जिनि जनि मानिआ प्रभ का भाणा ॥2॥
जग महि आइआ सो परवाणु ॥
घटि घटि अपणा सुआमी जाणु ॥3॥
कहु नानक जा के पूरन भाग ॥
हरि चरणी ता का मनु लाग ॥4॥90॥159॥
हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥
ओहु बिखई ओसु राम को रंगु ॥1॥ रहाउ ॥
मन असवार जैसे तुरी सीगारी ॥
जिउ कापुरखु पुचारै नारी ॥1॥
बैल कउ नेत्रा पाइ दुहावै ॥
गऊ चरि सिंघ पाछै पावै ॥2॥
गाडर ले कामधेनु करि पूजी ॥
सउदे कउ धावै बिनु पूंजी ॥3॥
नानक राम नामु जपि चीत ॥
सिमरि सुआमी हरि सा मीत ॥4॥91॥160॥
सा मति निरमल कहीअत धीर ॥
राम रसाइणु पीवत बीर ॥1॥
हरि के चरण हिरदै करि ओट ॥
जनम मरण ते होवत छोट ॥1॥ रहाउ ॥
सो तनु निरमलु जितु उपजै न पापु ॥
राम रंगि निरमल परतापु ॥2॥
साधसंगि मिटि जात बिकार ॥
सभ ते ऊच एहो उपकार ॥3॥
प्रेम भगति राते गोपाल ॥
नानक जाचै साध रवाल ॥4॥92॥161॥
ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥
मेलि लए पूरन वडभागी ॥1॥ रहाउ ॥
भरता पेखि बिगसै जिउ नारी ॥
तिउ हरि जनु जीवै नामु चितारी ॥1॥
पूत पेखि जिउ जीवत माता ॥
ओति पोति जनु हरि सिउ राता ॥2॥
लोभी अनदु करै पेखि धना ॥
जन चरन कमल सिउ लागो मना ॥3॥
बिसरु नही इकु तिलु दातार ॥
नानक के प्रभ प्रान अधार ॥4॥93॥162॥
राम रसाइणि जो जन गीधे ॥
चरन कमल प्रेम भगती बीधे ॥1॥ रहाउ ॥
आन रसा दीसहि सभि छारु ॥
नाम बिना निहफल संसार ॥1॥
अंध कूप ते काढे आपि ॥
गुण गोविंद अचरज परताप ॥2॥
वणि त्रिणि त्रिभवणि पूरन गोपाल ॥
ब्रहम पसारु जीअ संगि दइआल ॥3॥
कहु नानक सा कथनी सारु ॥
मानि लेतु जिसु सिरजनहारु ॥4॥94॥163॥
नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥
झोलि महा रसु हरि अंम्रितु पीजै ॥1॥ रहाउ ॥
निरमल उदकु गोविंद का नाम ॥
मजनु करत पूरन सभि काम ॥1॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) वही मनुष्य रूप वाला है, वही तीक्ष्ण बुद्धि वाला है, वही अक्लमंद है, जिस मनुष्य ने परमातमा की रजा को (सदा सिर माथे पर) माना है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।