ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कवन गुन प्रानपति मिलउ मेरी माई ॥1॥ रहाउ ॥
रूप हीन बुधि बल हीनी मोहि परदेसनि दूर ते आई ॥1॥
नाहिन दरबु न जोबन माती मोहि अनाथ की करहु समाई ॥2॥
खोजत खोजत भई बैरागनि प्रभ दरसन कउ हउ फिरत तिसाई ॥3॥
दीन दइआल क्रिपाल प्रभ नानक साधसंगि मेरी जलनि बुझाई ॥4॥1॥118॥
प्रभ मिलबे कउ प्रीति मनि लागी ॥
पाइ लगउ मोहि करउ बेनती कोऊ संतु मिलै बडभागी ॥1॥ रहाउ ॥
मनु अरपउ धनु राखउ आगै मन की मति मोहि सगल तिआगी ॥
जो प्रभ की हरि कथा सुनावै अनदिनु फिरउ तिसु पिछै विरागी ॥1॥
पूरब करम अंकुर जब प्रगटे भेटिओ पुरखु रसिक बैरागी ॥
मिटिओ अंधेरु मिलत हरि नानक जनम जनम की सोई जागी ॥2॥2॥119॥
निकसु रे पंखी सिमरि हरि पांख ॥
मिलि साधू सरणि गहु पूरन राम रतनु हीअरे संगि राखु ॥1॥ रहाउ ॥
भ्रम की कूई त्रिसना रस पंकज अति तीख्यण मोह की फास ॥
काटनहार जगत गुर गोबिद चरन कमल ता के करहु निवास ॥1॥
करि किरपा गोबिंद प्रभ प्रीतम दीना नाथ सुनहु अरदासि ॥
करु गहि लेहु नानक के सुआमी जीउ पिंडु सभु तुमरी रासि ॥2॥3॥120॥
हरि पेखन कउ सिमरत मनु मेरा ॥
आस पिआसी चितवउ दिनु रैनी है कोई संतु मिलावै नेरा ॥1॥ रहाउ ॥
सेवा करउ दास दासन की अनिक भांति तिसु करउ निहोरा ॥
तुला धारि तोले सुख सगले बिनु हरि दरस सभो ही थोरा ॥1॥
संत प्रसादि गाए गुन सागर जनम जनम को जात बहोरा ॥
आनद सूख भेटत हरि नानक जनमु क्रितारथु सफलु सवेरा ॥2॥4॥121॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किन बिधि मिलै गुसाई मेरे राम राइ ॥
कोई ऐसा संतु सहज सुखदाता मोहि मारगु देइ बताई ॥1॥ रहाउ ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु गउड़ी पूरबी महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।