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अंग 234

अंग
234
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सबदि रते से निरमले चलहि सतिगुर भाइ ॥7॥
हरि प्रभ दाता एकु तूं तूं आपे बखसि मिलाइ ॥
जनु नानकु सरणागती जिउ भावै तिवै छडाइ ॥8॥1॥9॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के शबद (के रंग) में रंगे जाते हैं, वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं, वे गुरू के बताए हुकम के अनुसार चलते हैं, (जीवन बिताते हैं)। 7। हे हरी ! हे प्रभू ! सिर्फ आप ही है जो (गुरू के द्वारा अपने नाम की) दात देने वाला है, आप स्वयं ही मेहर करके मुझे अपने चरणों में जोड़। (मैं आपका) दास नानक आपकी शरण आया हूँ, जैसे आपको ठीक लगे, मुझे उसी तरह (इस माया के मोह के पँजे से) बचा ले। 8। 1। 9।
रागु गउड़ी पूरबी महला 4 करहले
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करहले मन परदेसीआ किउ मिलीऐ हरि माइ ॥
गुरु भागि पूरै पाइआ गलि मिलिआ पिआरा आइ ॥1॥
मन करहला सतिगुरु पुरखु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ हरि राम नाम धिआइ ॥
जिथै लेखा मंगीऐ हरि आपे लए छडाइ ॥2॥
मन करहला अति निरमला मलु लागी हउमै आइ ॥
परतखि पिरु घरि नालि पिआरा विछुड़ि चोटा खाइ ॥3॥
मन करहला मेरे प्रीतमा हरि रिदै भालि भालाइ ॥
उपाइ कितै न लभई गुरु हिरदै हरि देखाइ ॥4॥
मन करहला मेरे प्रीतमा दिनु रैणि हरि लिव लाइ ॥
घरु जाइ पावहि रंग महली गुरु मेले हरि मेलाइ ॥5॥
मन करहला तूं मीतु मेरा पाखंडु लोभु तजाइ ॥
पाखंडि लोभी मारीऐ जम डंडु देइ सजाइ ॥6॥
मन करहला मेरे प्रान तूं मैलु पाखंडु भरमु गवाइ ॥
हरि अंम्रित सरु गुरि पूरिआ मिलि संगती मलु लहि जाइ ॥7॥
मन करहला मेरे पिआरिआ इक गुर की सिख सुणाइ ॥
इहु मोहु माइआ पसरिआ अंति साथि न कोई जाइ ॥8॥
मन करहला मेरे साजना हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥
हरि दरगह पैनाइआ हरि आपि लइआ गलि लाइ ॥9॥
मन करहला गुरि मंनिआ गुरमुखि कार कमाइ ॥
गुर आगै करि जोदड़ी जन नानक हरि मेलाइ ॥10॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी महला 4 करहले ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे बे-मुहारे मन ! हे (यहाँ) परदेस में रहने वाले मन ! (तूने सदा इस वतन में ही नहीं टिके रहना। कभी सोच कि उस) परमात्मा को कैसे मिला जाए (जो) माँ (की तरह हमें पालता है)। (हे बे-मुहारे मन ! जिस मनुष्य को) पूरी किस्मत से गुरू मिल जाता है, प्यारा परमात्मा उसके गले से आ लगता है। 1। हे ऊँठ के बच्चे की तरह बे-मुहारे (मेरे) मन ! परमात्मा के रूप गुरू को याद रख। 1। रहाउ। हे बे-मुहार मन ! विचारवान बन, और, परमात्मा का नाम सिमरता रह, (अगर सिमरता रहेगा तो) परमात्मा खुद ही (वहाँ) सुर्खरू करवा लेगा जहाँ (किए कर्मों का) हिसाब मांगा जाता है। 2। हे बे’मुहार मन ! आप (अस्लियत में) बहुत पवित्र था, पर आपको अहंकार की मैल चिपकी हुई है। (क्या अजीब दुर्भाग्य है कि) पति-प्रभू प्रत्यक्ष तौर पर हृदय में बस रहा है, (जिंद के) साथ बस रहा है, (पर जिंद माया के मोह के कारण उससे) विछड़ के दुखी हो रही है। 3। हे मेरे प्यारे मन ! हे बे-मुहार मन ! अपने हृदय में परमात्मा की खोज कर, तलाश कर। वह परमात्मा किसी और तरीके से नहीं मिलता। गुरू (ही) हृदय में (बसता) दिखा देता है। 4। हे बे-मुहार मन ! हे मेरे प्यारे मन ! दिन रात परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़। (इस तरह उस) आनंदी के महल में जा के ठिकाना ढूँढ लेगा। पर गुरू ही परमात्मा से मिला सकता है। 5। हे मेरे बे-मुहार मन !आप मेरा मित्र है (मैं आपको समझाता हूँ) माया का लालच छोड़ के पाखण्ड छोड़ दे। पाखण्डी और लालची का आत्मिक जीवन खत्म हो जाता है। आत्मिक मौत का सहम सदा उसके सिर पर रहता है, परमात्मा उसे ये सजा देता है। 6। हे मेरे प्यारे मन ! हे बे-मुहार मन ! आप (अपने अंदर से विकारों की) मैल दूर कर, पाखण्ड छोड़ दे और (माया के पीछे) भटकना त्याग दे। (देख ! साध-संगति में) पूरे गुरू ने हरी नाम अमृत का सरोवर लबा लब भरा हुआ है, साध-संगति में मिल के (उस सरोवर में स्नान कर, आपकी विकारों की) मैल उतर जाएगी। 7। हे बे-मुहार मन ! हे मेरे मन ! गुरू की ये शिक्षा (ध्यान से) सुन (ये सारे साक-संबंधी और धन-पदार्थ-) ये सारा माया का मोह (-जाल) बिखरा हुआ है, और अंत के समय (इनमें से) कोई भी (आपके) साथ नहीं जाएगा। 8। हे मेरे सज्जन मन ! हे मेरे बे-मुहार मन ! जिस मनुष्य ने (इस जीवन यात्रा में) परमात्मा (का नाम धन-) खर्च पल्ले बाँधा है, वह (लोक परलोक में) इज्जत कमाता है, परमात्मा की दरगाह में उसे आदर-सम्मान मिलता है, परमात्मा स्वयं उसे अपने गले से लगा लेता है। 9। हे मेरे बे-मुहार मन ! गुरू में श्रद्धा धारण कर के गुरू की बताई हुई कार कर। हे दास नानक ! (कह, हे बे-मुहार मन !) गुरू के आगे अरजोई कर (हे गुरू मेहर कर, मुझे) परमात्मा (के चरणों) में जोड़े रख। 10। 1।
गउड़ी महला 4 ॥
मन करहला वीचारीआ वीचारि देखु समालि ॥
बन फिरि थके बन वासीआ पिरु गुरमति रिदै निहालि ॥1॥
मन करहला गुर गोविंदु समालि ॥1॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ मनमुख फाथिआ महा जालि ॥
गुरमुखि प्राणी मुकतु है हरि हरि नामु समालि ॥2॥
मन करहला मेरे पिआरिआ सतसंगति सतिगुरु भालि ॥
सतसंगति लगि हरि धिआईऐ हरि हरि चलै तेरै नालि ॥3॥
मन करहला वडभागीआ हरि एक नदरि निहालि ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 4 ॥ हे मेरे बे-मुहार मन ! आप विचारवान बन, आप विचार के देख, आप होश करके देख। जंगलों में भटक-भटक के जंगलवासी (मन) ! (आपका) मालिक प्रभू (आपके) हृदय में (बस रहा है, उसे) गुरू की मति ले कर (अपने अंदर) देख। 1। ऊँठ के बच्चे की तरह हे (मेरे) बे-मुहार मन ! आप परमात्मा (की याद) को (अपने अंदर) संभाल के रख। 1। रहाउ। हे बे-मुहार मन ! आप विचारवान बन। (देख) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (माया के मोह के) बड़े जाल में फंसे हुए हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वह परमात्मा का नाम (हृदय में) संभाल के (इस जाल से) बच जाता है। 2। हे मेरे प्यारे मन ! हे बे-मुहार मन ! साध-संगति में जा, (वहां) गुरू को तलाश। साध-संगति का आसरा लेकर परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए, ये हरी नाम ही आपके (सदा) साथ रहेगा। 3। हे बे-मुहार मन ! वह मनुष्य बहुत भाग्यशाली बन जाता है जिस पर परमात्मा मिहर की निगाह करता है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य गुरू के शबद (के रंग) में रंगे जाते हैं, वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं, वे गुरू के बताए हुकम के अनुसार चलते हैं, (जीवन बिताते हैं)।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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