अंतरि कमलु प्रगासिआ अंम्रितु भरिआ अघाइ ॥
नानक सतगुरु मीतु करि सचु पावहि दरगह जाइ ॥4॥20॥
हरि हरि जपहु पिआरिआ गुरमति ले हरि बोलि ॥
मनु सच कसवटी लाईऐ तुलीऐ पूरै तोलि ॥
कीमति किनै न पाईऐ रिद माणक मोलि अमोलि ॥1॥
भाई रे हरि हीरा गुर माहि ॥
सतसंगति सतगुरु पाईऐ अहिनिसि सबदि सलाहि ॥1॥ रहाउ ॥
सचु वखरु धनु रासि लै पाईऐ गुर परगासि ॥
जिउ अगनि मरै जलि पाइऐ तिउ त्रिसना दासनि दासि ॥
जम जंदारु न लगई इउ भउजलु तरै तरासि ॥2॥
गुरमुखि कूड़ु न भावई सचि रते सच भाइ ॥
साकत सचु न भावई कूड़ै कूड़ी पांइ ॥
सचि रते गुरि मेलिऐ सचे सचि समाइ ॥3॥
मन महि माणकु लालु नामु रतनु पदारथु हीरु ॥
सचु वखरु धनु नामु है घटि घटि गहिर गंभीरु ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ दइआ करे हरि हीरु ॥4॥21॥
भरमे भाहि न विझवै जे भवै दिसंतर देसु ॥
अंतरि मैलु न उतरै ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वेसु ॥
होरु कितै भगति न होवई बिनु सतिगुर के उपदेस ॥1॥
मन रे गुरमुखि अगनि निवारि ॥
गुर का कहिआ मनि वसै हउमै त्रिसना मारि ॥1॥ रहाउ ॥
मनु माणकु निरमोलु है राम नामि पति पाइ ॥
मिलि सतसंगति हरि पाईऐ गुरमुखि हरि लिव लाइ ॥
आपु गइआ सुखु पाइआ मिलि सललै सलल समाइ ॥2॥
जिनि हरि हरि नामु न चेतिओ सु अउगुणि आवै जाइ ॥
जिसु सतगुरु पुरखु न भेटिओ सु भउजलि पचै पचाइ ॥
इहु माणकु जीउ निरमोलु है इउ कउडी बदलै जाइ ॥3॥
जिंना सतगुरु रसि मिलै से पूरे पुरख सुजाण ॥
गुर मिलि भउजलु लंघीऐ दरगह पति परवाणु ॥
नानक ते मुख उजले धुनि उपजै सबदु नीसाणु ॥4॥22॥
वणजु करहु वणजारिहो वखरु लेहु समालि ॥
तैसी वसतु विसाहीऐ जैसी निबहै नालि ॥
अगै साहु सुजाणु है लैसी वसतु समालि ॥1॥
भाई रे रामु कहहु चितु लाइ ॥
हरि जसु वखरु लै चलहु सहु देखै पतीआइ ॥1॥ रहाउ ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के द्वारा नाम जल प्राप्त कर के (हृदय में) सुलग रहीं चारों अग्नियों को बुझा के (तृष्णा की ओर से) मर जा।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।