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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 202 · गउड़ी

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अंग
202
गउड़ी
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  1. संत प्रसादि परम पदु पाइआ ॥2॥
  2. कोटि मजन कीनो इसनान ॥
  3. सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ ॥
  4. अपने सेवक कउ आपि सहाई ॥
  5. राम को बलु पूरन भाई ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग गउड़ी

संत प्रसादि परम पदु पाइआ ॥2॥

अंग 201 से चला आ रहा अंश

संत प्रसादि परम पदु पाइआ ॥2॥
जन की कीनी आपि सहाइ ॥
सुखु पाइआ लगि दासह पाइ ॥
आपु गइआ ता आपहि भए ॥
क्रिपा निधान की सरनी पए ॥3॥
जो चाहत सोई जब पाइआ ॥
तब ढूंढन कहा को जाइआ ॥
असथिर भए बसे सुख आसन ॥
गुर प्रसादि नानक सुख बासन ॥4॥110॥

हिन्दी अर्थ: गुरू संत की कृपा से सबसे ऊंची आत्मिक अवस्था मिल जाती है। 2। (हे भाई!) परमात्मा ने खुद जिस मनुष्य की सहायता की, उसने परमात्मा के भक्तों के चरणों में लग के आत्मिक आनंद पाया। जो मनुष्य दया के खजाने परमात्मा की शरण आ पड़े, उनके अंदर (जब) स्वैभाव दूर हो गया तब वे परमात्मा का रूप हो गए। 3। (हे भाई!) किसी मनुष्य को (गुरू की कृपा से) वह परमात्मा ही मिल पड़ता है जिसे वह मिलना चाहता है। तब वह (बाहर जंगल पहाड़ों आदि में उसे) ढूँढने नहीं जाता। हे नानक! (परमात्मा को अपने ही अंदर ढूँढ लेने वाले मनुष्य) अडोल-चित्त हो जाते हैं, वे सदा आनंद अवस्था में टिके रहते हैं। गुरू की कृपा से वे सदा सुख में बसने वाले हो जाते हैं। 4। 110।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग गउड़ी

कोटि मजन कीनो इसनान ॥

गउड़ी महला 5 ॥
कोटि मजन कीनो इसनान ॥
लाख अरब खरब दीनो दानु ॥
जा मनि वसिओ हरि को नामु ॥1॥
सगल पवित गुन गाइ गुपाल ॥
पाप मिटहि साधू सरनि दइआल ॥ रहाउ ॥
बहुतु उरध तप साधन साधे ॥
अनिक लाभ मनोरथ लाधे ॥
हरि हरि नाम रसन आराधे ॥2॥
सिंम्रिति सासत बेद बखाने ॥
जोग गिआन सिध सुख जाने ॥
नामु जपत प्रभ सिउ मन माने ॥3॥
अगाधि बोधि हरि अगम अपारे ॥
नामु जपत नामु रिदे बीचारे ॥
नानक कउ प्रभ किरपा धारे ॥4॥111॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ उसने मानों करोड़ों तीर्थों के स्नान कर लिए। उसने मानों करोड़ों तीर्थों में डुबकियां लगा ली हों। उसने (मानो) लाखों रुपए अरबों रुपए खरबों रुपए दान कर दिए (हे भाई!) जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। 1। (हे भाई!) सृष्टि के पालनहार प्रभू के गुण गा के सारे मनुष्य पवित्र हो सकते हैं। दया के श्रोत गुरू की शरण पड़ने से (सारे) पाप मिट जाते हैं। रहाउ। उसने (मानो) उल्टा लटक के अनेकों तपों की साधनाएं साध लीं। उसने (मानो, रिद्धियों-सिद्धियों के) अनेकों लाभ प्राप्त कर लिए (हे भाई!) जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा का नाम जपता है। 2। उसने (मानो) स्मृतियों-शास्त्रों-वेदों के उच्चारण कर लिए। उसने (जैसे) योग (की पेचीदिकियों) की सूझ हासिल कर ली है। (हे भाई!) परमात्मा का नाम सिमरते सिमरते जिस मनुष्य का मन परमात्मा में लीन हो जाता है उसने (मानो) सिद्धों को मिले सुखों से सांझ पा ली। 3। (हे भाई! जिस मनुष्य पर प्रभू कृपा करता है, वह मनुष्य) उस अथाह हस्ती वाले अपहुँच और बेअंत परमात्मा का नाम जपता है, उसका नाम अपने हृदय में टिकाता है। (हे नानक! आप भी अरदास करें और कहें) हे प्रभू! मुझ नानक पर कृपा करें (ता कि मैं आपका नाम जप सकूँ)। 4। 111।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग गउड़ी

सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ ॥

गउड़ी मः 5 ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ ॥
चरन कमल गुर रिदै बसाइआ ॥1॥
गुर गोबिंदु पारब्रहमु पूरा ॥
तिसहि अराधि मेरा मनु धीरा ॥ रहाउ ॥
अनदिनु जपउ गुरू गुर नाम ॥
ता ते सिधि भए सगल कांम ॥2॥
दरसन देखि सीतल मन भए ॥
जनम जनम के किलबिख गए ॥3॥
कहु नानक कहा भै भाई ॥
अपने सेवक की आपि पैज रखाई ॥4॥112॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ उसने गोबिंद का नाम सिमर सिमर के आत्मिक आनंद पाया है। (जिस मनुष्य ने) गुरू के सुंदर चरण अपने हृदय में बसाए हैं, (पर, हे भाई! गोबिंद की आराधना गुरू के द्वारा ही मिलती है)। 1। (हे भाई!) गोबिंद पारब्रहम् (सब हस्तियों से) बड़ा है। सारे गुणों का मालिक है (उसमें कोई किसी किस्म की कमी नहीं है)। उस गोबिंद को आराध के मेरा मन हौसले वाला बन जाता है (और अनेकों किलविखों का मुकाबला करने के काबिल हो जाता है)। रहाउ। (हे भाई!) मैं हर समय गुरू का नाम याद रखता हूँ। (गुरू की मेहर से ही गोबिंद का सिमरन प्राप्त होता है और) उस सिमरन की बरकति से सारे कामों में सफलता हासिल होती है। 2। (हे भाई! गुरू के द्वारा हर जगह परमात्मा का) दर्शन करके (दर्शन करने वाले) ठण्डे-ठार मन वाले हो जाते हैं। उनके अनेकों (पहले) जन्मों के किए हुए पाप नाश हो जाते हैं। 3। हे नानक! कहें, हे भाई! (गुरू की शरण पड़ के गोबिंद का नाम सिमरने से संसार के) सारे डर-खतरे मन से उतर जाते हैं। (क्योंकि) (सिमरन की बरकति से ये यकीन बन जाता है कि गोबिंद) अपने सेवक की स्वयं लाज रखता है। 4। 112।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग गउड़ी

अपने सेवक कउ आपि सहाई ॥

गउड़ी महला 5 ॥
अपने सेवक कउ आपि सहाई ॥
नित प्रतिपारै बाप जैसे माई ॥1॥
प्रभ की सरनि उबरै सभ कोइ ॥
करन करावन पूरन सचु सोइ ॥ रहाउ ॥
अब मनि बसिआ करनैहारा ॥
भै बिनसे आतम सुख सारा ॥2॥
करि किरपा अपने जन राखे ॥
जनम जनम के किलबिख लाथे ॥3॥
कहनु न जाइ प्रभ की वडिआई ॥
नानक दास सदा सरनाई ॥4॥113॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई!) परमात्मा अपने सेवक के लिए (सदा) मददगार बना रहता है, सदा (अपने सेवक की) संभाल करता है जैसे माता और पिता (अपने बच्चे की संभाल करते हैं)। 1। (हे भाई!) हरेक मनुष्य (जो) परमात्मा की शरण में (आता है, सारे विकारों, डरों, सहिमों से) बच जाता है। उसे निश्चय बन जाता है कि वह सर्व व्यापक सदा कायम रहने वाला परमात्मा सब कुछ करने की स्मर्था रखता है और जीवों से सब कुछ करवाने वाला है। रहाउ। (हे भाई!) सब कुछ करने की स्मर्था रखने वाला परमात्मा (मेरे) मन में आ बसा है। अब मेरे सारे डर खतरे नाश हो गए हैं और मैं आत्मिक आनंद पा रहा हूँ। 2। (हे भाई!) परमात्मा कृपा करके अपने सेवकों की स्वयं रक्षा करता है, उनके (पहले के) अनेकों जन्मों के (किए) पापों के संस्कार (उनके मन से) उतर जाते हैं। 3। परमात्मा कितनी बड़ी स्मर्था वाला है, ये बात बयान नहीं की जा सकती। हे नानक! परमात्मा के सेवक सदा परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं। 4। 113।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग गउड़ी

राम को बलु पूरन भाई ॥

रागु गउड़ी चेती महला 5 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम को बलु पूरन भाई ॥
ता ते ब्रिथा न बिआपै काई ॥1॥ रहाउ ॥
जो जो चितवै दासु हरि माई ॥
सो सो करता आपि कराई ॥1॥
निंदक की प्रभि पति गवाई ॥
नानक हरि गुण निरभउ गाई ॥2॥114॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी चेती महला 5 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! परमात्मा की ताकत हर जगह (अपना प्रभाव डाल रही है)। (इस वास्ते जिस सेवक के सिर पर परमात्मा अपना मेहर का हाथ रखता है) उस ताकत की बरकति से (उस सेवक पे) कोई दुख कलेश अपना जोर नहीं डाल सकते। 1। रहाउ। हे (मेरी) माँ! परमात्मा का सेवक जो जो मांग अपने मन में चितवता है, करतार स्वयं उसकी वह मांग पूरी कर देता है। 1। (पर सेवक के) दोखी-निंदक की इज्जत प्रभू ने लोक-परलोक में खुद गवा दी होती है। हे नानक! (परमात्मा का सेवक) परमात्मा के गुण गाता रहता है (और दुनिया के डरों से) निडर हो जाता है। 2। 114।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 202 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।