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अंग २४० · गउड़ी

अंग
240
गउड़ी
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  1. जिनि गुरि मो कउ दीना जीउ ॥
  2. मिलु मेरे गोबिंद अपना नामु देहु ॥
  3. आदि मधि जो अंति निबाहै ॥ सो साजनु मेरा मनु चाहै ॥1॥
  4. खोजत फिरे असंख अंतु न पारीआ ॥

जिनि गुरि मो कउ दीना जीउ ॥

अंग २३९ से चला आ रहा अंश

जिनि गुरि मो कउ दीना जीउ ॥
आपुना दासरा आपे मुलि लीउ ॥6॥
आपे लाइओ अपना पिआरु ॥
सदा सदा तिसु गुर कउ करी नमसकारु ॥7॥
कलि कलेस भै भ्रम दुख लाथा ॥
कहु नानक मेरा गुरु समराथा ॥8॥9॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जिस गुरू ने मुझे आत्मिक जीवन दिया है। जिसने मुझे अपना तुच्छ दास बना के खुद ही मुल्य ले लिया है (मेरे साथ गहरा अपनत्व बना लिया है)। जिस गुरू ने खुद ही मेरे अंदर अपना प्यार पैदा किया है। उस गुरू को मैं सदा ही सदा ही अपना सिर झुकाता रहता हूँ। 6। 7। उसकी शरण पड़ने से (मेरे अंदर से) झगड़े-कलेश सहम-भटकना और सारे दुख दूर हो गए हैं। हे नानक ! कह, मेरा गुरू बहुत सारी ताकतों का मालिक है।8। 9।

मिलु मेरे गोबिंद अपना नामु देहु ॥

गउड़ी महला 5 ॥
मिलु मेरे गोबिंद अपना नामु देहु ॥
नाम बिना ध्रिगु ध्रिगु असनेहु ॥1॥ रहाउ ॥
नाम बिना जो पहिरै खाइ ॥
जिउ कूकरु जूठन महि पाइ ॥1॥
नाम बिना जेता बिउहारु ॥ जिउ मिरतक मिथिआ सीगारु ॥2॥
नामु बिसारि करे रस भोग ॥
सुखु सुपनै नही तन महि रोग ॥3॥
नामु तिआगि करे अन काज ॥
बिनसि जाइ झूठे सभि पाज ॥4॥
नाम संगि मनि प्रीति न लावै ॥
कोटि करम करतो नरकि जावै ॥5॥
हरि का नामु जिनि मनि न आराधा ॥
चोर की निआई जम पुरि बाधा ॥6॥
लाख अडंबर बहुतु बिसथारा ॥
नाम बिना झूठे पासारा ॥7॥
हरि का नामु सोई जनु लेइ ॥
करि किरपा नानक जिसु देइ ॥8॥10॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे मेरे गोबिंद ! (मुझे) मिल। (और मुझे) अपना नाम दे। (हे गोबिंद ! आपके) नाम (के प्यार) के बिना (और दुनिया वाला मोह-) प्यार धिक्कार है धिक्कार है। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा की नाम के याद के बिना मनुष्य जो कुछ भी पहनता है जो कुछ भी खाता है (वह ऐसे ही है) जैसे (कोई) कुक्ता जूठी (गंदगी) चीजों में (अपना मुंह) मारता फिरता है। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम भुला के मनुष्य और जितने भी कार्य-व्यवहार करता है। (वह ऐसे है) जैसे किसी लाश का श्रृंगार व्यर्थ (उद्यम) है। 2। (हे भाई !जो मनुष्य) परमात्मा का नाम भुला के दुनिया के पदार्थ ही भोगता फिरता है उसे (उन भोगों से) सुपने में भी (कभी ही) सुख नहीं मिल सकता (पर हां इन भोगों से) उसके शरीर में रोग पैदा हो जाते हैं। 3। (हे भाई ! जो मनुष्य) परमात्मा को छोड़ के अन्य-अन्य काम-काज करता रहता है। उसका आत्मिक जीवन नाश हो जाता है, और उसके (दुनिया वाले) सारे दिखावे व्यर्थ हो जाते हैं। 4। (हे भाई ! जो मनुष्य) अपने मन में परमात्मा के नाम के साथ प्रीति नहीं जोड़ता। वह और करोड़ों ही (बनाए हुए धार्मिक) कर्म करता हुआ भी नर्क में पहुँचता है (पड़ा रहता है। सदैव नरकीय जीवन व्यतीत करता है)। 5। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा। वह जम की पुरी में बंधा रहता है (वह आत्मिक मौत के पँजे में फंसा हुआ दुखों की चोटें सहता रहता है) जैसे कोई चोर (सेंध लगाते पकड़ा जाए तो मार खाता है)। 6। (हे भाई ! दुनिया में इज्जत बनाए रखने के) लाखों ही दिखावे के उद्यम व अनेकों फैलाव- ये सारे ही परमात्मा के नाम के बिना व्यर्थ के पसारे हैं। 7। हे नानक ! वही मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है। जिसे परमात्मा स्वयं कृपा करके (ये दाति) देता है। 8। 10।

आदि मधि जो अंति निबाहै ॥ सो साजनु मेरा मनु चाहै ॥1॥

गउड़ी महला 5 ॥
आदि मधि जो अंति निबाहै ॥ सो साजनु मेरा मनु चाहै ॥1॥
हरि की प्रीति सदा संगि चालै ॥
दइआल पुरख पूरन प्रतिपालै ॥1॥ रहाउ ॥
बिनसत नाही छोडि न जाइ ॥
जह पेखा तह रहिआ समाइ ॥2॥
सुंदरु सुघड़ु चतुरु जीअ दाता ॥
भाई पूतु पिता प्रभु माता ॥3॥
जीवन प्रान अधार मेरी रासि ॥
प्रीति लाई करि रिदै निवासि ॥4॥
माइआ सिलक काटी गोपालि ॥
करि अपुना लीनो नदरि निहालि ॥5॥
सिमरि सिमरि काटे सभि रोग ॥
चरण धिआन सरब सुख भोग ॥6॥
पूरन पुरखु नवतनु नित बाला ॥
हरि अंतरि बाहरि संगि रखवाला ॥7॥
कहु नानक हरि हरि पदु चीन ॥ सरबसु नामु भगत कउ दीन ॥8॥11॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) जो सदा ही हर वक्त मनुष्य का साथ देता है। मेरा मन उस सज्जन प्रभू को (मिलना) चाहता है 1। (हे भाई !) परमात्मा के साथ जुड़ी हुई प्रीति सदा मनुष्य का साथ देती है। वह दया का घर सर्व-व्यापक और सब गुणों का मालिक परमात्मा (अपने सेवक भक्त की सदैव) पालना करता है। 1। रहाउ। ना वह परमात्मा कभी मरता है। और ना ही वह जीवों को छोड़ के कहीं जाता है। (हे भाई !) मैं तो जिधर देखता हूँ उधर ही हर जगह परमात्मा मौजूद है। 2। (हे भाई !) परमात्मा सुंदर स्वरूप वाला है, सुचॅजा है, समझदार है, जिंद देने वाला है। वही हमारा (असली भाई) है, पुत्र है, पिता है, माँ है। 3। (हे भाई !) परमात्मा मेरे जीवन का। मेरी जिंद का आसरा है। मेरे आत्मिक जीवन की राशि पूँजी है। मैंने उसे अपने हृदय में टिका के उसके साथ अपनी प्रीति जोड़ी हुई है। 4। (हे भाई !) सृष्टि के रक्षक उस प्रभू ने मेरी माया (के मोह) की जंजीरें काट दी हैं। (मेरी ओर) मेहर की निगाह से देख के उसने मुझे अपना बना लिया है। 5। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के सारे रोग काटे जा सकते हैं। परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़नी ही (दुनिया के) सारे सुख हैं, सारे पदार्थों के भोग हैं। 6। परमात्मा सारे गुणों का मालिक है। सब जीवों में व्यापक है। वह सदा नया है। सदा जवान है (वह प्यार करने से कभी थकता नहीं। उक्ताता है)। 7। (हे भाई !) परमात्मा हरेक जीव के अंदर बसता है। सारे जगत में हर जगह बसता है। हरेक जीव के साथ है। और सब जीवों का रक्षक है। हे नानक ! कह, परमात्मा अपना नाम अपने भक्त को देता है। (भक्त के वास्ते उसका नाम ही दुनिया का) सारा धन पदार्थ है (जिसे परमात्मा अपने नाम की दाति देता है वह) परमात्मा के मिलाप की अवस्था को समझ लेता है। 8। 11।

खोजत फिरे असंख अंतु न पारीआ ॥

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रागु गउड़ी माझ महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
खोजत फिरे असंख अंतु न पारीआ ॥
सेई होए भगत जिना किरपारीआ ॥1॥
हउ वारीआ हरि वारीआ ॥1॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि पंथु डराउ बहुतु भैहारीआ ॥
मै तकी ओट संताह लेहु उबारीआ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी माझ महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। अनगिनत जीव ढूँढते फिरते हैं। पर किसी ने परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया। वही मनुष्य परमात्मा के भक्त बन सकते हैं। जिन पर उसकी कृपा होती है। 1। मैं कुर्बान हूँ। हरी से कुर्बान हूँ। 1। रहाउ। बार बार ये सुन के कि जगत-जीवन का रास्ता डरावना है, मैं बहुत सहमा हुआ था (कि मैं कैसे ये सफर तय करूँगा?); आखिर मैंने संतों का आसरा देखा है। (मैं संत जनों के आगे अरदास करता हूँ कि आत्मिक जीवन के रास्ते के खतरों से) मुझे बचा लें। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २४० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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