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गउड़ी
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· शबद · राग गउड़ी
मइआ करी पूरन हरि राइआ ॥1॥ रहाउ ॥
मइआ करी पूरन हरि राइआ ॥1॥ रहाउ ॥
कहु नानक जा के पूरे भाग ॥
हरि हरि नामु असथिरु सोहागु ॥2॥106॥
कहु नानक जा के पूरे भाग ॥
हरि हरि नामु असथिरु सोहागु ॥2॥106॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई!) जिस मनुष्य पर सर्व व्यापक प्रभू पातशाह ने मेहर की है। 1। रहाउ। हे नानक! कहें, जिस मनुष्य के (माथे पर) पूरे भाग्य जाग पड़ते हैं, वह सदा परमात्मा का नाम जपता है। (उस के सिर पर) परमात्मा सदा कायम रहने वाला पति (अपना हाथ रखता है)। 2। 106।
· शबद · राग गउड़ी
धोती खोलि विछाए हेठि ॥
गउड़ी महला 5 ॥
धोती खोलि विछाए हेठि ॥
गरधप वांगू लाहे पेटि ॥1॥
बिनु करतूती मुकति न पाईऐ ॥
मुकति पदारथु नामु धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
पूजा तिलक करत इसनानां ॥
छुरी काढि लेवै हथि दाना ॥2॥
बेदु पड़ै मुखि मीठी बाणी ॥
जीआं कुहत न संगै पराणी ॥3॥
कहु नानक जिसु किरपा धारै ॥
हिरदा सुधु ब्रहमु बीचारै ॥4॥107॥
धोती खोलि विछाए हेठि ॥
गरधप वांगू लाहे पेटि ॥1॥
बिनु करतूती मुकति न पाईऐ ॥
मुकति पदारथु नामु धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
पूजा तिलक करत इसनानां ॥
छुरी काढि लेवै हथि दाना ॥2॥
बेदु पड़ै मुखि मीठी बाणी ॥
जीआं कुहत न संगै पराणी ॥3॥
कहु नानक जिसु किरपा धारै ॥
हिरदा सुधु ब्रहमु बीचारै ॥4॥107॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (पर, हे भाई! ब्राहमण अपने जजमानों को यही बताता है कि ब्राहमण को दिया दान ही मोक्ष पदवी मिलने का रास्ता है। वह ब्राहमण श्राद्ध आदि के समय जजमान के घर जा के चौके में बैठ के) अपनी धोती का ऊपर का हिस्सा उतार के नीचे रख लेता है और गधे की तरह (दबादब खीर आदि) अपने पेट में डाले जाता है। 1। (हे भाई!) नाम सिमरन की कमाई किए बिना मोक्ष पदवी नहीं मिलती। (हे भाई!) परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। ये ऐसा पदार्थ है जो विकारों से खलासी देता है। 1। रहाउ। (ब्राहमण) स्नान करके, तिलक लगा के पूजा करता है, और छुरी निकाल के, हाथ में दान लेता है। 2। (ब्राहमण) मुंह से मीठी सुर का वेद (मंत्र) पढ़ता है, पर अपने जजमानों के साथ धोखा करते हुए रक्ती भर नहीं झिझकता। 3। (पर) हे नानक! कहें, (ब्राहमण के भी क्या वश?) जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है वही परमातमा के गुण अपने हृदय में बसाता है। (जिसकी बरकति से) उसका हृदय पवित्र हो जाता है (और वह किसी के साथ ठॅगी-फरेब नहीं करता)। 4। 107।
· शबद · राग गउड़ी
थिरु घरि बैसहु हरि जन पिआरे ॥
गउड़ी महला 5 ॥
थिरु घरि बैसहु हरि जन पिआरे ॥
सतिगुरि तुमरे काज सवारे ॥1॥ रहाउ ॥
दुसट दूत परमेसरि मारे ॥
जन की पैज रखी करतारे ॥1॥
बादिसाह साह सभ वसि करि दीने ॥
अंम्रित नाम महा रस पीने ॥2॥
निरभउ होइ भजहु भगवान ॥
साधसंगति मिलि कीनो दानु ॥3॥
सरणि परे प्रभ अंतरजामी ॥
नानक ओट पकरी प्रभ सुआमी ॥4॥108॥
थिरु घरि बैसहु हरि जन पिआरे ॥
सतिगुरि तुमरे काज सवारे ॥1॥ रहाउ ॥
दुसट दूत परमेसरि मारे ॥
जन की पैज रखी करतारे ॥1॥
बादिसाह साह सभ वसि करि दीने ॥
अंम्रित नाम महा रस पीने ॥2॥
निरभउ होइ भजहु भगवान ॥
साधसंगति मिलि कीनो दानु ॥3॥
सरणि परे प्रभ अंतरजामी ॥
नानक ओट पकरी प्रभ सुआमी ॥4॥108॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे प्यारे भक्त जनों! अपने हृदय में ये पूरी श्रद्धा बनाएँ, कि सतिगुरू ने हमारे कारज सवार दिए हैं (कि सत्गुरू शरण पड़ने वालों के कार्य सवार देता है)। 1। रहाउ। (हे संत जनों! ये निश्चय धारें कि जो मनुष्य और आसरे छोड़ के परमेश्वर का आसरा ताकता है), परमेश्वर ने उसके दोखी-वैरी सब समाप्त कर दिए हैं, करतार ने अपने सेवक की इज्जत जरूर रखी है। 1। (हे संत जनों परमेश्वर ने अपने सेवकों को) दुनिया के शाहों-बादशाहों से बे-मुहताज (आजाद) कर दिया है। परमेश्वर के सेवक आत्मिक जीवन देने वाला परमेश्वर का सब रसों से मीठा नाम-रस पीते रहते हैं। 2। (हे प्यारे भक्त जनों! परमेश्वर ने आपके ऊपर) नाम की बख्शिश की है, आप साध-संगति में मिल के निडर हो के भगवान का नाम सिमरते रहें। 3। हे नानक! (प्रभू दर पर अरदास करें और कहें) हे अंतरजामी प्रभू! हे स्वामी प्रभू! मैं आपकी शरण पड़ा हूँ, मैंने आपका आसरा लिया है (मुझे अपने नाम की दाति बख्शें)। 4। 108।
· शबद · राग गउड़ी
हरि संगि राते भाहि न जलै ॥
गउड़ी महला 5 ॥
हरि संगि राते भाहि न जलै ॥
हरि संगि राते माइआ नही छलै ॥
हरि संगि राते नही डूबै जला ॥
हरि संगि राते सुफल फला ॥1॥
सभ भै मिटहि तुमारै नाइ ॥
भेटत संगि हरि हरि गुन गाइ ॥ रहाउ ॥
हरि संगि राते मिटै सभ चिंता ॥
हरि सिउ सो रचै जिसु साध का मंता ॥
हरि संगि राते जम की नही त्रास ॥
हरि संगि राते पूरन आस ॥2॥
हरि संगि राते दूखु न लागै ॥
हरि संगि राता अनदिनु जागै ॥
हरि संगि राता सहज घरि वसै ॥
हरि संगि राते भ्रमु भउ नसै ॥3॥
हरि संगि राते मति ऊतम होइ ॥
हरि संगि राते निरमल सोइ ॥
कहु नानक तिन कउ बलि जाई ॥ जिन कउ प्रभु मेरा बिसरत नाही ॥4॥109॥
हरि संगि राते भाहि न जलै ॥
हरि संगि राते माइआ नही छलै ॥
हरि संगि राते नही डूबै जला ॥
हरि संगि राते सुफल फला ॥1॥
सभ भै मिटहि तुमारै नाइ ॥
भेटत संगि हरि हरि गुन गाइ ॥ रहाउ ॥
हरि संगि राते मिटै सभ चिंता ॥
हरि सिउ सो रचै जिसु साध का मंता ॥
हरि संगि राते जम की नही त्रास ॥
हरि संगि राते पूरन आस ॥2॥
हरि संगि राते दूखु न लागै ॥
हरि संगि राता अनदिनु जागै ॥
हरि संगि राता सहज घरि वसै ॥
हरि संगि राते भ्रमु भउ नसै ॥3॥
हरि संगि राते मति ऊतम होइ ॥
हरि संगि राते निरमल सोइ ॥
कहु नानक तिन कउ बलि जाई ॥ जिन कउ प्रभु मेरा बिसरत नाही ॥4॥109॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई!) परमात्मा के साथ रंगे रहने से (मनुष्य तृष्णा की) आग में नहीं जलता। परमात्मा के चरणों में जुड़े रहने से (मनुष्य को) माया ठॅग नहीं सकती। परमात्मा की याद में मस्त रहने से मनुष्य संसार समुंदं के विकारों के पानियों में ग़र्क नहीं होता, मानस जन्म का खूबसूरत मनोरथ प्राप्त कर लेता है। 1। (हे प्रभू!) आपके नाम में जुड़ने से (मनुष्य के सारे) डर दूर हो जाते हैं। (हे भाई!) प्रभू की संगति में रहने से (चरणों में जुड़ने से) मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है। 1। रहाउ। (हे भाई!) परमात्मा की याद में जुड़े रहने से (मनुष्य की) हरेक किस्म की चिंता मिट जाती है। (पर) परमात्मा के साथ वही मनुष्य जुड़ता है जिसे गुरू का उपदेश प्राप्त होता है। परमात्मा के साथ रंगे रहने से मौत का सहम नहीं रहता, और मनुष्य की सारी आशाएं पूरी हो जाती हैं। 2। (हे भाई!) परमात्मा के चरणों में जुड़े रहने से कोई दुख छू नहीं सकता। जो मनुष्य परमात्मा की याद में मस्त रहता है, वह हर वक्त (विकारों के हमलों से) सुचेत रहता है। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता की अवस्था में टिका रहता है। परमात्मा की याद में जुड़े रहने से मनुष्य की हरेक किस्म की भटकना मिट जाती है, हरेक सहम दूर हो जाता है। 3। जो मनुष्य परमात्मा की याद में मस्त रहता है, वह उत्तम (श्रेष्ठ) हो जाता है और वह पवित्र हो जाता है हे नानक! कहें, मैं उन लोगों से सदके जाता हूँ, जिन्हें मेरा परमात्मा कभी नहीं भूलता। 4। 109।
· शबद · राग गउड़ी
उदमु करत सीतल मन भए ॥
गउड़ी महला 5 ॥
उदमु करत सीतल मन भए ॥
मारगि चलत सगल दुख गए ॥
नामु जपत मनि भए अनंद ॥
रसि गाए गुन परमानंद ॥1॥
खेम भइआ कुसल घरि आए ॥
भेटत साधसंगि गई बलाए ॥ रहाउ ॥
नेत्र पुनीत पेखत ही दरस ॥
धनि मसतक चरन कमल ही परस ॥
गोबिंद की टहल सफल इह कांइआ ॥
उदमु करत सीतल मन भए ॥
मारगि चलत सगल दुख गए ॥
नामु जपत मनि भए अनंद ॥
रसि गाए गुन परमानंद ॥1॥
खेम भइआ कुसल घरि आए ॥
भेटत साधसंगि गई बलाए ॥ रहाउ ॥
नेत्र पुनीत पेखत ही दरस ॥
धनि मसतक चरन कमल ही परस ॥
गोबिंद की टहल सफल इह कांइआ ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई! साध-संगति में जाने का) उद्यम करते हुए (मनुष्य) शांत-चित्त हो जाते हैं। (साध-संगति के) रास्ते पर चलते हुए सारे दुख दूर हो जाते हैं (छू नहीं सकते)। (हे भाई!) सबसे उच्च आनंद का मालिक प्रभू के गुण प्रेम से गाने से, प्रभू का नाम जपने से मन में आनंद ही आनंद पैदा हो जाते हैं। 1। (जो लोग साध-संगति में जुड़ते हैं उन्हें) सुख ही सुख प्राप्त होता है, वे आनंद की अवस्था में टिक जाते हैं। (हे भाई!) साध-संगति में मिलने से (माया-) चुड़ेल (की चिपकन) देर हो जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई!) गोबिंद के दर्शन करते ही आँखें पवित्र हो जाती हैं (विकार-वासना से रहित हो जाती हैं)। (हे भाई!) भाग्यशाली हैं वह माथे जिन्हें गोबिंद के सुंदर चरणों की छोह मिलती है। परमात्मा की सेवा-भगती करने से ये शरीर सफल हो जाता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 201 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।