गउड़ी महला 5 ॥ जोग जुगति सुनि आइओ गुर ते ॥ मो कउ सतिगुर सबदि बुझाइओ ॥1॥ रहाउ ॥ नउ खंड प्रिथमी इसु तन महि रविआ निमख निमख नमसकारा ॥ दीखिआ गुर की मुंद्रा कानी द्रिड़िओ एकु निरंकारा ॥1॥ पंच चेले मिलि भए इकत्रा एकसु कै वसि कीए ॥ दस बैरागनि आगिआकारी तब निरमल जोगी थीए ॥2॥ भरमु जराइ चराई बिभूता पंथु एकु करि पेखिआ ॥ सहज सूख सो कीनी भुगता जो ठाकुरि मसतकि लेखिआ ॥3॥ जह भउ नाही तहा आसनु बाधिओ सिंगी अनहत बानी ॥ ततु बीचारु डंडा करि राखिओ जुगति नामु मनि भानी ॥4॥ ऐसा जोगी वडभागी भेटै माइआ के बंधन काटै ॥ सेवा पूज करउ तिसु मूरति की नानकु तिसु पग चाटै ॥5॥11॥132॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ मैं गुरू से असल योग का तरीका सुन के आया हूँ। (हे भाई !) मुझे सतिगुरू के शबद ने (परमात्मा से मिलाप की युक्ति) समझा दी है।1। रहाउ। (हे भाई !) मैं पल पल उस परमात्मा को नमस्कार करता रहता हूँ, जो इस मानस शरीर में ही मौजूद है (यही है मेरे वास्ते जोगियों वाला) सारी धरती (का रटन)। मैंने अपने गुरू का उपदेश अपने हृदय में दृढ़ कर लिया है (यही मेरे वास्ते) कानों की मुंद्रा (जो जोगी लोग पहनते हैं) मैं एक निरंकार को सदा अपने हृदय में बसाता हे1। (हे भाई ! गुरू के उपदेश की बरकति से) मेरी पाँचों ज्ञानेंद्रियां (दुनिया के पदार्थों की तरफ भटकने की जगह) मिल के इकट्ठी हो गई हैं। (भटकने से हट गए हैं), ये सारे एक ऊँची सुरति के अधीन हो गए हैं। (गुरू के उपदेश से जब से) विकारों से विरक्त हो के मेरी इंद्रियां (ऊूंची मति की) आज्ञा में चलने लग पड़ी हैं, तब से मैं पवित्र जीवन वाला जोगी बन गया हूँ। 2। (हे भाई ! मन की) भटकन को जला के (ये) राख मैंने (अपने शरीर पर) लगा ली है, मैं एक परमात्मा को ही सारे संसार में व्यापक देखता हूँ – ये है मेरा जोग पंथ। (हे भाई !) मैंने उस आत्मिक अडोलता के आनंद को (अपनी आत्मिक खुराक वास्ते जोगियों के भण्डारे वाला) चूरमा बनाया है, जिसकी प्राप्ति ठाकुर प्रभू ने मेरे माथे पर लिख दी। 3। (हे भाई !) मैं परमात्मा के सिफत सालाह की एक रस सिंगी बजा रहा हूँ। (इसकी बरकति से) मैंने उस आत्मिक अवस्था में अपना आसन जमाया हुआ है जहाँ (दुनिया वाला) कोई डर मुझे छू नहीं सकता। (हे भाई !) जगत के मूल-प्रभू (के गुणों) को विचारते रहना- इसे (जोगियों वाला) डण्डा बना के मैंने अपने पास रखा हुआ है। (परमात्मा के) नाम (को सिमरते रहना बस ! यही जोगी की) जुगति मेरे मन को भा रही है। (हे भाई !) ऐसी (जुगति निभाने वाला) जोगी (जिस मनुष्य को) बड़े भाग्यों से मिल जाता है, वह उसके माया के (मोह के) सारे बंधन काट देता है। मैं भी परमात्मा-के-रूप ऐसे जोगी की सेवा करता हूँ, पूजा करता हूँ। नानक ऐसे जोगी के पैर परसता है। 5। 11। 132।
गउड़ी महला 5 ॥ अनूप पदारथु नामु सुनहु सगल धिआइले मीता ॥ हरि अउखधु जा कउ गुरि दीआ ता के निरमल चीता ॥1॥ रहाउ ॥ अंधकारु मिटिओ तिह तन ते गुरि सबदि दीपकु परगासा ॥ भ्रम की जाली ता की काटी जा कउ साधसंगति बिस्वासा ॥1॥ तारीले भवजलु तारू बिखड़ा बोहिथ साधू संगा ॥ पूरन होई मन की आसा गुरु भेटिओ हरि रंगा ॥2॥ नाम खजाना भगती पाइआ मन तन त्रिपति अघाए ॥ नानक हरि जीउ ता कउ देवै जा कउ हुकमु मनाए ॥3॥12॥133॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे मित्रो ! सुनो, परमात्मा का नाम एक ऐसा पदार्थ है जिस जैसा और कोई नहीं। (इस वास्ते हे मित्रो !) सारे (इस नाम को) सिमरो। जिन्हें गुरू ने नाम औषधि दिया उनके चित्त (हरेक किस्म के विकारों की) मैल से साफ हो गए। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू ने (जिस मनुष्य के अंदर अपने) शबद के द्वारा (आत्मिक ज्ञान का) दीपक जला दिया, उसके हृदय में से (माया के मोह का) अंधकार दूर हो गया। (हे भाई !) साध-संगति में जिस मनुष्य की श्रद्धा बन गई, (गुरू ने) उस (के मन) का (माया की खातिर) भटकन का जाल काट दिया। 1। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने) गुरू की संगति रूपी जहाज का आसरा लिया, वह इस अथाह और मुश्किल संसार समुंद्र से पार लांघ गया। (हे भाई !) जिस मनुष्य को परमात्मा से प्यार करने वाला गुरू मिल गया, उसके मन की (हरेक) कामना पूरी हो गयी। 2। (हे भाई ! जिन) भक्त जनों ने परमात्मा के नाम का खजाना ढूँढ लिया, उनके मन माया की तरफ से तृप्त हो गए, उनके तन (हृदय माया की तरफ से) संतुष्ट हो गए। हे नानक ! (कह, ये नाम-खजाना) परमात्मा उनको ही देता है, जिन्हें प्रभू अपना हुकम मानने के लिए प्रेरणा देता है। 3। 12। 133।
गउड़ी महला 5 ॥ दइआ मइआ करि प्रानपति मोरे मोहि अनाथ सरणि प्रभ तोरी ॥ अंध कूप महि हाथ दे राखहु कछू सिआनप उकति न मोरी ॥1॥ रहाउ ॥ करन करावन सभ किछु तुम ही तुम समरथ नाही अन होरी ॥ तुमरी गति मिति तुम ही जानी से सेवक जिन भाग मथोरी ॥1॥ अपुने सेवक संगि तुम प्रभ राते ओति पोति भगतन संगि जोरी ॥ प्रिउ प्रिउ नामु तेरा दरसनु चाहै जैसे द्रिसटि ओह चंद चकोरी ॥2॥ राम संत महि भेदु किछु नाही एकु जनु कई महि लाख करोरी ॥ जा कै हीऐ प्रगटु प्रभु होआ अनदिनु कीरतनु रसन रमोरी ॥3॥ तुम समरथ अपार अति ऊचे सुखदाते प्रभ प्रान अधोरी ॥ नानक कउ प्रभ कीजै किरपा उन संतन कै संगि संगोरी ॥4॥13॥134॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे मेरी जीवात्मा के मालिक ! (मेरे पर) दया कर मेहर कर। हे प्रभू ! मैं अनाथ आपकी शरण आया हूँ। (मैं माया के मोह के अंधेरे कूएं में गिरा पड़ा हूँ, अपना) हाथ दे के मुझे (इस अंधेरे कूएं में से) बचा ले। मेरी कोई सियानप, कोई दलील (यहां) नहीं चल सकती। 1। रहाउ। हे मेरे प्रभू ! (सब जीवों में व्यापक हो के) आप खुद ही सब कुछ कर रहा है, आप स्वयं ही सब कुछ कर रहा है, आप हरेक ताकत का मालिक है, आपके बराबर का कोई और दूसरा नहीं। (हे प्रभू !) आप कैसा है, आप कितना बड़ा है – ये भेद आप खुद ही जानता है। जिन लोगों के माथे पर (आपकी बख्शिश के) भाग्य जागते हैं, वे आपके सेवक बन जाते हैं। 1। हे मेरे प्रभू ! आप अपने सेवकों से हमेशा प्यार करता है। अपने भक्तों की तूने अपनी प्रीति ऐसे जोड़ी हुई है जैसे ताणे-पेटे में धागे ओत-प्रोत मिले होते हैं, जैसे चकोर की निगाह चाँद की ओर ही रहती है, वही निगाह आपके भक्त की होती है। आपका भक्त आपको ‘प्यारा प्यारा’ कह कह के आपका नाम जपता है, और आपके दीदार की चाहत रखता है। 2। (हे भाई !) परमात्मा और परमात्मा के संत में कोई फर्क नहीं होता, पर ऐसा मनुष्य कई लाखों करोड़ों में कोई एक ही होता है। (हे भाई !) जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू अपना प्रकाश करता है, वह मनुष्य हर वक्त अपनी जीभ से प्रभू की सिफत सालाह उचारता रहता है। 3। हे मेरे प्रभू !हे मेरी जिंद के आसरे ! हे बेअंत ऊँचे ! हे सबको सुख देने वाले ! आप सब ताकतों का मालिक है। हे प्रभू ! मुझ नानक पर कृपा कर, मुझे उन संत जनों की संगति में स्थान दिए रख। 4। 13। 134।
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी महला 5 ॥ मैं गुरू से असल योग का तरीका सुन के आया हूँ।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।