भुज बल बीर ब्रहम सुख सागर गरत परत गहि लेहु अंगुरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
स्रवनि न सुरति नैन सुंदर नही आरत दुआरि रटत पिंगुरीआ ॥1॥
दीना नाथ अनाथ करुणा मै साजन मीत पिता महतरीआ ॥
चरन कवल हिरदै गहि नानक भै सागर संत पारि उतरीआ ॥2॥2॥115॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दय गुसाई मीतुला तूं संगि हमारै बासु जीउ ॥1॥ रहाउ ॥
तुझ बिनु घरी न जीवना ध्रिगु रहणा संसारि ॥
जीअ प्राण सुखदातिआ निमख निमख बलिहारि जी ॥1॥
हसत अलंबनु देहु प्रभ गरतहु उधरु गोपाल ॥
मोहि निरगुन मति थोरीआ तूं सद ही दीन दइआल ॥2॥
किआ सुख तेरे संमला कवन बिधी बीचार ॥
सरणि समाई दास हित ऊचे अगम अपार ॥3॥
सगल पदारथ असट सिधि नाम महा रस माहि ॥
सुप्रसंन भए केसवा से जन हरि गुण गाहि ॥4॥
मात पिता सुत बंधपो तूं मेरे प्राण अधार ॥
साधसंगि नानकु भजै बिखु तरिआ संसारु ॥5॥1॥116॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
है कोई राम पिआरो गावै ॥
सरब कलिआण सूख सचु पावै ॥ रहाउ ॥
बनु बनु खोजत फिरत बैरागी ॥
बिरले काहू एक लिव लागी ॥
जिनि हरि पाइआ से वडभागी ॥1॥
ब्रहमादिक सनकादिक चाहै ॥
जोगी जती सिध हरि आहै ॥
जिसहि परापति सो हरि गुण गाहै ॥2॥
ता की सरणि जिन बिसरत नाही ॥
वडभागी हरि संत मिलाही ॥
जनम मरण तिह मूले नाही ॥3॥
करि किरपा मिलु प्रीतम पिआरे ॥
बिनउ सुनहु प्रभ ऊच अपारे ॥
नानकु मांगतु नामु अधारे ॥4॥1॥117॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी महला 5 ॥ हे बली बाहों वाले शूरवीर प्रभू ! हे सुखों के समुंदर पारब्रहम् ! (संसार समुंद्र के विकारों के) गड्ढे में गिरते हुए की (मेरी) उंगली पकड़ ले।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।