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अंग २२२ · गउड़ी

अंग
222
गउड़ी
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  1. तनि मनि सूचै साचु सु चीति ॥
  2. ना मनु मरै न कारजु होइ ॥
  3. हउमै करतिआ नह सुखु होइ ॥

तनि मनि सूचै साचु सु चीति ॥

अंग २२१ से चला आ रहा अंश

तनि मनि सूचै साचु सु चीति ॥
नानक हरि भजु नीता नीति ॥8॥2॥

हिन्दी अर्थ: वह सदा स्थिर रहने वाला प्रभू उनके हृदय में बसता है। हे नानक ! आप भी (इसी तरह) सदा सदा उस परमात्मा का भजन कर। 8। 2।

ना मनु मरै न कारजु होइ ॥

गउड़ी गुआरेरी महला 1 ॥
ना मनु मरै न कारजु होइ ॥
मनु वसि दूता दुरमति दोइ ॥
मनु मानै गुर ते इकु होइ ॥1॥
निरगुण रामु गुणह वसि होइ ॥
आपु निवारि बीचारे सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
मनु भूलो बहु चितै विकारु ॥
मनु भूलो सिरि आवै भारु ॥
मनु मानै हरि एकंकारु ॥2॥
मनु भूलो माइआ घरि जाइ ॥
कामि बिरूधउ रहै न ठाइ ॥
हरि भजु प्राणी रसन रसाइ ॥3॥
गैवर हैवर कंचन सुत नारी ॥
बहु चिंता पिड़ चालै हारी ॥
जूऐ खेलणु काची सारी ॥4॥
संपउ संची भए विकार ॥
हरख सोक उभे दरवारि ॥
सुखु सहजे जपि रिदै मुरारि ॥5॥
नदरि करे ता मेलि मिलाए ॥
गुण संग्रहि अउगण सबदि जलाए ॥
गुरमुखि नामु पदारथु पाए ॥6॥
बिनु नावै सभ दूख निवासु ॥
मनमुख मूड़ माइआ चित वासु ॥
गुरमुखि गिआनु धुरि करमि लिखिआसु ॥7॥
मनु चंचलु धावतु फुनि धावै ॥
साचे सूचे मैलु न भावै ॥
नानक गुरमुखि हरि गुण गावै ॥8॥3॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 1 ॥ तब तक मन (में से तृष्णा) मरती नहीं और तब तक (परमात्मा के साथ एक-रूप होने का) जनम मनोरथ भी सम्पूर्ण नहीं होता। जब तक मनुष्य का मन कामादिक विकारों के वश में है, घटिया मति के अधीन है, मेरे-तेर के काबू में है, जब गुरू से (शिक्षा ले के मनुष्य का) मन (सिफत सालाह में) रम जाता है, तब ये परमात्मा के साथ एक-रूप हो जाता है। 1। परमात्मा माया के तीन गुणों से परे है, और, ऊँचे आत्मिक गुणों के वश में है (भाव, मनुष्य ऊँचे आत्मिक गुणों को अपने अंदर बसाता है, परमात्मा उससे प्यार करता है)। जो मनुष्य स्वैभाव दूर कर लेता है वह शुभ गुणों को अपने मन में बसाता है। 1। रहाउ। (माया के वशीभूत हो के जब तक) मन गलत राह पर रहता है, तब तक ये विकार ही विकार चितवता रहता है। (और मनुष्य के) सिर पर विकारों का बोझ इकट्ठा होता जाता है। पर जब (गुरू से शिक्षा ले के) मन (प्रभू की सिफत सालाह में) परचता है (पसीजता है) तब ये परमात्मा के साथ एक-सुर हो जाता है। 2। (माया के प्रभाव में आ के) गलत राह पर पड़ा मन माया के घर (बारंबार) जाता है, काम-वासना में फंसा हुआ मन ठिकाने पे नहीं रहता। (इस माया के प्रभाव से बचने के लिए) हे प्राणी ! अपनी जीभ को (अमृत रस में) रसा के परमात्मा का भजन कर। 3। बढ़िया हाथी, बढ़िया घोड़े, सोना, पुत्र, स्त्री- (इनका मोह) जूए की खेल है। (पुत्र, स्त्री आदि के मोह के कारण) मन बहुत चिंतातुर रहता है, और, आखिर इस जगत अखाड़े से मनुष्य बाजी हार के जाता है। (जैसे चौपड़ की) कच्ची नर्दें (बारंबार मार खाती हैं। वैसे ही इस जूए की खेल खेलने वाले का मन कमजोर रह के विकारों की चोटें खाता रहता है)। 4। जैसे जैसे मनुष्य धन जोड़ता है मन में विकार पैदा होते जाते हैं, (कभी खुशी कभी गम) ये खुशी व सहम सदा मनुष्य के दरवाजे पर खड़े रहते हैं। पर हृदय में परमात्मा का सिमरन करने से मन अडोल अवस्था में टिक जाता है और आत्मिक आनंद पाता है। 5। (पर जीव के भी क्या वश?) जब परमात्मा मेहर की निगाह करता है, तब गुरू इसे अपने शबद में जोड़ के प्रभू चरणों में मिला देता है। (गुरू के सन्मुख हो के) जीव आत्मिक गुण (अपने अंदर) इकट्ठे करके गुरू शबद के द्वारा (अपने अंदर से) अवगुणों को जला देता है। गुरू के सन्मुख हो के मनुष्य नाम-धन ढूँढ लेता है। 6। प्रभू के नाम में जुड़े बिना मनुष्य के मन में सारे दुख-कलेशों का डेरा आ लगता है, मूर्ख मनुष्य के चित्त का बसेरा माया (के मोह) में रहता है। धुर से ही परमात्मा की मेहर से (जिस माथे पर किए कर्मों के संस्कारों के) लेख उघाड़ता है, वह मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है। 7। (आत्मिक गुणों से वंचित) मन चंचल रहता है (माया के पीछे) दौड़ता है बार बार भागता है। सदा स्थिर रहने वाले और (विकारों की झूठ, अपवित्रता से) स्वच्छ परमात्मा को (मनुष्य के मन की ये) मैल अच्छी नहीं लगती (इस वास्ते ये परमात्मा से विछुड़ा रहता है)। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वह परमात्मा के गुण गाता है (और उसका जनम मनोरथ सफल हो जाता है)। 8। 3।

हउमै करतिआ नह सुखु होइ ॥

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गउड़ी गुआरेरी महला 1 ॥
हउमै करतिआ नह सुखु होइ ॥
मनमति झूठी सचा सोइ ॥
सगल बिगूते भावै दोइ ॥
सो कमावै धुरि लिखिआ होइ ॥1॥
ऐसा जगु देखिआ जूआरी ॥
सभि सुख मागै नामु बिसारी ॥1॥ रहाउ ॥
अदिसटु दिसै ता कहिआ जाइ ॥
बिनु देखे कहणा बिरथा जाइ ॥
गुरमुखि दीसै सहजि सुभाइ ॥
सेवा सुरति एक लिव लाइ ॥2॥
सुखु मांगत दुखु आगल होइ ॥
सगल विकारी हारु परोइ ॥
एक बिना झूठे मुकति न होइ ॥
करि करि करता देखै सोइ ॥3॥
त्रिसना अगनि सबदि बुझाए ॥
दूजा भरमु सहजि सुभाए ॥
गुरमती नामु रिदै वसाए ॥
साची बाणी हरि गुण गाए ॥4॥
तन महि साचो गुरमुखि भाउ ॥
नाम बिना नाही निज ठाउ ॥
प्रेम पराइण प्रीतम राउ ॥
नदरि करे ता बूझै नाउ ॥5॥
माइआ मोहु सरब जंजाला ॥
मनमुख कुचील कुछित बिकराला ॥
सतिगुरु सेवे चूकै जंजाला ॥
अंम्रित नामु सदा सुखु नाला ॥6॥
गुरमुखि बूझै एक लिव लाए ॥
निज घरि वासै साचि समाए ॥
जंमणु मरणा ठाकि रहाए ॥
पूरे गुर ते इह मति पाए ॥7॥
कथनी कथउ न आवै ओरु ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 1 ॥ (अपने मन की अगवाई में रह के) हर समय अपने ही बड़प्पन व सुख की बातें करने से सुख नहीं मिल सकता। मन की समझदारी नाशवंत पदार्थों में (जोड़ती है), वह परमात्मा सदा स्थिर रहने वाला है (और सुख का श्रोत है। ‘मन मति’ और ‘परमात्मा’ का स्वाभाव अलग अलग है, दोनों का मेल नहीं। सुख कहाँ से आए?) जिन को (नाम विसार के) मेर-तेर अच्छी लगती है, वह सारे खुआर ही होते हैं। (पर जीवों के भी क्या वश?) (किए कर्मों के अनुसार जीव के माथे पर) जो धुर से लेख लिखे होते हैं, उसी के अनुसार यहाँ कमाई करता है (नाम-सिमरन छोड़ के नाशवंत पदार्थों में सुख की तलाश के व्यर्थ प्रयत्न करता है)। 1। मैंने देखा है कि जगत जूए की खेल खेलता है, ऐसी (खेल खेलता है कि) सुख तो सारे ही मांगता है, पर (जिस नाम से सुख मिलते हैं उस) नाम को विसार रहा है। 1। रहाउ। परमात्मा (इन आँखों से) दिखाई नहीं देता। अगर आँखों से दिखाई दे, तो ही (उससे मिलने की कसक पैदा हो, और) उसका नाम लेने को चित्त करे। आँखों को दिखे बिना (उसके दीदार की खींच नहीं बनती और चाह से) उसका नाम नहीं लिया जा सकता (खींच बनी रहती है दिखाई देते पदार्थों से)। गुरू के सन्मुख रहने से मनुष्य का मन (दिखते पदार्थों से हट के) अडोलता में टिकता है, प्रभू के प्रेम में लीन होता है और इस तरह अंतरात्मे वह प्रभू दिख पड़ता है। गुरू के सन्मुख मनुष्य की सूरति गुरू की बताई सेवा में जुड़ती है, उसकी लिव एक परमात्मा में लगती है। 2। (प्रभू का नाम विसार के) सुख मांगने से (बल्कि) बहुत दुख बढ़ता है (क्योंकि) मनुष्य सारे विकारों का हार परो के (अपने गले में डाल लेता है)। नाशवंत पदार्थों के मोह में फंसे हुए को परमात्मा के नाम के बिना (दुखों व विकारों से) खलासी हासिल नहीं होती। (प्रभू की ऐसी ही रजा है) वह करतार स्वयं ही सब कुछ करके खुद ही इस खेल को देख रहा है। 3। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के (अपने अंदर से) तृष्णा की आग बुझाता है, अडोल अवस्था में टिक के प्रभू के प्रेम में जुड़ के उसकी मायावी पदार्थों की ओर की भटकना खत्म हो जाती है। गुरू की शिक्षा पर चल कर वह परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाता है। प्रभू की सिफत सालाह की बाणी के द्वारा वह परमात्मा के गुण गाता है (और उसके अंदर आत्मिक आनंद पैदा होता है)। 4। (वैसे तो) हरेक शरीर में सदा स्थिर प्रभू बसता है, पर गुरू की शरण पड़ने से ही उसके साथ प्रेम जागता है (और मनुष्य नाम सिमरता है) नाम के बिना मन एक टिकाने पर आ नहीं सकता। प्रीतम प्रभू भी प्रेम के अधीन है (जो उसके साथ प्रेम करता है) प्रभू उस के ऊपर मेहर की नजर करता है और वह उसके नाम की कद्र समझता है। 5। माया के मोह सारे (मायावी) बंधन पैदा करते हैं। (इस करके) मन के मुरीद मनुष्य का जीवन गंदा, बुरा व डरावना बन जाता है। जो मनुष्य गुरू का बताया हुआ राह पकड़ता है, उसके माया वाले बंधन टूट जाते हैं। वह आत्मिक जीवन देने वाला नाम जपता है, और सदा ही आत्मिक आनंद अपने अंदर पाता है। 6। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (नाम की कद्र) समझता है, एक परमात्मा में सुरति जोड़ता है, अपने स्वै-स्वरूप में टिका रहता है, सदा स्थिर प्रभू (के चरणों) में लीन रहता है। वह अपना जनम मरन का चक्र रोक लेता है। पर ये बुद्धि वह पूरे गुरू से ही प्राप्त करता है। 7। जिस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पड़ सकता, मैं उसके गुण गाता हूँ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २२२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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