तुम हरि सेती राते संतहु ॥
निबाहि लेहु मो कउ पुरख बिधाते ओड़ि पहुचावहु दाते ॥1॥ रहाउ ॥
तुमरा मरमु तुमा ही जानिआ तुम पूरन पुरख बिधाते ॥
राखहु सरणि अनाथ दीन कउ करहु हमारी गाते ॥1॥
तरण सागर बोहिथ चरण तुमारे तुम जानहु अपुनी भाते ॥
करि किरपा जिसु राखहु संगे ते ते पारि पराते ॥2॥
ईत ऊत प्रभ तुम समरथा सभु किछु तुमरै हाथे ॥
ऐसा निधानु देहु मो कउ हरि जन चलै हमारै साथे ॥3॥
निरगुनीआरे कउ गुनु कीजै हरि नामु मेरा मनु जापे ॥
संत प्रसादि नानक हरि भेटे मन तन सीतल ध्रापे ॥4॥14॥135॥
सहजि समाइओ देव ॥
मो कउ सतिगुर भए दइआल देव ॥1॥ रहाउ ॥
काटि जेवरी कीओ दासरो संतन टहलाइओ ॥
एक नाम को थीओ पूजारी मो कउ अचरजु गुरहि दिखाइओ ॥1॥
भइओ प्रगासु सरब उजीआरा गुर गिआनु मनहि प्रगटाइओ ॥
अंम्रितु नामु पीओ मनु त्रिपतिआ अनभै ठहराइओ ॥2॥
मानि आगिआ सरब सुख पाए दूखह ठाउ गवाइओ ॥
जउ सुप्रसंन भए प्रभ ठाकुर सभु आनद रूपु दिखाइओ ॥3॥
ना किछु आवत ना किछु जावत सभु खेलु कीओ हरि राइओ ॥
कहु नानक अगम अगम है ठाकुर भगत टेक हरि नाइओ ॥4॥15॥136॥
पारब्रहम पूरन परमेसुर मन ता की ओट गहीजै रे ॥
जिनि धारे ब्रहमंड खंड हरि ता को नामु जपीजै रे ॥1॥ रहाउ ॥
मन की मति तिआगहु हरि जन हुकमु बूझि सुखु पाईऐ रे ॥
जो प्रभु करै सोई भल मानहु सुखि दुखि ओही धिआईऐ रे ॥1॥
कोटि पतित उधारे खिन महि करते बार न लागै रे ॥
दीन दरद दुख भंजन सुआमी जिसु भावै तिसहि निवाजै रे ॥2॥
सभ को मात पिता प्रतिपालक जीअ प्रान सुख सागरु रे ॥
देंदे तोटि नाही तिसु करते पूरि रहिओ रतनागरु रे ॥3॥
जाचिकु जाचै नामु तेरा सुआमी घट घट अंतरि सोई रे ॥
नानकु दासु ता की सरणाई जा ते ब्रिथा न कोई रे ॥4॥16॥137॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी महला 5 ॥ हे संत जनो ! (आप भाग्यशाली हैं कि) आप परमात्मा के साथ रंगे हुए हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।