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अंग 201

अंग
201
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मइआ करी पूरन हरि राइआ ॥1॥ रहाउ ॥
कहु नानक जा के पूरे भाग ॥
हरि हरि नामु असथिरु सोहागु ॥2॥106॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जिस मनुष्य पर सर्व व्यापक प्रभू पातशाह ने मेहर की है। 1। रहाउ। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य के (माथे पर) पूरे भाग्य जाग पड़ते हैं, वह सदा परमात्मा का नाम जपता है। (उस के सिर पर) परमात्मा सदा कायम रहने वाला पति (अपना हाथ रखता है)। 2। 106।
गउड़ी महला 5 ॥
धोती खोलि विछाए हेठि ॥
गरधप वांगू लाहे पेटि ॥1॥
बिनु करतूती मुकति न पाईऐ ॥
मुकति पदारथु नामु धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
पूजा तिलक करत इसनानां ॥
छुरी काढि लेवै हथि दाना ॥2॥
बेदु पड़ै मुखि मीठी बाणी ॥
जीआं कुहत न संगै पराणी ॥3॥
कहु नानक जिसु किरपा धारै ॥
हिरदा सुधु ब्रहमु बीचारै ॥4॥107॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (पर, हे भाई ! ब्राहमण अपने जजमानों को यही बताता है कि ब्राहमण को दिया दान ही मोक्ष पदवी मिलने का रास्ता है। वह ब्राहमण श्राद्ध आदि के समय जजमान के घर जा के चौके में बैठ के) अपनी धोती का ऊपर का हिस्सा उतार के नीचे रख लेता है और गधे की तरह (दबादब खीर आदि) अपने पेट में डाले जाता है। 1। (हे भाई !) नाम सिमरन की कमाई किए बिना मोक्ष पदवी नहीं मिलती। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। ये ऐसा पदार्थ है जो विकारों से खलासी देता है।1। रहाउ। (ब्राहमण) स्नान करके, तिलक लगा के पूजा करता है, और छुरी निकाल के, हाथ में दान लेता है। 2। (ब्राहमण) मुंह से मीठी सुर का वेद (मंत्र) पढ़ता है, पर अपने जजमानों के साथ धोखा करते हुए रक्ती भर नहीं झिझकता। 3। (पर) हे नानक ! कह, (ब्राहमण के भी क्या वश?) जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है वही परमातमा के गुण अपने हृदय में बसाता है। (जिसकी बरकति से) उसका हृदय पवित्र हो जाता है (और वह किसी के साथ ठॅगी-फरेब नहीं करता)। 4। 107।
गउड़ी महला 5 ॥
थिरु घरि बैसहु हरि जन पिआरे ॥
सतिगुरि तुमरे काज सवारे ॥1॥ रहाउ ॥
दुसट दूत परमेसरि मारे ॥
जन की पैज रखी करतारे ॥1॥
बादिसाह साह सभ वसि करि दीने ॥
अंम्रित नाम महा रस पीने ॥2॥
निरभउ होइ भजहु भगवान ॥
साधसंगति मिलि कीनो दानु ॥3॥
सरणि परे प्रभ अंतरजामी ॥
नानक ओट पकरी प्रभ सुआमी ॥4॥108॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे प्यारे भक्त जनों ! अपने हृदय में ये पूरी श्रद्धा बनाओ, कि सतिगुरू ने हमारे कारज सवार दिए हैं (कि सत्गुरू शरण पड़ने वालों के कार्य सवार देता है)। 1। रहाउ। (हे संत जनों ! ये निश्चय धारो कि जो मनुष्य और आसरे छोड़ के परमेश्वर का आसरा ताकता है), परमेश्वर ने उसके दोखी-वैरी सब समाप्त कर दिए हैं, करतार ने अपने सेवक की इज्जत जरूर रखी है। 1। (हे संत जनों परमेश्वर ने अपने सेवकों को) दुनिया के शाहों-बादशाहों से बे-मुहताज (आजाद) कर दिया है। परमेश्वर के सेवक आत्मिक जीवन देने वाला परमेश्वर का सब रसों से मीठा नाम-रस पीते रहते हैं। 2। (हे प्यारे भक्त जनों ! परमेश्वर ने आपके ऊपर) नाम की बख्शिश की है, आप साध-संगति में मिल के निडर हैं के भगवान का नाम सिमरते रहो। 3। हे नानक ! (प्रभू दर पर अरदास कर और कह) हे अंतरजामी प्रभू ! हे स्वामी प्रभू ! मैं आपकी शरण पड़ा हूँ, मैंने आपका आसरा लिया है (मुझे अपने नाम की दाति बख्श)। 4। 108।
गउड़ी महला 5 ॥
हरि संगि राते भाहि न जलै ॥
हरि संगि राते माइआ नही छलै ॥
हरि संगि राते नही डूबै जला ॥
हरि संगि राते सुफल फला ॥1॥
सभ भै मिटहि तुमारै नाइ ॥
भेटत संगि हरि हरि गुन गाइ ॥ रहाउ ॥
हरि संगि राते मिटै सभ चिंता ॥
हरि सिउ सो रचै जिसु साध का मंता ॥
हरि संगि राते जम की नही त्रास ॥
हरि संगि राते पूरन आस ॥2॥
हरि संगि राते दूखु न लागै ॥
हरि संगि राता अनदिनु जागै ॥
हरि संगि राता सहज घरि वसै ॥
हरि संगि राते भ्रमु भउ नसै ॥3॥
हरि संगि राते मति ऊतम होइ ॥
हरि संगि राते निरमल सोइ ॥
कहु नानक तिन कउ बलि जाई ॥ जिन कउ प्रभु मेरा बिसरत नाही ॥4॥109॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा के साथ रंगे रहने से (मनुष्य तृष्णा की) आग में नहीं जलता। परमात्मा के चरणों में जुड़े रहने से (मनुष्य को) माया ठॅग नहीं सकती। परमात्मा की याद में मस्त रहने से मनुष्य संसार समुंदं के विकारों के पानियों में ग़र्क नहीं होता, मानस जन्म का खूबसूरत मनोरथ प्राप्त कर लेता है। 1। (हे प्रभू !) आपके नाम में जुड़ने से (मनुष्य के सारे) डर दूर हैं जाते हैं। (हे भाई !) प्रभू की संगति में रहने से (चरणों में जुड़ने से) मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा की याद में जुड़े रहने से (मनुष्य की) हरेक किस्म की चिंता मिट जाती है। (पर) परमात्मा के साथ वही मनुष्य जुड़ता है जिसे गुरू का उपदेश प्राप्त होता है। परमात्मा के साथ रंगे रहने से मौत का सहम नहीं रहता, और मनुष्य की सारी आशाएं पूरी हो जाती हैं। 2। (हे भाई !) परमात्मा के चरणों में जुड़े रहने से कोई दुख छू नहीं सकता। जो मनुष्य परमात्मा की याद में मस्त रहता है, वह हर वक्त (विकारों के हमलों से) सुचेत रहता है। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता की अवस्था में टिका रहता है। परमात्मा की याद में जुड़े रहने से मनुष्य की हरेक किस्म की भटकना मिट जाती है, हरेक सहम दूर हो जाता है। 3। जो मनुष्य परमात्मा की याद में मस्त रहता है, वह उत्तम (श्रेष्ठ) हो जाता है और वह पवित्र हो जाता है हे नानक ! कह, मैं उन लोगों से सदके जाता हूँ, जिन्हें मेरा परमात्मा कभी नहीं भूलता। 4। 109।
गउड़ी महला 5 ॥
उदमु करत सीतल मन भए ॥
मारगि चलत सगल दुख गए ॥
नामु जपत मनि भए अनंद ॥
रसि गाए गुन परमानंद ॥1॥
खेम भइआ कुसल घरि आए ॥
भेटत साधसंगि गई बलाए ॥ रहाउ ॥
नेत्र पुनीत पेखत ही दरस ॥
धनि मसतक चरन कमल ही परस ॥
गोबिंद की टहल सफल इह कांइआ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई ! साध-संगति में जाने का) उद्यम करते हुए (मनुष्य) शांत-चित्त हो जाते हैं। (साध-संगति के) रास्ते पर चलते हुए सारे दुख दूर हो जाते हैं (छू नहीं सकते)। (हे भाई !) सबसे उच्च आनंद का मालिक प्रभू के गुण प्रेम से गाने से, प्रभू का नाम जपने से मन में आनंद ही आनंद पैदा हो जाते हैं। 1। (जो लोग साध-संगति में जुड़ते हैं उन्हें) सुख ही सुख प्राप्त होता है, वे आनंद की अवस्था में टिक जाते हैं। (हे भाई !) साध-संगति में मिलने से (माया-) चुड़ेल (की चिपकन) देर हो जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई !) गोबिंद के दर्शन करते ही आँखें पवित्र हो जाती हैं (विकार-वासना से रहित हो जाती हैं)। (हे भाई !) भाग्यशाली हैं वह माथे जिन्हें गोबिंद के सुंदर चरणों की छोह मिलती है। परमात्मा की सेवा-भगती करने से ये शरीर सफल हो जाता है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) जिस मनुष्य पर सर्व व्यापक प्रभू पातशाह ने मेहर की है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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