नर निहकेवल निरभउ नाउ ॥ अनाथह नाथ करे बलि जाउ ॥ पुनरपि जनमु नाही गुण गाउ ॥5॥ अंतरि बाहरि एको जाणै ॥ गुर कै सबदे आपु पछाणै ॥ साचै सबदि दरि नीसाणै ॥6॥ सबदि मरै तिसु निज घरि वासा ॥ आवै न जावै चूकै आसा ॥ गुर कै सबदि कमलु परगासा ॥7॥ जो दीसै सो आस निरासा ॥ काम क्रोध बिखु भूख पिआसा ॥ नानक बिरले मिलहि उदासा ॥8॥7॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: मनुष्य निर्भय परमात्मा का नाम जप के (माया के हमलों से निर्भय हो के) वासना-रहित (शुद्ध) हो जाता है। वह पति-विहीनों को पति वाला बना देता है (वह है असल जोगी, और ऐसे जोगी से) मैं कुर्बान हूँ। उसे मुड़ मुड़ जनम नहीं लेना पड़ता, वह सदा प्रभू की सिफत सालाह करता है। 5। वह जोगी अपने अंदर व बाहर सारे जगत में एक परमात्मा को ही व्यापक जानता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह अपने असले को पहिचानता है। गुरू के सच्चे शबद की बरकति से वह जोगी परमात्मा के दर पर (सिफत सालाह की) राहदारी ले कर जाता है। 6। जो मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (विकारों की ओर से) मर जाता है (वह है असल जोगी, और) उसका निवास सदैव अपने अंतरात्में में रहता है। उसकी आशा (तृष्णा) खत्म हो जाती है, वह भटकना में नहीं पड़ता। गुरू के शबद में जुड़ने से उसका कमल रूपी हृदय सदैव खिला रहता है। 7। जगत में जो भी दिखाई देता है, वही गिरी हुई आशाओं वाला (निराशा में डूबा हुआ) ही दिखता है (किसी की सारी आशाएं कभी पूरी नहीं हुई)। हरेक को काम का जहर, क्रोध का विष (मारता जा रहा है, हरेक को माया की) भूख (माया की) प्यास (लगी हुई है)। हे नानक ! जगत में गिने चुने (विरले) लोग ही ऐसे मिलते हैं, जो आशा-तृष्णा के अधीन नहीं हैं (और, वही असल जोगी हैं)। 8। 7।
गउड़ी महला 1 ॥ ऐसो दासु मिलै सुखु होई ॥ दुखु विसरै पावै सचु सोई ॥1॥ दरसनु देखि भई मति पूरी ॥ अठसठि मजनु चरनह धूरी ॥1॥ रहाउ ॥ नेत्र संतोखे एक लिव तारा ॥ जिहवा सूची हरि रस सारा ॥2॥ सचु करणी अभ अंतरि सेवा ॥ मनु त्रिपतासिआ अलख अभेवा ॥3॥ जह जह देखउ तह तह साचा ॥ बिनु बूझे झगरत जगु काचा ॥4॥ गुरु समझावै सोझी होई ॥ गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥5॥ करि किरपा राखहु रखवाले ॥ बिनु बूझे पसू भए बेताले ॥6॥ गुरि कहिआ अवरु नही दूजा ॥ किसु कहु देखि करउ अन पूजा ॥7॥ संत हेति प्रभि त्रिभवण धारे ॥ आतमु चीनै सु ततु बीचारे ॥8॥ साचु रिदै सचु प्रेम निवास ॥ प्रणवति नानक हम ता के दास ॥9॥8॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ (परमात्मा का) ऐसा दास (मनुष्य को) मिल जाता है, (उसके अंदर) आत्मिक आनंद पैदा होता है। वह मनुष्य सदा स्थिर प्रभू की प्राप्ति कर लेता है, दुख उसके नजदीक नहीं फटकता। 1। (हरी के दास, गुरू का) दर्शन करके मनुष्य की अक्ल पूरी (सूझ वाली) हो जाती है। (गुरू के) चरणों की धूड़ (ही) अढ़सठ तीर्थों का स्नान है। 1। रहाउ। उसकी आँखें (पराया रूप देखने की ओर से) तृप्त रहती हैं, उसकी सुरति की तार एक परमात्मा में रहती है। परमात्मा के नाम का श्रेष्ठ रस चख के उसकी जीभ पवित्र हो जाती है। 2। (परमात्मा का ऐसा दास, गुरू जिस मनुष्य को मिलता है) प्रभू का सिमरन उसकी (नित्य की) करनी बन जाता है। अलख और अभेव परमात्मा की अपने अंदर सेवा-भक्ति करके उसका मन (माया की ओर से) तृप्त हो जाता है। 3। (उस गुरू के दीदार की बरकति से ही) मैं जिधर देखता हूँ उधर उधर मुझे सदा स्थिर प्रभू दिखता है। पर माया के मुकाबले कमजोर मन वाला जगत इस ज्ञान से वंचित होने के कारण खहि खहि कर रहा है। 4। ये समझ कि परमात्मा हर जगह मौजूद है उसी को होती है जिसे गुरू ये समझ दे। कोई विरला मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के ये समझ प्राप्त करता है। 5। हे राखनहार प्रभू ! मेहर कर, और जीवों को (खहि खहि से) आप खुद बचा। गुरू से ज्ञान प्राप्त किए बिना जीव पशू (-स्वभाव) बन रहे हैं। भूतने हैं रहे हैं। 6। मुझे सतिगुरू ने समझा दिया है कि प्रभू के बिना उस जैसा कोई नहीं। बताओ, (हे भाई !) मैं किसे (उस जैसा) देख के किसी और की पूजा कर सकता हूँ? । 7। परमात्मा ने (मनुष्यों को) संत बनाने के लिए ये सृष्टि रची है। जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर) अपने आप को पहिचानता है, वह इस अस्लियत को समझ लेता है। 8। (गुरू का दीदार करके ही) सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा मनुष्य के हृदय में निवास करता है, परमात्मा का प्यार हृदय में टिकता है। नानक विनती करता है, मैं भी उस गुरू का दास हूँ। 9। 8।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ ब्रहमा ने अहंकार किया (कि मैं इतना बड़ा हूँ, मैं कमल की नाभि में से कैसे पैदा हो सकता हूँ?) उसने परमात्मा की बेअंतता को नहीं समझा। (जब उसका घमण्ड तोड़ने के लिए उसके) वेद चुराए जाने की बिपदा उस पर आ पड़ी तब वह पछताया (कि मैंने अपने आप को व्यर्थ ही इतना बड़ा समझा)। जब (उस विपदा के वक्त) उसने परमात्मा को सिमरा (तो परमात्मा ने उसकी सहायता की) तब उसे यकीन आया (कि परमात्मा ही सबसे बड़ा है)। 1। जगत में अहंकार एक ऐसा विकार है, जो बहुत बुरा है। (बड़े-बड़े कहलवाने वाले भी जब जब अहंकार में आए तो बहुत खुआर हुए)। जिस (भाग्यशाली मनुष्य) को गुरू मिल जाता है (गुरू) उसका अहंकार दूर कर देता है। 1। रहाउ। राजे बलि को माया का गुमान हो गया। उसने बड़े यज्ञ किए। अहंकार प्रचण्ड हो गया। पर (माया के मान में) अपने गुरू की सालाह लिए बिना (उसने ब्राहमण-रूप धारी विष्णु को दान देना मान लिया और) पाताल में चला गया। 2। (राजा) हरिश्चंद्र (भी) बहुत दानी था, (दान की शोभा में ही मस्त रहा)। गुरू के बगैर वह भी ये ना समझ सका कि परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता, उसका भेद नहीं पाया जा सकता (उसकी दृष्टि में बेअंत दानी हैं), (पर जीव के भी क्या वश?) परमात्मा खुद ही अक्ल देता है। 3। बुरी मति के कारण हर्णाकश्यप दुराचारी हो गया (अत्याचार करने लग पड़ा)। पर, नारायण प्रभू स्वयं ही (अहंकारियों का) अहंकार दूर करने वाला है। उसने मेहर की और प्रहलाद की रक्षा की (हर्णाक्षस का गुमान तोड़ा)। 4। मूर्ख रावण बेसमझी में गलत रास्ते पर पड़ गया। (नतीजा ये निकला कि) उसकी लंका लूटी गई, और उसका सिर भी काट दिया गया। अहंकार के कारण, गुरू की शरण पड़े बिना अहंकार के मद में ही रावण तबाह हुआ। 5। सहसबाहु (को परशुराम ने मारा), मधु और कैटभ (को विष्णु ने मार दिया), महिसासुर (दुर्गा के हाथों मरा), हरणाखश को (नर सिंह ने) नाखूनों से मार दिया। ये सारे दैत्य प्रभू भक्ति के अभ्यास से वंचित रहने के कारण (अपनी मूर्खता की सजा भुगतते हुए) मारे गए। 6। जरासंधि व कालजमुन (कृष्ण के हाथों) मारे गए। रक्तबीज (दुर्गा के हाथों) मरा। कालनेम (विष्णु के त्रिशूल से) चीरा गया (इन अहंकारियों को इनके अहंकार ने ही ले लिया)। परमात्मा ने दैत्य मार के संतों की रक्षा की। 7। (इस सारी खेल का मालिक परमात्मा) खुद ही गुरू रूप हो के अपनी सिफत सालाह की बाणी को विचारता है,
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मनुष्य निर्भय परमात्मा का नाम जप के (माया के हमलों से निर्भय हो के) वासना-रहित (शुद्ध) हो जाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।