Lulla Family

अंग 215

अंग
215
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मानु अभिमानु दोऊ समाने मसतकु डारि गुर पागिओ ॥
संपत हरखु न आपत दूखा रंगु ठाकुरै लागिओ ॥1॥
बास बासरी एकै सुआमी उदिआन द्रिसटागिओ ॥
निरभउ भए संत भ्रमु डारिओ पूरन सरबागिओ ॥2॥
जो किछु करतै कारणु कीनो मनि बुरो न लागिओ ॥
साधसंगति परसादि संतन कै सोइओ मनु जागिओ ॥3॥
जन नानक ओड़ि तुहारी परिओ आइओ सरणागिओ ॥
नाम रंग सहज रस माणे फिरि दूखु न लागिओ ॥4॥2॥160॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे बहिन ! कोई मेरा आदर करे, कोई मेरे साथ घमण्डियों वाला सलूक करे, मुझे दोनों एक ही जैसे प्रतीत होते हैं। (क्यूँकि) मैंने अपना माथा (सिर) गुरू के चरणों में रख दिया है। (गुरू की किरपा से मेरे मन में) परमात्मा का प्यार बन चुका है। अब मुझे आए धन की खुशी नहीं होती, और आई बिपता से दुख प्रतीत नहीं होता। 1। हे बहिन ! अब मुझे सब घरों में एक मालिक प्रभू ही दिखता है, जंगलों में भी मुझे वही नजर । गुरू संत (की किरपा से) मैंने भटकना समाप्त कर ली है, अब सबके दिल की जानने वाला प्रभू ही मुझे सर्व-व्यापक दिखता है और मैं निडर हो गया हूँ। 2। (हे बहिन ! जब भी) जो भी सबॅब ईश्वर ने बनाया (अब मुझे अपने) मन में (वह) बुरा नहीं लगता। साध-संगति में आ के संत जनों की किरपा से (माया के मोह में) सोया हुआ (मेरा) मन जाग उठा है। 3। हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !गुरू की कृपा से) मैं आपकी ओट में आ पड़ा हूँ, मैं आपकी शरण में आ गिरा हूँ। अब मुझे कोई दुख नहीं सताता। मैं आपके नाम का आनंद ले रहा हूँ मैं आत्मिक अडोलता के सुख माण रहा हूँ। 4। 2। 160।
गउड़ी माला महला 5 ॥
पाइआ लालु रतनु मनि पाइआ ॥
तनु सीतलु मनु सीतलु थीआ सतगुर सबदि समाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
लाथी भूख त्रिसन सभ लाथी चिंता सगल बिसारी ॥
करु मसतकि गुरि पूरै धरिओ मनु जीतो जगु सारी ॥1॥
त्रिपति अघाइ रहे रिद अंतरि डोलन ते अब चूके ॥
अखुटु खजाना सतिगुरि दीआ तोटि नही रे मूके ॥2॥
अचरजु एकु सुनहु रे भाई गुरि ऐसी बूझ बुझाई ॥
लाहि परदा ठाकुरु जउ भेटिओ तउ बिसरी ताति पराई ॥3॥
कहिओ न जाई एहु अचंभउ सो जानै जिनि चाखिआ ॥
कहु नानक सच भए बिगासा गुरि निधानु रिदै लै राखिआ ॥4॥3॥161॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला 5 ॥ (हे भाई ! मैंने अपने) मन में एक लाल ढूँढ लिया है। मैं गुरू के शबद में लीन हो गया हूँ। मेरा शरीर (हरेक ज्ञानेंद्रियां) शांत हो गई हैं, मेरा मन ठंडा हो गया है। 1। रहाउ। (मेरी माया की) भूख उतर गई है। मेरी माया की सारी प्यास खत्म हो गई है, मैंने सारे चिंता-फिक्र भुला दिए हैं। (हे भाई !) पूरे गुरू ने (मेरे) माथे पर (अपना) हाथ रखा है (उसकी बरकति से मैंने अपना) मन काबू में कर लिया है।(मानो) मैंने सारा जगत जीत लिया है 1। (हे भाई ! माया की तरफ से मेरे अंदर की भूख) तृप्त हो गई है, मैं (माया की ओर से अपने) दिल में अघा चुका हूँ। (अब माया की खातिर) डोलने से मैं हट गया हूँ। हे भाई ! सतिगुरू ने मुझे (प्रभू नाम का एक ऐसा) खजाना दिया है जो कभी खत्म होने वाला नहीं। ना ही उसमें कमी आ सकती है, ना ही वह खत्म होने वाला है। 2। हे भाई ! एक और अनोखी बात सुनो।गुरू ने मुझे ऐसी समझ बख्श दी है (जिसकी बरकति से) जब से (मेरे अंदर से अहंकार का) परदा उतार के मुझे ठाकुर प्रभू मिला है, तब से (मेरे दिल में से) पराई ईष्या बिसर गई है। 3। हे भाई ! ये एक ऐसा आश्चर्यजनक आनंद है जो बयान नहीं किया जा सकता। इस रस को वही जानता है जिसने ये चखा है। हे नानक ! कह, गुरू ने (मेरे अंदर परमात्मा के नाम का खजाना ला के रख दिया है, और मेरे अंदर उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा (के ज्ञान) का प्रकाश हो गया है। 4। 3। 161।
गउड़ी माला महला 5 ॥
उबरत राजा राम की सरणी ॥
सरब लोक माइआ के मंडल गिरि गिरि परते धरणी ॥1॥ रहाउ ॥
सासत सिंम्रिति बेद बीचारे महा पुरखन इउ कहिआ ॥
बिनु हरि भजन नाही निसतारा सूखु न किनहूं लहिआ ॥1॥
तीनि भवन की लखमी जोरी बूझत नाही लहरे ॥
बिनु हरि भगति कहा थिति पावै फिरतो पहरे पहरे ॥2॥
अनिक बिलास करत मन मोहन पूरन होत न कामा ॥
जलतो जलतो कबहू न बूझत सगल ब्रिथे बिनु नामा ॥3॥
हरि का नामु जपहु मेरे मीता इहै सार सुखु पूरा ॥
साधसंगति जनम मरणु निवारै नानक जन की धूरा ॥4॥4॥162॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला 5 ॥ (हे भाई !) प्रभू-पातशाह के शरन पड़ के ही मनुष्य (माया के प्रभाव से) बच सकता है। मात लोक, पाताल लोक और आकाश लोक -इन सब लोकों के जीव माया के चक्कर में फंसे पड़े हैं, (माया के प्रभाव के कारण जीव उच्च आत्मिक मण्डल से) गिर गिर के निम्न आत्मिक दशा में आ पड़ते हैं। 1। (पण्डित लोग तो) शास्त्रों-स्मृतियों-वेद (आदि सारे धर्म पुस्तकों को) विचारते आ रहे हैं। पर महापुरुषों ने तो यही कहा है कि परमात्मा के भजन के बिना (माया के समुंद्र से) पार नहीं हुआ जा सकता, (सिमरन के बिना) किसी मनुष्य ने भी सुख नहीं पाया। 1। (हे भाई !) अगर मनुष्य सारी सृष्टि की ही माया एकत्र कर ले, तो भी लोभ की लहरें मिटती नहीं हैं। (इतनी माया जोड़ जोड़ के भी) परमात्मा की भक्ति के बिना मनुष्य कहीं भी मन का टिकाव नहीं ढूँढ सकता, हर समय ही (माया की खातिर) भटकता फिरता है। 2। (हे भाई !) मनुष्य मन को मोहने वाली अनेकों मौजें भी करता रहे, (पर, मन की विकारों वाली) वासना पूरी नहीं होती। मनुष्य तृष्णा की आग में जलता फिरता है, तृष्णा की आग कभी बुझती नहीं। परमात्मा के नाम के बिना मनुष्य के अन्य सभी उद्यम व्यर्थ चले जाते हैं। 3। हे मेरे मित्र ! परमात्मा का नाम जपा कर, यही सब से श्रेष्ठ सुख है, और इस सुख में कोई कमी नहीं रह जाती। जो मनुष्य साध-संगति में आ के अपना जनम मरण (का चक्र) खत्म कर लेता है, नानक उस मनुष्य के चरणों की धूड़ (मांगता) है। 4। 4। 162।
गउड़ी माला महला 5 ॥
मो कउ इह बिधि को समझावै ॥
करता होइ जनावै ॥1॥ रहाउ ॥
अनजानत किछु इनहि कमानो जप तप कछू न साधा ॥
दह दिसि लै इहु मनु दउराइओ कवन करम करि बाधा ॥1॥
मन तन धन भूमि का ठाकुरु हउ इस का इहु मेरा ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला 5 ॥ (हे भाई !) और कौन मुझे इस तरह समझ सकता है? (वही गुरमुख) समझ सकता है (जो) करतार का रूप हो जाए। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू के बिना और कोई नहीं समझ सकता कि) अज्ञानता में फंस के इस जीव ने सिमरन नहीं किया और विकारों को रोकने का प्रयास नहीं किया, कुछ अन्य ही (कोझे, बेमतलब काम) किए हैं। ये जीव अपने इस मन को दसों दिशाओं में भगा रहा है। ये कौन से कर्मों के कारण (माया के मोह में) बंधा हुआ है?। 1। (मोह में फस के जीव हर समय यही कहता है) मैं अपनी जीवात्मा का, शरीर का, धन का, धरती का मालिक हूँ, मैं इस (धन आदि) का मालिक हूँ, ये धन आदिक मेरा है। 2।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे बहिन ! कोई मेरा आदर करे, कोई मेरे साथ घमण्डियों वाला सलूक करे, मुझे दोनों एक ही जैसे प्रतीत होते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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