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अंग 210

अंग
210
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु गउड़ी पूरबी महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि कबहू न मनहु बिसारे ॥
ईहा ऊहा सरब सुखदाता सगल घटा प्रतिपारे ॥1॥ रहाउ ॥
महा कसट काटै खिन भीतरि रसना नामु चितारे ॥
सीतल सांति सूख हरि सरणी जलती अगनि निवारे ॥1॥
गरभ कुंड नरक ते राखै भवजलु पारि उतारे ॥
चरन कमल आराधत मन महि जम की त्रास बिदारे ॥2॥
पूरन पारब्रहम परमेसुर ऊचा अगम अपारे ॥
गुण गावत धिआवत सुख सागर जूए जनमु न हारे ॥3॥
कामि क्रोधि लोभि मोहि मनु लीनो निरगुण के दातारे ॥
करि किरपा अपुनो नामु दीजै नानक सद बलिहारे ॥4॥1॥138॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) कभी भी परमात्मा को अपने मन से ना विसार। वह परमात्मा इस लोक में और परलोक में, सब जीवों को सुख देने वाला है, और सारे शरीरों की पालना करने वाला है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य अपनी) जीभ से उस परमात्मा का नाम याद करता है, उस मनुष्य के वह (प्रभू) बड़े बड़े कष्ट एक छिन में दूर कर देता है। जो मनुष्य उस हरी की शरण पड़ते हैं, उनके अंदर से वह हरी (तृष्णा की) जल रही अग्नि को बुझा देता है, वे (विकारों की आग की तपश से बच के) ठण्डक पाते हैं, उनके अंदर शांति और आनंद ही आनंद बन जाते हैं। 1। (हे भाई !) परमात्मा माँ के पेट के नर्क-कुण्ड से बचा लेता है, परमात्मा के सुंदर चरण मन में आराधने से, मौत का सहम दूर कर देता है। 2। (हे भाई !) परमात्मा सर्व-व्यापक है, सब से ऊँचा मालिक है, अपहुँच है, बेअंत है, उस सुखों के समुंद्र प्रभू के गुण गाने और नाम आराधने से मनुष्य अपना मानस जन्म व्यर्थ नही गवा के जाता। 3। हे नानक ! (अरदास कर और कह) हे (मैं) गुण हीन के दातार ! मेरा मन काम में, क्रोध में, लोभ में, मोह में फंसा पड़ा है। मेहर कर, मुझे अपना नाम बख्श। मैं आपसे सदा कुर्बान जाता हूँ। 4। 1। 138।
रागु गउड़ी चेती महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुखु नाही रे हरि भगति बिना ॥
जीति जनमु इहु रतनु अमोलकु साधसंगति जपि इक खिना ॥1॥ रहाउ ॥
सुत संपति बनिता बिनोद ॥ छोडि गए बहु लोग भोग ॥1॥
हैवर गैवर राज रंग ॥
तिआगि चलिओ है मूड़ नंग ॥2॥
चोआ चंदन देह फूलिआ ॥
सो तनु धर संगि रूलिआ ॥3॥
मोहि मोहिआ जानै दूरि है ॥
कहु नानक सदा हदूरि है ॥4॥1॥139॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी चेती महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) परमात्मा की भक्ति के बिना (और किसी तरीके से) सुख नहीं मिल सकता। (इस वास्ते) साध-संगति में मिल के परमात्मा का नाम जप और इस मानस जन्म की बाजी जीत ले। ये (मानस जन्म) ऐसा रत्न है जिसकी कीमत नहीं पाई जा सकती (जो किसी मूल्य से नहीं मिल सकती)। 1। रहाउ। (हे भाई !) पुत्र, धन, पदार्थ, स्त्री के लाड-प्यार – अनेकों लोग ऐसे मौज मेले छोड़ के यहां से चले गए (और चले जाएंगे)। 1। (हे भाई !) बढ़िया घोड़े, बढ़िया हाथी और हकूमत की मौजें- मूर्ख मनुष्य इनको छोड़ के (आखिर) नंगा ही (यहां से) चल पड़ता है। 2। (हे भाई !मनुष्य अपने) शरीर को इत्र और चंदन (आदि लगा के) मान करता है (पर ये नहीं समझता कि) वह शरीर (आखिर) मिट्टी में मिल जाना है। 3। (हे भाई !माया के) मोह में फंसा मनुष्य समझता है (कि परमात्मा कहीं) दूर बसता है। (पर) हे नानक ! कह, परमात्मा सदा (हरेक जीव के) अंग-संग बसता है। 4। 1। 139।
गउड़ी महला 5 ॥
मन धर तरबे हरि नाम नो ॥
सागर लहरि संसा संसारु गुरु बोहिथु पार गरामनो ॥1॥ रहाउ ॥
कलि कालख अंधिआरीआ ॥
गुर गिआन दीपक उजिआरीआ ॥1॥
बिखु बिखिआ पसरी अति घनी ॥
उबरे जपि जपि हरि गुनी ॥2॥
मतवारो माइआ सोइआ ॥
गुर भेटत भ्रमु भउ खोइआ ॥3॥
कहु नानक एकु धिआइआ ॥
घटि घटि नदरी आइआ ॥4॥2॥140॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे मन ! परमात्मा का नाम (संसार समुंद्र से) पार लंघाने के लिए आसरा है। ये संसार सहिम फिक्रों की लहरों से भरा हुआ समुंद्र है। गुरू जहाज है जो इसमें से पार लंघाने के स्मर्थ है। 1। रहाउ। (हे भाई ! दुनिया की खातिर) झगड़े-बखेड़े (एक ऐसी) कालिख है (जो मनुष्य के मन में मोह का) अंधकार पैदा करती है। गुरू का ज्ञान दीपक है जो (मन में उच्च आत्मिक जीवन का) प्रकाश पैदा करता है। 1। (हे भाई !) माया (के मोह) का जहर (जगत में) बहुत गहरा बिखरा हुआ है। परमात्मा के गुणों को याद कर करके ही (मनुष्य इस जहर की मार से) बच सकते हैं। 2। (हे भाई !) माया में मस्त हुआ मनुष्य (मोह की नींद में) सोया रहता है, पर गुरू को मिलने से (मनुष्य की माया की खातिर) भटकना और (दुनिया का) सहम-डर दूर कर लेता है। 3। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य ने एक परमात्मा का ध्यान धरा है, उसे परमात्मा हरेक शरीर में बसता दिखाई देने लगा है। 4। 2। 140।
गउड़ी महला 5 ॥
दीबानु हमारो तुही एक ॥
सेवा थारी गुरहि टेक ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक जुगति नही पाइआ ॥
गुरि चाकर लै लाइआ ॥1॥
मारे पंच बिखादीआ ॥
गुर किरपा ते दलु साधिआ ॥2॥
बखसीस वजहु मिलि एकु नाम ॥
सूख सहज आनंद बिस्राम ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे प्रभू ! सिर्फ आप ही मेरा आसरा है। गुरू की ओट ले कर मैं आपकी ही सेवा भक्ति करता हूँ। 1। रहाउ। हे प्रभू ! (विभिन्न) अनेकों ढंगों से मैं तूझे नहीं ढूँढ सका। (अब) गुरू ने (मेहर करके मुझे) आपका चाकर बना के (आपके चरणों में) लगा दिया है। 1। (हे प्रभू !अब मैंने कामादिक) पाँचों झगड़ालू वैरी मार डाले हैं, गुरू की मेहर से मैंने (इन पाँचों की) फौज काबू कर ली है। 2। (हे प्रभू ! जिस मनुष्य को) सिर्फ आपका नाम बख्शिश के तौर पर मिल जाता है, उसके अंदर आत्मिक अडोलता के सुख आनंद बस पड़ते हैं।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु गउड़ी पूरबी महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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