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अंग 217

अंग
217
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भ्रमु भउ काटि कीए निरवैरे जीउ ॥
गुर मन की आस पूराई जीउ ॥4॥
जिनि नाउ पाइआ सो धनवंता जीउ ॥
जिनि प्रभु धिआइआ सु सोभावंता जीउ ॥
जिसु साधू संगति तिसु सभ सुकरणी जीउ ॥
जन नानक सहजि समाई जीउ ॥5॥1॥166॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गुरू (उनके अंदर से माया की) भटकना दूर करके (हरेक किस्म का मलीन) डर दूर कर के उन मनुष्यों को निर्वेर बना देता है। हे गुरू ! तूने ही मेरे मन की भी (सिमरन की) आस पूरी की है। 4। हे दास नानक ! (कह) जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम धन ढूँढ लिया, वह धनाढ बन गया। जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम सिमरन किया वह (लोक परलोक में) शोभा वाला हो गया। जिस मनुष्य को गुरू की संगति मिल गई, उसकी सारी करनी श्रेष्ठ बन गई। उस मनुष्य को आत्मिक अडोलता में लीनता प्राप्त हो गई। 5। 1। 166।
गउड़ी महला 5 माझ ॥
आउ हमारै राम पिआरे जीउ ॥
रैणि दिनसु सासि सासि चितारे जीउ ॥
संत देउ संदेसा पै चरणारे जीउ ॥
तुधु बिनु कितु बिधि तरीऐ जीउ ॥1॥
संगि तुमारै मै करे अनंदा जीउ ॥
वणि तिणि त्रिभवणि सुख परमानंदा जीउ ॥
सेज सुहावी इहु मनु बिगसंदा जीउ ॥
पेखि दरसनु इहु सुखु लहीऐ जीउ ॥2॥
चरण पखारि करी नित सेवा जीउ ॥
पूजा अरचा बंदन देवा जीउ ॥
दासनि दासु नामु जपि लेवा जीउ ॥
बिनउ ठाकुर पहि कहीऐ जीउ ॥3॥
इछ पुंनी मेरी मनु तनु हरिआ जीउ ॥
दरसन पेखत सभ दुख परहरिआ जीउ ॥
हरि हरि नामु जपे जपि तरिआ जीउ ॥
इहु अजरु नानक सुखु सहीऐ जीउ ॥4॥2॥167॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 माझ ॥ हे मेरे प्यारे राम जी ! मेरे हृदय घर में आ बस। मैं रात दिन हरेक सांस के साथ आपको याद करता हूँ। (आपके) संत जनों के चरणों में पड़ कर मैं (आपके को) संदेश भेजता हूँ (कि, हे मेरे प्यारे राम जी !) मैं आपके बगैर किसी तरह भी (इस संसार समुंद्र को) पार नहीं लांघ सकता। 1। (हे मेरे प्यारे राम जी !) आपकी संगति में रह के मैं आनंद लेता हूँ। सारी बनस्पति में और तीन भवनों वाले संसार में (आपको देख के) मैं परम सुख परम आनंद (अनुभव करता हूँ)। मेरे हृदय की सेज सुंदर बन गई है, मेरा ये मन खिल गया है। (हे मेरे प्यारे राम जी !) आपका दर्शन करके ये (आत्मिक) सुख मिलता है। 2। (हे मेरे राम जी ! मेहर कर, मैं आपके संत जनों के) चरण धो के उनकी सदा सेवा करता रहूँ- यही मेरे वास्ते देव-पूजा है, यही मेरे लिए देवताओं के लिए फूल भेट है और यही देवताओं के आगे नमस्कार है मुझे अपने दासों का दास बना ले जिससे में नाम जप प्राप्त कर सकूं (हे मेरे प्यारे राम जी ! आपके संत जनों के पास मैं विनती करता हूँ कि) मालिक प्रभू के पास मेरी ये विनती कहना । 3। (हे भाई ! प्यारे राम की किरपा से) मेरी (उससे मिलाप की) अभिलाषा पूरी हो गई है, मेरा मन आत्मिक जीवन वाला हो गया है, मेरा शरीर (भाव, हरेक ज्ञानेंद्रिय) हरा हो गया है, (प्यारे राम का) दर्शन करके मेरा सारा दुख दूर हो गया है, प्यारे राम जी का नाम जप जप के मैंने (संसार-समुंद्र को) पार कर लिया है। हे नानक ! (उस प्यारे राम जी का दर्शन करने से) ये एक ऐसा सुख पा लेते हैं जो कभी कम होने वाला नहीं। 4। 2। 167।
गउड़ी माझ महला 5 ॥
सुणि सुणि साजन मन मित पिआरे जीउ ॥
मनु तनु तेरा इहु जीउ भि वारे जीउ ॥
विसरु नाही प्रभ प्राण अधारे जीउ ॥
सदा तेरी सरणाई जीउ ॥1॥
जिसु मिलिऐ मनु जीवै भाई जीउ ॥
गुर परसादी सो हरि हरि पाई जीउ ॥
सभ किछु प्रभ का प्रभ कीआ जाई जीउ ॥
प्रभ कउ सद बलि जाई जीउ ॥2॥
एहु निधानु जपै वडभागी जीउ ॥
नाम निरंजन एक लिव लागी जीउ ॥
गुरु पूरा पाइआ सभु दुखु मिटाइआ जीउ ॥
आठ पहर गुण गाइआ जीउ ॥3॥
रतन पदारथ हरि नामु तुमारा जीउ ॥
तूं सचा साहु भगतु वणजारा जीउ ॥
हरि धनु रासि सचु वापारा जीउ ॥
जन नानक सद बलिहारा जीउ ॥4॥3॥168॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 माझ ॥ हे मेरे प्यारे सज्जन प्रभू ! हे मेरे मन के मित्र प्रभू ! (मेरी विनती) ध्यान से सुन। (मेरा ये) मन आपका दिया हुआ है, मेरी ये जीवात्मा भी आपकी ही दी हुई है। मैं (ये सब कुछ आप पर से) कुर्बान करता हूँ। मुझे भूलना नहीं, हे मेरी जिंद के आसरे प्रभू ! मैं सदा आपकी शरण पड़ा रहूँ। 1। हे भाई ! जिस हरी प्रभू को मिलने से आत्मिक जीवन प्राप्त हो जाता है, वह हरी प्रभू गुरू की किरपा से ही मिल सकता है। (हे भाई ! मेरा मन तन) सब कुछ प्रभू का ही दिया हुआ है, (जगत की) सभी जगहें प्रभू की ही हैं। मैं सदा उस प्रभू से ही सदके जाता हूँ। 2। (हे भाई ! परमात्मा का) ये (नाम सारे पदार्थों का) खजाना (है, कोई) भाग्यशाली मनुष्य ही ये नाम जपता है। पवित्र स्वरूप प्रभू के नाम से (उस भाग्यशाली मनुष्य की लगन लग जाती है, जिस भाग्यशाली मनुष्य को) पूरा गुरू मिल जाता है, वह हरेक किस्म का दुख दूर कर लेता है, वह आठों पहर परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाता रहता है। 3। (हे मेरे प्यारे सज्जन प्रभू ! हे हरी ! आपका नाम कीमती पदार्थों का श्रोत) है। हे हरी ! आप सदा कायम रहने वाला (उन रत्न पदार्थों का) शाहूकार है, आपका भक्त उन रत्न पदार्थों का व्यापार करने वाला है। हे हरी ! आपका नाम-धन (आपके भक्तों का) सरमाया है, आपका भक्त यही सदा स्थिर रहने वाला वणज करता है। हे दास नानक ! (कह, हे हरी !) मैं (आपसे और आपके भक्त से) सदा कुर्बान जाता हूँ। 4। 3। 168।
रागु गउड़ी माझ महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं मेरा बहु माणु करते तूं मेरा बहु माणु ॥
जोरि तुमारै सुखि वसा सचु सबदु नीसाणु ॥1॥ रहाउ ॥
सभे गला जातीआ सुणि कै चुप कीआ ॥
कद ही सुरति न लधीआ माइआ मोहड़िआ ॥1॥
देइ बुझारत सारता से अखी डिठड़िआ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी माझ महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे करतार !आप मेरे वास्ते गर्व वाली जगह है, आप मेरा मान है। हे करतार ! आपके बल पर मैं सुखी बसता हूँ, आपकी सदा स्थिर सिफत सालाह की बाणी (मेरे जीवन सफर में मेरे वास्ते) राहदारी है। 1। रहाउ। हे करतार ! माया में मोहित जीव पदार्थों की सारी बातें सुन के समझता भी है, फिर भी परवाह नहीं करता, और कभी भी (परमार्थ की तरफ) ध्यान नहीं देता। 1। अगर कोई गुरमुखि कोई इशारा अथवा संकेत देता भी है (कि यहां सदा स्थिर नहीं रहना, फिर) ये बातें आँखों से भी देख लेते हैं (कि सब चले जा रहे हैं)

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू (उनके अंदर से माया की) भटकना दूर करके (हरेक किस्म का मलीन) डर दूर कर के उन मनुष्यों को निर्वेर बना देता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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