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अंग २२० · गउड़ी

अंग
220
गउड़ी
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  1. बेद पुरान साध मग सुनि करि निमख न हरि गुन गावै ॥1॥ रहाउ ॥
  2. साधो राम सरनि बिसरामा ॥
  3. मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥
  4. नर अचेत पाप ते डरु रे ॥
  5. निधि सिधि निरमल नामु बीचारु ॥

बेद पुरान साध मग सुनि करि निमख न हरि गुन गावै ॥1॥ रहाउ ॥

अंग २१९ से चला आ रहा अंश

बेद पुरान साध मग सुनि करि निमख न हरि गुन गावै ॥1॥ रहाउ ॥
दुरलभ देह पाइ मानस की बिरथा जनमु सिरावै ॥
माइआ मोह महा संकट बन ता सिउ रुच उपजावै ॥1॥
अंतरि बाहरि सदा संगि प्रभु ता सिउ नेहु न लावै ॥
नानक मुकति ताहि तुम मानहु जिह घटि रामु समावै ॥2॥6॥

हिन्दी अर्थ: (ये भूला हुआ मन) वेद-पुराण (आदि धर्म-पुस्तकों और) संत जनों के उपदेश सुन के (भी) रत्ती भर समय के लिए भी परमात्मा के गुण नहीं गाता। 1। रहाउ। (हे मेरी माँ ! ये मन ऐसा कुमार्ग पर पड़ा हुआ है कि) बड़ी मुश्किल से मिल सकने वाले मानस शरीर प्राप्त करके भी इस जन्म को व्यर्थ गुजार रहा है। (हे माँ ! ये संसार) जंगल माया के मोह से नाको नाक भरा पड़ा है (और मेरा मन) इस (जंगल से ही) प्रेम बना रहा है। 1। (हे मेरी माँ ! जो) परमात्मा (हरेक जीव के) अंदर व बाहर हर समय बसता है उससे (ये मेरा मन) प्यार नहीं डालता। हे नानक ! (कह, माया के मोह से भरपूर संसार जंगल में से) खलासी आप उसी मनुष्य को (मिली) समझिए जिसके हृदय में परमात्मा बस रहा है। 2। 6।

साधो राम सरनि बिसरामा ॥

गउड़ी महला 9 ॥
साधो राम सरनि बिसरामा ॥
बेद पुरान पड़े को इह गुन सिमरे हरि को नामा ॥1॥ रहाउ ॥
लोभ मोह माइआ ममता फुनि अउ बिखिअन की सेवा ॥ हरख सोग परसै जिह नाहनि सो मूरति है देवा ॥1॥
सुरग नरक अंम्रित बिखु ए सभ तिउ कंचन अरु पैसा ॥
उसतति निंदा ए सम जा कै लोभु मोहु फुनि तैसा ॥2॥
दुखु सुखु ए बाधे जिह नाहनि तिह तुम जानउ गिआनी ॥
नानक मुकति ताहि तुम मानउ इह बिधि को जो प्रानी ॥3॥7॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ हे संत जनो ! परमात्मा की शरण पड़ने से ही (विकारों की भटकना से) शांति प्राप्त होती है। वेद पुराण (आदि धार्मिक पुस्तकों) पढ़ने का यही लाभ (होना चाहिए) कि मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता रहे। 1। रहाउ। (हे संत जनो !) लोभ, माया का मोह, अपनत्व और विषियों का सेवन, खुशी, गमी- (इनमें से कोई भी) जिस मनुष्य को छू नहीं सकता (जिस मनुष्य पर अपना जोर नहीं डाल सकता) वह मनुष्य परमात्मा का रूप है। 1। (हे संत जनो ! वह मनुष्य परमात्मा का रूप है जिसे) स्वर्ग एवं नर्क, अमृत और जहर एक जैसे प्रतीत होते हैं। जिसे सोना व तांबा एक समान लगता है। जिसके हृदय में उस्तति और निंदा भी एक जैसे हैं (कोई उसकी उपमा करे, या कोई उसकी निंदा करे- उसके लिए एक समान हैं)। जिसके हृदय में लोभ भी प्रभाव नहीं डाल सकता, मोह भी असर नहीं कर सकता। 2। (हे संत जनो !) आप उस मनुष्य को परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल के रखने वाला समझें, जिसे ना कोई दुख ना ही कोई सुख (अपने प्रभाव में) बाँध सकता है। हे नानक ! (कह, हे संत जनो ! लोभ, मोह, दुख सुख आदि से) खलासी उस मनुष्य को (मिली) मानें, जो मनुष्य इस किस्म की जीवन-युक्ति वाला है। 3। 7।

मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥

गउड़ी महला 9 ॥
मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥
अहिनिसि अउध घटै नही जानै भइओ लोभ संगि हउरा ॥1॥ रहाउ ॥
जो तनु तै अपनो करि मानिओ अरु सुंदर ग्रिह नारी ॥
इन मैं कछु तेरो रे नाहनि देखो सोच बिचारी ॥1॥
रतन जनमु अपनो तै हारिओ गोबिंद गति नही जानी ॥
निमख न लीन भइओ चरनन सिंउ बिरथा अउध सिरानी ॥2॥
कहु नानक सोई नरु सुखीआ राम नाम गुन गावै ॥
अउर सगल जगु माइआ मोहिआ निरभै पदु नही पावै ॥3॥8॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ हे (मेरे) मन ! आप कहां (लोभ आदि में फंस के) पागल हो रहे हैं? (हे भाई !) दिन रात उम्र घटती रहती है, पर मनुष्य ये बात समझता नहीं और लोभ में फंस के कमजोर आत्मिक जीवन वाला बनता जाता है। 1। रहाउ। हे (मेरे) मन ! जो (ये) शरीर, जिसे आप अपना करके समझ रहे हैं, और घर की सुंदर स्त्री को आप अपनी मान रहे हैं, इनमें से कोई भी आपका (सदा निभने वाला साथी) नहीं है, सोच के देख ले, विचार के देख ले। 1। हे (मेरे) मन ! जैसे जुआरी जूए में बाजी हारता है, (वैसे ही) आप अपना कीमती मानस जनम हार रहे हैं। क्योंकि आपने परमात्मा के साथ मिलाप की अवस्था की कद्र नहीं पाई। आप रक्ती भर समय के लिए भी गोबिंद प्रभू के चरनों में नहीं जुड़ते, आप व्यर्थ उम्र गुजार रहे हैं। 2। हे नानक ! कह, वही मनुष्य सुखी जीवन वाला है जो परमात्मा का नाम (जपता है, जो) परमात्मा के गुण गाता है। बाकी का सारा जहान (जो) माया के मोह में फंसा रहता है (वह सहमा रहता है, वह) उस आत्मिक अवस्था पर नहीं पहुँचता, जहां कोई डर छू नहीं सकता। 3। 8।

नर अचेत पाप ते डरु रे ॥

गउड़ी महला 9 ॥
नर अचेत पाप ते डरु रे ॥
दीन दइआल सगल भै भंजन सरनि ताहि तुम परु रे ॥1॥ रहाउ ॥
बेद पुरान जास गुन गावत ता को नामु हीऐ मो धरु रे ॥
पावन नामु जगति मै हरि को सिमरि सिमरि कसमल सभ हरु रे ॥1॥
मानस देह बहुरि नह पावै कछू उपाउ मुकति का करु रे ॥
नानक कहत गाइ करुना मै भव सागर कै पारि उतरु रे ॥2॥9॥251॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ हे गाफिल मनुष्य ! पापों से बचा रह। (और इन पापों से बचने के वास्ते उस) परमात्मा की शरण पड़ा रह, जो गरीबों पर दया करने वाला है, और सारे डर दूर करने वाला है। 1। रहाउ। (हे गाफिल मनुष्य !) उस परमात्मा का नाम अपने हृदय में परोए रख, जिसके गुण वेद पुराण (आदि धर्म पुस्तकें) गा रहे हैं। (हे गाफिल मनुष्य ! पापों से बचा के) पवित्र करने वाला जगत में परमात्मा का नाम (ही) है, आप उस परमात्मा को सिमर सिमर के (अपने अंदर से) सारे पाप दूर कर ले। 1। (हे गाफिल मनुष्य !) आप ये मानस शरीर फिर कभी नहीं पा सकेंगे (इसे क्यूँ पापों में लगा के गवा रहे हैं? यही समय है, इन पापों से) मुक्ति प्राप्त करने का। कोई इलाज कर ले। आपको नानक कहता है, तरस-रूप परमात्मा के गुण गा के संसार समुंद्र पार हो जा। 2। 9। 251।

निधि सिधि निरमल नामु बीचारु ॥

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रागु गउड़ी असटपदीआ महला 1 गउड़ी गुआरेरी
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
निधि सिधि निरमल नामु बीचारु ॥
पूरन पूरि रहिआ बिखु मारि ॥
त्रिकुटी छूटी बिमल मझारि ॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी असटपदीआ महला 1 गउड़ी गुआरेरी सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥ परमात्मा का निर्मल नाम मेरे वास्ते (आत्मिक) खजाना है। परमातमा के गुणों की विचार ही मेरे वास्ते रिद्धियां (-सिद्धियां) हैं। अब मुझे परमात्मा हर जगह व्यापक दिखाई दे रहा है, मैंने माया के जहर को (अपने अंदर से) मार लिया है। (उस मति की बरकति से) पवित्र हरी नाम में लीन रहने से मेरी अंदर की खिझ समाप्त हो गई है

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ९: गुरु तेग बहादुर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २२० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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