एक बात सुनि ताकी ओटा साधसंगि मिटि जाही ॥2॥
करि किरपा संत मिले मोहि तिन ते धीरजु पाइआ ॥
संती मंतु दीओ मोहि निरभउ गुर का सबदु कमाइआ ॥3॥
जीति लए ओइ महा बिखादी सहज सुहेली बाणी ॥
कहु नानक मनि भइआ परगासा पाइआ पदु निरबाणी ॥4॥4॥125॥
ओहु अबिनासी राइआ ॥
निरभउ संगि तुमारै बसते इहु डरनु कहा ते आइआ ॥1॥ रहाउ ॥
एक महलि तूं होहि अफारो एक महलि निमानो ॥
एक महलि तूं आपे आपे एक महलि गरीबानो ॥1॥
एक महलि तूं पंडितु बकता एक महलि खलु होता ॥
एक महलि तूं सभु किछु ग्राहजु एक महलि कछू न लेता ॥2॥
काठ की पुतरी कहा करै बपुरी खिलावनहारो जानै ॥
जैसा भेखु करावै बाजीगरु ओहु तैसो ही साजु आनै ॥3॥
अनिक कोठरी बहुतु भाति करीआ आपि होआ रखवारा ॥
जैसे महलि राखै तैसै रहना किआ इहु करै बिचारा ॥4॥
जिनि किछु कीआ सोई जानै जिनि इह सभ बिधि साजी ॥
कहु नानक अपरंपर सुआमी कीमति अपुने काजी ॥5॥5॥126॥
छोडि छोडि रे बिखिआ के रसूआ ॥
उरझि रहिओ रे बावर गावर जिउ किरखै हरिआइओ पसूआ ॥1॥ रहाउ ॥
जो जानहि तूं अपुने काजै सो संगि न चालै तेरै तसूआ ॥
नागो आइओ नाग सिधासी फेरि फिरिओ अरु कालि गरसूआ ॥1॥
पेखि पेखि रे कसुंभ की लीला राचि माचि तिनहूं लउ हसूआ ॥
छीजत डोरि दिनसु अरु रैनी जीअ को काजु न कीनो कछूआ ॥2॥
करत करत इव ही बिरधानो हारिओ उकते तनु खीनसूआ ॥
जिउ मोहिओ उनि मोहनी बाला उस ते घटै नाही रुच चसूआ ॥3॥
जगु ऐसा मोहि गुरहि दिखाइओ तउ सरणि परिओ तजि गरबसूआ ॥
मारगु प्रभ को संति बताइओ द्रिड़ी नानक दास भगति हरि जसूआ ॥4॥6॥127॥
तुझ बिनु कवनु हमारा ॥
मेरे प्रीतम प्रान अधारा ॥1॥ रहाउ ॥
अंतर की बिधि तुम ही जानी तुम ही सजन सुहेले ॥
सरब सुखा मै तुझ ते पाए मेरे ठाकुर अगह अतोले ॥1॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे पिता प्रभू ! इन पाँचों बिखादियों से बचने के लिए) मैं अनेकों और कई किस्मों के यतन कर कर के थक गया हूँ।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।