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अंग 230

अंग
230
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरमुखि विचहु हउमै जाइ ॥
गुरमुखि मैलु न लागै आइ ॥
गुरमुखि नामु वसै मनि आइ ॥2॥
गुरमुखि करम धरम सचि होई ॥
गुरमुखि अहंकारु जलाए दोई ॥
गुरमुखि नामि रते सुखु होई ॥3॥
आपणा मनु परबोधहु बूझहु सोई ॥
लोक समझावहु सुणे न कोई ॥
गुरमुखि समझहु सदा सुखु होई ॥4॥
मनमुखि डंफु बहुतु चतुराई ॥
जो किछु कमावै सु थाइ न पाई ॥
आवै जावै ठउर न काई ॥5॥
मनमुख करम करे बहुतु अभिमाना ॥
बग जिउ लाइ बहै नित धिआना ॥
जमि पकड़िआ तब ही पछुताना ॥6॥
बिनु सतिगुर सेवे मुकति न होई ॥
गुर परसादी मिलै हरि सोई ॥
गुरु दाता जुग चारे होई ॥7॥
गुरमुखि जाति पति नामे वडिआई ॥
साइर की पुत्री बिदारि गवाई ॥
नानक बिनु नावै झूठी चतुराई ॥8॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (हे पंडित !) गुरू की शरण पड़ने से मन में से अहंकार दूर हो जाता है, गुरू की शरण पड़ने से (मन के अहंकार की) मैल आ के नहीं चिपकती, (क्योंकि) गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा का नाम मन में आ बसता है। 2। (हे पंडित !) गुरू के सन्मुख रहने से सदा स्थिर परमात्मा में लीनता हैं जाती है (और यही है असली) कर्म-धर्म। जो गुरू की शरण पड़ता है वह (अपने अंदर से) अहंकार व मेर तेर जला देता है। प्रभू के नाम में रंगे जा के गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 3। (हे पंडित ! पहले) अपने मन को जगाओ और उस परमात्मा की हस्ती को समझो। (हे पण्डित ! आपका अपना मन माया के मोह में सोया पड़ा है, पर) आप लोगों को शिक्षा देते हैं (इस तरह कभी) कोई मनुष्य (शिक्षा) नहीं सुनता। गुरू की शरण पड़ कर आप खुद (सही जीवन मार्ग को) समझो, आपको सदा आत्मिक आनंद मिलेगा। 4। (हे पंडित !) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (धार्मिक) दिखावा करता है, बड़ी चतुराई दिखाता है। (पर जो कुछ वह) खुद (अमली जीवन) कमाता है वह (परमात्मा की नजरों में) परवान नहीं होता, वह मनुष्य जनम मरण के चक्कर में पड़ा रहता है, उसे आत्मिक शांति की कोई जगह नहीं मिलती। 5। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (अपनी ओर से धार्मिक) कर्म करता है (पर) इस तरह उसके अंदर बहुत गुरूर पैदा होता है, वह सदा बगुले की तरह ही समाधि लगा के बैठता है। वह तभी पछताएगा जब मौत ने (उसे सिर से) आ जकड़ा। 6। (हे पण्डित !) सतिगुरू की शरण पड़े बिना (दंभ आदि से) खलासी नहीं होती। गुरू की कृपा से ही वह (घट-घट की जानने वाला) परमात्मा मिलता है। (हे पण्डित ! सतियुग कलियुग कह कह के किसी युग के जिम्मे बुराई लगा के गलती ना कर) चारों युगों में गुरू ही परमात्मा के नाम की दाति देने वाला है। 7। (हे पंडित !) गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य के लिए हरी-नाम ही ऊँची जाति है, ऊँचा कुल है, परमात्मा के नाम में वह अपनी इज्जत मानता है। नाम की बरकति से ही उसने माया का प्रभाव (अपने अंदर से) काट के परे रख दिया है। हे नानक ! (कह, हे पंडित !) परमात्मा के नाम से वंचित रह कर और और चतुराईयां दिखानी व्यर्थ हैं। 8। 2।
गउड़ी मः 3 ॥
इसु जुग का धरमु पड़हु तुम भाई ॥
पूरै गुरि सभ सोझी पाई ॥
ऐथै अगै हरि नामु सखाई ॥1॥
राम पड़हु मनि करहु बीचारु ॥
गुर परसादी मैलु उतारु ॥1॥ रहाउ ॥
वादि विरोधि न पाइआ जाइ ॥
मनु तनु फीका दूजै भाइ ॥
गुर कै सबदि सचि लिव लाइ ॥2॥
हउमै मैला इहु संसारा ॥
नित तीरथि नावै न जाइ अहंकारा ॥
बिनु गुर भेटे जमु करे खुआरा ॥3॥
सो जनु साचा जि हउमै मारै ॥
गुर कै सबदि पंच संघारै ॥
आपि तरै सगले कुल तारै ॥4॥
माइआ मोहि नटि बाजी पाई ॥
मनमुख अंध रहे लपटाई ॥
गुरमुखि अलिपत रहे लिव लाई ॥5॥
बहुते भेख करै भेखधारी ॥
अंतरि तिसना फिरै अहंकारी ॥
आपु न चीनै बाजी हारी ॥6॥
कापड़ पहिरि करे चतुराई ॥
माइआ मोहि अति भरमि भुलाई ॥
बिनु गुर सेवे बहुतु दुखु पाई ॥7॥
नामि रते सदा बैरागी ॥
ग्रिही अंतरि साचि लिव लागी ॥
नानक सतिगुरु सेवहि से वडभागी ॥8॥3॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी मः 3 ॥ हे भाई ! इस मानस जन्म के कर्तव्य पढ़ो (अर्थात, ये सीखो कि मानस जन्म में जीवन सफल करने के लिए क्या प्रयास करने चाहिए)। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ा है) पूरे गुरू ने उसे ये सूझ दी कि इस लोक में और परलोक में परमात्मा का नाम (ही असल) साथी है। 1। (हे भाई !) परमात्मा (की सिफत सालाह) पढ़ो, (अपने) मन में (परमात्मा के गुणों का) विचार करो, (इस तरह) गुरू की कृपा से (अपने मन में से विकारों की) मैल दूर करो। 1। रहाउ। (हे भाई ! किसी धार्मिक) बहिस करने से (या किसी धर्म का) खण्डन करने से परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं होता (इस तरह परमात्मा के नाम की लगन से टूट के) और ही स्वादों में पड़ा मन आत्मिक जीवन से वंचित हो जाता है, शरीर (हृदय) आत्मिक जीवन विहीन हो जाता है। गुरू के शबद के द्वारा (ही मनुष्य) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में लगन जोड़ सकता है। 2। (हे भाई !गुरू को मिले बिना) ये जगत (भाव, दुनिया का ये मनुष्य) अहम् (के विकार) से मलीन (-मन) हो जाता है। सदा तीर्थों पर स्नान भी करता है (पर इस तरह इसके मन का) अहंकार दूर नहीं होता, गुरू को मिले बगैर आत्मिक मौत इसे ख्वार करती रहती है। 3। (हे भाई !) वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का रूप हो जाता है, और (अपने अंदर से) अहंकार को दूर कर लेता है जो मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (कामादिक) पाँचों विकारों को खत्म कर देता है, वह खुद (संसार समुंद्र में से) पार लांघ जाता है और अपने सारे कुलों को भी पार लंघा लेता है। 4। (हे भाई ! जैसे जब कोई नट बाजी डालता है तो लोग तमाशा देखने आ इकट्ठे होते हैं, वैसे ही) (प्रभू) नट ने माया के मोह से ये (जगत रचना का) तमाशा रच दिया है। (इसे देख देख के) अपने मन के पीछे चलने वाले (माया के मोह में) अंधे हुए मनुष्य (इस तमाशे के साथ) चिपक रहे हैं। पर, गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ के (इस तमाशे से) निर्लिप रहते हैं। 5। (हे भाई !) निरे धार्मिक पहिरावे को ही धर्म समझने वाला मनुष्य विभिन्न तरह की धार्मिक वेश-भूषाएं पहनता है (पर उसके) अंदर (माया की) तृष्णा (बनी रहती है) वह अहंकार में ही विचरता है। वह अपने जीवन को नहीं परखता (इस वास्ते) वह मनुष्य-जनम की बाज़ी हार जाता है। 6। (हे भाई !) जो मनुष्य निरे धार्मिक पहिरावे करके ही चतुराई (भरी बातें) करता है (कि मैं धार्मिक हूँ, पर अंदर से) माया के मोह के कारण बहुत भटकना में फंस के गलत राह पर पड़ा रहता है, वह मनुष्य गुरू की शरण ना आने के कारण बहुत दुख पाता है। 7। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा के नाम में रंगे रहते हैं, वे सदैव वैरागमयी रहते हैं। गृहस्थ में रहते हुए ही उनकी लगन सदा-स्थिर परमात्मा में लगी रहती है। हे नानक ! वे मनुष्य बहुत भाग्यशाली हैं, क्योंकि वे गुरू की शरण में रहते हैं। 8। 3।
गउड़ी महला 3 ॥
ब्रहमा मूलु वेद अभिआसा ॥
तिस ते उपजे देव मोह पिआसा ॥
त्रै गुण भरमे नाही निज घरि वासा ॥1॥
हम हरि राखे सतिगुरू मिलाइआ ॥
अनदिनु भगति हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
त्रै गुण बाणी ब्रहम जंजाला ॥
पड़ि वादु वखाणहि सिरि मारे जमकाला ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 3 ॥ (हे भाई ! जिस) ब्रहमा को वेद-अभ्यास का रास्ता चलाने वाला माना जाता है (जो ब्रह्मा वेद-अभ्यास का मूल माना जाता है) उससे (सारे) देवते पैदा हुए (माने जाते हैं, पर वह देवते माया के) मोह (-माया की) तृष्णा में फंसे हुए ही बताए जा रहे हैं। वह देवते माया के तीन गुणों में ही भटकते रहे, उन्हे प्रभू चरणों में ठिकाना ना मिला। 1। (हे भाई !) हमें परमात्मा ने (माया के प्रभाव से बचा) लिया है, (परमातमा ने हमें) गुरू मिला दिया है, (जिस गुरू ने हमारे दिल में) हर वक्त (परमात्मा की) भक्ति पक्की टिका दी है, परमात्मा का नाम पक्का टिका दिया है। 1। रहाउ। (हे भाई !) ब्रह्मा की रची हुई बाणी (वह बाणी जो ब्रहमा की रची हुई बताई जाती है) माया के तीन गुणों में ही रखती है, (क्योंकि इसे) पढ़ के (विद्वान पण्डित) बहिस ही करते हैं, उनके सिर पर आत्मिक मौत अपनी चोट कायम रखती है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे पंडित !) गुरू की शरण पड़ने से मन में से अहंकार दूर हो जाता है, गुरू की शरण पड़ने से (मन के अहंकार की) मैल आ के नहीं चिपकती, (क्योंकि) गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा का नाम मन मे।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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