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अंग २४१ · गउड़ी

अंग
241
गउड़ी
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  1. मोहन लाल अनूप सरब साधारीआ ॥
  2. नाराइण हरि रंग रंगो ॥
  3. हरि हरि गुरु गुरु करत भरम गए ॥

मोहन लाल अनूप सरब साधारीआ ॥

अंग २४० से चला आ रहा अंश

मोहन लाल अनूप सरब साधारीआ ॥
गुर निवि निवि लागउ पाइ देहु दिखारीआ ॥3॥
मै कीए मित्र अनेक इकसु बलिहारीआ ॥
सभ गुण किस ही नाहि हरि पूर भंडारीआ ॥4॥
चहु दिसि जपीऐ नाउ सूखि सवारीआ ॥
मै आही ओड़ि तुहारि नानक बलिहारीआ ॥5॥
गुरि काढिओ भुजा पसारि मोह कूपारीआ ॥
मै जीतिओ जनमु अपारु बहुरि न हारीआ ॥6॥
मै पाइओ सरब निधानु अकथु कथारीआ ॥
हरि दरगह सोभावंत बाह लुडारीआ ॥7॥
जन नानक लधा रतनु अमोलु अपारीआ ॥
गुर सेवा भउजलु तरीऐ कहउ पुकारीआ ॥8॥12॥

हिन्दी अर्थ: हे मन को मोह लेने वाले सुंदर लाल ! हे सब जीवों के आसरे प्रभू ! मैंझुक झुक के गुरू के चरणों में लगता हूँ (और गुरू के आगे विनती करता हूँ कि मुझे आपका) दर्शन करवा दे। 3। मैंने अनेको साक-संबंधियों को अपना मित्र बनाया (पर किसी के साथ भी सिरे का साथ नहीं निभता। अब मैं) एक परमात्मा से ही कुर्बान जाता हूँ (वही साथ निभने वाला साथी है)। सारे गुण (भी) और किसी में नहीं हैं। एक परमात्मा ही भरे खजानों वाला है। 4। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) चारों तरफ आपका ही नाम जपा जा रहा है। (जो मनुष्य जपता है वह) सुख-आनंद में (रहता है। उसका जीवन) सँवर जाता है। (हे प्रभू !) मैंने आपका आसरा लिया है। मैं आपसे सदके जाता हूँ। 5। (हे भाई !) गुरू ने मुझे बाँह फैला के मोह के कूएं में से निकाल लिया है। (उसकी बरकति से) मैंने कीमती मानस जन्म (की बाजी) जीत ली है। दुबारा मैं (मोह के मुकाबले में) बाजी नहीं हारूँगा। 6। (गुरू की कृपा) मैंने सारे गुणों का खजाना वह परमात्मा ढूँढ लिया है। जिसकी सिफत सालाह की कहानियां बयान नहीं की जा सकतीं। (जो मनुष्य सरब-निधान प्रभू को मिल लेते हैं) वह उसकी दरगाह में शोभा हासिल कर लेते हैं। वह वहाँ बाँह उलार के चलते हैं (अर्थात। मौज-आनंद में रहते हैं)। 7। हे दास नानक ! (कह, जिन्होंने गुरू का पल्ला पकड़ा। उन्होंने) परमात्मा का बेअंत कीमती नाम-रत्न हासिल कर लिया। (हे भाई !) मैं पुकार के कहता हूँ कि गुरू की शरण पड़ने से संसार समुंद्र में (से बेदाग रह के) पार लांघ जाते हैं। 8। 12।

नाराइण हरि रंग रंगो ॥

गउड़ी महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाराइण हरि रंग रंगो ॥
जपि जिहवा हरि एक मंगो ॥1॥ रहाउ ॥
तजि हउमै गुर गिआन भजो ॥
मिलि संगति धुरि करम लिखिओ ॥1॥
जो दीसै सो संगि न गइओ ॥
साकतु मूड़ु लगे पचि मुइओ ॥2॥
मोहन नामु सदा रवि रहिओ ॥
कोटि मधे किनै गुरमुखि लहिओ ॥3॥
हरि संतन करि नमो नमो ॥
नउ निधि पावहि अतुलु सुखो ॥4॥
नैन अलोवउ साध जनो ॥
हिरदै गावहु नाम निधो ॥5॥
काम क्रोध लोभु मोहु तजो ॥
जनम मरन दुहु ते रहिओ ॥6॥
दूखु अंधेरा घर ते मिटिओ ॥
गुरि गिआनु द्रिड़ाइओ दीप बलिओ ॥7॥
जिनि सेविआ सो पारि परिओ ॥
जन नानक गुरमुखि जगतु तरिओ ॥8॥1॥13॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हरी परमात्मा के प्यार रंग में अपने मन को रंग। (हे भाई !) अपनी जीभ से परमात्मा का नाम जप। हरी के दर से उसका नाम मांग।1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू के बख्शे ज्ञान की बरकति से (अपने अंदर से) अहंकार दूर करके परमात्मा का नाम सिमर। जिस मनुष्य के माथे पर धुर दरगाह से बख्शिश का लेख लिखा जाता है। वह साध-संगति में मिल के (अहंकार दूर करता है और हरी-नाम जपता है)। 1। (हे भाई ! जगत में आँखों से) जो कुछ दिखाई दे रहा है। ये किसी के भी साथ नहीं जाता। पर मूर्ख माया में ग्रसित मनुष्य (इस दिखते प्यार में) लग के परेशान हो के आत्मिक मौत बर्दाश्त करता है। 2। उस मोहन प्रभू का नाम जो सदा हर जगह व्याप रहा है। (हे भाई !) करोड़ों में किसी विरले मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर प्राप्त किया है ।3। (हे भाई !) परमात्मा के संत जनों को सदा सदा नमस्कार करता रह। आप बेअंत सुख पाएगा, आपको वह नाम मिल जाएगा, जो मानो धरती के नौ खजाने हैं। 4। (मेरी तो यही प्रार्थना है कि) मैं अपनी आँखों से (उनका) दर्शन करता रहूँ (जो नाम जपते हैं)। हे साध जनो ! अपने हृदय में परमात्मा का नाम गाते रहो जो सारे सुखों का खजाना है।5। (हे भाई !अपने मन में से) काम-क्रोध-लोभ-मोह दूर करो। (जो मनुष्य इन विकारों को मिटाता है) वह जनम और मरन दोनों (के चक्र) से बच जाता है। 6। उसके हृदय-घर में दुख का अंधकार मट जाता है, (हे भाई !) गुरू ने जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा के साथ गहरी सांझ पक्की कर ली, उसके अंदर (आत्मिक सूझ का) दीपक जग जाता है। 7। हे दास नानक ! (कह) जिस मनुष्य ने परमात्मा का सिमरन किया, वह संसार समुंद्र से पार लांघ गया। गुरू की शरण पड़ कर जगत (संसार समुंद्र को) तैर जाता है। 8। 1। 13।

हरि हरि गुरु गुरु करत भरम गए ॥

महला 5 गउड़ी ॥
हरि हरि गुरु गुरु करत भरम गए ॥
मेरै मनि सभि सुख पाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
बलतो जलतो तउकिआ गुर चंदनु सीतलाइओ ॥1॥
अगिआन अंधेरा मिटि गइआ गुर गिआनु दीपाइओ ॥2॥
पावकु सागरु गहरो चरि संतन नाव तराइओ ॥3॥
ना हम करम न धरम सुच प्रभि गहि भुजा आपाइओ ॥4॥
भउ खंडनु दुख भंजनो भगति वछल हरि नाइओ ॥5॥
अनाथह नाथ क्रिपाल दीन संम्रिथ संत ओटाइओ ॥6॥
निरगुनीआरे की बेनती देहु दरसु हरि राइओ ॥7॥
नानक सरनि तुहारी ठाकुर सेवकु दुआरै आइओ ॥8॥2॥14॥

हिन्दी अर्थ: महला 5 गउड़ी ॥ (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरते हुए। गुरू गुरू करते हुए मेरे मन की सारी भटकनें दूर हो गई हैं। और मेरे मन ने सारे ही सुख प्राप्त कर लिए हैं। 1। रहाउ। (हे भाई ! मन विकारों में) जल रहा था, तप रहा था, (जब) गुरू का शबद रूपी चँदन (घिसा के इस पर) छिड़का, तो यह मन शीतल हो गया। 1। (हे भाई !मन विकारों में) सड़ रहा था। जल रहा था। (जब) गुरू का शबद-चंदन (घिसा के इस पर) छिड़का तो ये मन ठण्डा-ठार हो गया। 2। (हे भाई !) ये गहरा संसार-समुंद्र (विकारों की तपश से) आग (आग बना पड़ा था) मैं साध-संगति बेड़ी में चढ़ के इससे पार गुजर आया हूँ। 3। (हे भाई !) मेरे पास ना कोई कर्म। ना धर्म। ना पवित्रता (आदि राशि-पूँजी) थी। प्रभू ने मेरी बाँह पकड़ के (खुद ही मुझे) अपना (दास) बना लिया है। 4। (हे भाई !) भक्ति से प्यार करने वाले हरी का वह नाम जो हरेक किस्म का डर व दुख नाश करने में स्मर्थ है (मुझे उसकी अपनी मेहर से ही मिल गया है)। 5। हे अनाथों के नाथ ! हे दीनों पर दया करने वाले ! हे संतों के सहारे ! हे प्रभू पातशाह ! 6। मेरी गुण-हीन की विनती सुन। मुझे अपना दर्शन दे। 7। हे नानक ! (अरदास कर। और कह) हे ठाकुर ! मैं आपका सेवक आपकी शरण आया हूँ। आपके दर पर आया हूँ। 8। 2। 14।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २४१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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