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अंग 199

अंग
199
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
संतसंगि तह गोसटि होइ ॥
कोटि जनम के किलविख खोइ ॥2॥
सिमरहि साध करहि आनंदु ॥
मनि तनि रविआ परमानंदु ॥3॥
जिसहि परापति हरि चरण निधान ॥ नानक दास तिसहि कुरबान ॥4॥95॥164॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) वहाँ (उस हरी-नाम-जल में डुबकी लगाते हुए) प्रभू संत से मिलाप हो जाता है (और, मनुष्य अपने) करोड़ों जन्मों के (किए हुए) पाप दूर कर लेता है। 2। (हे भाई ! जो) गुरमुख बंदे (हरी नाम) सिमरते हैं, वे आत्मिक आनंद लेते हैं। उन्हें अपने मन में अपने हृदय में सब से श्रेष्ठ आनंद का मालिक परमात्मा हर समय मौजूद दिखाई देता है। 3। हे नानक ! (कह) परमात्मा के चरणों के खजाने जिस मनुष्य को प्राप्त हो जाते हैं, उस मनुष्य पर से प्रभू के भक्त सेवक कुर्बान हो जाते हैं। 4। 95। 164।
गउड़ी महला 5 ॥
सो किछु करि जितु मैलु न लागै ॥
हरि कीरतन महि एहु मनु जागै ॥1॥ रहाउ ॥
एको सिमरि न दूजा भाउ ॥
संतसंगि जपि केवल नाउ ॥1॥
करम धरम नेम ब्रत पूजा ॥
पारब्रहम बिनु जानु न दूजा ॥2॥
ता की पूरन होई घाल ॥ जा की प्रीति अपुने प्रभ नालि ॥3॥
सो बैसनो है अपर अपारु ॥
कहु नानक जिनि तजे बिकार ॥4॥96॥165॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) वह (धार्मिक) उद्यम कर, जिस के करने से आपके मन को विकारों की मैल ना लग सके, और आपका ये मन परमात्मा की सिफत सालाह में टिक के (विकारों के हमलों से) सुचेत रहे। 1। रहाउ। (हे भाई !) सिर्फ एक परमात्मा का नाम जप। किसी और का प्यार (अपने मन में) मत ला। साध-संगति में टिक के सिर्फ परमात्मा का नाम जपा कर। 1। (हे भाई ! निहित) धार्मिक कर्म, व्रत पूजा आदिक (बनाए हुए) नेम- परमात्मा के सिमरन के बिना ऐसे किसी दूसरे कर्म को (उच्च आत्मिक जीवन के वास्ते सहायक) ना समझ। 2। (हे भाई !सिर्फ) उस मनुष्य की मेहनत सफल होती है, जिसकी प्रीति अपने परमात्मा के साथ बनी हुई है। 3। हे नानक ! कह, (कर्म-धर्म-नेम-ब्रत-पूजा करने वाला मनुष्य असल वैष्णव नहीं है) वह वैष्णव परे से परे और श्रेष्ठ है, जिस ने (साध-संगति में टिक के सिमरन की बरकति से अपने अंदर से) सारे विकार दूर कर लिए हैं। 4। 96। 165।
गउड़ी महला 5 ॥
जीवत छाडि जाहि देवाने ॥
मुइआ उन ते को वरसांने ॥1॥
सिमरि गोविंदु मनि तनि धुरि लिखिआ ॥
काहू काज न आवत बिखिआ ॥1॥ रहाउ ॥
बिखै ठगउरी जिनि जिनि खाई ॥
ता की त्रिसना कबहूं न जाई ॥2॥
दारन दुख दुतर संसारु ॥
राम नाम बिनु कैसे उतरसि पारि ॥3॥
साधसंगि मिलि दुइ कुल साधि ॥
राम नाम नानक आराधि ॥4॥97॥166॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे दिवाने मनुष्य ! जो माया के पदार्थ मनुष्य को जीवित ही छोड़ जाते हैं, मौत आने पर उनसे कोई क्या लाभ उठा सकता है?। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमर, (ये सिमरन-लेख ही धुर से रॅबी नियम अनुसार आपके मन में आपके हृदय में (सदा के लिए)) उकरा रह सकता हैं, पर ये माया (जिसकी खातिर सारी उम्र दौड़ भाग करता है, आखिर) किसी काम नहीं आती। 1। रहाउ। (हे भाई ! याद रख) जिस जिस मनुष्य ने विषियों की ठॅगी बूटी खा ली है, (विकारों की) उसकी तृष्णा कभी भी नहीं मिटती। 2। (हे भाई !) इस संसार (-समुंद्र) से पार लांघना बहुत मुश्किल है। ये बड़े भयानक दुखों से भरपूर है। आप परमात्मा के नाम के बिना किस तरह इससे पार लांघ सकेगा?। 3। साध-संगति में मिल के ये लोक व परलोक दोनों ही संवर जायेंगे – हे नानक ! (कह, हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमर । 4। 97। 166।
गउड़ी महला 5 ॥
गरीबा उपरि जि खिंजै दाड़ी ॥
पारब्रहमि सा अगनि महि साड़ी ॥1॥
पूरा निआउ करे करतारु ॥
अपुने दास कउ राखनहारु ॥1॥ रहाउ ॥
आदि जुगादि प्रगटि परतापु ॥
निंदकु मुआ उपजि वड तापु ॥2॥
तिनि मारिआ जि रखै न कोइ ॥
आगै पाछै मंदी सोइ ॥3॥
अपुने दास राखै कंठि लाइ ॥
सरणि नानक हरि नामु धिआइ ॥4॥98॥167॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई ! देख उसका न्याय !) जो दाढ़ी गरीबों पर खिझती रहती है पारब्रहम् प्रभू ने वह दाढ़ी आग में जला दी (होती) है (भाव, जो मनुष्य अहंकार में आ कर दूसरों को दुखी करता है, वह खुद भी क्रोध की अग्नि में जलता रहता है)। 1। (हे भाई !) जीवों को पैदा करने वाला परमात्मा (सदा) न्याय करता है। (ऐसा न्याय) जिसमें कोई कमी नहीं होती। वह करतार अपने सेवकों की सहायता करने की स्मर्था वाला है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जगत के) आरम्भ से, युगों की शुरुवात से ही परमात्मा का तेज प्रताप प्रगट होता आया है (कि दूसरों की) निंदा करने वाला मनुष्य (स्वयं) आत्मिक मौत मरा रहता है, (उसके अपने अंदर निंदा के कारण) बड़ा दुख-कलेश बना रहता है। 2। (हे भाई ! गरीबों पर अत्याचार करने वाले मनुष्य को) वह परमात्मा (खुद) आत्मिक मौत मार देता होता है जिससे (परमात्मा के बिनां) और कोई बचा नहीं सकता, (ऐसे मनुष्य की) इस लोक में भी और परलोक में भी बदनामी ही होती है। 3। हे नानक ! (कह) परमात्मा अपने सेवकों को अपने गले से लगा के रखता है (भाव, उनके उच्च आत्मिक जीवन का पूरा ध्यान रखता है)। (हे भाई !) उस परमात्मा की शरण पड़, और उस परमात्मा का नाम (सदा) सिमर। 4। 98। 167।
गउड़ी महला 5 ॥
महजरु झूठा कीतोनु आपि ॥
पापी कउ लागा संतापु ॥1॥
जिसहि सहाई गोबिदु मेरा ॥
तिसु कउ जमु नही आवै नेरा ॥1॥ रहाउ ॥
साची दरगह बोलै कूड़ु ॥
सिरु हाथ पछोड़ै अंधा मूड़ु ॥2॥
रोग बिआपे करदे पाप ॥
अदली होइ बैठा प्रभु आपि ॥3॥
अपन कमाइऐ आपे बाधे ॥
दरबु गइआ सभु जीअ कै साथै ॥4॥
नानक सरनि परे दरबारि ॥
राखी पैज मेरै करतारि ॥5॥99॥168॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई ! देखो, हमारे विरुद्ध तैयार किया हुआ) मेजरनामा करतार ने खुद झूठा (साबित) कर दिया, (और झूठ अनर्थ थोपने वाले) पापियों को (आत्मिक तौर पर) बहुत दुख-कलेश हुआ। 1। (हे भाई !) मेरा गोबिंद जिस मनुष्य का सहायक बनता है, उसे मौत का डर नहीं छू सकता। 1। रहाउ। हे भाई !) जो मनुष्य (किसी को हानि पहुँचाने के लिए) झूठ बोलता है (वह अंधा मूर्ख सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की दरगाह में अपना सिर अपने हाथों से पीटता है (भाव, वह पश्चाताप करता है)। 2। (हे भाई !) जो मनुष्य बुरे कर्म करते हैं (उसके न्याय के अनुसार) वे अनेकों रोगों में ग्रसे रहते हैं। 3। परमात्मा स्वयं न्याय करने वाला बन के (कचहरी लगाए) बैठा हुआ है (उससे कोई ठॅगी नहीं हो सकती)। अपने किए कर्मों के अनुसार जीव खुद ही (मोह के बंधनों में) बंधे रहते हैं (हे भाई ! धन आदि की खातिर जीव पाप कर्म करते हैं, पर) सारा ही धन जीवात्मा के साथ ही (जीव के हाथों) चला जाता है। 4। हे नानक ! (कह) जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ते हैं परमात्मा के दर पर गिरते हैं, उनकी इज्जत मेरे करतार ने सदा ही रख ली है। 5। 99। 168।
गउड़ी महला 5 ॥
जन की धूरि मन मीठ खटानी ॥
पूरबि करमि लिखिआ धुरि प्रानी ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ उसके मन को परमात्मा के सेवक की चरण-धूड़ मीठी लगती है (हे भाई !) पूर्व जन्म के किए कर्मों के अनुसार जिस प्राणी के माथे पर धुर दरगाह से लेख लिखा होता है। 1। रहाउ।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) वहाँ (उस हरी-नाम-जल में डुबकी लगाते हुए) प्रभू संत से मिलाप हो जाता है (और, मनुष्य अपने) करोड़ों जन्मों के (किए हुए) पाप दूर कर लेता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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