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अंग 22

अंग
22
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
चारे अगनि निवारि मरु गुरमुखि हरि जलु पाइ ॥
अंतरि कमलु प्रगासिआ अंम्रितु भरिआ अघाइ ॥
नानक सतगुरु मीतु करि सचु पावहि दरगह जाइ ॥4॥20॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: गुरू के द्वारा नाम जल प्राप्त कर के (हृदय में) सुलग रहीं चारों अग्नियों को बुझा के (तृष्णा की ओर से) मर जा। (इस तरह) आपके अंदर (हृदय) कमल खिल जाएगा। (आपके हृदय में) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल भर जाएगा। हे नानक! गुरू को मित्र बना, यकीनी तौर पे परमात्मा की हजूरी प्राप्त कर लेगा।4।20।
सिरीरागु महला 1 ॥
हरि हरि जपहु पिआरिआ गुरमति ले हरि बोलि ॥
मनु सच कसवटी लाईऐ तुलीऐ पूरै तोलि ॥
कीमति किनै न पाईऐ रिद माणक मोलि अमोलि ॥1॥
भाई रे हरि हीरा गुर माहि ॥
सतसंगति सतगुरु पाईऐ अहिनिसि सबदि सलाहि ॥1॥ रहाउ ॥
सचु वखरु धनु रासि लै पाईऐ गुर परगासि ॥
जिउ अगनि मरै जलि पाइऐ तिउ त्रिसना दासनि दासि ॥
जम जंदारु न लगई इउ भउजलु तरै तरासि ॥2॥
गुरमुखि कूड़ु न भावई सचि रते सच भाइ ॥
साकत सचु न भावई कूड़ै कूड़ी पांइ ॥
सचि रते गुरि मेलिऐ सचे सचि समाइ ॥3॥
मन महि माणकु लालु नामु रतनु पदारथु हीरु ॥
सचु वखरु धनु नामु है घटि घटि गहिर गंभीरु ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ दइआ करे हरि हीरु ॥4॥21॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे प्यारे! हरि नाम जपो, गुरू की मति ऊपर चल के हरी का सिमरन करो। जब मन सिमरन की कसवटी पे लगाया जाता है (तब सिमरन की बरकत के साथ) ये तोल पूरा उतरता है। तब हृदय रूपी माणक अपने मुल्य से अमुल्य हो जाता है, इसका कोई मुल्य नहीं पा सकता। हे भाई ! यह कीमती हरि नाम गुरू के पास है। गुरू साध-संगति में मिलता है। (सो, हे भाई! साध-संगति में जा के) गुरू के शबद में जुड़ के दिन रात परमात्मा की सिफत सलाह कर।1। (हे भाई!) सदा कायम रहने वाला सौदा धन सरमाया एकत्र कर। यह धन गुरू के बख्शे आत्मिक प्रकाश से प्राप्त होता है। जैसे पानी डालने से आग बुझ जाती है, वैसे ही प्रभू के दासों के दास बनने से तृष्णा (रूपी आग) बुझ जाती है। (जो आदमी नाम धन इकट्ठा करता है) उसका भयानक यमराज भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इस तरह वह मनुष्य संसार सागर से सही सलामत पार लांघ जाता है।2। गुरू की राह पर चलने वाले लोगों को झूठा पदार्थ पसंद नहीं आता (भाव, वे दुनियावी पदार्थों में चित्त नहीं जोड़ते) वे सच्चे प्रभू में जुड़े रहते हैं, वे सदा सदा स्थिर प्रभू के प्यार में जुड़े रहते हैं। (पर) माया में लिप्त मनुष्य को प्रभू का नाम अच्छा नहीं लगता। झूठ में फंसे हुए की इज्जत भी झूठी ही होती है (इज्जत भी चार दिनों की ही होती है)। (पर ये अपने बस की खेल नहीं) जिन को गुरू (प्रभू चरणों में) मिला ले, वे प्रभू में रंगे रहते हैं। उनकी लीनता सदा प्रभू याद में ही रहती है।3। प्रभू का नाम (जो मानों) माणक है, लाल है, रतन है, हीरा है, हरेक मनुष्य के अंदर बसता है। अथाह प्रभू हरेक के शरीर में बिराजमान है। उसका नाम ही सदा स्थिर रहने वाला सौदा है धन है। (पर) हे नानक! जिस मनुष्य पे हीरा प्रभू मेहर करता है उसको उसका नाम गुरू के द्वारा मिलता है।4।21।
सिरीरागु महला 1 ॥
भरमे भाहि न विझवै जे भवै दिसंतर देसु ॥
अंतरि मैलु न उतरै ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वेसु ॥
होरु कितै भगति न होवई बिनु सतिगुर के उपदेस ॥1॥
मन रे गुरमुखि अगनि निवारि ॥
गुर का कहिआ मनि वसै हउमै त्रिसना मारि ॥1॥ रहाउ ॥
मनु माणकु निरमोलु है राम नामि पति पाइ ॥
मिलि सतसंगति हरि पाईऐ गुरमुखि हरि लिव लाइ ॥
आपु गइआ सुखु पाइआ मिलि सललै सलल समाइ ॥2॥
जिनि हरि हरि नामु न चेतिओ सु अउगुणि आवै जाइ ॥
जिसु सतगुरु पुरखु न भेटिओ सु भउजलि पचै पचाइ ॥
इहु माणकु जीउ निरमोलु है इउ कउडी बदलै जाइ ॥3॥
जिंना सतगुरु रसि मिलै से पूरे पुरख सुजाण ॥
गुर मिलि भउजलु लंघीऐ दरगह पति परवाणु ॥
नानक ते मुख उजले धुनि उपजै सबदु नीसाणु ॥4॥22॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ (गुरू की शरण को छोड़ के) अगर मनुष्य (सन्यासी भेष धारण करके) देशों-देशांतरों में भ्रमण करता फिरे, (जगह जगह) घूमने से (तृष्णा की) आग बुझ नहीं सकती, अंदर से विकारों की मैल नहीं उतरती, ऐसा जीवन धिक्कार-योग्य ही रहता है। ऐसा भेष फिटकारें ही खाता है। (ये बात पक्की हो जाए कि) सत्गुरू की शिक्षा ग्रहण करने के बिना और किसी स्थान पे प्रमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती (और भक्ति के बिना तृष्णा खत्म नहीं होती)।1। हे मन! गुरू के चरण पड़ के (तृष्णा की) आग दूर कर सकते हैं। जब गुरू का बताया हुआ उपदेश मन में टिक जाए, तो मैं बड़ा हो जाऊँ, मैं बड़ा हो जाऊँ -ये लालच खत्म हो जाता है।1।रहाउ। परमात्मा के नाम में जुड़ के ये मन बहुमूल्य मोती बन जाता है। इसे (हर जगह) आदर मिलता है। (पर) परमात्मा का नाम साध-संगति में मिल के ही प्राप्त होता है। गुरू की शरण पड़ने से ही प्रमात्मा (के चरणों में) सुरति जुड़ती है। (प्रभू चरणों में सुरति जुड़ने से मनुष्य के अंदर से) स्वै-भाव, अहम् भाव दूर हो जाता है, आत्मिक आनंद मिलता है (परमात्मा से मनुष्य इस तरह एकमेक हो जाता है) जैसे पानी से पानी मिल के एक-रूप् हो जाता है।2। जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा, वह विकारी जीवन में रह के मरता-पैदा होता है। जिस मनुष्य को सत्गुरू नहीं मिलावह संसार समुंद्र (के विकारों) में ही खुआर होते रहते हैं। (प्रभू की अंश) ये जीवात्माएक बहुमुल्य मोती है, (जो) इस तरह (विकारों में खचित हो के) कौड़ी के बदले ही बर्बाद हो जाता है।3। जिन मनुष्यों को प्रेम के कारण सत्गुरू मिलता है, वह पूरे (बरतन) हैं, वे चतुर सुजान हैं (क्योंकि) गुरू को मिल के ही संसार समुंद्र से पार लांघ सकते हैं। प्रभू की हजूरी में इज्जत मिलती है, कबूल होते हैं। हे नानक! वे लोग ही उज्जवल-मुख व सुर्ख-रू हैं, जिनके अंदर गुरू का शबद-बाजा बजता है (भाव, गुरू का शबद अपना पूरा प्रभाव डाले रखता है), (सिमरन की) लहर उठी रहती है।4।22।
सिरीरागु महला 1 ॥
वणजु करहु वणजारिहो वखरु लेहु समालि ॥
तैसी वसतु विसाहीऐ जैसी निबहै नालि ॥
अगै साहु सुजाणु है लैसी वसतु समालि ॥1॥
भाई रे रामु कहहु चितु लाइ ॥
हरि जसु वखरु लै चलहु सहु देखै पतीआइ ॥1॥ रहाउ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे (राम नाम का) व्यापार करने आए जीवो! (नाम का) व्यापार करो, नाम सौदा संभाल लो। वैसा सौदा ही खरीदना चाहिए जो सदा के लिए साथ निभाए। परलोक में बैठा शाहूकार सुजान है वह (हमारे खरीदे हुए) सौदे की पूरी परख करके कबूल करेगा।1। हे भाई! चित्त लगा के (प्रेम सहित) परमात्मा का नाम जपो। (यहां से अपने साथ) परमात्मा की सिफत सलाह का सौदाले के चलो, प्रभू पति खुश हो के देखेगा।1।रहाउ।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के द्वारा नाम जल प्राप्त कर के (हृदय में) सुलग रहीं चारों अग्नियों को बुझा के (तृष्णा की ओर से) मर जा।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।