गउड़ी महला 1 ॥ गुर परसादी बूझि ले तउ होइ निबेरा ॥ घरि घरि नामु निरंजना सो ठाकुरु मेरा ॥1॥ बिनु गुर सबद न छूटीऐ देखहु वीचारा ॥ जे लख करम कमावही बिनु गुर अंधिआरा ॥1॥ रहाउ ॥ अंधे अकली बाहरे किआ तिन सिउ कहीऐ ॥ बिनु गुर पंथु न सूझई कितु बिधि निरबहीऐ ॥2॥ खोटे कउ खरा कहै खरे सार न जाणै ॥ अंधे का नाउ पारखू कली काल विडाणै ॥3॥ सूते कउ जागतु कहै जागत कउ सूता ॥ जीवत कउ मूआ कहै मूए नही रोता ॥4॥ आवत कउ जाता कहै जाते कउ आइआ ॥ पर की कउ अपुनी कहै अपुनो नही भाइआ ॥5॥ मीठे कउ कउड़ा कहै कड़ूए कउ मीठा ॥ राते की निंदा करहि ऐसा कलि महि डीठा ॥6॥ चेरी की सेवा करहि ठाकुरु नही दीसै ॥ पोखरु नीरु विरोलीऐ माखनु नही रीसै ॥7॥ इसु पद जो अरथाइ लेइ सो गुरू हमारा ॥ नानक चीनै आप कउ सो अपर अपारा ॥8॥ सभु आपे आपि वरतदा आपे भरमाइआ ॥ गुर किरपा ते बूझीऐ सभु ब्रहमु समाइआ ॥9॥2॥18॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ (हे भाई !) माया के प्रभाव से पैदा हुए आत्मिक अंधेरे में से आपको निजात मिल जाएगी, अगर आप गुरू की कृपा से ये बात समझ ले कि- माया रहित प्रभू का नाम हरेक हृदय-घर में बसता है और वही निरंजन मेरा भी पालनहार मालिक है । 1। (माया के मोह ने जीवों की आत्मिक आँखों के आगे अंधकार खड़ा कर दिया है, हे भाई !) विचार करके देख लो, गुरू के शबद के बिना (इस आत्मिक अंधेरे से) खलासी नहीं हो सकती। (हे भाई !) अगर आप लाखों ही धर्म-कर्म करता रहे, तो भी गुरू की शरण आए बिना ये आत्मिक अंधेरा (टिका ही रहेगा)। 1। रहाउ। जिन लोगों को माया के मोह ने अंधा कर दिया है और बुद्धि हीन कर दिया है, उन्हें ये समझाने का कोई लाभ नहीं। गुरू की शरण के बिना उन्हे जीवन का सही रास्ता मिल नहीं सकता, सही जीवन-राह के राही का उनके साथ किसी तरह का भी साथ नहीं निभ सकता। 2। माया के मोह में अंधा हुआ मनुष्य उस धन को जिसका प्रभू की दरगाह में कोई मूल्य नहीं है, असल धन कहता है। पर (जो नाम-धन) असल धन (है उस) की कद्र ही नहीं समझता। माया में अंधे हुए मनुष्य को समझदार कहा जा रहा है – ये आश्चर्यजनक चाल है दुनिया के समय की। 3। माया की मोह की नींद में सोए हुए को जगत कहता है कि ये जागता है सुचेत है, पर जो मनुष्य (परमातमा की याद में) जागता है सुचेत है, उसको कहता है कि ये सोया हुआ है। प्रभू की भक्ति की बरकति से जीते आत्मिक जीवन वाले को जगत कहता है कि हमारे लिए तो मरा हुआ है। पर आत्मिक मौत मरे हुए को देख के कोई अफसोस नहीं करता। 4। परमात्मा के रास्ते पर आने वाले को जगत कहता है कि ये गया गुजरा है, पर प्रभू की ओर से गए गुजरे को जगत समझता है कि इसी का जगत में आना सफल हुआ है। जिस माया ने दूसरे की बन जाना है उसे जगत अपनी कहता है, पर जो नाम-धन असल में अपना है वह अच्छा नहीं लगता। 5। नाम-रस और सारे रसों से मीठा है, इसको जगत कड़वा कहता है। विषियों का रस (अंत को) कड़वा (दुखदाई साबत होता) है, इसे जगत स्वादिष्ट कह रहा है। प्रभू के नाम-रंग में रंगे हुए की लोग निंदा करते हैं। जगत में ये आश्चर्यजनक तमाशा देखने में । 6। लोग परमात्मा की दासी (माया) की तो सेवा खुशामद कर रहे हैं, पर (माया का) मालिक किसी को दिखता ही नहीं। (माया में से सुख ढूँढना इस तरह है जैसे पानी मथ के उसमें से मक्खन ढूँढना)। यदि छप्पड़ को मथें, अगर पानी को मथें, उसमें से मक्खन नहीं निकल सकता। 7। हे नानक ! जो मनुष्य अपनी अस्लियत को पहिचान लेता है, वह उस परमात्मा का रूप बन जाता है जो माया के प्रभाव से परे है और जिसके गुणों का परला छोर नहीं मिल सकता। स्वै-पहिचान के आत्मिक दर्जे को मनुष्य प्राप्त कर लेता है, मैं उसके आगे अपना सिर झुकाता हूँ। 8। (पर माया में और जीवों में) हर जगह परमात्मा स्वयं ही स्वयं व्यापक है, खुद ही जीवों को गलत राह पर डालता है। गुरू की मेहर से ही ये समझ पड़ती है कि परमातमा हरेक जगह मौजूद है। 9। 2। 18।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी गुआरेरी महला 3 असटपदीआ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !परमात्मा को भुला के माया आदि) के साथ डाला प्यार मन की अपवित्रता (का कारण बनता) है (इस अपवित्रता के कारण माया की) भटकना में गलत रास्ते पर पड़े हुए मनुष्य को जनम मरण का चक्र बना रहता है। 1। (हे भाई !) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (के मन) की अपवित्रता कभी दूर नहीं होती। जब तक (मनुष्य गुरू के) शबद में नहीं पतीजता, परमात्मा के नाम में नहीं जुड़ता (तब तक मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है ।1। रहाउ। (हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के लिए) ये जितना ही जगत है, जितना ही जगत का मोह है ये सारा अपवित्रता (का मूल) है, वह मनुष्य (इस आत्मिक मौत में) मर मर के बारंबार पैदा होता रहता है। 2। (मनमुखों के वास्ते) आग में, हवा में, पानी में भी अपवित्रता ही है, जितना कुछ भोजन आदि वो खाते हैं वह भी (उनके मन के वास्ते) अपवित्रता (का कारण ही बनता) है। 3। (हे भाई !) सूतक (के भ्रम में ग्रसे हुए मन को) कोई कर्म-कांड पवित्र नहीं कर सकते। कोई देव-पूजा पवित्र नहीं कर सकती। परमात्मा के नाम में रंगे जा के ही मन पवित्र होता है। 4। (हे भाई !) अगर सतिगुरू का आसरा लिया जाए तो मन की अपवित्रता दूर हो जाती है, (गुरू की शरण में रहने वाला मनुष्य) ना मरता है ना पैदा होता है, ना ही उसे आत्मिक मौत खाती है। 5। (हे भाई !बेशक) कोई स्मृतियों-शास्त्रों को भी विचार के देख लो। परमात्मा के नाम के बिना कोई मनुष्य मानसिक अपवित्रता से खलासी नहीं पा सकता। 6। (हे भाई !) चारों युगों में गुरू के शबद को विचार के (परमात्मा का) नाम (जप के ही मनुष्य) उत्तम बन सकता है। इस युग में भी जिसे कलियुग कहा जा रहा है वही मनुष्य (विकारों के समुंद्रों से) पार लांघता है जो गुरू की शरण पड़ता है। 7। जो सदा कायम रहने वाला है और जो कभी पैदा होता मरता नहीं (इस तरह उस मनुष्य को कोई अपवित्रता छू नहीं सकती) हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य उस परमात्मा में सदा लीन रहता है । 8। 1।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 3 ॥ (हे पंडित !) गुरू के सन्मुख हो के परमात्मा की सेवा भक्ति को अपने जीवन का आसरा बना। परमात्मा को अपने हृदय में अपने मन में टिका के रख, (हे पंडित !) गुरू की शरण पड़ कर आप सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर आदर मान हासिल करेगा। 1। हे पंडित !परमात्मा की सिफत सालाह पढ़ (और इसकी बरकति से अपने अंदर से) विकार छोड़। (हे पंडित !) गुरू की शरण पड़ कर आप संसार समुंद्र से पार लांघ जाएगा। 1। रहाउ।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी महला 1 ॥ (हे भाई !) माया के प्रभाव से पैदा हुए आत्मिक अंधेरे में से आपको निजात मिल जाएगी, अगर आप गुरू की कृपा से ये बात समझ ले कि- माया रहित प्रभू का नाम हरेक हृदय-घर में बसता।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।