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अंग १९८ · गउड़ी

अंग
198
गउड़ी
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  1. रूपवंतु सो चतुरु सिआणा ॥
  2. हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥
  3. सा मति निरमल कहीअत धीर ॥
  4. ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥
  5. राम रसाइणि जो जन गीधे ॥
  6. नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥

रूपवंतु सो चतुरु सिआणा ॥

अंग १९७ से चला आ रहा अंश

रूपवंतु सो चतुरु सिआणा ॥
जिनि जनि मानिआ प्रभ का भाणा ॥2॥
जग महि आइआ सो परवाणु ॥
घटि घटि अपणा सुआमी जाणु ॥3॥
कहु नानक जा के पूरन भाग ॥
हरि चरणी ता का मनु लाग ॥4॥90॥159॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) वही मनुष्य रूप वाला है, वही तीक्ष्ण बुद्धि वाला है, वही अक्लमंद है, जिस मनुष्य ने परमातमा की रजा को (सदा सिर माथे पर) माना है। 2। (जिस मनुष्य ने मालिक प्रभू को हरेक शरीर में बसता पहिचान लिया है) वही मनुष्य जगत में आया सफल है (हे भाई !) अपने मालिक प्रभू को हरेक शरीर में बसता हुआ पहिचान। 3। हे नानक ! कह,जिस मनुष्य के पूरे भाग्य जाग पड़ते हैं, उसका मनपरमात्मा के चरणों में लगा रहता है। 4। 90। 159।

हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥

गउड़ी महला 5 ॥
हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥
ओहु बिखई ओसु राम को रंगु ॥1॥ रहाउ ॥
मन असवार जैसे तुरी सीगारी ॥
जिउ कापुरखु पुचारै नारी ॥1॥
बैल कउ नेत्रा पाइ दुहावै ॥
गऊ चरि सिंघ पाछै पावै ॥2॥
गाडर ले कामधेनु करि पूजी ॥
सउदे कउ धावै बिनु पूंजी ॥3॥
नानक राम नामु जपि चीत ॥
सिमरि सुआमी हरि सा मीत ॥4॥91॥160॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा के भक्त के साथ माया-ग्रसित मनुष्य का जोड़ नहीं बन सकता (क्योंकि) वह साकत विषियों का प्यारा होता है और उस भगत को परमात्मा का प्रेम रंग चढ़ा होता है। 1। रहाउ। (हरी के दास और साकत का संग इस तरह है) जैसे किसी अनाड़ी सवार के वास्ते सजाई गई घोड़ी, जैसे कोई हिजड़ा किसी स्त्री को प्यार करे। 1। (हे भाई ! हरी के दास और साकत का मेल यूँ ही है) जैसे कोई मनुष्य बछड़ा दे के बैल का दूध चूने की कोशिश करने लगे, जैसे कोई मनुष्य गाय पर चढ़ कर उसे शेर के पीछे दौड़ाने लग पड़े। 2। (हे भाई !हरी के भक्त और साकत का मेल ऐसे है) जैसे कोई मनुष्य भेड़ लेकर उसे कामधेन समझ कर पूजने लग जाए, जैसे कोई मनुष्य बगैर पूँजी के सौदा खरीदने उठ दौड़े। 3। हे नानक ! (हरी के दासों की संगति में टिक कर) परमात्मा का नाम अपने मन में सिमर, परमात्मा जैसे मालिक व मित्र का सिमरन करा कर। 4। 91। 160।

सा मति निरमल कहीअत धीर ॥

गउड़ी महला 5 ॥
सा मति निरमल कहीअत धीर ॥
राम रसाइणु पीवत बीर ॥1॥
हरि के चरण हिरदै करि ओट ॥
जनम मरण ते होवत छोट ॥1॥ रहाउ ॥
सो तनु निरमलु जितु उपजै न पापु ॥
राम रंगि निरमल परतापु ॥2॥
साधसंगि मिटि जात बिकार ॥
सभ ते ऊच एहो उपकार ॥3॥
प्रेम भगति राते गोपाल ॥
नानक जाचै साध रवाल ॥4॥92॥161॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे भाई ! वह बुद्धि पवित्र कही जाती है, धैर्य वाली कही जाती है, (जिसका आसरा लेकर मनुष्य) सब रसों से उत्तम प्रभू नाम का रस पीता है। 1। (हे भाई !) अपने हृदय में परमात्मा के चरणों का आसरा बना, (ऐसा करने से) जन्म मरण के चक्र से निजात मिल जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई !) वह शरीर पवित्र है जिसमें कोई पाप नहीं पैदा होता। परमात्मा के प्रेम रंग की बरकति से पवित्र हुए मनुष्य का तेज-प्रताप (चमकता) है। 2। (हे भाई !साध-संगति किया कर) साध-संगति में रहने से (अंदर से) सारे विकार दूर हो जाते हैं। (साध-संगति का) सबसे उत्तम यही उपकार है। 3। जो मनुष्य परमात्मा की प्रेम भक्ति में लगे रहते हैं, नानक उनके चरणों की धूड़ मांगता है। 4। 92। 161।

ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥

गउड़ी महला 5 ॥
ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥
मेलि लए पूरन वडभागी ॥1॥ रहाउ ॥
भरता पेखि बिगसै जिउ नारी ॥
तिउ हरि जनु जीवै नामु चितारी ॥1॥
पूत पेखि जिउ जीवत माता ॥
ओति पोति जनु हरि सिउ राता ॥2॥
लोभी अनदु करै पेखि धना ॥
जन चरन कमल सिउ लागो मना ॥3॥
बिसरु नही इकु तिलु दातार ॥
नानक के प्रभ प्रान अधार ॥4॥93॥162॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा से जिन मनुष्यों को ऐसी प्रीति (जिसका जिक्र यहाँ किया जा रहा है) बनती है, वह मनुष्य भाग्यशाली हो जाते हैं, वे सारे गुणों से भरपूर हो जाते हैं, परमात्मा उन्हें अपने साथ मिला लेता है। 1। रहाउ। जैसे स्त्री अपने पति को देख के खुश होती है, वैसे ही हरी का दास हरी का नाम याद कर के अंतरात्मे विभोर (हिलोरे मारता है) में आता है। 1। जैसे माँ अपने पुत्रों को देख-देख के जीती है, वैसे ही परमात्मा का भक्त परमात्मा के साथ ओत-प्रोत रहता है (ताने-पेटे के सूत्र में बंधा)। 2। (जैसे, हे भाई !) लालची मनुष्य धन देख के आनंदित होता है, वैसे ही परमात्मा के भक्त का मन परमात्मा के सुंदर चरणों से लिपटा रहता है। 3। हे दातार ! (मुझ नानक को) एक रत्ती जितना समय भी ना भूल। हे नानक के प्राणों के आसरे प्रभू ! । 4। 93। 162

राम रसाइणि जो जन गीधे ॥

गउड़ी महला 5 ॥
राम रसाइणि जो जन गीधे ॥
चरन कमल प्रेम भगती बीधे ॥1॥ रहाउ ॥
आन रसा दीसहि सभि छारु ॥
नाम बिना निहफल संसार ॥1॥
अंध कूप ते काढे आपि ॥
गुण गोविंद अचरज परताप ॥2॥
वणि त्रिणि त्रिभवणि पूरन गोपाल ॥
ब्रहम पसारु जीअ संगि दइआल ॥3॥
कहु नानक सा कथनी सारु ॥
मानि लेतु जिसु सिरजनहारु ॥4॥94॥163॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) जो मनुष्य सबसे श्रेष्ठ हरी-नाम-रस में मस्त रहते हैं वह मनुष्य परमात्मा के सुंदर चरणों की प्रेमा-भक्ति में लीन रहते हैं (जैसे भौरा कमल फूल में अभेद हो जाता है)। 1। रहाउ। (हे भाई ! उन मनुष्यों को दुनिया के) और सारे रस (प्रभू-नाम-रस के मुकाबले में) राख दिखते हैं। परमात्मा के नाम के बिना संसार के सारे पदार्थ उन्हें व्यर्थ प्रतीत होते हैं। 1। (हे भाई !) (उन्हें परमात्मा) खुद (माया के मोह के) अंधे कूएं में से निकाल लेता है (जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाते हैं) गोबिंद के गुण आश्चर्यजनक प्रताप वाले हैं । 2। (हे भाई ! हरी-नाम-रस में मस्त लोगों को) सृष्टि का पालणहार प्रभू, बन में, त्रिण में, तीन भवनीय संसार में व्यापक दिखता है। उन्हें ये सारा जगत परमात्मा का पसारा दिखता है, परमात्मा सब जीवों के अंग-संग प्रतीत होता है, और दया का घर दिखता है। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई ! आप भी अपने हृदय में) वह सिफत सालाह सँभालिए, जिस (सिफत सालाह रूप कथनी) को सृजनहार प्रभू आदर-सत्कार देता है। 4। 94। 163।

नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥

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गउड़ी महला 5 ॥
नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥
झोलि महा रसु हरि अंम्रितु पीजै ॥1॥ रहाउ ॥
निरमल उदकु गोविंद का नाम ॥
मजनु करत पूरन सभि काम ॥1॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा के नाम रूपी सरोवर में सदा ही स्नान करना चाहिए। (परमात्मा के नाम का रस) सबसे श्रेष्ठ रस है, आत्मिक जीवन देने वाले इस हरी नाम रस को बड़े प्रेम से पीना चाहिए। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा का नाम पवित्र जल है, (इस जल में) स्नान करने से सारे मनोरथ पूरे हो जाते हैं (सारी वासनाएं समाप्त हो जाती हैं)। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १९८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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