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अंग 200

अंग
200
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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अहंबुधि मन पूरि थिधाई ॥
साध धूरि करि सुध मंजाई ॥1॥
अनिक जला जे धोवै देही ॥
मैलु न उतरै सुधु न तेही ॥2॥
सतिगुरु भेटिओ सदा क्रिपाल ॥
हरि सिमरि सिमरि काटिआ भउ काल ॥3॥
मुकति भुगति जुगति हरि नाउ ॥
प्रेम भगति नानक गुण गाउ ॥4॥100॥169॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अहंकार वाली बुद्धि के कारण (मनुष्य के) मन को (अहम् की) चिकनाई लगी रहती है (उस चिकनाई के कारण मन पर किसी उपदेश का असर नहीं होता, जैसे चिकने बरतन पर पानी नहीं ठहरता। जिस मनुष्य को ‘जन की धूरि’ मीठी लगती है) साधू की चरण-धूड़ से उसकी बुद्धि मांजी जाती है और शुद्ध हो जाती है। 1। अगर मनुष्य अनेकों (तीर्थों के) पानियों से अपने शरीर को धोता रहे, तो भी उसके मन की मैल नहीं उतरती, उस तरह (भाव, तीर्थ-स्नानों से भी) वह मनुष्य पवित्र नहीं हो सकता। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य को सत्गुरू मिल जाता है, जिस पे गुरू सदा दयावान रहता है, वह मनुष्य परमात्मा का नाम सिमर सिमर के (अपने अंदर से) मौत का डर (आत्मिक मौत का खतरा) दूर कर लेता है। 3। परमात्मा का नाम ही विकारों से निजात दिलवाता है। नाम ही आत्मिक जीवन की खुराक है, नाम जपना ही जीवन की सही जुगति है। हे नानक ! प्रेम-भरी भक्ति से परमात्मा के गुण गाता रह। 4। 100। 169।
गउड़ी महला 5 ॥
जीवन पदवी हरि के दास ॥
जिन मिलिआ आतम परगासु ॥1॥
हरि का सिमरनु सुनि मन कानी ॥
सुखु पावहि हरि दुआर परानी ॥1॥ रहाउ ॥
आठ पहर धिआईऐ गोपालु ॥
नानक दरसनु देखि निहालु ॥2॥101॥170॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं, वे हरी के दास हैं) हरी के दासों को उच्च आत्मिक दर्जा प्राप्त है। उन (हरी के दासों) को मिलके आत्मा को (ज्ञान का) प्रकाश मिल जाता है। 1। हे मेरे मन ! ध्यान से परमात्मा का नाम सुना कर। हे प्राणी ! (सिमरन की बरकति से) आप हरी के दर पर सुख प्राप्त करेगा। 1। रहाउ। हे नानक ! (हरी के दासों की संगति में रह के) आठों पहर सृष्टि के पालनहार प्रभू को सिमरना चाहिए। (सिमरन की बरकति से हर जगह परमात्मा का) दर्शन करके (मन) खिला रहता है। 2। 101। 170।
गउड़ी महला 5 ॥
सांति भई गुर गोबिदि पाई ॥
ताप पाप बिनसे मेरे भाई ॥1॥ रहाउ ॥
राम नामु नित रसन बखान ॥
बिनसे रोग भए कलिआन ॥1॥
पारब्रहम गुण अगम बीचार ॥
साधू संगमि है निसतार ॥2॥
निरमल गुण गावहु नित नीत ॥
गई बिआधि उबरे जन मीत ॥3॥
मन बच क्रम प्रभु अपना धिआई ॥
नानक दास तेरी सरणाई ॥4॥102॥171॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे मेरे भाई ! गोबिंद के रूप गुरू ने (जिस मनुष्य को नाम की दाति) बख्श दी, उसके अंदर ठंढ पड़ गई, उसके सारे दुख-कलेश और पाप नाश हो गए। 1। रहाउ। (हे भाई !) जो मनुष्य अपनी जीभ से सदा परमात्मा का नाम उच्चारण करता है, उसके सारे रोग दूर हो जाते हैं, उसके अंदर आनंद ही आनंद बने रहते हैं। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य अपहुँच पारब्रहम् प्रभू के गुणों का विचार करता रहता है, गुरू की संगति में रह के उस का (संसार-समुंद्र से) पार उतारा हो जाता है। 2। हे (मेरे) मित्र ! सदा परमात्मा के गुण गाते रहो। (जो मनुष्य गुण गाते हैं, उनका हरेक) रोग दूर हो जाता है, वह मनुष्य (रोगों-विकारों से) बचे रहते हैं। 3। हे नानक ! (प्रभू-चरणों में प्रार्थना करके कह, हे प्रभू !) मैं आपका दास आपकी शरण आया हूँ। (मेहर कर) मैं अपने मन से बचनों से और कर्मों से सदा अपने मालिक प्रभू को सिमरता रहूँ। 4। 102। 171।
गउड़ी महला 5 ॥
नेत्र प्रगासु कीआ गुरदेव ॥
भरम गए पूरन भई सेव ॥1॥ रहाउ ॥
सीतला ते रखिआ बिहारी ॥
पारब्रहम प्रभ किरपा धारी ॥1॥
नानक नामु जपै सो जीवै ॥
साधसंगि हरि अंम्रितु पीवै ॥2॥103॥172॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे गुरदेव ! जिस मनुष्य की (आत्मिक) आँखों को तूने (ज्ञान का) प्रकाश बख्शा, उसके सारे वहम (जगह जगह की भटकना) दूर हो गई। आपके दर पर टिक के की हुई उसकी सेवा सफल हैं गई। 1। रहाउ। हे प्रभू ! तूने ही शीतला (माता का रोग, चेचक।) से बचाया है (और कोई देवी आदि आपके बराबर की नहीं है)। हे सुंदर स्वरूप ! हे पारब्रहम् ! तूने ही कृपा की । 1। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जो मनुष्य (और सारे आसरे छोड़ के) परमात्मा का नाम जपता है, वह आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है (क्योंकि) वह साध-संगति में रह के आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम-रस पीता रहता है। 2। 103। 172।
गउड़ी महला 5 ॥
धनु ओहु मसतकु धनु तेरे नेत ॥
धनु ओइ भगत जिन तुम संगि हेत ॥1॥
नाम बिना कैसे सुखु लहीऐ ॥
रसना राम नाम जसु कहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
तिन ऊपरि जाईऐ कुरबाणु ॥
नानक जिनि जपिआ निरबाणु ॥2॥104॥173॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे प्रभू !) भाग्यशाली है वह माथा (जो आपके दर पर झुकता है), भाग्यशाली हैं वे आँखें (जो) आपके (दीदार में मस्त रहती हैं)। भाग्यशाली हें वे भक्तजन जिनका आपके नाम से प्रेम बना रहता है। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरे बिना कभी सुख नहीं मिल सकता। (इस वास्ते सदैव) जीभ से परमात्मा का नाम जपना चाहिए, परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह, हे भाई !) उनपे से (सदा) सदके जाना चाहिए जिस जिस ने वासना रहित प्रभू का नाम जपा है। 2। 104। 173।
गउड़ी महला 5 ॥
तूंहै मसलति तूंहै नालि ॥
तूहै राखहि सारि समालि ॥1॥
ऐसा रामु दीन दुनी सहाई ॥
दास की पैज रखै मेरे भाई ॥1॥ रहाउ ॥
आगै आपि इहु थानु वसि जा कै ॥
आठ पहर मनु हरि कउ जापै ॥2॥
पति परवाणु सचु नीसाणु ॥
जा कउ आपि करहि फुरमानु ॥3॥
आपे दाता आपि प्रतिपालि ॥
नित नित नानक राम नामु समालि ॥4॥105॥174॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप (हर जगह मेरा) सलाहकार है, आप ही (हर जगह) मेरे साथ बसता है। आप ही (जीवों की) सार ले के संभाल करके रक्षा करता है। 1। हे मेरे वीर ! परमात्मा इस लोक में और परलोक में ऐसा साथी है कि वह अपने सेवक की इज्जत (हर जगह) रखता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस परमात्मा के वश में हमारा ये लोक है, वही खुद परलोक में भी (हमारा रक्षक) है। (हे भाई !) मेरा मन तो आठों पहर उस परमात्मा का नाम जपता है। 2। उसे (आपके दरबार में) आदर-सत्कार मिलता है, वह (आपके दर पर) कबूल होता है, उसको (जीवन यात्रा में) आपका सदा स्थिर रहने वाला नाम, (बतौर) राहदारी मिलता है हे प्रभू ! जिस (सेवक) के वास्ते आप खुद हुकम करता है। 3। हे नानक ! परमात्मा खुद ही (सब जीवों को) दातें देने वाला है, स्वयं ही (सबकी) पालना करने वाला है। आप सदा ही उस परमात्मा का नाम (अपने हृदय में) संभाल के रख। 4। 105। 174।
गउड़ी महला 5 ॥
सतिगुरु पूरा भइआ क्रिपालु ॥
हिरदै वसिआ सदा गुपालु ॥1॥
रामु रवत सद ही सुखु पाइआ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) अभॅुल गुरू जिस मनुष्य पर दयावान होता है, सृष्टि के रक्षक परमात्मा (का नाम) सदा उसके हृदय में बसा रहता है। 1। परमात्मा का नाम सिमरते हुए उसने सदा ही आत्मिक आनंद पाया है

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अहंकार वाली बुद्धि के कारण (मनुष्य के) मन को (अहम् की) चिकनाई लगी रहती है (उस चिकनाई के कारण मन पर किसी उपदेश का असर नहीं होता, जैसे चिकने बरतन पर पानी नहीं ठहरता।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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