मन करहला मेरे पिआरिआ विचि देही जोति समालि ॥
गुरि नउ निधि नामु विखालिआ हरि दाति करी दइआलि ॥5॥
मन करहला तूं चंचला चतुराई छडि विकरालि ॥
हरि हरि नामु समालि तूं हरि मुकति करे अंत कालि ॥6॥
मन करहला वडभागीआ तूं गिआनु रतनु समालि ॥
गुर गिआनु खड़गु हथि धारिआ जमु मारिअड़ा जमकालि ॥7॥
अंतरि निधानु मन करहले भ्रमि भवहि बाहरि भालि ॥
गुरु पुरखु पूरा भेटिआ हरि सजणु लधड़ा नालि ॥8॥
रंगि रतड़े मन करहले हरि रंगु सदा समालि ॥
हरि रंगु कदे न उतरै गुर सेवा सबदु समालि ॥9॥
हम पंखी मन करहले हरि तरवरु पुरखु अकालि ॥
वडभागी गुरमुखि पाइआ जन नानक नामु समालि ॥10॥2॥
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
जब इहु मन महि करत गुमाना ॥
तब इहु बावरु फिरत बिगाना ॥
जब इहु हूआ सगल की रीना ॥
ता ते रमईआ घटि घटि चीना ॥1॥
सहज सुहेला फलु मसकीनी ॥
सतिगुर अपुनै मोहि दानु दीनी ॥1॥ रहाउ ॥
जब किस कउ इहु जानसि मंदा ॥
तब सगले इसु मेलहि फंदा ॥
मेर तेर जब इनहि चुकाई ॥
ता ते इसु संगि नही बैराई ॥2॥
जब इनि अपुनी अपनी धारी ॥
तब इस कउ है मुसकलु भारी ॥
जब इनि करणैहारु पछाता ॥
तब इस नो नाही किछु ताता ॥3॥
जब इनि अपुनो बाधिओ मोहा ॥
आवै जाइ सदा जमि जोहा ॥
जब इस ते सभ बिनसे भरमा ॥
भेदु नाही है पारब्रहमा ॥4॥
जब इनि किछु करि माने भेदा ॥
तब ते दूख डंड अरु खेदा ॥
जब इनि एको एकी बूझिआ ॥
तब ते इस नो सभु किछु सूझिआ ॥5॥
जब इहु धावै माइआ अरथी ॥
नह त्रिपतावै नह तिस लाथी ॥
जब इस ते इहु होइओ जउला ॥
पीछै लागि चली उठि कउला ॥6॥
करि किरपा जउ सतिगुरु मिलिओ ॥
मन मंदर महि दीपकु जलिओ ॥
जीत हार की सोझी करी ॥
तउ इसु घर की कीमति परी ॥7॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर परमात्मा स्वयं ही (माया के जाल में) से खलासी कराए तो ही गुरू के चरणों को (हृदय में) संभाल के (इस जाल में से) निकल सकते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।