इकसु दुहु चहु किआ गणी सभ इकतु सादि मुठी ॥
इकु अधु नाइ रसीअड़ा का विरली जाइ वुठी ॥3॥
भगत सचे दरि सोहदे अनद करहि दिन राति ॥
रंगि रते परमेसरै जन नानक तिन बलि जात ॥4॥1॥169॥
दुख भंजनु तेरा नामु जी दुख भंजनु तेरा नामु ॥
आठ पहर आराधीऐ पूरन सतिगुर गिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
जितु घटि वसै पारब्रहमु सोई सुहावा थाउ ॥
जम कंकरु नेड़ि न आवई रसना हरि गुण गाउ ॥1॥
सेवा सुरति न जाणीआ ना जापै आराधि ॥
ओट तेरी जगजीवना मेरे ठाकुर अगम अगाधि ॥2॥
भए क्रिपाल गुसाईआ नठे सोग संताप ॥
तती वाउ न लगई सतिगुरि रखे आपि ॥3॥
गुरु नाराइणु दयु गुरु गुरु सचा सिरजणहारु ॥
गुरि तुठै सभ किछु पाइआ जन नानक सद बलिहार ॥4॥2॥170॥
हरि राम राम राम रामा ॥
जपि पूरन होए कामा ॥1॥ रहाउ ॥
राम गोबिंद जपेदिआ होआ मुखु पवित्रु ॥
हरि जसु सुणीऐ जिस ते सोई भाई मित्रु ॥1॥
सभि पदारथ सभि फला सरब गुणा जिसु माहि ॥
किउ गोबिंदु मनहु विसारीऐ जिसु सिमरत दुख जाहि ॥2॥
जिसु लड़ि लगिऐ जीवीऐ भवजलु पईऐ पारि ॥
मिलि साधू संगि उधारु होइ मुख ऊजल दरबारि ॥3॥
जीवन रूप गोपाल जसु संत जना की रासि ॥
नानक उबरे नामु जपि दरि सचै साबासि ॥4॥3॥171॥
मीठे हरि गुण गाउ जिंदू तूं मीठे हरि गुण गाउ ॥
सचे सेती रतिआ मिलिआ निथावे थाउ ॥1॥ रहाउ ॥
होरि साद सभि फिकिआ तनु मनु फिका होइ ॥
विणु परमेसर जो करे फिटु सु जीवणु सोइ ॥1॥
अंचलु गहि कै साध का तरणा इहु संसारु ॥
पारब्रहमु आराधीऐ उधरै सभ परवारु ॥2॥
साजनु बंधु सुमित्रु सो हरि नामु हिरदै देइ ॥
अउगण सभि मिटाइ कै परउपकारु करेइ ॥3॥
मालु खजाना थेहु घरु हरि के चरण निधान ॥
नानकु जाचकु दरि तेरै प्रभ तुधनो मंगै दानु ॥4॥4॥172॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर जीव ऐसा कोई मूर्ख लोभी है कि (ऐसी) कही हुई बात बिल्कुल नहीं सुनता।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।