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अंग 231

अंग
231
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ततु न चीनहि बंनहि पंड पराला ॥2॥
मनमुख अगिआनि कुमारगि पाए ॥
हरि नामु बिसारिआ बहु करम द्रिड़ाए ॥
भवजलि डूबे दूजै भाए ॥3॥
माइआ का मुहताजु पंडितु कहावै ॥
बिखिआ राता बहुतु दुखु पावै ॥
जम का गलि जेवड़ा नित कालु संतावै ॥4॥
गुरमुखि जमकालु नेड़ि न आवै ॥
हउमै दूजा सबदि जलावै ॥
नामे राते हरि गुण गावै ॥5॥
माइआ दासी भगता की कार कमावै ॥
चरणी लागै ता महलु पावै ॥
सद ही निरमलु सहजि समावै ॥6॥
हरि कथा सुणहि से धनवंत दिसहि जुग माही ॥
तिन कउ सभि निवहि अनदिनु पूज कराही ॥
सहजे गुण रवहि साचे मन माही ॥7॥
पूरै सतिगुरि सबदु सुणाइआ ॥
त्रै गुण मेटे चउथै चितु लाइआ ॥
नानक हउमै मारि ब्रहम मिलाइआ ॥8॥4॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: वह असल (जीवन उद्देश्य) को नहीं पहचानते, वह (धार्मिक चर्चा की) फूस के बंडल ही (अपने सिर पर) बाँधे रखते हैं। 2। (हे भाई ! वे लोग ब्रहमा की रची हुई बाणी पढ़ते हैं, पर) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य परमात्मा के साथ जान-पहिचान से वंचित रहने के कारण गलत जीवन राह पर पड़े रहते हैं। वे परमात्मा का नाम तो भुला देते हैं, पर (अन्य वर्त-नेम आदिक) अनेकों कर्म करने पर जोर देते रहते हैं। ऐसे मनुष्य परमात्मा के बिना और प्यार में फंसे रहने के कारण संसार समुंद्र में डूबे रहते हैं (विकारों में फंसे रहते हैं)। 3। (हे भाई ! ब्रह्मा की रची बाणी का विद्वान मनुष्य) माया का तृष्णालु रहता हुआ भी (अपने आप को) पंडित कहलवाता है। माया के मोह में फंसा वह (अंतरात्मे) बहुत दुख सहता रहता है, उसके गले में आत्मिक मौत का फंदा पड़ा रहता है, आत्मिक मौत उसे सदैव दुखी रखती है। 4। (पर, हे भाई !) आत्मिक मौत गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के नजदीक नहीं फटकती, वह गुरू के शबद की बरकति से (अपने अंदर से) अहंकार जला देता है, वह परमात्मा के नाम में ही रंगा रह के परमात्मा के गुण गाता रहता है। 5। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति करते हैं, माया उनकी दासी बनी रहती है, और उनकी जरूरतें पूरी करती है। जो मनुष्य उन भक्त जनों की चरणों में लगता है, वह भी प्रभू चरणों में ठिकाना प्राप्त कर लेता है। वह भी सदा ही पवित्र मन वाला हो जाता है और आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। 6। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह की बातें सुनतें हैं, वह जगत में (प्रत्यक्ष) धनवान दिखते हैं (वे माया की तृष्णा में नहीं भटकते फिरते), सारे लोग उनके आगे नत्मस्तक होते हैं, और हर वक्त उनका आदर-सत्कार करते हैं (क्योंकि वह मनुष्य) आत्मिक अडोलता में टिक के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के गुण अपने मन में याद करे रखते हैं। 7। हे नानक ! (कह, हे भाई ! जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी सुनाई है, उसने अपने अंदर से (माया के) तीनों गुणों का प्रभाव मिटा लिया है, उसने अपना मन उस आत्मिक अवस्था में टिका लिया है जहाँ माया के तीन गुण अपना असर नहीं डाल सकते, (गुरू ने उसके अंदर से) अहंकार मार के उसको परमात्मा के साथ जोड़ दिया है। 8। 4।
गउड़ी महला 3 ॥
ब्रहमा वेदु पड़ै वादु वखाणै ॥
अंतरि तामसु आपु न पछाणै ॥
ता प्रभु पाए गुर सबदु वखाणै ॥1॥
गुर सेवा करउ फिरि कालु न खाइ ॥
मनमुख खाधे दूजै भाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखि प्राणी अपराधी सीधे ॥
गुर कै सबदि अंतरि सहजि रीधे ॥
मेरा प्रभु पाइआ गुर कै सबदि सीधे ॥2॥
सतिगुरि मेले प्रभि आपि मिलाए ॥
मेरे प्रभ साचे कै मनि भाए ॥
हरि गुण गावहि सहजि सुभाए ॥3॥
बिनु गुर साचे भरमि भुलाए ॥
मनमुख अंधे सदा बिखु खाए ॥
जम डंडु सहहि सदा दुखु पाए ॥4॥
जमूआ न जोहै हरि की सरणाई ॥
हउमै मारि सचि लिव लाई ॥
सदा रहै हरि नामि लिव लाई ॥5॥
सतिगुरु सेवहि से जन निरमल पविता ॥
मन सिउ मनु मिलाइ सभु जगु जीता ॥
इन बिधि कुसलु तेरै मेरे मीता ॥6॥
सतिगुरू सेवे सो फलु पाए ॥
हिरदै नामु विचहु आपु गवाए ॥
अनहद बाणी सबदु वजाए ॥7॥
सतिगुर ते कवनु कवनु न सीधो मेरे भाई ॥
भगती सीधे दरि सोभा पाई ॥
नानक राम नामि वडिआई ॥8॥5॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 3 ॥ (हे भाई ! पंडित उस) वेद को पढ़ता है (जिसे वह) ब्रह्मा का उच्चारा हुआ (समझता है, उसके आसरे) बहिस (की बातें) सुनाता है, पर उसके अपने अंदर आत्मिक जीवन वाला अंधेरा ही रहता है, क्योंकि वह अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता ही नहीं। जब मनुष्य गुरू का शबद (जो प्रभू की सिफत सालाह से भरपूर है) उच्चारता है, तभी प्रभू का मिलाप हासिल करता है। 1। (हे भाई !) मैं (तो) गुरू की सेवा करता हूँ (मैं तो गुरू की शरण पड़ा हूँ। जो मनुष्य गुरू का प्रभाव लेता है उसे) फिर कभी आत्मिक मौत नहीं खाती (आत्मिक मौत उसके आत्मिक जीवन को तबाह नहीं करती)। (पर) जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलते हैं, माया के प्यार में (फंसने के कारण) उनके आत्मिक जीवन खत्म हो जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) पापी मनुष्य भी गुरू की शरण पड़ कर अपना जीवन सफल कर लेते हैं, गुरू के शबद की बरकति से वह आत्मिक अडोलता में टिक जाते हैं, उनके अंदर प्रभू मिलाप की रीझ पैदा हो जाती है, वह प्रभू को मिल जाते हैं, गुरू के शबद द्वारा वे सफल जीवन वाले हो जाते हैं। 2। (हे भाई !) जिन्हें गुरू ने (अपने शबद में) जोड़ा है, उन्हें प्रभू ने अपने चरणों में मिला लिया है, वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के मन में प्यारे लगने लग पड़ते हैं, वे आत्मिक अडोलता में प्रेम में जुड़ के प्रभू के गुण गाते हैं। 3। (हे भाई !) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभू के रूप गुरू से विछुड़ के भटकना के कारण गलत राह पर पड़े रहते हैं। माया के मोह में अंधे हुए हुये वे सदा (इस मोह का) जहर ही खाते रहते हैं जिस कारण वे आत्मिक मौत की सजा ही सहते हैं और सदा दुख पाते हैं। 4। (हे भाई ! जो मनुष्य) परमात्मा की शरण पड़ा रहता है विचारा जम उसकी तरफ देख भी नहीं सकता (आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं फटकती)। वह मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार दूर करके सदा स्थिर प्रभू (के चरणों) में सुरति जोड़े रखता है, वह सदा परमात्मा के नाम में लिव लगाए रखता है। 5। (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं, वे पवित्र और स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं, वह गुरू के मन के साथ अपना मन जोड़ के (गुरू की रजा में चल के) सारे जगत को जीत लेते हैं (कोई विकार उनके ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकता)। हे मेरे मित्र ! (अगर आप भी गुरू की शरण पड़े, तो) इस तरीके से आपके अंदर भी आनंद बना रहेगा। 6। (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वह (यह) फल हासिल करता है (कि) उसके हृदय में परमात्मा का नाम बस पड़ता है, वह अपने अंदर से स्वैभाव (अहम्-अहंकार) दूर कर लेता है। (जैसे ढोल बजने पर कोई छोटी मोटी आवाज सुनाई नहीं देती) वह मनुष्य (अपने अंदर) एक रस सिफत सालाह की बाणी, सिफत सालाह का शबद उजागर करता है (जिसकी बरकति से) कोई अन्य बुरी प्रेरणा असर नहीं डाल सकती। 7। हे नानक ! (कह) हे मेरे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से कौन कौन सा मनुष्य (जीवन में) कामयाब नहीं होता? (जो भी मनुष्य गुरू का पल्ला पकड़ता है, उसकी जिंदगी सफल हो जाती है)। (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा की भक्ति की बरकति से मनुष्य कामयाब जीवन वाले हो जाते हैं, प्रभू के दर पर उन्हें शोभा मिलती है। परमात्मा के नाम की बरकति से उन्हें (हर जगह वडिआई) आदर, शोभा मिलती है। 8। 5।
गउड़ी महला 3 ॥
त्रै गुण वखाणै भरमु न जाइ ॥
बंधन न तूटहि मुकति न पाइ ॥
मुकति दाता सतिगुरु जुग माहि ॥1॥
गुरमुखि प्राणी भरमु गवाइ ॥
सहज धुनि उपजै हरि लिव लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
त्रै गुण कालै की सिरि कारा ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 3 ॥ (पर, हे भाई !) जो मनुष्य माया के पसारे की बातों में दिलचस्पी रखता है, उसके मन की भटकना दूर नहीं हो सकती, उसके (माया के मोह के) बंधन नहीं टूटते, उसे (माया के मोह से) आजादी प्राप्त नहीं होती। (हे भाई !) जगत में माया के मोह से निजात देने वाला (सिर्फ) गुरू (ही) है। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वह अपने मन की भटकना दूर कर लेता है, उसके अंदर आत्मिक अडोलता की रौंअ पैदा हो जाती है (क्योंकि, गुरू की कृपा से) वह परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) माया के पसारे में दिलचस्पी रखने वालों के सिर पर (सदा) आत्मिक मौत का हुकम चलता है,

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह असल (जीवन उद्देश्य) को नहीं पहचानते, वह (धार्मिक चर्चा की) फूस के बंडल ही (अपने सिर पर) बाँधे रखते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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