सबदि मनु रंगिआ लिव लाइ ॥ निज घरि वसिआ प्रभ की रजाइ ॥1॥ सतिगुरु सेविऐ जाइ अभिमानु ॥ गोविदु पाईऐ गुणी निधानु ॥1॥ रहाउ ॥ मनु बैरागी जा सबदि भउ खाइ ॥ मेरा प्रभु निरमला सभ तै रहिआ समाइ ॥ गुर किरपा ते मिलै मिलाइ ॥2॥ हरि दासन को दासु सुखु पाए ॥ मेरा हरि प्रभु इन बिधि पाइआ जाए ॥ हरि किरपा ते राम गुण गाए ॥3॥ ध्रिगु बहु जीवणु जितु हरि नामि न लगै पिआरु ॥ ध्रिगु सेज सुखाली कामणि मोह गुबारु ॥ तिन सफलु जनमु जिन नामु अधारु ॥4॥ ध्रिगु ध्रिगु ग्रिहु कुटंबु जितु हरि प्रीति न होइ ॥ सोई हमारा मीतु जो हरि गुण गावै सोइ ॥ हरि नाम बिना मै अवरु न कोइ ॥5॥ सतिगुर ते हम गति पति पाई ॥ हरि नामु धिआइआ दूखु सगल मिटाई ॥ सदा अनंदु हरि नामि लिव लाई ॥6॥ गुरि मिलिऐ हम कउ सरीर सुधि भई ॥ हउमै त्रिसना सभ अगनि बुझई ॥ बिनसे क्रोध खिमा गहि लई ॥7॥ हरि आपे क्रिपा करे नामु देवै ॥ गुरमुखि रतनु को विरला लेवै ॥ नानकु गुण गावै हरि अलख अभेवै ॥8॥8॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जिस मनुष्य ने गुरू के शबद द्वारा (प्रभू के चरणों में) सुरति जोड़ के (अपने) मन को (प्रभू के प्रेम रंग में) रंग लिया है, (गृहस्थ त्याग के कहीं बाहर जाने की आवश्यक्ता नहीं पड़ी)। वह मनुष्य प्रभू-चरणों में टिका रहता है, वह मनुष्य प्रभू-रजा में राजी रहता है। 1। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने से (मन में से) अहंकार दूर हो जाता है और गुणों का खजाना परमात्मा मिल जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) जब (कोई मनुष्य इस) डर को (कि परमात्मा हरेक के अंदर बस रहा है और हरेक के दिल की जानता है, अपनी आत्मा की) खुराक बनाता है, (उस का) मन माया के मोह से उपराम हो जाता है, उसे पवित्र स्वरूप प्यारा प्रभू हर जगह व्यापक दिखाई देता है। वह मनुष्य गुरू की कृपा से (गुरू का) मिलाया हुआ (परमात्मा को) मिल जाता है। 2। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा के सेवकों का सेवक बन जाता है, वह आत्मिक आनंद पाता है। (हे भाई !) इस तरीके से (ही) प्यारे परमात्मा का मेल प्राप्त होता है। वह मनुष्य परमात्मा की मेहर से परमात्मा के गुण गाता रहता है। 3। (हे भाई ! प्राणयाम आदि द्वारा बढ़ाई गयी) लम्बी उम्र (बल्कि) धिक्कारयोग्य है, अगर उससे परमात्मा के नाम में (उस लंबी उम्र वाले का) प्यार नहीं बनता। (दूसरी तरफ, हे भाई ! सुंदर) स्त्री की सुखदाई सेज (भी) धिक्कारयोग्य है (अगर वह) मोह का गुबार (घोर अंधेरा) (पैदा करती) है। (हे भाई ! सिर्फ) उन मनुष्यों का जन्म ही कामयाब है, जिन्होंने परमात्मा के नाम को (अपनी जिंदगी का) आसरा बनाया है। 4। (हे भाई !) वह गृहरथ जीवन धिक्कारयोग्य है, वह परिवार (वाला जीवन) धिक्कार योग्य है, जिससे परमात्मा की प्रीति नहीं बनती। (हे भाई !) हमारा तो मित्र वही मनुष्य है, जो उस परमात्मा के गुण गाता है (और हमें भी सिफत सालाह के लिए प्रेरित करता है)। (हे भाई !) परमात्मा के नाम के बगैर मुझे और कोई (सदा साथ निभने वाला साथी) नहीं दिखता। 5। (हे भाई !) गुरू से हम उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त कर सकते हैं (जिसकी बरकति से हर जगह) इज्जत मिलती है। (गुरू की शरण में आ के जिसने) परमात्मा का नाम सिमरा है, उसने अपना हरेक किस्म का दुख दूर कर लिया है, वह मनुष्य परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ के सदा आनंद पाता है। 6। (हे भाई !) अगर गुरू मिल जाए तो हम अपने शरीर को विकारों से बचा के रखने की समझ भी हासिल कर लेते हैं। (जो मनुष्य गुरू की शरण में आता है उसके अंदर से) अहम् व तृष्णा की सारी आग बुझ जाती है, (उसके अंदर से) क्रोध खत्म हो जाता है, वह सदैव क्षमा धारण किए रखता है। 7। (पर, हे भाई !) परमात्मा स्वयं ही कृपा करता है, और अपना नाम बख्शता है, कोई विरला (भाग्यशाली) मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर ये नाम-रत्न पल्ले बाँधता है। नानक (तो गुरू की कृपा से ही) उस अलख व अभेव परमात्मा के गुण सदा गाता है। 8। 8।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु गउड़ी बैरागणि महला 3 ॥ सतिगुर ते जो मुह फेरे ते वेमुख बुरे दिसंनि ॥ अनदिनु बधे मारीअनि फिरि वेला ना लहंनि ॥1॥ हरि हरि राखहु क्रिपा धारि ॥ सतसंगति मेलाइ प्रभ हरि हिरदै हरि गुण सारि ॥1॥ रहाउ ॥ से भगत हरि भावदे जो गुरमुखि भाइ चलंनि ॥ आपु छोडि सेवा करनि जीवत मुए रहंनि ॥2॥ जिस दा पिंडु पराण है तिस की सिरि कार ॥ ओहु किउ मनहु विसारीऐ हरि रखीऐ हिरदै धारि ॥3॥ नामि मिलिऐ पति पाईऐ नामि मंनिऐ सुखु होइ ॥ सतिगुर ते नामु पाईऐ करमि मिलै प्रभु सोइ ॥4॥ सतिगुर ते जो मुहु फेरे ओइ भ्रमदे ना टिकंनि ॥ धरति असमानु न झलई विचि विसटा पए पचंनि ॥5॥ इहु जगु भरमि भुलाइआ मोह ठगउली पाइ ॥ जिना सतिगुरु भेटिआ तिन नेड़ि न भिटै माइ ॥6॥ सतिगुरु सेवनि सो सोहणे हउमै मैलु गवाइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु गउड़ी बैरागणि महला 3 ॥ (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू से मुंह फेरे रखते हैं, गुरू की ओर से बे-मुख हुए वो मनुष्य (देखने को ही भले) बुरे दिखते हैं। (माया के मोह के बंधनों में) बंधे हुए वह मनुष्य हर समय मोह की चोटें खाते रहते हैं, (इन चोटों से बचने के लिए) उन्हें दुबारा समय हाथ नहीं लगेगा, (अर्थात, मार भी खाते रहते हैं, फिर भी ये मोह इतना प्यारा लगता है कि इसमें से निकलने को जीअ नहीं करता)। 1। हे हरी ! हे हरी !मेहर कर, (मुझे माया के पँजे से) बचा के रख। हे हरी ! हे प्रभू ! मुझे साध-संगत में मिला के रख, ता कि मैं आपके गुण अपने हृदय में संभाल के रखूँ। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा को वह भक्त प्यारे लगते हैं, जो गुरू की शरण पड़ कर गुरू के दर्शाए मुताबिक जीवन व्यातीत करते हैं, जो (गुरू के हुकम अनुसार) स्वैभाव (स्वार्थ) छोड़ के सेवा भक्ति करते हैं और दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए भी माया के मोह की ओर से अछोह रहते हैं। 2। (हे भाई !) जिस परमात्मा का दिया हुआ ये शरीर है, जिस परमात्मा की दी हुई ये जिंद है, उसी का हुकम (ही) हरेक के शरीर पर चल रहा है। उसे किसी भी हालत में अपने मन से भुलाना नहीं चाहिए। उस परमात्मा को अपने हृदय में बसा के रखना चाहिए। 3। (हे भाई !) अगर परमात्मा का नाम मिल जाए तो (हर जगह) इज्जत मिलती है, अगर परमात्मा के नाम से मन लग जाए तो आत्मिक आनंद हासिल होता है, (पर, हे भाई !) गुरू से ही परमात्मा का नाम मिलता है, अपनी मेहर से ही वह परमात्मा मिलता है। 4। (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की ओर से मुंह मोड़े रखते हैं, वो मनुष्य (माया के मोह में सदैव) भटकते फिरते हैं, उन्हें कभी आत्मिक शांति नहीं मिलती। उन्हें ना धरती ना ही आसमान झेल सकता है (सारी सृष्टि में कोई अन्य जीव उन्हें आत्मिक सहारा नहीं दे सकता) वे माया के मोह की गंदगी में पड़े हुए ही आत्मिक जीवन जलाते रहते हैं। 5। (हे भाई !माया ने) इस जगत को (अपने मोह की) भटकना में (डाल के) मोह की ठगबूटी खिला के गलत जीवन राह पर डाला हुआ है। (पर, हे भाई !) जिन्हें सतिगुरू मिल जाता है, ये माया उनके नजदीक भी नहीं फटकती (उन पर अपने मोह का जादू नहीं चला सकती)। 6। (हे भाई !) जो मनुष्य सतिगुरू की शरण पड़ते हैं वह (अपने अंदर से) अहंकार की मैल दूर करके स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) जिस मनुष्य ने गुरू के शबद द्वारा (प्रभू के चरणों में) सुरति जोड़ के (अपने) मन को (प्रभू के प्रेम रंग में) रंग लिया है, (गृहस्थ त्याग के कहीं बाहर जाने की आवश्यक्ता नहीं ।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।