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अंग 198

अंग
198
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रूपवंतु सो चतुरु सिआणा ॥
जिनि जनि मानिआ प्रभ का भाणा ॥2॥
जग महि आइआ सो परवाणु ॥
घटि घटि अपणा सुआमी जाणु ॥3॥
कहु नानक जा के पूरन भाग ॥
हरि चरणी ता का मनु लाग ॥4॥90॥159॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) वही मनुष्य रूप वाला है, वही तीक्ष्ण बुद्धि वाला है, वही अक्लमंद है, जिस मनुष्य ने परमातमा की रजा को (सदा सिर माथे पर) माना है। 2। (जिस मनुष्य ने मालिक प्रभू को हरेक शरीर में बसता पहिचान लिया है) वही मनुष्य जगत में आया सफल है (हे भाई !) अपने मालिक प्रभू को हरेक शरीर में बसता हुआ पहिचान। 3। हे नानक ! कह,जिस मनुष्य के पूरे भाग्य जाग पड़ते हैं, उसका मनपरमात्मा के चरणों में लगा रहता है। 4। 90। 159।
गउड़ी महला 5 ॥
हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥
ओहु बिखई ओसु राम को रंगु ॥1॥ रहाउ ॥
मन असवार जैसे तुरी सीगारी ॥
जिउ कापुरखु पुचारै नारी ॥1॥
बैल कउ नेत्रा पाइ दुहावै ॥
गऊ चरि सिंघ पाछै पावै ॥2॥
गाडर ले कामधेनु करि पूजी ॥
सउदे कउ धावै बिनु पूंजी ॥3॥
नानक राम नामु जपि चीत ॥
सिमरि सुआमी हरि सा मीत ॥4॥91॥160॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा के भक्त के साथ माया-ग्रसित मनुष्य का जोड़ नहीं बन सकता (क्योंकि) वह साकत विषियों का प्यारा होता है और उस भगत को परमात्मा का प्रेम रंग चढ़ा होता है। 1। रहाउ। (हरी के दास और साकत का संग इस तरह है) जैसे किसी अनाड़ी सवार के वास्ते सजाई गई घोड़ी, जैसे कोई हिजड़ा किसी स्त्री को प्यार करे। 1। (हे भाई ! हरी के दास और साकत का मेल यूँ ही है) जैसे कोई मनुष्य बछड़ा दे के बैल का दूध चूने की कोशिश करने लगे, जैसे कोई मनुष्य गाय पर चढ़ कर उसे शेर के पीछे दौड़ाने लग पड़े। 2। (हे भाई !हरी के भक्त और साकत का मेल ऐसे है) जैसे कोई मनुष्य भेड़ लेकर उसे कामधेन समझ कर पूजने लग जाए, जैसे कोई मनुष्य बगैर पूँजी के सौदा खरीदने उठ दौड़े। 3। हे नानक ! (हरी के दासों की संगति में टिक कर) परमात्मा का नाम अपने मन में सिमर, परमात्मा जैसे मालिक व मित्र का सिमरन करा कर। 4। 91। 160।
गउड़ी महला 5 ॥
सा मति निरमल कहीअत धीर ॥
राम रसाइणु पीवत बीर ॥1॥
हरि के चरण हिरदै करि ओट ॥
जनम मरण ते होवत छोट ॥1॥ रहाउ ॥
सो तनु निरमलु जितु उपजै न पापु ॥
राम रंगि निरमल परतापु ॥2॥
साधसंगि मिटि जात बिकार ॥
सभ ते ऊच एहो उपकार ॥3॥
प्रेम भगति राते गोपाल ॥
नानक जाचै साध रवाल ॥4॥92॥161॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ हे भाई ! वह बुद्धि पवित्र कही जाती है, धैर्य वाली कही जाती है, (जिसका आसरा लेकर मनुष्य) सब रसों से उत्तम प्रभू नाम का रस पीता है। 1। (हे भाई !) अपने हृदय में परमात्मा के चरणों का आसरा बना, (ऐसा करने से) जन्म मरण के चक्र से निजात मिल जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई !) वह शरीर पवित्र है जिसमें कोई पाप नहीं पैदा होता। परमात्मा के प्रेम रंग की बरकति से पवित्र हुए मनुष्य का तेज-प्रताप (चमकता) है। 2। (हे भाई !साध-संगति किया कर) साध-संगति में रहने से (अंदर से) सारे विकार दूर हो जाते हैं। (साध-संगति का) सबसे उत्तम यही उपकार है। 3। जो मनुष्य परमात्मा की प्रेम भक्ति में लगे रहते हैं, नानक उनके चरणों की धूड़ मांगता है। 4। 92। 161।
गउड़ी महला 5 ॥
ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥
मेलि लए पूरन वडभागी ॥1॥ रहाउ ॥
भरता पेखि बिगसै जिउ नारी ॥
तिउ हरि जनु जीवै नामु चितारी ॥1॥
पूत पेखि जिउ जीवत माता ॥
ओति पोति जनु हरि सिउ राता ॥2॥
लोभी अनदु करै पेखि धना ॥
जन चरन कमल सिउ लागो मना ॥3॥
बिसरु नही इकु तिलु दातार ॥
नानक के प्रभ प्रान अधार ॥4॥93॥162॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा से जिन मनुष्यों को ऐसी प्रीति (जिसका जिक्र यहाँ किया जा रहा है) बनती है, वह मनुष्य भाग्यशाली हो जाते हैं, वे सारे गुणों से भरपूर हो जाते हैं, परमात्मा उन्हें अपने साथ मिला लेता है। 1। रहाउ। जैसे स्त्री अपने पति को देख के खुश होती है, वैसे ही हरी का दास हरी का नाम याद कर के अंतरात्मे विभोर (हिलोरे मारता है) में आता है। 1। जैसे माँ अपने पुत्रों को देख-देख के जीती है, वैसे ही परमात्मा का भक्त परमात्मा के साथ ओत-प्रोत रहता है (ताने-पेटे के सूत्र में बंधा)। 2। (जैसे, हे भाई !) लालची मनुष्य धन देख के आनंदित होता है, वैसे ही परमात्मा के भक्त का मन परमात्मा के सुंदर चरणों से लिपटा रहता है। 3। हे दातार ! (मुझ नानक को) एक रत्ती जितना समय भी ना भूल। हे नानक के प्राणों के आसरे प्रभू ! । 4। 93। 162
गउड़ी महला 5 ॥
राम रसाइणि जो जन गीधे ॥
चरन कमल प्रेम भगती बीधे ॥1॥ रहाउ ॥
आन रसा दीसहि सभि छारु ॥
नाम बिना निहफल संसार ॥1॥
अंध कूप ते काढे आपि ॥
गुण गोविंद अचरज परताप ॥2॥
वणि त्रिणि त्रिभवणि पूरन गोपाल ॥
ब्रहम पसारु जीअ संगि दइआल ॥3॥
कहु नानक सा कथनी सारु ॥
मानि लेतु जिसु सिरजनहारु ॥4॥94॥163॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) जो मनुष्य सबसे श्रेष्ठ हरी-नाम-रस में मस्त रहते हैं वह मनुष्य परमात्मा के सुंदर चरणों की प्रेमा-भक्ति में लीन रहते हैं (जैसे भौरा कमल फूल में अभेद हो जाता है)। 1। रहाउ। (हे भाई ! उन मनुष्यों को दुनिया के) और सारे रस (प्रभू-नाम-रस के मुकाबले में) राख दिखते हैं। परमात्मा के नाम के बिना संसार के सारे पदार्थ उन्हें व्यर्थ प्रतीत होते हैं। 1। (हे भाई !) (उन्हें परमात्मा) खुद (माया के मोह के) अंधे कूएं में से निकाल लेता है (जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाते हैं) गोबिंद के गुण आश्चर्यजनक प्रताप वाले हैं । 2। (हे भाई ! हरी-नाम-रस में मस्त लोगों को) सृष्टि का पालणहार प्रभू, बन में, त्रिण में, तीन भवनीय संसार में व्यापक दिखता है। उन्हें ये सारा जगत परमात्मा का पसारा दिखता है, परमात्मा सब जीवों के अंग-संग प्रतीत होता है, और दया का घर दिखता है। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई ! आप भी अपने हृदय में) वह सिफत सालाह संभाल, जिस (सिफत सालाह रूप कथनी) को सृजनहार प्रभू आदर-सत्कार देता है। 4। 94। 163।
गउड़ी महला 5 ॥
नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥
झोलि महा रसु हरि अंम्रितु पीजै ॥1॥ रहाउ ॥
निरमल उदकु गोविंद का नाम ॥
मजनु करत पूरन सभि काम ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा के नाम रूपी सरोवर में सदा ही स्नान करना चाहिए। (परमात्मा के नाम का रस) सबसे श्रेष्ठ रस है, आत्मिक जीवन देने वाले इस हरी नाम रस को बड़े प्रेम से पीना चाहिए। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा का नाम पवित्र जल है, (इस जल में) स्नान करने से सारे मनोरथ पूरे हो जाते हैं (सारी वासनाएं समाप्त हो जाती हैं)। 1।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) वही मनुष्य रूप वाला है, वही तीक्ष्ण बुद्धि वाला है, वही अक्लमंद है, जिस मनुष्य ने परमातमा की रजा को (सदा सिर माथे पर) माना है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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