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अंग २१२ · गउड़ी

अंग
212
गउड़ी
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  1. जा कउ बिसरै राम नाम ताहू कउ पीर ॥
  2. गरबु बडो मूलु इतनो ॥
  3. मोहि दासरो ठाकुर को ॥
  4. है कोई ऐसा हउमै तोरै ॥
  5. चिंतामणि करुणा मए ॥1॥ रहाउ ॥
  6. मेरे मन सरणि प्रभू सुख पाए ॥

जा कउ बिसरै राम नाम ताहू कउ पीर ॥

गउड़ी महला 5 ॥
जा कउ बिसरै राम नाम ताहू कउ पीर ॥
साधसंगति मिलि हरि रवहि से गुणी गहीर ॥1॥ रहाउ ॥
जा कउ गुरमुखि रिदै बुधि ॥
ता कै कर तल नव निधि सिधि ॥1॥
जो जानहि हरि प्रभ धनी ॥
किछु नाही ता कै कमी ॥2॥
करणैहारु पछानिआ ॥
सरब सूख रंग माणिआ ॥3॥
हरि धनु जा कै ग्रिहि वसै ॥
कहु नानक तिन संगि दुखु नसै ॥4॥9॥147॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम भूल जाता है उसे ही दुख आ घेरता है। जो मनुष्य साध-संगति में बैठ के परमात्मा का नाम सिमरते हैं, वह गुणों के मालिक बन जाते हैं, वह गहरे जिगरे वाले बन जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर जिस मनुष्य के हृदय में (सिमरन की) सूझ पैदा हो जाती है, उस मनुष्य के हाथों की तलियों पर नौ खजाने और सारी सिद्धियां (आ टिकती हैं)। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य (सब खजानों के) मालिक हरी प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं, उनके घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं रहती। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने सिरजनहार करतार के साथ मेल-जोल बना लिया, वह आत्मिक सुख और आनंद भोगता है। 3। हे नानक ! कह, जिन मनुष्यों के हृदय-घर में परमात्मा का नाम धन आ बसता है, उनकी संगति में रहने से हर किस्म के दुख दूर हो जाते हैं। 4। 9। 147।

गरबु बडो मूलु इतनो ॥

गउड़ी महला 5 ॥
गरबु बडो मूलु इतनो ॥
रहनु नही गहु कितनो ॥1॥ रहाउ ॥
बेबरजत बेद संतना उआहू सिउ रे हितनो ॥
हार जूआर जूआ बिधे इंद्री वसि लै जितनो ॥1॥
हरन भरन संपूरना चरन कमल रंगि रितनो ॥
नानक उधरे साधसंगि किरपा निधि मै दितनो ॥2॥10॥148॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे जीव ! आपको (अपने आप का) अहंकार तो बहुत है, पर (इस अहंकार का) मूल (मेरा अपना विक्त) थोड़ा सा ही है। (इस संसार में आपका सदा के लिए) ठिकाना नहीं है, पर आपकी माया के वास्ते कशिश बहुत ज्यादा है। 1। रहाउ। हे जीव ! (जिस माया के मोह से) वेद आदिक धार्मिक पुस्तकें विवर्जित (रोकती) करती हैं, उससे आपका प्यार बना रहता है। आप जीवन बाजी हार रहे हैं जैसे जूए में जुआरी हारता है। इंद्रियों (काम वासना आदि) ने अपने वश में ले कर आपको जीता हुआ है। 1। हे जीव ! सब जीवों के नाश करने वाले और पालने वाले परमात्मा के सुंदर चरणों के प्रेम में (टिकने) से आप वंचित हैं। हे नानक ! (कह, जो मनुष्य) साध-संगति में (जुड़ते हैं वह माया के मोह से) बच जाते हैं। कृपा के खजाने परमात्मा ने (अपनी कृपा करके) मुझे (नानक को अपने चरणों के प्यार की दाति) दी है। 2। 10। 148।

मोहि दासरो ठाकुर को ॥

गउड़ी महला 5 ॥
मोहि दासरो ठाकुर को ॥
धानु प्रभ का खाना ॥1॥ रहाउ ॥
ऐसो है रे खसमु हमारा ॥
खिन महि साजि सवारणहारा ॥1॥
कामु करी जे ठाकुर भावा ॥
गीत चरित प्रभ के गुन गावा ॥2॥
सरणि परिओ ठाकुर वजीरा ॥
तिना देखि मेरा मनु धीरा ॥3॥
एक टेक एको आधारा ॥
जन नानक हरि की लागा कारा ॥4॥11॥149॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ पालनहार प्रभू का मैं एक निमाणा सा सेवक हूँ, मैं उसी प्रभू का दिया हुआ अन्न ही खाता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! मेरा पति प्रभू ऐसा है कि एक छिन में रचना रच के उसे सुंदर बनाने की स्मर्था रखता है। 1। (हे भाई !मैं ठाकुर प्रभू का दिया हुआ खाता हूँ) अगर उस ठाकुर प्रभू की किरपा मुझ पर हो, तो मैं (उस का ही) काम करूँ, उसके गुण गाता रहूँ, उसी के सिफत सालाह के गीत गुनगुनाता रहूँ। 2। (हे भाई !) मैं उस ठाकुर प्रभू के वजीरों (संत जनों) की शरण आ पड़ा हूँ, उनका दर्शन करके मेरे मन को भी हौसला बन रहा है (कि मैं उस मालिक की सिफत सालाह कर सकूँगां)। 3। हे दास नानक ! (कह, ठाकुर के वजीरों की शरण पड़ कर) मैंने एक परमात्मा को ही (अपने जीवन का) ओट-आसरा बनाया है, और परमातमा (की सिफत सालाह) के काम में लगा हुआ हूँ। 4। 11। 149।

है कोई ऐसा हउमै तोरै ॥

गउड़ी महला 5 ॥
है कोई ऐसा हउमै तोरै ॥
इसु मीठी ते इहु मनु होरै ॥1॥ रहाउ ॥
अगिआनी मानुखु भइआ जो नाही सो लोरै ॥
रैणि अंधारी कारीआ कवन जुगति जितु भोरै ॥1॥
भ्रमतो भ्रमतो हारिआ अनिक बिधी करि टोरै ॥
कहु नानक किरपा भई साधसंगति निधि मोरै ॥2॥12॥150॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) कहीं कोई ऐसा मनुष्य भी मिल जाएगा जो (मेरे) इस मन को इस मीठी (लगने वाली माया के मोह) को रोक सके?। 1। (हे भाई !इस मिठाई के असर में) मनुष्य अपनी अक्ल गवा बैठा है (क्योंकि) जो (सदा साथ निभने वाली) नहीं है उसी को तलाशता फिरता है। (मनुष्य के मन में माया के मोह की) काली अंधियारी रात बनी हुई है। (हे भाई !) वह कौन सा तरीका हो सकता है जिससे (इसके अंदर ज्ञान का) दिन चढ़ जाए?। 1। हे नानक ! कह, (मीठी माया के मोह से मन को रोक सकने वाले की) अनेकों ढंग-तरीकों से तलाश करता-करता और भटकता-भटकता मैं थक गया। (तब प्रभू की मुझ पर) मेहर हुई (अब) साध-संगति ही मेरे वास्ते (उनके सारे गुणों का) खजाना है (जिनकी बरकति से मीठी माया के मोह से मन रुक सकता है)। 2। 12। 150।

चिंतामणि करुणा मए ॥1॥ रहाउ ॥

गउड़ी महला 5 ॥
चिंतामणि करुणा मए ॥1॥ रहाउ ॥
दीन दइआला पारब्रहम ॥
जा कै सिमरणि सुख भए ॥1॥
अकाल पुरख अगाधि बोध ॥
सुनत जसो कोटि अघ खए ॥2॥
किरपा निधि प्रभ मइआ धारि ॥ नानक हरि हरि नाम लए ॥3॥13॥151॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे तरस-रूप प्रभू ! आप ही ऐसे रत्न हैं जो सब जीवों की चितवी हुई कामनाएँ पूरी करने वाले हैं। 1। रहाउ। हे पारब्रहम प्रभू ! आप गरीबों पर दया करने वाले हैं (आप ऐसे हैं) जिसके सिमरन की बरकति से सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं। 1। हे अकाल-पुरख ! आपके स्वरूप की समझ जीवों की अक्ल से परे है, आपकी सिफत सालाह सुनने से करोड़ों पाप नाश हो जाते हैं। 2। हे नानक ! (अरदास कर और कह) हे किरपा के खजाने प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप तरस करते हैं, वह आपका हरि नाम सिमरता है। ३।१३।१५१।

मेरे मन सरणि प्रभू सुख पाए ॥

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गउड़ी पूरबी महला 5 ॥
मेरे मन सरणि प्रभू सुख पाए ॥
जा दिनि बिसरै प्रान सुखदाता सो दिनु जात अजाए ॥1॥ रहाउ ॥
एक रैण के पाहुन तुम आए बहु जुग आस बधाए ॥
ग्रिह मंदर संपै जो दीसै जिउ तरवर की छाए ॥1॥
तनु मेरा संपै सभ मेरी बाग मिलख सभ जाए ॥
देवनहारा बिसरिओ ठाकुरु खिन महि होत पराए ॥2॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे मेरे मन ! जो मनुष्य प्रभू की शरण पड़ता है, वह आत्मिक आनंद पाता है। जिस दिन जिंद का दाता सुखों का देने वाला (प्रभू) जीव को बिसर जाता है, (उसका) वह दिन व्यर्थ चला जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) आप एक रात (कहीं सफर में) गुजारने वाले मेहमान की तरह (जगत में) आए हैं पर यहां कई युग जीते रहने की उम्मीदें बाँध रहे हैं। (हे भाई !) ये घर-महल, धन-पदार्थ - जो कुछ दिख रहा है, ये सभ वृक्ष की छाया की तरह है (सदा साथ नहीं निभाता)। 1। ये शरीर मेरा है, ये धन-पदार्थ सारा मेरा है, ये बाग मेरे हैं, ये जमीनें मेरी हैं, ये सारे स्थान मेरे हैं, (हे भाई ! इस ममता में फंस के मनुष्य को ये सब कुछ) देने वाला परमात्मा ठाकुर भूल जाता है (और, ये सारे ही पदार्थ) एक छिन में पराए हो जाते हैं (इस तरह आखिर खाली हाथ चल पड़ता है)। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २१२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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