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अंग 240

अंग
240
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिनि गुरि मो कउ दीना जीउ ॥
आपुना दासरा आपे मुलि लीउ ॥6॥
आपे लाइओ अपना पिआरु ॥
सदा सदा तिसु गुर कउ करी नमसकारु ॥7॥
कलि कलेस भै भ्रम दुख लाथा ॥
कहु नानक मेरा गुरु समराथा ॥8॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जिस गुरू ने मुझे आत्मिक जीवन दिया है। जिसने मुझे अपना तुच्छ दास बना के खुद ही मुल्य ले लिया है (मेरे साथ गहरा अपनत्व बना लिया है)। जिस गुरू ने खुद ही मेरे अंदर अपना प्यार पैदा किया है। उस गुरू को मैं सदा ही सदा ही अपना सिर झुकाता रहता हूँ। 6। 7। उसकी शरण पड़ने से (मेरे अंदर से) झगड़े-कलेश सहम-भटकना और सारे दुख दूर हो गए हैं। हे नानक ! कह, मेरा गुरू बहुत सारी ताकतों का मालिक है।8। 9।
गउड़ी महला 5 ॥
मिलु मेरे गोबिंद अपना नामु देहु ॥
नाम बिना ध्रिगु ध्रिगु असनेहु ॥1॥ रहाउ ॥
नाम बिना जो पहिरै खाइ ॥
जिउ कूकरु जूठन महि पाइ ॥1॥
नाम बिना जेता बिउहारु ॥ जिउ मिरतक मिथिआ सीगारु ॥2॥
नामु बिसारि करे रस भोग ॥
सुखु सुपनै नही तन महि रोग ॥3॥
नामु तिआगि करे अन काज ॥
बिनसि जाइ झूठे सभि पाज ॥4॥
नाम संगि मनि प्रीति न लावै ॥
कोटि करम करतो नरकि जावै ॥5॥
हरि का नामु जिनि मनि न आराधा ॥
चोर की निआई जम पुरि बाधा ॥6॥
लाख अडंबर बहुतु बिसथारा ॥
नाम बिना झूठे पासारा ॥7॥
हरि का नामु सोई जनु लेइ ॥
करि किरपा नानक जिसु देइ ॥8॥10॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे मेरे गोबिंद ! (मुझे) मिल। (और मुझे) अपना नाम दे। (हे गोबिंद ! आपके) नाम (के प्यार) के बिना (और दुनिया वाला मोह-) प्यार धिक्कार है धिक्कार है। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा की नाम के याद के बिना मनुष्य जो कुछ भी पहनता है जो कुछ भी खाता है (वह ऐसे ही है) जैसे (कोई) कुक्ता जूठी (गंदगी) चीजों में (अपना मुंह) मारता फिरता है। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम भुला के मनुष्य और जितने भी कार्य-व्यवहार करता है। (वह ऐसे है) जैसे किसी लाश का श्रृंगार व्यर्थ (उद्यम) है। 2। (हे भाई !जो मनुष्य) परमात्मा का नाम भुला के दुनिया के पदार्थ ही भोगता फिरता है उसे (उन भोगों से) सुपने में भी (कभी ही) सुख नहीं मिल सकता (पर हां इन भोगों से) उसके शरीर में रोग पैदा हो जाते हैं। 3। (हे भाई ! जो मनुष्य) परमात्मा को छोड़ के अन्य-अन्य काम-काज करता रहता है। उसका आत्मिक जीवन नाश हो जाता है, और उसके (दुनिया वाले) सारे दिखावे व्यर्थ हो जाते हैं। 4। (हे भाई ! जो मनुष्य) अपने मन में परमात्मा के नाम के साथ प्रीति नहीं जोड़ता। वह और करोड़ों ही (बनाए हुए धार्मिक) कर्म करता हुआ भी नर्क में पहुँचता है (पड़ा रहता है। सदैव नरकीय जीवन व्यतीत करता है)। 5। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा। वह जम की पुरी में बंधा रहता है (वह आत्मिक मौत के पँजे में फंसा हुआ दुखों की चोटें सहता रहता है) जैसे कोई चोर (सेंध लगाते पकड़ा जाए तो मार खाता है)। 6। (हे भाई ! दुनिया में इज्जत बनाए रखने के) लाखों ही दिखावे के उद्यम व अनेकों फैलाव- ये सारे ही परमात्मा के नाम के बिना व्यर्थ के पसारे हैं। 7। हे नानक ! वही मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है। जिसे परमात्मा स्वयं कृपा करके (ये दाति) देता है। 8। 10।
गउड़ी महला 5 ॥
आदि मधि जो अंति निबाहै ॥ सो साजनु मेरा मनु चाहै ॥1॥
हरि की प्रीति सदा संगि चालै ॥
दइआल पुरख पूरन प्रतिपालै ॥1॥ रहाउ ॥
बिनसत नाही छोडि न जाइ ॥
जह पेखा तह रहिआ समाइ ॥2॥
सुंदरु सुघड़ु चतुरु जीअ दाता ॥
भाई पूतु पिता प्रभु माता ॥3॥
जीवन प्रान अधार मेरी रासि ॥
प्रीति लाई करि रिदै निवासि ॥4॥
माइआ सिलक काटी गोपालि ॥
करि अपुना लीनो नदरि निहालि ॥5॥
सिमरि सिमरि काटे सभि रोग ॥
चरण धिआन सरब सुख भोग ॥6॥
पूरन पुरखु नवतनु नित बाला ॥
हरि अंतरि बाहरि संगि रखवाला ॥7॥
कहु नानक हरि हरि पदु चीन ॥ सरबसु नामु भगत कउ दीन ॥8॥11॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) जो सदा ही हर वक्त मनुष्य का साथ देता है। मेरा मन उस सज्जन प्रभू को (मिलना) चाहता है 1। (हे भाई !) परमात्मा के साथ जुड़ी हुई प्रीति सदा मनुष्य का साथ देती है। वह दया का घर सर्व-व्यापक और सब गुणों का मालिक परमात्मा (अपने सेवक भक्त की सदैव) पालना करता है। 1। रहाउ। ना वह परमात्मा कभी मरता है। और ना ही वह जीवों को छोड़ के कहीं जाता है। (हे भाई !) मैं तो जिधर देखता हूँ उधर ही हर जगह परमात्मा मौजूद है। 2। (हे भाई !) परमात्मा सुंदर स्वरूप वाला है, सुचॅजा है, समझदार है, जिंद देने वाला है। वही हमारा (असली भाई) है, पुत्र है, पिता है, माँ है। 3। (हे भाई !) परमात्मा मेरे जीवन का। मेरी जिंद का आसरा है। मेरे आत्मिक जीवन की राशि पूँजी है। मैंने उसे अपने हृदय में टिका के उसके साथ अपनी प्रीति जोड़ी हुई है। 4। (हे भाई !) सृष्टि के रक्षक उस प्रभू ने मेरी माया (के मोह) की जंजीरें काट दी हैं। (मेरी ओर) मेहर की निगाह से देख के उसने मुझे अपना बना लिया है। 5। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के सारे रोग काटे जा सकते हैं। परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़नी ही (दुनिया के) सारे सुख हैं, सारे पदार्थों के भोग हैं। 6। परमात्मा सारे गुणों का मालिक है। सब जीवों में व्यापक है। वह सदा नया है। सदा जवान है (वह प्यार करने से कभी थकता नहीं। उक्ताता है)। 7। (हे भाई !) परमात्मा हरेक जीव के अंदर बसता है। सारे जगत में हर जगह बसता है। हरेक जीव के साथ है। और सब जीवों का रक्षक है। हे नानक ! कह, परमात्मा अपना नाम अपने भक्त को देता है। (भक्त के वास्ते उसका नाम ही दुनिया का) सारा धन पदार्थ है (जिसे परमात्मा अपने नाम की दाति देता है वह) परमात्मा के मिलाप की अवस्था को समझ लेता है। 8। 11।
रागु गउड़ी माझ महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
खोजत फिरे असंख अंतु न पारीआ ॥
सेई होए भगत जिना किरपारीआ ॥1॥
हउ वारीआ हरि वारीआ ॥1॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि पंथु डराउ बहुतु भैहारीआ ॥
मै तकी ओट संताह लेहु उबारीआ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी माझ महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। अनगिनत जीव ढूँढते फिरते हैं। पर किसी ने परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया। वही मनुष्य परमात्मा के भक्त बन सकते हैं। जिन पर उसकी कृपा होती है। 1। मैं कुर्बान हूँ। हरी से कुर्बान हूँ। 1। रहाउ। बार बार ये सुन के कि जगत-जीवन का रास्ता डरावना है, मैं बहुत सहमा हुआ था (कि मैं कैसे ये सफर तय करूँगा?); आखिर मैंने संतों का आसरा देखा है। (मैं संत जनों के आगे अरदास करता हूँ कि आत्मिक जीवन के रास्ते के खतरों से) मुझे बचा लें। 2।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) जिस गुरू ने मुझे आत्मिक जीवन दिया है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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