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अंग 223

अंग
223
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरु पुछि देखिआ नाही दरु होरु ॥
दुखु सुखु भाणै तिसै रजाइ ॥
नानकु नीचु कहै लिव लाइ ॥8॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मैंने अपने गुरू को पूछ के देख लिया है कि (उस प्रभू के बिना सुख का) और कोई ठिकाना नहीं। जीव के दुख और सुख उस प्रभू की रजा में ही उस प्रभू की मर्जी से ही मिलते हैं। अंजान मति नानक (प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ के प्रभू की सिफत सालाह ही करता है (इसी में ही सुख है)। 8। 4।
गउड़ी महला 1 ॥
दूजी माइआ जगत चित वासु ॥
काम क्रोध अहंकार बिनासु ॥1॥
दूजा कउणु कहा नही कोई ॥
सभ महि एकु निरंजनु सोई ॥1॥ रहाउ ॥
दूजी दुरमति आखै दोइ ॥
आवै जाइ मरि दूजा होइ ॥2॥
धरणि गगन नह देखउ दोइ ॥
नारी पुरख सबाई लोइ ॥3॥
रवि ससि देखउ दीपक उजिआला ॥
सरब निरंतरि प्रीतमु बाला ॥4॥
करि किरपा मेरा चितु लाइआ ॥
सतिगुरि मो कउ एकु बुझाइआ ॥5॥
एकु निरंजनु गुरमुखि जाता ॥
दूजा मारि सबदि पछाता ॥6॥
एको हुकमु वरतै सभ लोई ॥
एकसु ते सभ ओपति होई ॥7॥
राह दोवै खसमु एको जाणु ॥
गुर कै सबदि हुकमु पछाणु ॥8॥
सगल रूप वरन मन माही ॥
कहु नानक एको सालाही ॥9॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ परमात्मा से दूरी डालने वाली (परमात्मा की) माया (ही है जिस ने) जगत के जीवों के मनों में अपना ठिकाना बनाया हुआ है। (इस माया से पैदा हुए) काम-क्रोध-अहंकार (आदि विकार जीवों के आत्मिक जीवन का) नाश कर देते हैं। 1। सारे जीवों में एक वही परमात्मा बस रहा है, जिस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता। कहीं भी उससे बिना कोई और नहीं। उस प्रभू से अलग (अलग अस्तित्व वाला) मैं कोई भी बता नहीं सकता। 1। रहाउ। परमात्मा से दूरी पैदा करने वाली (माया के कारण ही मनुष्य की) बुरी मति (मनुष्य को) बताती रहती है कि माया की हस्ती प्रभू से अलग है। (इस दुरमति के असर तहत) जीव पैदा होता है मरता है, पैदा होता है मरता है। (इस तरह) आत्मिक मौत मर के परमात्मा से दूर हो जाता है। 2। पर मैं तो धरती आकाश में, स्त्री पुरुष में, सारी ही सृष्टि में (कहीं भी परमात्मा के बिना) किसी और हस्ती को नहीं देखता। 3। मैं सूर्य चंद्रमा (इन सृष्टि के) दीपकों का प्रकाश देखता हूँ, सभी के अंदर मुझे एक-रस सदा यौवन प्रीतम प्रभू ही दिखाई दे रहा है। 4। सतिगुरू ने मेहर करके मेरा चित्त प्रभू चरणों में जोड़ दिया, और मुझे ये समझ दे दी कि हर जगह एक परमात्मा ही बस रहा है। 5। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह ये जान लेता है कि एक निरंजन ही हर जगह मौजूद है और गुरू शबद की बरकति से (अपने अंदर से) परमात्मा से अलगाव मिटा के परमात्मा (के अस्तित्व) को पहचान लेता है । 6। सारी सृष्टि में सिर्फ परमात्मा का ही हुकम चल रहा है, एक परमात्मा से ही सारी उत्पक्ति हुई है। 7। (एक प्रभू से ही सारी उत्पक्ति होने पर भी माया के प्रभाव तले जगत में) दोनों रास्ते चल पड़ते हैं (-गुरमुखता व दुरमति)। (पर, हे भाई ! सब में) एक परमात्मा को ही (रचा हुआ) जान। गुरू के शबद में जुड़ के (सारे जगत में परमात्मा का ही) हुकम चलता पहिचान। 8। जो सारे रूपों में सारे वर्णों में और सार (जीवों के) मनों में व्यापक है हे नानक ! कह, मैं उस एक परमात्मा की ही सिफत सालाह करता हूँ। 9। 5।
गउड़ी महला 1 ॥
अधिआतम करम करे ता साचा ॥
मुकति भेदु किआ जाणै काचा ॥1॥
ऐसा जोगी जुगति बीचारै ॥
पंच मारि साचु उरि धारै ॥1॥ रहाउ ॥
जिस कै अंतरि साचु वसावै ॥
जोग जुगति की कीमति पावै ॥2॥
रवि ससि एको ग्रिह उदिआनै ॥
करणी कीरति करम समानै ॥3॥
एक सबद इक भिखिआ मागै ॥
गिआनु धिआनु जुगति सचु जागै ॥4॥
भै रचि रहै न बाहरि जाइ ॥
कीमति कउण रहै लिव लाइ ॥5॥
आपे मेले भरमु चुकाए ॥
गुर परसादि परम पदु पाए ॥6॥
गुर की सेवा सबदु वीचारु ॥
हउमै मारे करणी सारु ॥7॥
जप तप संजम पाठ पुराणु ॥
कहु नानक अपरंपर मानु ॥8॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ जब मनुष्य आत्मिक जीवन ऊँचे करने वाले कर्म करता है, तब ही सच्चा (जोगी) है पर जिसका मन विकारों के मुकाबले में कमजोर है, वह विकारों से खलासी हासिल करने के भेद को क्या जान सकता है?1। ऐसा (आदमी) जोगी (कहलाने का हकदार हो सकता है जो जीवन की सही) जुगति समझता है (वह जीवन-जुगति ये है कि कामादिक) पाँचों (विकारों) को मार के सदा कायम रहने वाले परमात्मा (की याद) को अपने हृदय में टिकाता है। 1। रहाउ। जिस मनुष्य के अंदर परमात्मा अपना सदा स्थिर नाम बसाता है, वह मनुष्य प्रभू मिलाप की जुगति की कद्र समझता है। 2। तपश, ठण्ड (भाव, किसी की ओर से बेरुखी भरा सलूक और किसी की तरफ से मधुर रवईया) घर, जंगल (भाव, घर में रहते हुए निर्मोही सलूक) उसे एक समान दिखते हैं। परमात्मा की सिफत सालाह रूपी करणी उसका समान (साधारन) कर्म हें (भाव, सोए हुए ही वह अर्थात सहज ही वह सिफत सालाह में जुड़ा रहता है)। 3। (दर दर से रोटियां माँगने की जगह वह जोगी गुरू के दर से) परमातमा की सिफत सालाह की बाणी की खैर (भिक्षा) माँगता है। उसके अंदर प्रभू के साथ गहरी सांझ पड़ती है, उसकी ऊँची सुरति जाग पड़ती है, उसके अंदर सिमरन रूपी जुगति जाग जाती है। 4। वह जोगी सदा प्रभू के डर-अदब में लीन रहता है, (इस डर से) बाहर नहीं जाता। ऐसे जोगी का कौन मुल्य डाल सकता है? वह सदा प्रभू चरणों में सुरति जोड़े रखता है। 5। (ये जो साधना के हठ कुछ नहीं सवार सकते) प्रभू स्वयं ही अपने साथ मिलाता है और जीव की भटकना को खत्म करता है। गुरू की कृपा से मनुष्य सबसे ऊूंचा आत्मिक दर्जा हासिल करता है। 6। (असल जोगी) गुरू की बताई हुई सेवा करता है, गुरू के शबद को अपनी विचार बनाता है। अहंकार को (अपने अंदर से) मारता है – यही है उस जोगी की श्रेष्ठ करणी। 7। जोगी के जप, तप, संजम और पुराण आदिक कोई धर्म-पुस्तक का पाठ हे नानक ! कह, बेअंत प्रभू की सिफत सालाह में अपने आप को जोड़ लेना – ही हैं । 8। 6।
गउड़ी महला 1 ॥
खिमा गही ब्रतु सील संतोखं ॥
रोगु न बिआपै ना जम दोखं ॥
मुकत भए प्रभ रूप न रेखं ॥1॥
जोगी कउ कैसा डरु होइ ॥
रूखि बिरखि ग्रिहि बाहरि सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
निरभउ जोगी निरंजनु धिआवै ॥
अनदिनु जागै सचि लिव लावै ॥
सो जोगी मेरै मनि भावै ॥2॥
कालु जालु ब्रहम अगनी जारे ॥
जरा मरण गतु गरबु निवारे ॥
आपि तरै पितरी निसतारे ॥3॥
सतिगुरु सेवे सो जोगी होइ ॥
भै रचि रहै सु निरभउ होइ ॥
जैसा सेवै तैसो होइ ॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ वह जोगी (गृहस्थ में रह के ही) दूसरों की ज्यादती बर्दाश्त करने का स्वाभाव बनाता है। मीठा स्वभाव एवं संतोष उसके नित्य के कर्म हैं। (ऐसे असल जोगी पर कामादिक कोई) रोग जोर नहीं डाल सकता। उसे मौत का भी डर नहीं होता। ऐसे जोगी विकारों से आजाद हो जाते हैं, क्योंकि वह रूप-रेख रहित परमात्मा का रूप हो जाते हैं। 1। उस जोगी को (माया के शूरवीरों कामादिकों के हमलों से) किसी तरह का कोई डर नहीं रहता (जिससे घबरा के वह गृहस्थ त्याग के भाग जाए)। जिस मनुष्य को पेड़ पौधों में, घर में, बाहर जंगल (आदि) में हर जगह वह परमात्मा ही नजर आता है (वही है असल जोगी)1। रहाउ। जो परमात्मा माया के प्रभाव में नहीं आता, उसे जो मनुष्य सिमरता है वह है (असल) जोगी। वह तो हर समय (माया के हमलों से) सुचेत रहता है, क्योंकि वह सदा स्थिर प्रभू में सुरति जोड़े रखता है। वह भी (माया के हमलों से) नहीं डरता (उसे क्या जरूरत पड़ी है गृहस्थ से भागने की?)। मेरे मन में वह जोगी प्यारा लगता है (वही है असल जोगी)। 2। (वही जोगी अपने अंदर प्रकट हुए) ब्रहम् (के तेज) की अग्नि से मौत (मौत के डर को) जाल को (जिसके सहम ने सारे जीवों को फंसाया हुया है) जला देता है। उस जोगी को बुढ़ापे का डर मौत का सहम दूर दूर हो जाता है। वह जोगी (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लेता है। वह स्वयं भी (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाता है, अपने पित्रों को भी पार लंघा लेता है। 3। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है, वह (असल) जोगी बनता है, वह परमात्मा के डर अदब में (जीवन-राह पर) चलता है, वह (कामादिक विकारों के हमलों से) निडर रहता है (क्योंकि ये एक असूल की बात है कि) मनुष्य जैसे की सेवा (-भक्ति) करता है वैसा ही स्वयं बन जाता है (निरभउ निरंकार को सिमर के निर्भय ही बनना हुआ)। 4।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैंने अपने गुरू को पूछ के देख लिया है कि (उस प्रभू के बिना सुख का) और कोई ठिकाना नहीं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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