अंग
234
गउड़ी
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सबदि रते से निरमले चलहि सतिगुर भाइ ॥7॥
सबदि रते से निरमले चलहि सतिगुर भाइ ॥7॥
हरि प्रभ दाता एकु तूं तूं आपे बखसि मिलाइ ॥
जनु नानकु सरणागती जिउ भावै तिवै छडाइ ॥8॥1॥9॥
हरि प्रभ दाता एकु तूं तूं आपे बखसि मिलाइ ॥
जनु नानकु सरणागती जिउ भावै तिवै छडाइ ॥8॥1॥9॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के शबद (के रंग) में रंगे जाते हैं, वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं, वे गुरू के बताए हुकम के अनुसार चलते हैं, (जीवन बिताते हैं)। 7। हे हरी ! हे प्रभू ! सिर्फ आप ही हैं जो (गुरू के द्वारा अपने नाम की) दात देने वाले हैं, आप स्वयं ही मेहर करके मुझे अपने चरणों में जोड़। (मैं आपका) दास नानक आपकी शरण आया हूँ, जैसे आपको ठीक लगे, मुझे उसी तरह (इस माया के मोह के पँजे से) बचा ले। 8। 1। 9।
करहले मन परदेसीआ किउ मिलीऐ हरि माइ ॥
रागु गउड़ी पूरबी महला 4 करहले
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करहले मन परदेसीआ किउ मिलीऐ हरि माइ ॥
गुरु भागि पूरै पाइआ गलि मिलिआ पिआरा आइ ॥1॥
मन करहला सतिगुरु पुरखु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ हरि राम नाम धिआइ ॥
जिथै लेखा मंगीऐ हरि आपे लए छडाइ ॥2॥
मन करहला अति निरमला मलु लागी हउमै आइ ॥
परतखि पिरु घरि नालि पिआरा विछुड़ि चोटा खाइ ॥3॥
मन करहला मेरे प्रीतमा हरि रिदै भालि भालाइ ॥
उपाइ कितै न लभई गुरु हिरदै हरि देखाइ ॥4॥
मन करहला मेरे प्रीतमा दिनु रैणि हरि लिव लाइ ॥
घरु जाइ पावहि रंग महली गुरु मेले हरि मेलाइ ॥5॥
मन करहला तूं मीतु मेरा पाखंडु लोभु तजाइ ॥
पाखंडि लोभी मारीऐ जम डंडु देइ सजाइ ॥6॥
मन करहला मेरे प्रान तूं मैलु पाखंडु भरमु गवाइ ॥
हरि अंम्रित सरु गुरि पूरिआ मिलि संगती मलु लहि जाइ ॥7॥
मन करहला मेरे पिआरिआ इक गुर की सिख सुणाइ ॥
इहु मोहु माइआ पसरिआ अंति साथि न कोई जाइ ॥8॥
मन करहला मेरे साजना हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥
हरि दरगह पैनाइआ हरि आपि लइआ गलि लाइ ॥9॥
मन करहला गुरि मंनिआ गुरमुखि कार कमाइ ॥
गुर आगै करि जोदड़ी जन नानक हरि मेलाइ ॥10॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करहले मन परदेसीआ किउ मिलीऐ हरि माइ ॥
गुरु भागि पूरै पाइआ गलि मिलिआ पिआरा आइ ॥1॥
मन करहला सतिगुरु पुरखु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ हरि राम नाम धिआइ ॥
जिथै लेखा मंगीऐ हरि आपे लए छडाइ ॥2॥
मन करहला अति निरमला मलु लागी हउमै आइ ॥
परतखि पिरु घरि नालि पिआरा विछुड़ि चोटा खाइ ॥3॥
मन करहला मेरे प्रीतमा हरि रिदै भालि भालाइ ॥
उपाइ कितै न लभई गुरु हिरदै हरि देखाइ ॥4॥
मन करहला मेरे प्रीतमा दिनु रैणि हरि लिव लाइ ॥
घरु जाइ पावहि रंग महली गुरु मेले हरि मेलाइ ॥5॥
मन करहला तूं मीतु मेरा पाखंडु लोभु तजाइ ॥
पाखंडि लोभी मारीऐ जम डंडु देइ सजाइ ॥6॥
मन करहला मेरे प्रान तूं मैलु पाखंडु भरमु गवाइ ॥
हरि अंम्रित सरु गुरि पूरिआ मिलि संगती मलु लहि जाइ ॥7॥
मन करहला मेरे पिआरिआ इक गुर की सिख सुणाइ ॥
इहु मोहु माइआ पसरिआ अंति साथि न कोई जाइ ॥8॥
मन करहला मेरे साजना हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥
हरि दरगह पैनाइआ हरि आपि लइआ गलि लाइ ॥9॥
मन करहला गुरि मंनिआ गुरमुखि कार कमाइ ॥
गुर आगै करि जोदड़ी जन नानक हरि मेलाइ ॥10॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी महला 4 करहले ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे बे-मुहारे मन ! हे (यहाँ) परदेस में रहने वाले मन ! (आपने सदा इस वतन में ही नहीं टिके रहना। कभी सोच कि उस) परमात्मा को कैसे मिला जाए (जो) माँ (की तरह हमें पालता है)। (हे बे-मुहारे मन ! जिस मनुष्य को) पूरी किस्मत से गुरू मिल जाता है, प्यारा परमात्मा उसके गले से आ लगता है। 1। हे ऊँठ के बच्चे की तरह बे-मुहारे (मेरे) मन ! परमात्मा के रूप गुरू को याद रख। 1। रहाउ। हे बे-मुहार मन ! विचारवान बन, और, परमात्मा का नाम सिमरता रह, (अगर सिमरता रहेगा तो) परमात्मा खुद ही (वहाँ) सुर्खरू करवा लेगा जहाँ (किए कर्मों का) हिसाब मांगा जाता है। 2। हे बे’मुहार मन ! आप (अस्लियत में) बहुत पवित्र थे, पर आपको अहंकार की मैल चिपकी हुई है। (क्या अजीब दुर्भाग्य है कि) पति-प्रभू प्रत्यक्ष तौर पर हृदय में बस रहा है, (जिंद के) साथ बस रहा है, (पर जिंद माया के मोह के कारण उससे) विछड़ के दुखी हो रही है। 3। हे मेरे प्यारे मन ! हे बे-मुहार मन ! अपने हृदय में परमात्मा की खोज कर, तलाश कर। वह परमात्मा किसी और तरीके से नहीं मिलता। गुरू (ही) हृदय में (बसता) दिखा देता है। 4। हे बे-मुहार मन ! हे मेरे प्यारे मन ! दिन रात परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़। (इस तरह उस) आनंदी के महल में जा के ठिकाना ढूँढ लेगा। पर गुरू ही परमात्मा से मिला सकता है। 5। हे मेरे बे-मुहार मन !आप मेरे मित्र हैं (मैं आपको समझाता हूँ) माया का लालच छोड़ के पाखण्ड छोड़ दे। पाखण्डी और लालची का आत्मिक जीवन खत्म हो जाता है। आत्मिक मौत का सहम सदा उसके सिर पर रहता है, परमात्मा उसे ये सजा देता है। 6। हे मेरे प्यारे मन ! हे बे-मुहार मन ! आप (अपने अंदर से विकारों की) मैल दूर कर, पाखण्ड छोड़ दे और (माया के पीछे) भटकना त्याग दे। (देख ! साध-संगति में) पूरे गुरू ने हरी नाम अमृत का सरोवर लबा लब भरा हुआ है, साध-संगति में मिल के (उस सरोवर में स्नान कर, आपकी विकारों की) मैल उतर जाएगी। 7। हे बे-मुहार मन ! हे मेरे मन ! गुरू की ये शिक्षा (ध्यान से) सुन (ये सारे साक-संबंधी और धन-पदार्थ-) ये सारा माया का मोह (-जाल) बिखरा हुआ है, और अंत के समय (इनमें से) कोई भी (आपके) साथ नहीं जाएगा। 8। हे मेरे सज्जन मन ! हे मेरे बे-मुहार मन ! जिस मनुष्य ने (इस जीवन यात्रा में) परमात्मा (का नाम धन-) खर्च पल्ले बाँधा है, वह (लोक परलोक में) इज्जत कमाता है, परमात्मा की दरगाह में उसे आदर-सम्मान मिलता है, परमात्मा स्वयं उसे अपने गले से लगा लेता है। 9। हे मेरे बे-मुहार मन ! गुरू में श्रद्धा धारण कर के गुरू की बताई हुई कार कर। हे दास नानक ! (कह, हे बे-मुहार मन !) गुरू के आगे अरजोई कर (हे गुरू मेहर कर, मुझे) परमात्मा (के चरणों) में जोड़े रख। 10। 1।
मन करहला वीचारीआ वीचारि देखु समालि ॥
गउड़ी महला 4 ॥
मन करहला वीचारीआ वीचारि देखु समालि ॥
बन फिरि थके बन वासीआ पिरु गुरमति रिदै निहालि ॥1॥
मन करहला गुर गोविंदु समालि ॥1॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ मनमुख फाथिआ महा जालि ॥
गुरमुखि प्राणी मुकतु है हरि हरि नामु समालि ॥2॥
मन करहला मेरे पिआरिआ सतसंगति सतिगुरु भालि ॥
सतसंगति लगि हरि धिआईऐ हरि हरि चलै तेरै नालि ॥3॥
मन करहला वडभागीआ हरि एक नदरि निहालि ॥
मन करहला वीचारीआ वीचारि देखु समालि ॥
बन फिरि थके बन वासीआ पिरु गुरमति रिदै निहालि ॥1॥
मन करहला गुर गोविंदु समालि ॥1॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ मनमुख फाथिआ महा जालि ॥
गुरमुखि प्राणी मुकतु है हरि हरि नामु समालि ॥2॥
मन करहला मेरे पिआरिआ सतसंगति सतिगुरु भालि ॥
सतसंगति लगि हरि धिआईऐ हरि हरि चलै तेरै नालि ॥3॥
मन करहला वडभागीआ हरि एक नदरि निहालि ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 4 ॥ हे मेरे बे-मुहार मन ! आप विचारवान बन, आप विचार के देख, आप होश करके देख। जंगलों में भटक-भटक के जंगलवासी (मन) ! (आपका) मालिक प्रभू (आपके) हृदय में (बस रहा है, उसे) गुरू की मति ले कर (अपने अंदर) देख। 1। ऊँठ के बच्चे की तरह हे (मेरे) बे-मुहार मन ! आप परमात्मा (की याद) को (अपने अंदर) संभाल के रख। 1। रहाउ। हे बे-मुहार मन ! आप विचारवान बन। (देख) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (माया के मोह के) बड़े जाल में फंसे हुए हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वह परमात्मा का नाम (हृदय में) संभाल के (इस जाल से) बच जाता है। 2। हे मेरे प्यारे मन ! हे बे-मुहार मन ! साध-संगति में जा, (वहां) गुरू को तलाश। साध-संगति का आसरा लेकर परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए, ये हरी नाम ही आपके (सदा) साथ रहेगा। 3। हे बे-मुहार मन ! वह मनुष्य बहुत भाग्यशाली बन जाता है जिस पर परमात्मा मिहर की निगाह करता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ४: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २३४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।