बेद पुरान साध मग सुनि करि निमख न हरि गुन गावै ॥1॥ रहाउ ॥ दुरलभ देह पाइ मानस की बिरथा जनमु सिरावै ॥ माइआ मोह महा संकट बन ता सिउ रुच उपजावै ॥1॥ अंतरि बाहरि सदा संगि प्रभु ता सिउ नेहु न लावै ॥ नानक मुकति ताहि तुम मानहु जिह घटि रामु समावै ॥2॥6॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: (ये भूला हुआ मन) वेद-पुराण (आदि धर्म-पुस्तकों और) संत जनों के उपदेश सुन के (भी) रत्ती भर समय के लिए भी परमात्मा के गुण नहीं गाता। 1। रहाउ। (हे मेरी माँ ! ये मन ऐसा कुमार्ग पर पड़ा हुआ है कि) बड़ी मुश्किल से मिल सकने वाले मानस शरीर प्राप्त करके भी इस जन्म को व्यर्थ गुजार रहा है। (हे माँ ! ये संसार) जंगल माया के मोह से नाको नाक भरा पड़ा है (और मेरा मन) इस (जंगल से ही) प्रेम बना रहा है। 1। (हे मेरी माँ ! जो) परमात्मा (हरेक जीव के) अंदर व बाहर हर समय बसता है उससे (ये मेरा मन) प्यार नहीं डालता। हे नानक ! (कह, माया के मोह से भरपूर संसार जंगल में से) खलासी आप उसी मनुष्य को (मिली) समझो जिसके हृदय में परमात्मा बस रहा है। 2। 6।
गउड़ी महला 9 ॥ साधो राम सरनि बिसरामा ॥ बेद पुरान पड़े को इह गुन सिमरे हरि को नामा ॥1॥ रहाउ ॥ लोभ मोह माइआ ममता फुनि अउ बिखिअन की सेवा ॥ हरख सोग परसै जिह नाहनि सो मूरति है देवा ॥1॥ सुरग नरक अंम्रित बिखु ए सभ तिउ कंचन अरु पैसा ॥ उसतति निंदा ए सम जा कै लोभु मोहु फुनि तैसा ॥2॥ दुखु सुखु ए बाधे जिह नाहनि तिह तुम जानउ गिआनी ॥ नानक मुकति ताहि तुम मानउ इह बिधि को जो प्रानी ॥3॥7॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ हे संत जनो ! परमात्मा की शरण पड़ने से ही (विकारों की भटकना से) शांति प्राप्त होती है। वेद पुराण (आदि धार्मिक पुस्तकों) पढ़ने का यही लाभ (होना चाहिए) कि मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता रहे। 1। रहाउ। (हे संत जनो !) लोभ, माया का मोह, अपनत्व और विषियों का सेवन, खुशी, गमी- (इनमें से कोई भी) जिस मनुष्य को छू नहीं सकता (जिस मनुष्य पर अपना जोर नहीं डाल सकता) वह मनुष्य परमात्मा का रूप है। 1। (हे संत जनो ! वह मनुष्य परमात्मा का रूप है जिसे) स्वर्ग एवं नर्क, अमृत और जहर एक जैसे प्रतीत होते हैं। जिसे सोना व तांबा एक समान लगता है। जिसके हृदय में उस्तति और निंदा भी एक जैसे हैं (कोई उसकी उपमा करे, या कोई उसकी निंदा करे- उसके लिए एक समान हैं)। जिसके हृदय में लोभ भी प्रभाव नहीं डाल सकता, मोह भी असर नहीं कर सकता। 2। (हे संत जनो !) आप उस मनुष्य को परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल के रखने वाला समझो, जिसे ना कोई दुख ना ही कोई सुख (अपने प्रभाव में) बाँध सकता है। हे नानक ! (कह, हे संत जनो ! लोभ, मोह, दुख सुख आदि से) खलासी उस मनुष्य को (मिली) मानो, जो मनुष्य इस किस्म की जीवन-युक्ति वाला है। 3। 7।
गउड़ी महला 9 ॥ मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥ अहिनिसि अउध घटै नही जानै भइओ लोभ संगि हउरा ॥1॥ रहाउ ॥ जो तनु तै अपनो करि मानिओ अरु सुंदर ग्रिह नारी ॥ इन मैं कछु तेरो रे नाहनि देखो सोच बिचारी ॥1॥ रतन जनमु अपनो तै हारिओ गोबिंद गति नही जानी ॥ निमख न लीन भइओ चरनन सिंउ बिरथा अउध सिरानी ॥2॥ कहु नानक सोई नरु सुखीआ राम नाम गुन गावै ॥ अउर सगल जगु माइआ मोहिआ निरभै पदु नही पावै ॥3॥8॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ हे (मेरे) मन ! आप कहां (लोभ आदि में फंस के) पागल हैं रहा है? (हे भाई !) दिन रात उम्र घटती रहती है, पर मनुष्य ये बात समझता नहीं और लोभ में फंस के कमजोर आत्मिक जीवन वाला बनता जाता है। 1। रहाउ। हे (मेरे) मन ! जो (ये) शरीर, जिसे आप अपना करके समझ रहा है, और घर की सुंदर स्त्री को आप अपनी मान रहा है, इनमें से कोई भी आपका (सदा निभने वाला साथी) नहीं है, सोच के देख ले, विचार के देख ले। 1। हे (मेरे) मन ! जैसे जुआरी जूए में बाजी हारता है, (वैसे ही) आप अपना कीमती मानस जनम हार रहा है। क्योंकि तूने परमात्मा के साथ मिलाप की अवस्था की कद्र नहीं पाई। आप रक्ती भर समय के लिए भी गोबिंद प्रभू के चरनों में नहीं जुड़ता, आप व्यर्थ उम्र गुजार रहा है। 2। हे नानक ! कह, वही मनुष्य सुखी जीवन वाला है जो परमात्मा का नाम (जपता है, जो) परमात्मा के गुण गाता है। बाकी का सारा जहान (जो) माया के मोह में फंसा रहता है (वह सहमा रहता है, वह) उस आत्मिक अवस्था पर नहीं पहुँचता, जहां कोई डर छू नहीं सकता। 3। 8।
गउड़ी महला 9 ॥ नर अचेत पाप ते डरु रे ॥ दीन दइआल सगल भै भंजन सरनि ताहि तुम परु रे ॥1॥ रहाउ ॥ बेद पुरान जास गुन गावत ता को नामु हीऐ मो धरु रे ॥ पावन नामु जगति मै हरि को सिमरि सिमरि कसमल सभ हरु रे ॥1॥ मानस देह बहुरि नह पावै कछू उपाउ मुकति का करु रे ॥ नानक कहत गाइ करुना मै भव सागर कै पारि उतरु रे ॥2॥9॥251॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 9 ॥ हे गाफिल मनुष्य ! पापों से बचा रह। (और इन पापों से बचने के वास्ते उस) परमात्मा की शरण पड़ा रह, जो गरीबों पर दया करने वाला है, और सारे डर दूर करने वाला है। 1। रहाउ। (हे गाफिल मनुष्य !) उस परमात्मा का नाम अपने हृदय में परोए रख, जिसके गुण वेद पुराण (आदि धर्म पुस्तकें) गा रहे हैं। (हे गाफिल मनुष्य ! पापों से बचा के) पवित्र करने वाला जगत में परमात्मा का नाम (ही) है, आप उस परमात्मा को सिमर सिमर के (अपने अंदर से) सारे पाप दूर कर ले। 1। (हे गाफिल मनुष्य !) आप ये मानस शरीर फिर कभी नहीं पा सकेगा (इसे क्यूँ पापों में लगा के गवा रहा है? यही समय है, इन पापों से) मुक्ति प्राप्त करने का। कोई इलाज कर ले। आपको नानक कहता है, तरस-रूप परमात्मा के गुण गा के संसार समुंद्र पार हो जा। 2। 9। 251।
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी असटपदीआ महला 1 गउड़ी गुआरेरी सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥ परमात्मा का निर्मल नाम मेरे वास्ते (आत्मिक) खजाना है। परमातमा के गुणों की विचार ही मेरे वास्ते रिद्धियां (-सिद्धियां) हैं। अब मुझे परमात्मा हर जगह व्यापक दिखाई दे रहा है, मैंने माया के जहर को (अपने अंदर से) मार लिया है। (उस मति की बरकति से) पवित्र हरी नाम में लीन रहने से मेरी अंदर की खिझ समाप्त हो गई है
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(ये भूला हुआ मन) वेद-पुराण (आदि धर्म-पुस्तकों और) संत जनों के उपदेश सुन के (भी) रत्ती भर समय के लिए भी परमात्मा के गुण नहीं गाता।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।