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अंग 197

अंग
197
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सगल दूख का होइआ नासु ॥2॥
आसा माणु ताणु धनु एक ॥
साचे साह की मन महि टेक ॥3॥
महा गरीब जन साध अनाथ ॥
नानक प्रभि राखे दे हाथ ॥4॥85॥154॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: उसके सारे दुखों का नाश हो जाता है;2, एक परमात्मा का नाम ही उस मनुष्य की आस बन जाता है, प्रभू का नाम ही उस का मान-तान और धन हो जाता है। उस मनुष्य के मन में सदा कायम रहने वाले शाह परमात्मा का ही सहारा होता है। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई ! जो) बड़े गरीब और अनाथ लोग (थे, जब वह) गुरू के सेवक (बन गए, गुरू की शरण आ पड़े) परमात्मा ने (उन्हें दुखों-कलेशों से) हाथ दे कर बचा लिया। 4। 85। 154।
गउड़ी महला 5 ॥
हरि हरि नामि मजनु करि सूचे ॥
कोटि ग्रहण पुंन फल मूचे ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के चरण रिदे महि बसे ॥
जनम जनम के किलविख नसे ॥1॥
साधसंगि कीरतन फलु पाइआ ॥
जम का मारगु द्रिसटि न आइआ ॥2॥
मन बच क्रम गोविंद अधारु ॥
ता ते छुटिओ बिखु संसारु ॥3॥
करि किरपा प्रभि कीनो अपना ॥
नानक जापु जपे हरि जपना ॥4॥86॥155॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा के नाम (तीर्थ) में स्नान करके स्वच्छ (जीवन वाले बन जाते हैं)। (नाम तीर्थ में स्नान करने से) करोड़ों ग्रहणों के समय किए (दान-) पुंन्न के फलों से भी ज्यादा फल मिलते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य के) हृदय में परमात्मा के चरन बस जाएं, उसके अनेकों जन्मों के (किए) पाप नाश हो जाते हैं। 1। (हे भाई !जिस मनुष्य ने) साध-संगति में टिक के परमात्मा की सिफत सालाह का फल प्राप्त कर लिया। जमों का रास्ता उसे नजर भी नहीं पड़ता (आत्मिक मौत उसके कहीं नजदीक भी नहीं फटकी)। 2। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने) अपने मन का अपने बोलों का अपने कामों का आसरा परमात्मा (के नाम) को बना लिया, उस से संसार (का मोह) दूर हट गया, उससे (विकारों का वह) जहर परे रह गया (जो मनुष्य के आत्मिक जीवन को मार देता है)। 3। हे नानक ! मेहर कर के प्रभू ने जिस मनुष्य को अपना बना लिया। वह मनुष्य सदा प्रभू का जाप जपता है प्रभू का भजन करता है। 4। 86। 155।
गउड़ी महला 5 ॥
पउ सरणाई जिनि हरि जाते ॥
मनु तनु सीतलु चरण हरि राते ॥1॥
भै भंजन प्रभ मनि न बसाही ॥
डरपत डरपत जनम बहुतु जाही ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै रिदै बसिओ हरि नाम ॥
सगल मनोरथ ता के पूरन काम ॥2॥
जनमु जरा मिरतु जिसु वासि ॥
सो समरथु सिमरि सासि गिरासि ॥3॥
मीतु साजनु सखा प्रभु एक ॥
नामु सुआमी का नानक टेक ॥4॥87॥156॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा के साथ जान पहिचान बना ली है उसी की शरण पड़ा रह, (क्योंकि) प्रभू-चरणों में प्यार डाल के मन शांत हो जाता है, शरीर (भाव, हरेक इंद्रिय) शांत हो जाता है। 1। (हे भाई ! जो मनुष्य) सारे डरों का नाश करने वाले प्रभू को अपने मन में नहीं बसाते, उनके अनेकों जन्म इन डरों से काँपते हुए ही बीत जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम बस जाता है, उसके सारे काम सारे मनोरथ सफल हो जाते हैं। 2। (हे भाई !) हमारा जीना, हमारा बुढ़ापा और हमारी मौत जिस परमात्मा के वश में है, उस सब ताकतों के मालिक प्रभू को हरेक साँस के साथ और हरेक ग्रास के साथ सिमरता रह। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) एक परमात्मा ही (हम जीवों का) मित्र है सज्जन है, साथी है। उस मालिक प्रभू का नाम ही (हमारी जिंदगी का) सहारा है। 4। 87। 156।
गउड़ी महला 5 ॥
बाहरि राखिओ रिदै समालि ॥
घरि आए गोविंदु लै नालि ॥1॥
हरि हरि नामु संतन कै संगि ॥
मनु तनु राता राम कै रंगि ॥1॥ रहाउ ॥
गुर परसादी सागरु तरिआ ॥
जनम जनम के किलविख सभि हिरिआ ॥2॥
सोभा सुरति नामि भगवंतु ॥
पूरे गुर का निरमल मंतु ॥3॥
चरण कमल हिरदे महि जापु ॥
नानकु पेखि जीवै परतापु ॥4॥88॥157॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) जगत से कार्य-व्यवहार करते हुए संत जनों ने गोबिंद को अपने हृदय में संभाल के रखा होता है। गोबिंद को संत जन अपने हृदय घर में सदा अपने साथ रखते हैं। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सदा संत जनों के हृदय में बसता है। परमात्मा के (प्रेम) रंग में (संत जनों का) मन रंगा रहता है, तन (भाव, हरेक ज्ञानेंद्री) रंगी रहती है। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू की कृपा से (परमात्मा का नाम हृदय में संभाल के संत जन) संसार समुंद्र से पार लांघ जाते हैं, और अनेकों जन्मों के (पहले किए हुये) सारे पाप दूर कर लेते हैं। 2। जो मनुष्य गुरू का उपदेश हृदय में बसाता है, वह) भाग्यशाली हो जाता है, वह (लोक परलोक में) बड़प्पन कमाता है, उसकी सुरति प्रभू के नाम में जुड़ती है (हे भाई !आप भी) पूरे गुरू का उपदेश (अपने हृदय में बसा। 3। (हे भाई !आप भी परमात्मा के) सुंदर चरण (अपने) हृदय में जपता रह। नानक (उस परमात्मा का) प्रताप देख के आत्मिक जीवन हासिल करता है। 4। 88। 157।
गउड़ी महला 5 ॥
धंनु इहु थानु गोविंद गुण गाए ॥
कुसल खेम प्रभि आपि बसाए ॥1॥ रहाउ ॥
बिपति तहा जहा हरि सिमरनु नाही ॥
कोटि अनंद जह हरि गुन गाही ॥1॥
हरि बिसरिऐ दुख रोग घनेरे ॥
प्रभ सेवा जमु लगै न नेरे ॥2॥
सो वडभागी निहचल थानु ॥
जह जपीऐ प्रभ केवल नामु ॥3॥
जह जाईऐ तह नालि मेरा सुआमी ॥
नानक कउ मिलिआ अंतरजामी ॥4॥89॥158॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ अर्थ: (हे भाई !) गोबिंद के गुण गाने से (मनुष्य का) ये हृदय-स्थल भाग्यशाली बन जाता है (क्योंकि, जिस हृदय में प्रभू की सिफत सलाह आ बसी, उस में) प्रभू ने खुद सारे सुख, सारे आनंद ला बसाए। 1। रहाउ। (हे भाई !) बिपता (सदा) उस हृदय में (बीतती रहती) है, जिस में परमात्मा (के नाम) का सिमरन नहीं। जिस हृदय में परमात्मा के गुण गाए जाते हैं, वहाँ करोड़ों ही आनंद हैं। 1। (हे भाई !) अगर मनुष्य को परमात्मा (का नाम) बिसर जाए, तो उसे अनेकों दुख, अनेकों रोग (आ घेरते हैं)। (पर) परमात्मा की सेवा-भक्ति करने से जम (मौत का भय) नजदीक नहीं फटकता (आत्मिक मौत नहीं आती)। 2। (हे भाई !) वह हृदय-स्थल भाग्यशाली है, वह हृदय सदा अडोल रहता है, जिस में परमात्मा का ही नाम जपा जाता है। 3। अब मैं जिधर जाता हूँ, उधर मेरा मालिक-प्रभू मुझे अपने साथ दिखाई देता है (हे भाई !) सबके दिल की जानने वाला प्रभू (अपनी कृपा से मुझ) नानक को मिल गया है। 4। 89। 158।
गउड़ी महला 5 ॥
जो प्राणी गोविंदु धिआवै ॥
पड़िआ अणपड़िआ परम गति पावै ॥1॥
साधू संगि सिमरि गोपाल ॥
बिनु नावै झूठा धनु मालु ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ जो मनुष्य गोबिंद प्रभू को अपने हृदय में याद करता रहता है, वह चाहे विद्वान हो अथवा विद्या हीन, वह सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। 1। (हे भाई !) गुरू की संगति में (रह के) सृष्टि के पालणहार प्रभू (के नाम) का सिमरन किया कर। प्रभू के नाम के बिना और कोई धन और कोई चीज पक्का साथ निभाने वाली नहीं। 1। रहाउ।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसके सारे दुखों का नाश हो जाता है;2, एक परमात्मा का नाम ही उस मनुष्य की आस बन जाता है, प्रभू का नाम ही उस का मान-तान और धन हो जाता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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