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अंग 207

अंग
207
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बरनि न साकउ तुमरे रंगा गुण निधान सुखदाते ॥
अगम अगोचर प्रभ अबिनासी पूरे गुर ते जाते ॥2॥
भ्रमु भउ काटि कीए निहकेवल जब ते हउमै मारी ॥
जनम मरण को चूको सहसा साधसंगति दरसारी ॥3॥
चरण पखारि करउ गुर सेवा बारि जाउ लख बरीआ ॥
जिह प्रसादि इहु भउजलु तरिआ जन नानक प्रिअ संगि मिरीआ ॥4॥7॥128॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे गुणों के खजाने प्रभू ! हे सुख देने वाले प्रभू ! आपके रंग (खेल) वर्णन नहीं किये जा सकते हे अपहुँच प्रभू ! हे इन्द्रियों की पहुँच से परे प्रभू ! हे अविनाशी प्रभू ! पूरे गुरू के द्वारा ही आपके साथ गहरी सांझ डल सकती है। 2। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं वे गुरू की शरण पड़ कर) जब से (अपने अंदर से अहंकार दूर करते हैं), गुरू उनकी भटकना व डर दूर करके उन्हें पवित्र जीवन वाला बना देता है। साध-संगति में (गुरू के) दर्शन की बरकति से उनके जनम मरण के चक्कर का सहम खत्म हो जाता है। 3। हे दास नानक ! (कह) मैं (गुरू के) चरण धो के गुरू की सेवा करता हूँ। मैं (गुरू से) लाखों बार कुर्बान जाता हूँ, क्योंकि उस (गुरू) की कृपा से ही इस संसार समुंद्र से पार लांघ सकते हैं और प्रीतम प्रभू (के चरणों) में जुड़ सकते हैं। 4। 7। 128।
गउड़ी महला 5 ॥
तुझ बिनु कवनु रीझावै तोही ॥
तेरो रूपु सगल देखि मोही ॥1॥ रहाउ ॥
सुरग पइआल मिरत भूअ मंडल सरब समानो एकै ओही ॥
सिव सिव करत सगल कर जोरहि सरब मइआ ठाकुर तेरी दोही ॥1॥
पतित पावन ठाकुर नामु तुमरा सुखदाई निरमल सीतलोही ॥
गिआन धिआन नानक वडिआई संत तेरे सिउ गाल गलोही ॥2॥8॥129॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ आपकी मेहर के बिना आपको कोई जीव प्रसन्न नहीं कर सकता। हे प्रभू !आपका (सुंदर सर्व-व्यापक) रूप देख के सारी सृष्टि मस्त हैं जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई !) स्वर्गलोक, पाताल लोक, मातृ लोक, सारा ब्रहमण्ड, सब में एक वह परमात्मा ही समाया हुआ है। हे सब पर दया करने वाले सबके ठाकुर सारे जीव आपको ‘सुखों का दाता’ कह कह के (आपके आगे) दोनों हाथ जोड़ते हैं, और आपके दर पर ही सहायता के लिए पुकार करते हैं। 1। हे ठाकुर ! आपका नाम है ‘विकारों में गिरे हुओं को पवित्र करने वाला’। आप सबको सुख देने वाला है, आप पवित्र हस्ती वाला है, आप शांति-स्वरूप है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) आपके संत जनों से आपकी सिफत सालाह की बातें ही (आपके सेवकों के वास्ते) ज्ञान-चर्चा है, समाधियां हैं, (लोक-परलोक की) इज्ज़त है। 2। 8। 129।
गउड़ी महला 5 ॥
मिलहु पिआरे जीआ ॥
प्रभ कीआ तुमारा थीआ ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक जनम बहु जोनी भ्रमिआ बहुरि बहुरि दुखु पाइआ ॥
तुमरी क्रिपा ते मानुख देह पाई है देहु दरसु हरि राइआ ॥1॥
सोई होआ जो तिसु भाणा अवरु न किन ही कीता ॥
तुमरै भाणै भरमि मोहि मोहिआ जागतु नाही सूता ॥2॥
बिनउ सुनहु तुम प्रानपति पिआरे किरपा निधि दइआला ॥
राखि लेहु पिता प्रभ मेरे अनाथह करि प्रतिपाला ॥3॥
जिस नो तुमहि दिखाइओ दरसनु साधसंगति कै पाछै ॥
करि किरपा धूरि देहु संतन की सुखु नानकु इहु बाछै ॥4॥9॥130॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे सब जीवों से प्यार करने वाले प्रभू !मुझे मिल। हे प्रभू ! (जगत में) आपका किया ही हैं रहा है (वही होता है जो आप करता है)। 1। रहाउ। हे प्रभू पातशाह ! (माया से ग्रसा हुआ जीव) अनेक जन्मों में बहुत जूनियों में भटकता चला आता है, (जनम मरन का) दुख मुड़ मुड़ के सहता है। आपकी मेहर से (इसने अब) मानव शरीर प्राप्त किया है (इसे अपना) दर्शन दे (और इसकी विकारों से रक्षा कर)। 1। हे भाई ! जगत में वही कुछ बीतता है, जो कुछ परमात्मा को पसंद आता है। कोई और जीव (उसकी रजा के उलट कुछ) नहीं कर सकता। हे प्रभू ! जीव आपकी रजा के अनुसार ही माया की भटकना में माया के मोह में फंसा रहता है, सदा मोह में सोया रहता है और इस नींद में से सुचेत नहीं होता। 2। हे मेरी जीवात्मा के पति ! हे प्यारे प्रभू ! हे कृपा के खजाने प्रभू ! हे दयालु प्रभू ! आप (मेरी) विनती सुन। हे मेरे पिता प्रभू ! अनाथ जीवों की पालना कर (इन्हे विकारों के हमलों से) बचा ले। 3। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को तूने अपना दर्शन दिया है, साध-संगति के आसरे रख के दिया है। (हे प्रभू ! आपका दास) नानक (आपके दर से) ये सुख मांगता है कि मुझे नानक को भी अपने संत जनों के चरणों की धूड़ बख्श। 4। 9। 130।
गउड़ी महला 5 ॥
हउ ता कै बलिहारी ॥
जा कै केवल नामु अधारी ॥1॥ रहाउ ॥
महिमा ता की केतक गनीऐ जन पारब्रहम रंगि राते ॥
सूख सहज आनंद तिना संगि उन समसरि अवर न दाते ॥1॥
जगत उधारण सेई आए जो जन दरस पिआसा ॥
उन की सरणि परै सो तरिआ संतसंगि पूरन आसा ॥2॥
ता कै चरणि परउ ता जीवा जन कै संगि निहाला ॥
भगतन की रेणु होइ मनु मेरा होहु प्रभू किरपाला ॥3॥
राजु जोबनु अवध जो दीसै सभु किछु जुग महि घाटिआ ॥
नामु निधानु सद नवतनु निरमलु इहु नानक हरि धनु खाटिआ ॥4॥10॥131॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) मैं उन (संत जनों) से सदके जाता हूँ जिनके हृदय में सिर्फ परमात्मा का नाम (ही जिंदगी का) आसरा है। 1। रहाउ। (हे भाई !) संत जन परमात्मा के प्यार-रंग में रंगे रहते हैं, उनके आत्मिक बड़प्पन का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। उनकी संगति में रहने से आत्मिक अडोलता के सुख आनंद प्राप्त होते हैं, उनके बराबर का और कोई दानी नहीं हो सकता। 1। (हे भाई !) जिन (संत) जनों को स्वयं परमात्मा की चाहत लगी रहे, वही जगत के जीवों को विकारों से बचाने आए समझो। उनकी शरण जो मनुष्य आ जाता है, वह संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। (हे भाई !) संत जनों की संगति में रहने से सब आशाएं पूरी हो जाती हैं। (हे भाई !) संत जनों की संगति में रहने से मन खिल उठता है। मैं तो जब संत जनों के चरणों में आ गिरता हूँ, मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है। हे प्रभू ! मेरे पर कृपालु हुआ रह (ता कि आपकी कृपा से) मेरा मन आपके संत जनों के चरणों की धूड़ बना रहे। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) हकूमत, जवानी, उम्र, जो कुछ भी जगत में (संभालने लायक) दिखाई देता है ये घटता ही जाता है। परमात्मा का नाम (ही एक ऐसा) खजाना (है जो) सदा नया रहता है, और है भी पवित्र (भाव, इस खजाने से मन बिगड़ने की बजाय पवित्र होता जाता है)। (संत जन) ये नाम-धन ही सदा कमाते रहते हैं। 4। 10। 131।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे गुणों के खजाने प्रभू ! हे सुख देने वाले प्रभू ! आपके रंग (खेल) वर्णन नहीं किये जा सकते हे अपहुँच प्रभू ! हे इन्द्रियों की पहुँच से परे प्रभू ! हे अविनाशी प्रभू ! पूरे गुरू के द्।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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