ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि कबहू न मनहु बिसारे ॥
ईहा ऊहा सरब सुखदाता सगल घटा प्रतिपारे ॥1॥ रहाउ ॥
महा कसट काटै खिन भीतरि रसना नामु चितारे ॥
सीतल सांति सूख हरि सरणी जलती अगनि निवारे ॥1॥
गरभ कुंड नरक ते राखै भवजलु पारि उतारे ॥
चरन कमल आराधत मन महि जम की त्रास बिदारे ॥2॥
पूरन पारब्रहम परमेसुर ऊचा अगम अपारे ॥
गुण गावत धिआवत सुख सागर जूए जनमु न हारे ॥3॥
कामि क्रोधि लोभि मोहि मनु लीनो निरगुण के दातारे ॥
करि किरपा अपुनो नामु दीजै नानक सद बलिहारे ॥4॥1॥138॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुखु नाही रे हरि भगति बिना ॥
जीति जनमु इहु रतनु अमोलकु साधसंगति जपि इक खिना ॥1॥ रहाउ ॥
सुत संपति बनिता बिनोद ॥ छोडि गए बहु लोग भोग ॥1॥
हैवर गैवर राज रंग ॥
तिआगि चलिओ है मूड़ नंग ॥2॥
चोआ चंदन देह फूलिआ ॥
सो तनु धर संगि रूलिआ ॥3॥
मोहि मोहिआ जानै दूरि है ॥
कहु नानक सदा हदूरि है ॥4॥1॥139॥
मन धर तरबे हरि नाम नो ॥
सागर लहरि संसा संसारु गुरु बोहिथु पार गरामनो ॥1॥ रहाउ ॥
कलि कालख अंधिआरीआ ॥
गुर गिआन दीपक उजिआरीआ ॥1॥
बिखु बिखिआ पसरी अति घनी ॥
उबरे जपि जपि हरि गुनी ॥2॥
मतवारो माइआ सोइआ ॥
गुर भेटत भ्रमु भउ खोइआ ॥3॥
कहु नानक एकु धिआइआ ॥
घटि घटि नदरी आइआ ॥4॥2॥140॥
दीबानु हमारो तुही एक ॥
सेवा थारी गुरहि टेक ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक जुगति नही पाइआ ॥
गुरि चाकर लै लाइआ ॥1॥
मारे पंच बिखादीआ ॥
गुर किरपा ते दलु साधिआ ॥2॥
बखसीस वजहु मिलि एकु नाम ॥
सूख सहज आनंद बिस्राम ॥3॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु गउड़ी पूरबी महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।