Lulla Family

अंग 219

अंग
219
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गउड़ी महला 9 ॥
साधो मन का मानु तिआगउ ॥
कामु क्रोधु संगति दुरजन की ता ते अहिनिसि भागउ ॥1॥ रहाउ ॥
सुखु दुखु दोनो सम करि जानै अउरु मानु अपमाना ॥
हरख सोग ते रहै अतीता तिनि जगि ततु पछाना ॥1॥
उसतति निंदा दोऊ तिआगै खोजै पदु निरबाना ॥
जन नानक इहु खेलु कठनु है किनहूं गुरमुखि जाना ॥2॥1॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु गउड़ी महला 9 ॥ हे संत जनो ! (अपने) मन का अहंकार छोड़ दो। काम और क्रोध (भी) बुरे मनुष्य की संगत (समान ही) हैं। इससे (भी) दिन रात (हर वक्त) परे रहो। 1। रहाउ। (हे संत जनो !जो मनुष्य) सुख और दुख दोनों को एक समान जानता है, और जो आदर व निरादर को भी एक समान जानता है। (कोई मनुष्य उसका आदर करे तो भी परवाह नहीं) और जो मनुष्य खुशी और गमी दोनों से निर्लिप रहता है (खुशी के समय अहंकार में नहीं आ जाता और गमी के वक्त घबरा नहीं जाता) उसने जगत में जीवन के भेद को समझ लिया है। (हे संत जनो ! उस मनुष्य ने अस्लियत ढूँढ ली है जो) ना किसी की खुशामद करता है ना ही किसी की निंदा, और जो उस आत्मिक अवस्था को सदा तलाश करता है जहां कोई वासना छू नहीं सकती। (पर) हे नानक ! ये (जीवन-) खेल (खेलनी) मुश्किल है। कोई विरला मनुष्य ही गुरू की शरण पड़ कर इसे समझता है। 2। 1।
गउड़ी महला 9 ॥
साधो रचना राम बनाई ॥
इकि बिनसै इक असथिरु मानै अचरजु लखिओ न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
काम क्रोध मोह बसि प्रानी हरि मूरति बिसराई ॥
झूठा तनु साचा करि मानिओ जिउ सुपना रैनाई ॥1॥
जो दीसै सो सगल बिनासै जिउ बादर की छाई ॥
जन नानक जगु जानिओ मिथिआ रहिओ राम सरनाई ॥2॥2॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ हे संत जनो !परमात्मा ने (जगत की ये आश्चर्यजनक) रचना रच दी है (कि) एक मनुष्य (तो) मरता है (पर) दूसरा मनुष्य (उसे मरता देख के भी अपने आप को) सदा टिके रहने वाला समझता है। ये एक आश्चर्यजनक तमाशा है जो बयान नहीं किया जा सकता। 1। रहाउ। (हे संत जनो !) मनुष्य काम के, क्रोध के, मोह के काबू में रहता है और परमात्मा की हस्ती को भुलाए रखता है। ये शरीर सदा साथ रहने वाला नहीं है, पर मनुष्य इसे सदा कायम रहने वाला समझता है, जैसे रात को (सोते समय जो) सपना (आता है मनुष्य नींद की हालत में उस सपने को असली घटित हो रही बात समझता है)। 1। (हे संत जनो !) जैसे बादल की छाया (सदा एक जगह टिकी नहीं रह सकती, वैसे ही) जो कुछ (जगत में) दिखाई दे रहा है ये सब कुछ (अपने अपने समय में) नाश हो जाता है। हे दास नानक ! (जिस मनुष्य ने) जगत को नाशवान समझ लिया है, वह (सदा स्थिर रहने वाले) परमात्मा की शरण पड़ा रहता है। 2। 2।
गउड़ी महला 9 ॥
प्रानी कउ हरि जसु मनि नही आवै ॥
अहिनिसि मगनु रहै माइआ मै कहु कैसे गुन गावै ॥1॥ रहाउ ॥
पूत मीत माइआ ममता सिउ इह बिधि आपु बंधावै ॥
म्रिग त्रिसना जिउ झूठो इहु जग देखि तासि उठि धावै ॥1॥
भुगति मुकति का कारनु सुआमी मूड़ ताहि बिसरावै ॥
जन नानक कोटन मै कोऊ भजनु राम को पावै ॥2॥3॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ (हे भाई !) मनुष्य को परमात्मा की सिफत सालाह (अपने) मन में (बसानी) नहीं आती। (हे भाई !) बताओ, वह मनुष्य कैसे परमात्मा के गुण गा सकता है जो दिन रात माया (के मोह) में मस्त रहता है?। 1। रहाउ। (हे भाई ! माया के मोह में मस्त रहने वाला मनुष्य) पुत्र-मित्र-माया (आदि) की ममता से बंधा रहता है, और इस तरह अपने आप को (मोह के बंधनों में) बांधे रखता है। (माया-ग्रसित मनुष्य ये नहीं समझता कि) ये जगत (तो) ठगनीरे की तरह (ठगी ही ठगी है, जैसे हिरन मारीचिका को देख कर उसकी ओर दौड़ता और भटक भटक के मरता है, वैसे ही मनुष्य इस जगत को) देख कर इसकी ओर (सदा) दौड़ता रहता है (और आत्मिक मौत अपनाता है)। 1। मूर्ख मनुष्य उस मालिक प्रभू को भुलाए रखता है जो दुनिया के सुखों और भोगों का भी मालिक है और जो मोक्ष भी देने वाला है। हे दास नानक ! (कह) करोड़ों में कोई विरला मनुष्य ही होता है जो (जगत ठगनीरे के मोह से बच के) परमात्मा की भक्ति प्राप्त करता है। 2। 3।
गउड़ी महला 9 ॥
साधो इहु मनु गहिओ न जाई ॥
चंचल त्रिसना संगि बसतु है या ते थिरु न रहाई ॥1॥ रहाउ ॥
कठन करोध घट ही के भीतरि जिह सुधि सभ बिसराई ॥
रतनु गिआनु सभ को हिरि लीना ता सिउ कछु न बसाई ॥1॥
जोगी जतन करत सभि हारे गुनी रहे गुन गाई ॥
जन नानक हरि भए दइआला तउ सभ बिधि बनि आई ॥2॥4॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ हे संत जनो ! ये मन वश में नहीं किया जा सकता, (क्योंकि ये मन सदा) अनेकों हाव-भाव करने वाली तृष्णा के साथ बसा रहता है, इस वास्ते ये कभी टिक के नहीं रहता। 1। रहाउ। (हे संत जनो !) वश में ना आ सकने वाला क्रोध भी इसी हृदय में ही बसता है, जिस ने (मनुष्य को भली तरफ की) सारी होश भुला दी है। (क्रोध ने) हरेक मनुष्य का श्रेष्ठ ज्ञान चुरा लिया है, उसके साथ किसी की कोई पेश नहीं जाती। 1। सारे जोगी (इस मन को काबू करने के) यत्न करते करते थक गए हैं, विद्वान मनुष्य अपनी विद्या की तारीफें करते थक गए (ना योग साधन, ना विद्या- मन को कोई भी वश में लाने के स्मर्थ नहीं)। हे दास नानक ! जब प्रभू जी दयावान होते हैं (इस मन को काबू में रखने के) सारे ही ढंग तरीके सफल हो जाते हैं। 2। 4।
गउड़ी महला 9 ॥
साधो गोबिंद के गुन गावउ ॥
मानस जनमु अमोलकु पाइओ बिरथा काहि गवावउ ॥1॥ रहाउ ॥
पतित पुनीत दीन बंध हरि सरनि ताहि तुम आवउ ॥
गज को त्रासु मिटिओ जिह सिमरत तुम काहे बिसरावउ ॥1॥
तजि अभिमान मोह माइआ फुनि भजन राम चितु लावउ ॥
नानक कहत मुकति पंथ इहु गुरमुखि होइ तुम पावउ ॥2॥5॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ हे संत जनो ! (सदा) गोबिंद के गुण गाते रहा करो। ये बड़ा कीमती मानस जन्म मिला है, इसे व्यर्थ क्यूँ गवाते हैं? । 1। रहाउ। (हे संत जनो !) परमात्मा उन लोगों को भी पवित्र करने वाला है जो विकारों में गिरे हुए होते हैं, वह हरी गरीबों का सहयोगी है। आप भी उसी की शरण पड़ो। जिसका सिमरन करके हाथी का डर मिट गया था, आप उसे क्यूँ भुला रहे हैं?। 1। (हे संत जनो !) अहंकार दूर करके और माया का मोह दूर करके अपना चित्त परमात्मा के भजन में जोड़े रखो। नानक कहता है, विकारों से निजात पाने का यही रास्ता है, पर गुरू की शरण पड़ कर ही आप ये रास्ता ढूँढ सकोगे। 2। 5।
गउड़ी महला 9 ॥
कोऊ माई भूलिओ मनु समझावै ॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ हे (मेरी) माँ ! (माया के मोह से नाको नाक भरे हुए संसार जंगल में मेरा मन कुमार्ग पर पड़ गया है, मुझे) कोई (ऐसा गुरमुख मिल जाए जो मेरे इस) गलत रास्ते पर पड़े हुए मन को मति दे (समझा दे)।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। 1675 में औरंगज़ेब के हुक्म पर उन्हें दिल्ली के चाँदनी चौक के पास शहीद किया गया, क्योंकि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धर्मांतरण से इनकार किया था। उनकी शहादत के स्थल पर आज सीस-गंज गुरुद्वारा है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English