अंग
225
गउड़ी
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दूजै भाइ दैत संघारे ॥
दूजै भाइ दैत संघारे ॥
गुरमुखि साचि भगति निसतारे ॥8॥
बूडा दुरजोधनु पति खोई ॥
रामु न जानिआ करता सोई ॥
जन कउ दूखि पचै दुखु होई ॥9॥
जनमेजै गुर सबदु न जानिआ ॥
किउ सुखु पावै भरमि भुलानिआ ॥
इकु तिलु भूले बहुरि पछुतानिआ ॥10॥
कंसु केसु चांडूरु न कोई ॥
रामु न चीनिआ अपनी पति खोई ॥
बिनु जगदीस न राखै कोई ॥11॥
बिनु गुर गरबु न मेटिआ जाइ ॥
गुरमति धरमु धीरजु हरि नाइ ॥
नानक नामु मिलै गुण गाइ ॥12॥9॥
गुरमुखि साचि भगति निसतारे ॥8॥
बूडा दुरजोधनु पति खोई ॥
रामु न जानिआ करता सोई ॥
जन कउ दूखि पचै दुखु होई ॥9॥
जनमेजै गुर सबदु न जानिआ ॥
किउ सुखु पावै भरमि भुलानिआ ॥
इकु तिलु भूले बहुरि पछुतानिआ ॥10॥
कंसु केसु चांडूरु न कोई ॥
रामु न चीनिआ अपनी पति खोई ॥
बिनु जगदीस न राखै कोई ॥11॥
बिनु गुर गरबु न मेटिआ जाइ ॥
गुरमति धरमु धीरजु हरि नाइ ॥
नानक नामु मिलै गुण गाइ ॥12॥9॥
हिन्दी अर्थ: खुद ही दैत्यों को माया के मोह में फंसा के मारता है, खुद ही गुरू की शरण पड़े लोगों को अपने सिमरन में अपनी भक्ति मेुं जोड़ के (संसार समुंद्र से) पार लंघाता है। 8। दुर्योधन (अहंकार में) डूबा, और अपनी इज्जत गवा बैठा। (अहंकार में आ के) उसने परमात्मा को करतार को याद ना रखा (इस हद तक गिरा कि अनाथ द्रोपदी को बेआबरू करने पर उतर आया)। पर जो परमात्मा के दास को (दुख देता है वह उस) दुख के कारण खुद ही खुआर होता है। उसे खुद ही वह दुख (मार) देता है। 9। राजा जनमेजा ने अपने गुरू की शिक्षा को ना समझा (अपने धन और अक्ल पर गुमान किया। अहंकार के कारण) भुलेखे में पड़ के गलत राह पड़ गया, फिर सुख कहाँ मिलता? (गुरू ने समझा के कुष्ठ की भारी बिपदा से बचाने का उद्यम किया, पर फिर भी) थोड़ा सा थिरक गया, और फिर पछताया। (अहंकार बड़े बड़े समझदारों की अक्ल को चक्कर में डाल देता है)। 10। कंस, केसी और चांडूर (महान योद्धा थे, शूरबीरता में इनके बराबर का) और कोई नहीं था। (पर अपने ताकत के अहंकार में) इन्होंने परमात्मा की लीला को नहीं समझा और अपनी इज्जत गवा ली। (अपनी शक्ति का मान झूठा है। ये ताकत कोई मदद नहीं करती) ईश्वर के बिना और कोई (किसी की) रक्षा नहीं कर सकता। 11। (अहंकार बड़ा बलशाली है) गुरू की शरण पड़े बिना इस अहंकार को (अंदर से) मिटाया नहीं जा सकता। जो मनुष्य गुरू की शिक्षा धारण करता है वह (अहंकार मिटा के) धीरज धारता है। (धैर्य बहुत ऊँचा) धर्म है। हे नानक ! गुरू की शिक्षा पर चलने से ही परमात्मा का नाम प्राप्त होता है, और जीव परमात्मा की सिफत सालाह करता है। 12। 9।
चोआ चंदनु अंकि चड़ावउ ॥
गउड़ी महला 1 ॥
चोआ चंदनु अंकि चड़ावउ ॥
पाट पटंबर पहिरि हढावउ ॥
बिनु हरि नाम कहा सुखु पावउ ॥1॥
किआ पहिरउ किआ ओढि दिखावउ ॥
बिनु जगदीस कहा सुखु पावउ ॥1॥ रहाउ ॥
कानी कुंडल गलि मोतीअन की माला ॥
लाल निहाली फूल गुलाला ॥
बिनु जगदीस कहा सुखु भाला ॥2॥
नैन सलोनी सुंदर नारी ॥
खोड़ सीगार करै अति पिआरी ॥
बिनु जगदीस भजे नित खुआरी ॥3॥
दर घर महला सेज सुखाली ॥
अहिनिसि फूल बिछावै माली ॥
बिनु हरि नाम सु देह दुखाली ॥4॥
हैवर गैवर नेजे वाजे ॥
लसकर नेब खवासी पाजे ॥
बिनु जगदीस झूठे दिवाजे ॥5॥
सिधु कहावउ रिधि सिधि बुलावउ ॥
ताज कुलह सिरि छत्रु बनावउ ॥
बिनु जगदीस कहा सचु पावउ ॥6॥
खानु मलूकु कहावउ राजा ॥
अबे तबे कूड़े है पाजा ॥
बिनु गुर सबद न सवरसि काजा ॥7॥
हउमै ममता गुर सबदि विसारी ॥
गुरमति जानिआ रिदै मुरारी ॥
प्रणवति नानक सरणि तुमारी ॥8॥10॥
चोआ चंदनु अंकि चड़ावउ ॥
पाट पटंबर पहिरि हढावउ ॥
बिनु हरि नाम कहा सुखु पावउ ॥1॥
किआ पहिरउ किआ ओढि दिखावउ ॥
बिनु जगदीस कहा सुखु पावउ ॥1॥ रहाउ ॥
कानी कुंडल गलि मोतीअन की माला ॥
लाल निहाली फूल गुलाला ॥
बिनु जगदीस कहा सुखु भाला ॥2॥
नैन सलोनी सुंदर नारी ॥
खोड़ सीगार करै अति पिआरी ॥
बिनु जगदीस भजे नित खुआरी ॥3॥
दर घर महला सेज सुखाली ॥
अहिनिसि फूल बिछावै माली ॥
बिनु हरि नाम सु देह दुखाली ॥4॥
हैवर गैवर नेजे वाजे ॥
लसकर नेब खवासी पाजे ॥
बिनु जगदीस झूठे दिवाजे ॥5॥
सिधु कहावउ रिधि सिधि बुलावउ ॥
ताज कुलह सिरि छत्रु बनावउ ॥
बिनु जगदीस कहा सचु पावउ ॥6॥
खानु मलूकु कहावउ राजा ॥
अबे तबे कूड़े है पाजा ॥
बिनु गुर सबद न सवरसि काजा ॥7॥
हउमै ममता गुर सबदि विसारी ॥
गुरमति जानिआ रिदै मुरारी ॥
प्रणवति नानक सरणि तुमारी ॥8॥10॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ अगर मैं इत्र और चंदन अपने तन पर लगा लूँ, अगर मैं रेशम व रेशमी कपड़े पहनूँ, (फिर भी) अगर मैं परमात्मा के नाम से वंचित हूँ, तो कहीं भी मुझे सुख नहीं मिल सकता। 1। बढ़िया बढ़िया कपड़े पहनने और पहन कर दूसरों को दिखाने से क्या लाभ है? परमात्मा (के चरणों में जुड़े) बिनां कहीं और सुख नहीं मिल सकता। 1। रहाउ। अगर मैं अपने कानों में कुण्डल डाल लूँ, गले में मोतियों की माला पहन लूँ, मेरे लाल रंग गद्दे पर गुलाल के फूल (बिखरे हुए) हों, (फिर भी) परमात्मा के सिमरन के बिना मुझे कहीं भी सुख नहीं मिल सकता। 2। अगर सुंदर आँखों वाली खूबसूरत मेरी स्त्री हो, वह सोलह तरह के हार-श्रृंगार करती हो, और मुझे बहुत प्यारी लगती हो; फिर भी जगत के मालिक प्रभू का सिमरन किए बगैर सदा ख्वारी ही होती है। 3। अगर मेरे पास बसने के लिए महिल-माढ़ियां हों, सुख देने वाला मेरा पलंघ हो, उस पर माली दिन रात फूल बिछाता रहे, (फिर भी) परमात्मा के नाम सिमरन के बगैर ये शरीर दुखों का घर ही बना रहता है। 4। अगर मेरे पास बढ़िया घोड़े हाथी हों, शस्त्रों से लेस फौजें हों, लश्कर हों, हायब हों, शाही नौकर हों, ये सारा दिखावा हो, (फिर भी) जगत के मालिक परमात्मा का सिमरन किए बिना ये (शक्ति के) दिखावे नाशवंत ही हैं। 5। अगर मैं (अपने आप को) करामाती साधु कहला लूँ, (जब चाहूँ) चमत्कारी शक्तियों को (अपने पास) बुला सकूँ। मेरे सिर पर ताज की टोपी हो, मैं अपने सिर पर (शाही) छत्र झुला सकूँ, (फिर भी) जगत के मालिक प्रभू के सिमरन के बिना सदा टिके रहने वाली (आत्मिक) शक्ति कहीं से हासिल नहीं कर सकता। 6। यदि मैं अपने आप को खान कहलवा लूँ, बादशाह कहलवाऊँ, राजा कहलाऊँ, नौकरों चाकरों को डांट-फटकार भी दे सकूँ, (ताकत का सारा ये) दिखावा नाश हो जाने वाला है। गुरू के शबद का आसरा लिए बिना मानस जीवन का मनोर्थ सिरे नहीं चढ़ता। 7। मैं बड़ा बन जाऊँ, और मेरी बहुत सारी मल्कियतें हों -ये चाहत गुरू के शबद में जुड़ने से ही मन से भूलती हैं। गुरू की मति पर चलने से ही परमात्मा हृदय में टिका पहचाना जा सकता है। (पर, ये सब कुछ तभी हो सकता है अगर परमात्मा की अपनी मेहर हो। इस वास्ते) नानक प्रभू-दर पे विनती करता है - (हे प्रभू !) मैं आपकी शरण आया हूँ। 8। 10।
सेवा एक न जानसि अवरे ॥
गउड़ी महला 1 ॥
सेवा एक न जानसि अवरे ॥
परपंच बिआधि तिआगै कवरे ॥
भाइ मिलै सचु साचै सचु रे ॥1॥
ऐसा राम भगतु जनु होई ॥
हरि गुण गाइ मिलै मलु धोई ॥1॥ रहाउ ॥
ऊंधो कवलु सगल संसारै ॥
दुरमति अगनि जगत परजारै ॥
सो उबरै गुर सबदु बीचारै ॥2॥
भ्रिंग पतंगु कुंचरु अरु मीना ॥
मिरगु मरै सहि अपुना कीना ॥
त्रिसना राचि ततु नही बीना ॥3॥
कामु चितै कामणि हितकारी ॥
क्रोधु बिनासै सगल विकारी ॥
पति मति खोवहि नामु विसारी ॥4॥
सेवा एक न जानसि अवरे ॥
परपंच बिआधि तिआगै कवरे ॥
भाइ मिलै सचु साचै सचु रे ॥1॥
ऐसा राम भगतु जनु होई ॥
हरि गुण गाइ मिलै मलु धोई ॥1॥ रहाउ ॥
ऊंधो कवलु सगल संसारै ॥
दुरमति अगनि जगत परजारै ॥
सो उबरै गुर सबदु बीचारै ॥2॥
भ्रिंग पतंगु कुंचरु अरु मीना ॥
मिरगु मरै सहि अपुना कीना ॥
त्रिसना राचि ततु नही बीना ॥3॥
कामु चितै कामणि हितकारी ॥
क्रोधु बिनासै सगल विकारी ॥
पति मति खोवहि नामु विसारी ॥4॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ हे भाई ! परमात्मा का भगत एक परमात्मा की सेवा (भगती) करता है, किसी और को वह (परमात्मा के बराबर का) नहीं समझता। संसार के रोग (पैदा करने वाले भोगों) को वह कड़वा जान के त्याग देता है। (परमात्मा के) प्रेम में जुड़ के वह सदा स्थिर परमात्मा (के चरणों) में मिल जाता है, वह सदा स्थिर प्रभू का रूप हो जाता है। 1। परमात्मा का भगत परमात्मा का सेवक इस तरह का होता है, वह परमात्मा के गुण गा के (उसके चरणों में) मिलता है और (अपने मन के विकारों की) मैल धो लेता है। 1। रहाउ। सारे जगत (के जीवों) का हृदय कमल (परमात्मा के सिमरन की ओर से) उल्टा हुआ है। इस बुरी कोझी मति की आग संसार (के जीवों के आत्मिक जीवन) को अच्छी तरह जला रही है। (इस आग में से) वही मनुष्य बचता है जो गुरू के शबद को विचारता है। 2। भंवरा, पतंगा, हाथी, मछली और हिरन - हरेक अपना अपना किया पा के मर जाते हैं। (इसी तरह दुरमति का मारा मनुष्य) तृष्णा में फंस के अपने असल (परमात्मा) को नहीं देखता (और आत्मिक मौत मरता है)। 3। (दुरमति के अधीन हो के) स्त्री का प्रेमी मनुष्य सदा काम वासना ही चितवता है। (फिर) क्रोध सारे विकारियों (के आत्मिक जीवन) को तबाह करता है। ऐसे मनुष्य प्रभू का नाम भुला के अपनी इज्जत और अक्ल गवा लेते हैं। 4।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २२५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।