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अंग 23

अंग
23
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिना रासि न सचु है किउ तिना सुखु होइ ॥
खोटै वणजि वणंजिऐ मनु तनु खोटा होइ ॥
फाही फाथे मिरग जिउ दूखु घणो नित रोइ ॥2॥
खोटे पोतै ना पवहि तिन हरि गुर दरसु न होइ ॥
खोटे जाति न पति है खोटि न सीझसि कोइ ॥
खोटे खोटु कमावणा आइ गइआ पति खोइ ॥3॥
नानक मनु समझाईऐ गुर कै सबदि सालाह ॥
राम नाम रंगि रतिआ भारु न भरमु तिनाह ॥
हरि जपि लाहा अगला निरभउ हरि मन माह ॥4॥23॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: जिन लोगों के पास सदा कायम रहने वाले प्रभू के नाम की पूँजी नहीं, उन्हें कभी आत्मिक आनन्द नहीं मिल सकता। अगर नित्य खोटा व्यापार ही करते रहें तो मन भी खोटा हो जाता है तथा शरीर भी खोटा (भाव, खोट मनुष्य के अंदर रच जाता है)। जैसे, जाल में फंसा हुआ हिरन दुखी होता है, वैसे ही (खोट की फाही में फस के) जीव को बहुत दुख होता है, वह नित्य दुखी होता है।2। खोटे सिक्के (सरकारी) खजाने में नहीं लिए जाते (वैसे ही खोटे बंदे दरगाह में आदर नहीं पाते) उन्हें हरि का गुरू का दीदार नहीं होता। खोटे मनुष्य की असलियत ठीक नहीं होती। खोटे को इज्जत नहीं मिलती। खोट करने से कोई जीव (आत्मिक जीवन में) कामयाब नहीं हो सकता। खोटे मनुष्य ने सदा खोट ही कमाना है। (उसे खोट कमाने की आदत बन जाती है)। वह अपनी इज्जत गवा के सदा जन्मता मरता रहता है।3। हे नानक! परमात्मा की सिफत सलाह वाले गुर-शबद के द्वारा अपने मन को समझाना चाहिए। जो लोग परमात्मा के नाम के प्यार में रंगे रहते हैं, उनको खोटे कामों का भार सहना नहीं पड़ता। उनका मन खोटे कामों की ओर नहीं दौड़ता। परमात्मा का नाम जप के बहुत सारा आत्मिक लाभ कमा लेते हैं, और वह प्रभू जो निरभय है,मन में आ बसता है।4।23।
सिरीरागु महला 1 घरु 2 ॥
धनु जोबनु अरु फुलड़ा नाठीअड़े दिन चारि ॥
पबणि केरे पत जिउ ढलि ढुलि जुंमणहार ॥1॥
रंगु माणि लै पिआरिआ जा जोबनु नउ हुला ॥
दिन थोड़ड़े थके भइआ पुराणा चोला ॥1॥ रहाउ ॥
सजण मेरे रंगुले जाइ सुते जीराणि ॥
हं भी वंञा डुमणी रोवा झीणी बाणि ॥2॥
की न सुणेही गोरीए आपण कंनी सोइ ॥
लगी आवहि साहुरै नित न पेईआ होइ ॥3॥
नानक सुती पेईऐ जाणु विरती संनि ॥
गुणा गवाई गंठड़ी अवगण चली बंनि ॥4॥24॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 2 ॥ धन, जवानी और छोटा सा फूल- ये चार दिनों के ही मेहमान होते हैं। जैसे बनस्पति के पत्ते पानी के ढल जाने के बाद सूख के नाश हो जाते हैं, ऐसे ही ये भी नाश हो जाते हैं।1। हे प्यारे! जब तक नई जवानी है तब तक आत्मिक आनन्द ले ले। जब उम्र के दिन थोड़े रह गए, शारीरिक चोला पुराना हो जाएगा (फिर सिमरन नहीं हो सकेगा)।1।रहाउ । मेरे प्यारे सज्जन कब्रिस्तान में जा के सो गए हैं, (मैं उनके विजोग में) धीमी आवाज में रो रही हूँ (पर मुझे ये समझ नहीं आ रही कि) मैं भी दुचित्ती में हो के (उधर को ही) चल पड़ूंगी।2। हे सुंदर जीव स्त्री! आप ध्यान से ये खबर क्यूँ नहीं सुनती कि पेका घर (इस लोक का बसेवा) सदा नहीं रह सकता, सहुरे घर (परलोक में) जरूर जाना पड़ेगा।3। हे नानक! जो जीव स्त्री पेके घर (इस लोक में गफ़लत की नींद) सोई रही, ऐसे जानों कि (उसके गुणों को) दिन दिहाड़े ही सेंध लगी रही। उसने गुणों की गठड़ी गवा ली। वह (यहां से) अवगुणों की गठड़ी बांध के ले चली।4।24।
सिरीरागु महला 1 घरु दूजा 2 ॥
आपे रसीआ आपि रसु आपे रावणहारु ॥
आपे होवै चोलड़ा आपे सेज भतारु ॥1॥
रंगि रता मेरा साहिबु रवि रहिआ भरपूरि ॥1॥ रहाउ ॥
आपे माछी मछुली आपे पाणी जालु ॥
आपे जाल मणकड़ा आपे अंदरि लालु ॥2॥
आपे बहु बिधि रंगुला सखीए मेरा लालु ॥
नित रवै सोहागणी देखु हमारा हालु ॥3॥
प्रणवै नानकु बेनती तू सरवरु तू हंसु ॥
कउलु तू है कवीआ तू है आपे वेखि विगसु ॥4॥25॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु दूजा 2 ॥ प्रभू स्वयं ही रस भरा पदार्थ है, स्वयं ही (उस में) रस है, और स्वये ही उस स्वाद का आनंद लेने वाला है। प्रभू खुद ही स्त्री बनता है, खुद ही सेज, और खुद ही (भोगने वाला) पति है।1। मेरा मालिक प्रभू प्यार में रंगा हुआ है, वह (सारी सृष्टि में) पूर्ण तौर पर व्यापक है।1।रहाउ। प्रभू खुद ही मछलियां पकड़ने वाला है, खुद ही मछली है। खुद ही पानी है (जिसमें मछली रहती है), खुद ही जाल है (जिससे मछली पकड़ी जाती है)। प्रभू ही उस जाल के मणके है, खुद ही उस जाल में मास की बोटी है (जो मछली को जाल की ओर प्रेरती है)। हे सहेलियो! मेरा प्यारा प्रभू स्वयं ही कई तरीकों से अटखेलियां करने वाला है। भाग्यशाली जीव-सि्त्रयों को वह पति प्रभू सदा मिलता है। पर मेरे जैसियों का हाल देख (कि हमें कभी दीदार नहीं होता)।3। हे प्रभू! नानक (आपके दर पर) अरदास करता है (आप हर जगह मौजूद है, मुझे भी दीदार दे) आप ही सरोवर है, आप ही सरोवर पे रहने वाला हंस है। सूरज की रौशनी में खिलने वाला कमल का फूल भी आप ही है और चाँद की चाँदनी में खिलने वाली कमीं भी आप ही है (अपने जमाल को ओर अपने जलाल को) देख के आप खुद ही खुश होने वाला है।4।24।
सिरीरागु महला 1 घरु 3 ॥
इहु तनु धरती बीजु करमा करो सलिल आपाउ सारिंगपाणी ॥
मनु किरसाणु हरि रिदै जंमाइ लै इउ पावसि पदु निरबाणी ॥1॥
काहे गरबसि मूड़े माइआ ॥
पित सुतो सगल कालत्र माता तेरे होहि न अंति सखाइआ ॥ रहाउ ॥
बिखै बिकार दुसट किरखा करे इन तजि आतमै होइ धिआई ॥
जपु तपु संजमु होहि जब राखे कमलु बिगसै मधु आस्रमाई ॥2॥
बीस सपताहरो बासरो संग्रहै तीनि खोड़ा नित कालु सारै ॥
दस अठार मै अपरंपरो चीनै कहै नानकु इव एकु तारै ॥3॥26॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 घरु 3 ॥ (हे भाई!) इस शरीर को धरती बना, अपने (रोजमर्रा के) कामों को बीज बना, परमात्मा के नाम के पानी से (इस जमीन की) सिंचाई कर। अपने मन को किसान बना, परमात्मा का नाम अपने हृदय में उगा। इस तरह (हे भाई!) वह आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेगा जहां कोई वासना पहुँच नहीं कर सकती।1। हे मूर्ख ! माया का गुमान कयों करता है? पिता, पुत्र, स्त्री, मां-ये सारे अंत में आपके सहायक नहीं बन सकते ।रहाउ। जो मनुष्य गलत विषौ-विकारों को हृदय रूपी भूमि में से इस तरह उखाड़ फेंकता है जैसे खेतों में से नदीन। इन विकारों का त्याग करके जो मनुष्य अपने अंदर एक-चित्त हो के प्रभू को सिमरता है, जब जप, तप व संजम (उसके आत्मिक जीवन के) रक्षक बनते हैं, तो उसका हृदय कमल खिल उठता है। उसके अंदर आत्मिक आनंद का रस मानों सिमने लगता है, चूने लगता है।2। हे नानक! जो मनुष्य 27 ही नक्षत्रों में (भाव) हर रोज (प्रभू का नाम धन) एकत्र कर रहे हैं, जो मनुष्य अपनी तीनों ही अवस्थाओं (बालपन, जवानी और बुढ़ापा) में मौत को याद रखे, जो चार वेदों, छह शास्त्रो और अठारह पुराणों (आदि सारी धार्मिक पुस्तकों) में परमात्मा (के नाम) को ही खोजें तो इस तरह परमात्मा उस को (संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है।3।26।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिन लोगों के पास सदा कायम रहने वाले प्रभू के नाम की पूँजी नहीं, उन्हें कभी आत्मिक आनन्द नहीं मिल सकता।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।