अगम अगोचर प्रभ अबिनासी पूरे गुर ते जाते ॥2॥
भ्रमु भउ काटि कीए निहकेवल जब ते हउमै मारी ॥
जनम मरण को चूको सहसा साधसंगति दरसारी ॥3॥
चरण पखारि करउ गुर सेवा बारि जाउ लख बरीआ ॥
जिह प्रसादि इहु भउजलु तरिआ जन नानक प्रिअ संगि मिरीआ ॥4॥7॥128॥
तुझ बिनु कवनु रीझावै तोही ॥
तेरो रूपु सगल देखि मोही ॥1॥ रहाउ ॥
सुरग पइआल मिरत भूअ मंडल सरब समानो एकै ओही ॥
सिव सिव करत सगल कर जोरहि सरब मइआ ठाकुर तेरी दोही ॥1॥
पतित पावन ठाकुर नामु तुमरा सुखदाई निरमल सीतलोही ॥
गिआन धिआन नानक वडिआई संत तेरे सिउ गाल गलोही ॥2॥8॥129॥
मिलहु पिआरे जीआ ॥
प्रभ कीआ तुमारा थीआ ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक जनम बहु जोनी भ्रमिआ बहुरि बहुरि दुखु पाइआ ॥
तुमरी क्रिपा ते मानुख देह पाई है देहु दरसु हरि राइआ ॥1॥
सोई होआ जो तिसु भाणा अवरु न किन ही कीता ॥
तुमरै भाणै भरमि मोहि मोहिआ जागतु नाही सूता ॥2॥
बिनउ सुनहु तुम प्रानपति पिआरे किरपा निधि दइआला ॥
राखि लेहु पिता प्रभ मेरे अनाथह करि प्रतिपाला ॥3॥
जिस नो तुमहि दिखाइओ दरसनु साधसंगति कै पाछै ॥
करि किरपा धूरि देहु संतन की सुखु नानकु इहु बाछै ॥4॥9॥130॥
हउ ता कै बलिहारी ॥
जा कै केवल नामु अधारी ॥1॥ रहाउ ॥
महिमा ता की केतक गनीऐ जन पारब्रहम रंगि राते ॥
सूख सहज आनंद तिना संगि उन समसरि अवर न दाते ॥1॥
जगत उधारण सेई आए जो जन दरस पिआसा ॥
उन की सरणि परै सो तरिआ संतसंगि पूरन आसा ॥2॥
ता कै चरणि परउ ता जीवा जन कै संगि निहाला ॥
भगतन की रेणु होइ मनु मेरा होहु प्रभू किरपाला ॥3॥
राजु जोबनु अवध जो दीसै सभु किछु जुग महि घाटिआ ॥
नामु निधानु सद नवतनु निरमलु इहु नानक हरि धनु खाटिआ ॥4॥10॥131॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे गुणों के खजाने प्रभू ! हे सुख देने वाले प्रभू ! आपके रंग (खेल) वर्णन नहीं किये जा सकते हे अपहुँच प्रभू ! हे इन्द्रियों की पहुँच से परे प्रभू ! हे अविनाशी प्रभू ! पूरे गुरू के द्।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।