Lulla Family

अंग २१५ · गउड़ी

अंग
215
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. मानु अभिमानु दोऊ समाने मसतकु डारि गुर पागिओ ॥
  2. पाइआ लालु रतनु मनि पाइआ ॥
  3. उबरत राजा राम की सरणी ॥
  4. मो कउ इह बिधि को समझावै ॥

मानु अभिमानु दोऊ समाने मसतकु डारि गुर पागिओ ॥

अंग २१४ से चला आ रहा अंश

मानु अभिमानु दोऊ समाने मसतकु डारि गुर पागिओ ॥
संपत हरखु न आपत दूखा रंगु ठाकुरै लागिओ ॥1॥
बास बासरी एकै सुआमी उदिआन द्रिसटागिओ ॥
निरभउ भए संत भ्रमु डारिओ पूरन सरबागिओ ॥2॥
जो किछु करतै कारणु कीनो मनि बुरो न लागिओ ॥
साधसंगति परसादि संतन कै सोइओ मनु जागिओ ॥3॥
जन नानक ओड़ि तुहारी परिओ आइओ सरणागिओ ॥
नाम रंग सहज रस माणे फिरि दूखु न लागिओ ॥4॥2॥160॥

हिन्दी अर्थ: हे बहिन ! कोई मेरा आदर करे, कोई मेरे साथ घमण्डियों वाला सलूक करे, मुझे दोनों एक ही जैसे प्रतीत होते हैं। (क्यूँकि) मैंने अपना माथा (सिर) गुरू के चरणों में रख दिया है। (गुरू की किरपा से मेरे मन में) परमात्मा का प्यार बन चुका है। अब मुझे आए धन की खुशी नहीं होती, और आई बिपता से दुख प्रतीत नहीं होता। 1। हे बहिन ! अब मुझे सब घरों में एक मालिक प्रभू ही दिखता है, जंगलों में भी मुझे वही नजर । गुरू संत (की किरपा से) मैंने भटकना समाप्त कर ली है, अब सबके दिल की जानने वाला प्रभू ही मुझे सर्व-व्यापक दिखता है और मैं निडर हो गया हूँ। 2। (हे बहिन ! जब भी) जो भी सबॅब ईश्वर ने बनाया (अब मुझे अपने) मन में (वह) बुरा नहीं लगता। साध-संगति में आ के संत जनों की किरपा से (माया के मोह में) सोया हुआ (मेरा) मन जाग उठा है। 3। हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !गुरू की कृपा से) मैं आपकी ओट में आ पड़ा हूँ, मैं आपकी शरण में आ गिरा हूँ। अब मुझे कोई दुख नहीं सताता। मैं आपके नाम का आनंद ले रहा हूँ मैं आत्मिक अडोलता के सुख माण रहा हूँ। 4। 2। 160।

पाइआ लालु रतनु मनि पाइआ ॥

गउड़ी माला महला 5 ॥
पाइआ लालु रतनु मनि पाइआ ॥
तनु सीतलु मनु सीतलु थीआ सतगुर सबदि समाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
लाथी भूख त्रिसन सभ लाथी चिंता सगल बिसारी ॥
करु मसतकि गुरि पूरै धरिओ मनु जीतो जगु सारी ॥1॥
त्रिपति अघाइ रहे रिद अंतरि डोलन ते अब चूके ॥
अखुटु खजाना सतिगुरि दीआ तोटि नही रे मूके ॥2॥
अचरजु एकु सुनहु रे भाई गुरि ऐसी बूझ बुझाई ॥
लाहि परदा ठाकुरु जउ भेटिओ तउ बिसरी ताति पराई ॥3॥
कहिओ न जाई एहु अचंभउ सो जानै जिनि चाखिआ ॥
कहु नानक सच भए बिगासा गुरि निधानु रिदै लै राखिआ ॥4॥3॥161॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला 5 ॥ (हे भाई ! मैंने अपने) मन में एक लाल ढूँढ लिया है। मैं गुरू के शबद में लीन हो गया हूँ। मेरा शरीर (हरेक ज्ञानेंद्रियां) शांत हो गई हैं, मेरा मन ठंडा हो गया है। 1। रहाउ। (मेरी माया की) भूख उतर गई है। मेरी माया की सारी प्यास खत्म हो गई है, मैंने सारे चिंता-फिक्र भुला दिए हैं। (हे भाई !) पूरे गुरू ने (मेरे) माथे पर (अपना) हाथ रखा है (उसकी बरकति से मैंने अपना) मन काबू में कर लिया है।(मानो) मैंने सारा जगत जीत लिया है 1। (हे भाई ! माया की तरफ से मेरे अंदर की भूख) तृप्त हो गई है, मैं (माया की ओर से अपने) दिल में अघा चुका हूँ। (अब माया की खातिर) डोलने से मैं हट गया हूँ। हे भाई ! सतिगुरू ने मुझे (प्रभू नाम का एक ऐसा) खजाना दिया है जो कभी खत्म होने वाला नहीं। ना ही उसमें कमी आ सकती है, ना ही वह खत्म होने वाला है। 2। हे भाई ! एक और अनोखी बात सुनो।गुरू ने मुझे ऐसी समझ बख्श दी है (जिसकी बरकति से) जब से (मेरे अंदर से अहंकार का) परदा उतार के मुझे ठाकुर प्रभू मिला है, तब से (मेरे दिल में से) पराई ईष्या बिसर गई है। 3। हे भाई ! ये एक ऐसा आश्चर्यजनक आनंद है जो बयान नहीं किया जा सकता। इस रस को वही जानता है जिसने ये चखा है। हे नानक ! कह, गुरू ने (मेरे अंदर परमात्मा के नाम का खजाना ला के रख दिया है, और मेरे अंदर उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा (के ज्ञान) का प्रकाश हो गया है। 4। 3। 161।

उबरत राजा राम की सरणी ॥

गउड़ी माला महला 5 ॥
उबरत राजा राम की सरणी ॥
सरब लोक माइआ के मंडल गिरि गिरि परते धरणी ॥1॥ रहाउ ॥
सासत सिंम्रिति बेद बीचारे महा पुरखन इउ कहिआ ॥
बिनु हरि भजन नाही निसतारा सूखु न किनहूं लहिआ ॥1॥
तीनि भवन की लखमी जोरी बूझत नाही लहरे ॥
बिनु हरि भगति कहा थिति पावै फिरतो पहरे पहरे ॥2॥
अनिक बिलास करत मन मोहन पूरन होत न कामा ॥
जलतो जलतो कबहू न बूझत सगल ब्रिथे बिनु नामा ॥3॥
हरि का नामु जपहु मेरे मीता इहै सार सुखु पूरा ॥
साधसंगति जनम मरणु निवारै नानक जन की धूरा ॥4॥4॥162॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला 5 ॥ (हे भाई !) प्रभू-पातशाह के शरन पड़ के ही मनुष्य (माया के प्रभाव से) बच सकता है। मात लोक, पाताल लोक और आकाश लोक -इन सब लोकों के जीव माया के चक्कर में फंसे पड़े हैं, (माया के प्रभाव के कारण जीव उच्च आत्मिक मण्डल से) गिर गिर के निम्न आत्मिक दशा में आ पड़ते हैं। 1। (पण्डित लोग तो) शास्त्रों-स्मृतियों-वेद (आदि सारे धर्म पुस्तकों को) विचारते आ रहे हैं। पर महापुरुषों ने तो यही कहा है कि परमात्मा के भजन के बिना (माया के समुंद्र से) पार नहीं हुआ जा सकता, (सिमरन के बिना) किसी मनुष्य ने भी सुख नहीं पाया। 1। (हे भाई !) अगर मनुष्य सारी सृष्टि की ही माया एकत्र कर ले, तो भी लोभ की लहरें मिटती नहीं हैं। (इतनी माया जोड़ जोड़ के भी) परमात्मा की भक्ति के बिना मनुष्य कहीं भी मन का टिकाव नहीं ढूँढ सकता, हर समय ही (माया की खातिर) भटकता फिरता है। 2। (हे भाई !) मनुष्य मन को मोहने वाली अनेकों मौजें भी करता रहे, (पर, मन की विकारों वाली) वासना पूरी नहीं होती। मनुष्य तृष्णा की आग में जलता फिरता है, तृष्णा की आग कभी बुझती नहीं। परमात्मा के नाम के बिना मनुष्य के अन्य सभी उद्यम व्यर्थ चले जाते हैं। 3। हे मेरे मित्र ! परमात्मा का नाम जपा कर, यही सब से श्रेष्ठ सुख है, और इस सुख में कोई कमी नहीं रह जाती। जो मनुष्य साध-संगति में आ के अपना जनम मरण (का चक्र) खत्म कर लेता है, नानक उस मनुष्य के चरणों की धूड़ (मांगता) है। 4। 4। 162।

मो कउ इह बिधि को समझावै ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

गउड़ी माला महला 5 ॥
मो कउ इह बिधि को समझावै ॥
करता होइ जनावै ॥1॥ रहाउ ॥
अनजानत किछु इनहि कमानो जप तप कछू न साधा ॥
दह दिसि लै इहु मनु दउराइओ कवन करम करि बाधा ॥1॥
मन तन धन भूमि का ठाकुरु हउ इस का इहु मेरा ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला 5 ॥ (हे भाई !) और कौन मुझे इस तरह समझ सकता है? (वही गुरमुख) समझ सकता है (जो) करतार का रूप हो जाए। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू के बिना और कोई नहीं समझ सकता कि) अज्ञानता में फंस के इस जीव ने सिमरन नहीं किया और विकारों को रोकने का प्रयास नहीं किया, कुछ अन्य ही (कोझे, बेमतलब काम) किए हैं। ये जीव अपने इस मन को दसों दिशाओं में भगा रहा है। ये कौन से कर्मों के कारण (माया के मोह में) बंधा हुआ है?। 1। (मोह में फस के जीव हर समय यही कहता है) मैं अपनी जीवात्मा का, शरीर का, धन का, धरती का मालिक हूँ, मैं इस (धन आदि) का मालिक हूँ, ये धन आदिक मेरा है। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २१५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English