्रभू जी ! मुझे मिल। आपके बिना मैं बहुत आजिज हूँ। (हे प्रीतम जी !) आपके बिना मेरे आँखों में नींद नहीं आती। मुझे ना अन्न अच्छा लगता है ना पानी। (हे माँ ! प्रीतम प्रभू के विछोड़े में) अन्न-पानी अच्छा नहीं लगता। सिसकियों में जिंद दुखी रहती है। पति प्रभू के बिना आत्मिक आनंद प्राप्त नहीं होता।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २४४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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