Lulla Family

अंग 239

अंग
239
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जितु को लाइआ तित ही लागा ॥
सो सेवकु नानक जिसु भागा ॥8॥6॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हरेक जीव उसी तरफ ही लगा हुआ है जिस तरफ परमात्मा ने उसे लगाया हुआ है। (परमात्मा की मेहर से) जिसकी किस्मत जाग जाती है। वही उसका सेवक बनता है। 8। 6।
गउड़ी महला 5 ॥
बिनु सिमरन जैसे सरप आरजारी ॥
तिउ जीवहि साकत नामु बिसारी ॥1॥
एक निमख जो सिमरन महि जीआ ॥
कोटि दिनस लाख सदा थिरु थीआ ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु सिमरन ध्रिगु करम करास ॥
काग बतन बिसटा महि वास ॥2॥
बिनु सिमरन भए कूकर काम ॥
साकत बेसुआ पूत निनाम ॥3॥
बिनु सिमरन जैसे सीङ छतारा ॥
बोलहि कूरु साकत मुखु कारा ॥4॥
बिनु सिमरन गरधभ की निआई ॥
साकत थान भरिसट फिराही ॥5॥
बिनु सिमरन कूकर हरकाइआ ॥
साकत लोभी बंधु न पाइआ ॥6॥
बिनु सिमरन है आतम घाती ॥
साकत नीच तिसु कुलु नही जाती ॥7॥
जिसु भइआ क्रिपालु तिसु सतसंगि मिलाइआ ॥
कहु नानक गुरि जगतु तराइआ ॥8॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) जैसे साँप की उम्र है (उम्र तो लंबी है, पर साँप हमेशा दूसरों को डंक ही मारता रहता है) सिमरन के बिना सर्प की तरह का जीवन – परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य परमात्मा का नाम भुला के जीते हैं (मौका मिलने पर दूसरों को डंक ही मारते हैं)। 1। (हे भाई !) जो एक पलक झपकने मात्र समय भी परमात्मा के सिमरन में गुजारा जाए, वह मानो लाखों करोड़ों दिन (जी लिया क्योंकि सिमरन की बरकति से मनुष्य का आत्मिक जीवन) सदा के लिए अडोल हो जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) प्रभू-सिमरन से विछुड़ के अन्य काम करने धिक्कारयोग्य ही हैं। जैसे कौए की चोंच गंदगी में ही रहती है। वैसे ही सिमरन-हीन मनुष्यों के मुंह (निंदा आदि की) गंदगी में ही रहते हैं। 2। प्रभू की याद से टूट के मनुष्य (लोभ व कामादिक में फंस के) कुत्तों जैसे कामों में प्रवृति रहते हैं। (हे भाई !) परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य वैश्याओं के पुत्रों की तरह (निर्लज) हो जाते हैं। जिनके पिता का नाम नहीं बताया जा सकता।3। परमात्मा की याद से टूट के वह (धरती पर भार ही हैं जैसे) भेड़ों के सिर पर सींग। (हे भाई !) परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य (सदा) झूठ बोलते हैं, हर जगह मुंह की कालिख ही कमाते हैं। 4। सिमरन से टूट के वे गधे जैसी (मलीन जीवन गुजारते हैं। जैसे गधा हमेशा राख-मिट्टी में लेट के खुश होता है)। (हे भाई !) परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य (कुकर्मों वाली) गंदी जगहों पर ही फिरते रहते हैं।5। सिमरन से टूट के वो, जैसे, पागल कुत्ते बन जाते हैं (जिसका संग करते हैं, उसी को लोभ का पागलपन चिपका देते हैं)। (हे भाई !) ईश्वर से टूटे हुए मनुष्य लोभ में ग्रसे रहते हैं (उनके राह में लाखों रुपए कमा के भी) रोक नहीं पड़ सकती।6। (हे भाई !) ईश्वर से टूटा हुआ मनुष्य सिमरन से वंचित रह कर आत्मिक मौत ले लेता है। वह सदा नीच कर्मों में रुची रखता है। उसकी ना ऊँची कुल रह जाती है ना ही ऊँची जाति। 7। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य पर परमात्मा दयावान हो जाता है। उसे साध-संगति में ला के शामिल कर लेता है। और इस तरह जगत को गुरू के द्वारा (संसार समुंद्र के विकारों से) पार लंघाता है। 8। 7।
गउड़ी महला 5 ॥
गुर कै बचनि मोहि परम गति पाई ॥
गुरि पूरै मेरी पैज रखाई ॥1॥
गुर कै बचनि धिआइओ मोहि नाउ ॥
गुर परसादि मोहि मिलिआ थाउ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर कै बचनि सुणि रसन वखाणी ॥
गुर किरपा ते अंम्रित मेरी बाणी ॥2॥
गुर कै बचनि मिटिआ मेरा आपु ॥
गुर की दइआ ते मेरा वड परतापु ॥3॥
गुर कै बचनि मिटिआ मेरा भरमु ॥
गुर कै बचनि पेखिओ सभु ब्रहमु ॥4॥
गुर कै बचनि कीनो राजु जोगु ॥
गुर कै संगि तरिआ सभु लोगु ॥5॥
गुर कै बचनि मेरे कारज सिधि ॥
गुर कै बचनि पाइआ नाउ निधि ॥6॥
जिनि जिनि कीनी मेरे गुर की आसा ॥
तिस की कटीऐ जम की फासा ॥7॥
गुर कै बचनि जागिआ मेरा करमु ॥
नानक गुरु भेटिआ पारब्रहमु ॥8॥8॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ गुरू के उपदेश पर चल के मैंने सब से ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर ली है। (दुनिया के विकारों के मुकाबले से) पूरे गुरू ने मेरी इज्जत रख ली है। 1। (हे भाई !) गुरू के उपदेश की बरकति से मैंने परमात्मा का नाम सिमरा है। और गुरू की कृपा से मुझे (परमात्मा के चरणों में) जगह मिल गई है (मेरा मन प्रभू चरणों में टिका रहता है)। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू के उपदेश द्वारा (परमात्मा की सिफत सालाह) सुन के मैं अपनी जीभ से भी सिफत सालाह उचारता रहता हूँ। गुरू की कृपा से आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी मेरी (राशि पूँजी बन गई है)। 2। गुरू के उपदेश की बरकति से (मेरे अंदर से) मेरा स्वैभाव मिट गया है। गुरू की दया से मेरा बड़ा तेज-प्रताप बन गया है (कि कोई विकार अब मेरे नजदीक नहीं फटकता)। 3। गुरू के उपदेश पर चल के मेरे मन की भटकना दूर हो गई है। और अब मैंने सर्व-व्यापी परमात्मा देख लिया है। 4। गुरू के उपदेश की बरकति से गृहस्थ में रह के ही मैं प्रभू-चरणों का मिलाप सुख पा रहा हूँ। (हे भाई !) गुरू की संगति में (रह के) सारा जगत ही (संसार समुंद्र से) पार हो जाता है। 5। (हे भाई !) गुरू के उपदेश पर चल के मेरे सारे कामों में सफलता हैं रही है। गुरू के उपदेश से मैंने परमात्मा का नाम हासिल कर लिया है (जो मेरे लिए सब कामयाबियों का) खजाना है। 6। (हे भाई !) जिस जिस मनुष्य ने मेरे गुरू की आस (अपने मन में) धारण कर ली है। उसकी जम की फांसी कट गई हैं। 7। हे नानक ! (कह) गुरू के उपदेश की बरकति से मेरी किस्मत जाग गई है। मुझे गुरू मिल गया है (और गुरू की मेहर से) मुझे परमात्मा मिल गया है। 8। 8।
गउड़ी महला 5 ॥
तिसु गुर कउ सिमरउ सासि सासि ॥
गुरु मेरे प्राण सतिगुरु मेरी रासि ॥1॥ रहाउ ॥
गुर का दरसनु देखि देखि जीवा ॥
गुर के चरण धोइ धोइ पीवा ॥1॥
गुर की रेणु नित मजनु करउ ॥
जनम जनम की हउमै मलु हरउ ॥2॥
तिसु गुर कउ झूलावउ पाखा ॥
महा अगनि ते हाथु दे राखा ॥3॥
तिसु गुर कै ग्रिहि ढोवउ पाणी ॥
जिसु गुर ते अकल गति जाणी ॥4॥
तिसु गुर कै ग्रिहि पीसउ नीत ॥
जिसु परसादि वैरी सभ मीत ॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) उस गुरू को मैं (अपने) हरेक श्वास के साथ-साथ याद करता रहता हूँ। जो गुरू मेरी जिंद का आसरा है मेरी (आत्मिक जीवन की) राशि पूंजी (का रक्षक) है।1। रहाउ। (हे भाई !) जैसे जैसे मैं गुरू के दर्शन करता हूँ। मुझे आत्मिक जीवन मिलता है। जैसे जैसे मैं गुरू के चरण धोता हूँ, मुझे (आत्मिक जीवन देने वाला) नाम जल (पीने को, जपने को) मिलता है। 1। गुरू के चरणों की धूड़ (मेरे वास्ते तीर्थ का जल है उस) में मैं सदा स्नान करता हूँ। और अनेकों जन्मों की (एकत्र की हुई) अहंकार की मैल (अपने मन में से) दूर करता हूँ। 2। उस गुरू को मैं पंखा झलता हूँ। (हे भाई !) जिस गुरू ने मुझे (विकारों की) बड़ी आग में से (अपना) हाथ दे कर बचाया हुआ है।3। मैं उस गुरू के घर में (हमेशा) पानी ढोता हूँ। (हे भाई !) जिस गुरू से मैंने उस परमात्मा की सूझ-बूझ हासिल की है जो कभी घटता-बढ़ता नहीं।4। उस गुरू के घर में मैं हमेशा चक्की पीसता हूँ। (हे भाई !) जिस गुरू की कृपा से (पहले) वैरी (दिखाई दे रहे लोग अब) सारे मित्र प्रतीत हो रहे हैं। 5।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हरेक जीव उसी तरफ ही लगा हुआ है जिस तरफ परमात्मा ने उसे लगाया हुआ है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English