Lulla Family

अंग २१८ · गउड़ी

अंग
218
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. कोई जि मूरखु लोभीआ मूलि न सुणी कहिआ ॥2॥
  2. दुख भंजनु तेरा नामु जी दुख भंजनु तेरा नामु ॥
  3. हरि राम राम राम रामा ॥
  4. मीठे हरि गुण गाउ जिंदू तूं मीठे हरि गुण गाउ ॥

कोई जि मूरखु लोभीआ मूलि न सुणी कहिआ ॥2॥

अंग २१७ से चला आ रहा अंश

कोई जि मूरखु लोभीआ मूलि न सुणी कहिआ ॥2॥
इकसु दुहु चहु किआ गणी सभ इकतु सादि मुठी ॥
इकु अधु नाइ रसीअड़ा का विरली जाइ वुठी ॥3॥
भगत सचे दरि सोहदे अनद करहि दिन राति ॥
रंगि रते परमेसरै जन नानक तिन बलि जात ॥4॥1॥169॥

हिन्दी अर्थ: पर जीव ऐसा कोई मूर्ख लोभी है कि (ऐसी) कही हुई बात बिल्कुल नहीं सुनता। 2। (हे भाई !) मैं किसी एक की, दो या चार की क्या बात बताऊँ? सारी ही सृष्टि एक ही स्वाद में ठॅगी जा रही है। कोई विरला मनुष्य परमातमा के नाम में रस लेने वाला है, कोई एक-आध हृदय-स्थल ही कृपा पात्र मिलता है। 3। (हे भाई !) परमात्मा की भक्ति करने वाले लोग सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर शोभा पाते हैं, और दिन रात आत्मिक आनंद का लुत्फ लेते हैं। हे दास नानक ! (कह, जो मनुष्य) परमेश्वर के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं, मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। 4। 1। 169।

दुख भंजनु तेरा नामु जी दुख भंजनु तेरा नामु ॥

गउड़ी महला 5 मांझ ॥
दुख भंजनु तेरा नामु जी दुख भंजनु तेरा नामु ॥
आठ पहर आराधीऐ पूरन सतिगुर गिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
जितु घटि वसै पारब्रहमु सोई सुहावा थाउ ॥
जम कंकरु नेड़ि न आवई रसना हरि गुण गाउ ॥1॥
सेवा सुरति न जाणीआ ना जापै आराधि ॥
ओट तेरी जगजीवना मेरे ठाकुर अगम अगाधि ॥2॥
भए क्रिपाल गुसाईआ नठे सोग संताप ॥
तती वाउ न लगई सतिगुरि रखे आपि ॥3॥
गुरु नाराइणु दयु गुरु गुरु सचा सिरजणहारु ॥
गुरि तुठै सभ किछु पाइआ जन नानक सद बलिहार ॥4॥2॥170॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 मांझ ॥ हे प्रभू ! आपका नाम दुखों का नाश करने वाला है, आपका नाम दुखों का नाश करने वाला है। (हे भाई !) ये नाम आठों पहर सिमरना चाहिए- पूरे सतिगुरू का यही उपदेश है जो परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल सकता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस हृदय में परमात्मा आ बसता है, वही हृदय-स्थल सुंदर बन जाता है। जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा के गुण गाता है, जमदूत उसके पास नहीं फटकता (उसे मौत का डर नहीं छू सकता)। 1। मैंने (अब तक) आपकी सेवा-भक्ति की सूझ की कद्र ना जानी, मुझे आपके नाम की आराधना करनी नहीं सूझी, (पर अब) मैंने आपका आसरा लिया है, हे जगत की जिंदगी के आसरे ! हे मेरे पालनहार मालिक ! हे अपहुँच प्रभू ! हे अथाह प्रभू ! । 2। (हे भाई !) सृष्टि के मालिक प्रभू जिस मनुष्य पर मेहरवान होते हैं, उसके सारे फिक्र और कलेश मिट जाते हैं। जिस मनुष्य की गुरू ने स्वयं रक्षा की, उसे (सोग-संताप आदि का) सेक नहीं लगता। 3। (हे भाई !) गुरू नारायण का रूप है, गुरू सब पर दया करने वाले प्रभू का स्वरूप है। गुरू उस करतार का रूप है जो सदा कायम रहने वाला है। अगर गुरू प्रसन्न हो जाए तो सब कुछ प्राप्त हो जाता है। हे दास नानक ! (कह) मैं गुरू से सदके हूँ। 4। 2। 170।

हरि राम राम राम रामा ॥

गउड़ी माझ महला 5 ॥
हरि राम राम राम रामा ॥
जपि पूरन होए कामा ॥1॥ रहाउ ॥
राम गोबिंद जपेदिआ होआ मुखु पवित्रु ॥
हरि जसु सुणीऐ जिस ते सोई भाई मित्रु ॥1॥
सभि पदारथ सभि फला सरब गुणा जिसु माहि ॥
किउ गोबिंदु मनहु विसारीऐ जिसु सिमरत दुख जाहि ॥2॥
जिसु लड़ि लगिऐ जीवीऐ भवजलु पईऐ पारि ॥
मिलि साधू संगि उधारु होइ मुख ऊजल दरबारि ॥3॥
जीवन रूप गोपाल जसु संत जना की रासि ॥
नानक उबरे नामु जपि दरि सचै साबासि ॥4॥3॥171॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माझ महला 5 ॥ (हे भाई !) सदा परमात्मा का नाम जप के सारे काम सफल हो जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) राम राम गोबिंद गोबिंद जपते हुए मुंह पवित्र हो जाता है। (दुनिया में) वही मनुष्य (असल) भाई है, (असल) मित्र है, जिससे परमात्मा की सिफत सालाह सुनी जाए। 1। जिसके वश में (दुनिया के) सारे पदार्थ, सारे फल और सारे आत्मिक गुण हैं (हे भाई !) उस गोबिंद को अपने मन से कभी भुलाना नहीं चाहिए, जिसका सिमरन करने से सारे दुख दूर हो जाते हैं। 2। (हे भाई !उस गोबिंद को अपने मन से कभी भी भुलाना नहीं चाहिए) जिसका आसरा लेने से आत्मिक जीवन मिल जाता है, संसार समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। गुरू की संगति में मिल के (जिसका सिमरन करने से विकारों से) बचाव हो जाता है और प्रभू की हजूरी में सुर्खरू हो जाते हैं। 3। हे नानक ! गोपाल प्रभू की सिफत सालाह आत्मिक जीवन देने वाली है, प्रभू की सिफत सालाह संत जनों के वास्ते राशि (सरमाया) है। प्रभू का नाम जप के (संत जन विकारों से) बच निकलते हैं, और सदा स्थिर प्रभू के दर पर से शाबाश हासिल करते हैं। 4। 3। 171।

मीठे हरि गुण गाउ जिंदू तूं मीठे हरि गुण गाउ ॥

गउड़ी माझ महला 5 ॥
मीठे हरि गुण गाउ जिंदू तूं मीठे हरि गुण गाउ ॥
सचे सेती रतिआ मिलिआ निथावे थाउ ॥1॥ रहाउ ॥
होरि साद सभि फिकिआ तनु मनु फिका होइ ॥
विणु परमेसर जो करे फिटु सु जीवणु सोइ ॥1॥
अंचलु गहि कै साध का तरणा इहु संसारु ॥
पारब्रहमु आराधीऐ उधरै सभ परवारु ॥2॥
साजनु बंधु सुमित्रु सो हरि नामु हिरदै देइ ॥
अउगण सभि मिटाइ कै परउपकारु करेइ ॥3॥
मालु खजाना थेहु घरु हरि के चरण निधान ॥
नानकु जाचकु दरि तेरै प्रभ तुधनो मंगै दानु ॥4॥4॥172॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माझ महला 5 ॥ हे मेरी जिंदे ! आप हरी के प्यारे लगने वाले गुण गाती रहा कर। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ रंगे रहने से उस मनुष्य को भी (हर जगह) आदर मिल जाता है, जिसे पहले कोई जगह नहीं मिलती। 1। रहाउ। (हे मेरी जिंदे ! हरी के मीठे गुणों के मुकाबले दुनिया के) सारे स्वाद फीके हैं। (इन स्वादों में पड़ने से) शरीर (हरेक ज्ञानेंद्रिय) फीकी (रूखी) हो जाती है, मन खुश्क हो जाता है। परमेश्वर का नाम जपने से वंचित होकर मनुष्य जो कुछ भी करता है, उससे जिंदगी धिक्कारयोग्य हो जाती है। 1। (हे मेरी जिंदे !) गुरू का पल्ला पकड़ के इस संसार (-समुंद्र) से पार लांघ सकते हैं। (हे जिंदे !) परमात्मा की आराधना करनी चाहिए। (जो मनुष्य आराधना करता है, उसका) सारा परिवार (संसार समुंद्र के विकारों की लहरों में से) बच निकलता है। 2। (हे मेरी जिंदे !) जो गुरमुख परमात्मा का नाम हृदय में (बसाने के लिए) देता है, वही असल सज्जन है, वही असल संबंधी है, वही असली मित्र है, (क्योंकि वह हमारे अंदर से) सारे अवगुण दूर करके (हमारी) भलाई करता है। 3। (हे मेरी जिंदे !) परमात्मा के चरण ही (सारे पदार्थों के) खजाने हैं (जीव के साथ निभने वाला) माल है, खजाना है (जीव के वास्ते असली) बसेरा व घर है। हे प्रभू ! (आपके दर का) मंगता नानक आपके दर पर आपके नाम-दान के तौर पर मांगता है। 4। 4। 172।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २१८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English