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अंग १९६ · गउड़ी

अंग
196
गउड़ी
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  1. अउखध मंत्र तंत सभि छारु ॥
  2. करि किरपा भेटे गुर सोई ॥
  3. बिखै राज ते अंधुला भारी ॥
  4. आठ पहर संगी बटवारे ॥
  5. थाती पाई हरि को नाम ॥
  6. जलि थलि महीअलि पूरन हरि मीत ॥

अउखध मंत्र तंत सभि छारु ॥

अंग १९५ से चला आ रहा अंश

अउखध मंत्र तंत सभि छारु ॥
करणैहारु रिदे महि धारु ॥3॥
तजि सभि भरम भजिओ पारब्रहमु ॥
कहु नानक अटल इहु धरमु ॥4॥80॥149॥

हिन्दी अर्थ: (इसके मुकाबले के अन्य) सभी औषधियां, सारे मंत्र और तंत्र (टूणे) तुच्छ हैं (हे भाई !) सृजनहार प्रभू को अपने हृदय में टिकाए रख। 3। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य ने सारे भ्रम त्याग के पारब्रहम् प्रभू का भजन किया है, (उसने देख लिया है कि भजन-सिमरन वाला) धर्म ऐसा है जो कभी फल देने में कमी नहीं आने देता। 4। 80। 149।

करि किरपा भेटे गुर सोई ॥

गउड़ी महला 5 ॥
करि किरपा भेटे गुर सोई ॥
तितु बलि रोगु न बिआपै कोई ॥1॥
राम रमण तरण भै सागर ॥
सरणि सूर फारे जम कागर ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरि मंत्रु दीओ हरि नाम ॥
इह आसर पूरन भए काम ॥2॥
जप तप संजम पूरी वडिआई ॥ गुर किरपाल हरि भए सहाई ॥3॥
मान मोह खोए गुरि भरम ॥
पेखु नानक पसरे पारब्रहम ॥4॥81॥150॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) वही मनुष्य गुरू को मिलता है, जिस पर परमात्मा कृपा करता है। (गुरू के मिलाप की बरकति से मनुष्य के अंदर आत्मिक बल पैदा होता है) उस बल के कारण कोई रोग अपना जोर नहीं डाल सकता। 1। (हे भाई !) परमात्मा का सिमरन करने से संसार समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। शूरवीर गुरू की शरण पड़ने से जमों के लेखे फाड़े जाते हैं, (आत्मिक मौत लाने वाले सारे संस्कार मिट जाते हैं)। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य को) सत्गुरू ने परमात्मा का नाम मंत्र दे दिया, इस नाम-मंत्र के आसरे उसके सारे मनोरथ पूरे हो गए। 2। उसको सारे जपों का, सारे तपों का, सारे संजमों का सम्मान प्राप्त हो गया (हे भाई ! जिस मनुष्य पर) सतिगुरू जी कृपाल हुए, जिसके मददगार सत्गुरू जी बन गए। 3। हे नानक ! देख, गुरू ने जिस मनुष्य के अहंकार, मोह आदि भ्रम नाश कर दिए, उसे पारब्रहम् प्रभू जी हर जगह व्यापक दिख पड़े। 4। 81। 150।

बिखै राज ते अंधुला भारी ॥

गउड़ी महला 5 ॥
बिखै राज ते अंधुला भारी ॥
दुखि लागै राम नामु चितारी ॥1॥
तेरे दास कउ तुही वडिआई ॥
माइआ मगनु नरकि लै जाई ॥1॥ रहाउ ॥
रोग गिरसत चितारे नाउ ॥
बिखु माते का ठउर न ठाउ ॥2॥
चरन कमल सिउ लागी प्रीति ॥
आन सुखा नही आवहि चीति ॥3॥
सदा सदा सिमरउ प्रभ सुआमी ॥
मिलु नानक हरि अंतरजामी ॥4॥82॥151॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) विषियों के प्रभाव से (मनुष्य विकारों में) बहुत अंधा हो जाता है (तब उसे परमात्मा का नाम कभी नहीं सूझता, पर विकारों के कारण जब वह) दुख में फंसता है, तब परमात्मा का नाम याद करता है। 1। (हे प्रभू !) आपके दास के वास्ते आपका नाम ही (लोक-परलोक में) इज्जत है। (आपका दास जानता है कि) माया में मस्त मनुष्य को (माया) नर्क में ले जाती है (और सदा दुखी रखती है)। 1। रहाउ। (हे भाई !) रोगों से घिरा हुआ मनुष्य परमात्मा का नाम याद करता है, पर विकारों के जहर में मस्त हुए मनुष्य के आत्मिक जीवन का कहीं नामो निशान नहीं मिलता (विकारों का जहर उसके आत्मिक जीवन को खत्म कर देता है)। 2। (हे भाई ! परमात्मा के) सुंदर चरणों से (जिस मनुष्य की) प्रीत बन जाती है, उसे दुनिया वाले और सुख याद नहीं आते। 3। हे नानक ! (अरदास कर और कह) हे प्रभू !हे स्वामी ! मैं सदा ही आपको सिमरता रहूँ हे अंतरजामी हरी ! (मुझे) मिल । 4। 82। 151।

आठ पहर संगी बटवारे ॥

गउड़ी महला 5 ॥
आठ पहर संगी बटवारे ॥
करि किरपा प्रभि लए निवारे ॥1॥
ऐसा हरि रसु रमहु सभु कोइ ॥
सरब कला पूरन प्रभु सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
महा तपति सागर संसार ॥
प्रभ खिन महि पारि उतारणहार ॥2॥
अनिक बंधन तोरे नही जाहि ॥
सिमरत नाम मुकति फल पाहि ॥3॥
उकति सिआनप इस ते कछु नाहि ॥
करि किरपा नानक गुण गाहि ॥4॥83॥152॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !कामादिक पाँचों) डाकू आठों पहर (मनुष्य के साथ) साथी बने रहते हैं (और इसके आत्मिक जीवन पर डाका मारते रहते हैं। जिन्हें बचाया है) प्रभू ने स्वयं ही कृपा करके बचा लिया है। 1। हरेक जीव ऐसी समर्था वाले प्रभू के नाम का रस ले (हे भाई !) वह परमात्मा सारी मुकम्मल ताकतों का मालिक है (जो मनुष्य उसका पल्ला पकड़ता है, वह किसी विकार को उसके नजदीक नहीं फटकने देता)। 1। रहाउ। (हे भाई !कामादिक विकारों की) संसार समुंद्र में बड़ी तपश पड़ रही है (इस तपश से बचने के लिए प्रभू का ही आसरा लो) । प्रभू एक पल में इस जलन में से पार लंघाने की ताकत रखने वाला है। 2 (हे भाई ! माया के मोह के ये विकार आदिक) अनेकों बंधन हैं (मनुष्य के अपने प्रयत्नों से ये बंधन) तोड़े नहीं जा सकते। पर परमात्मा का नाम सिमरते हुए इन बंधनों से निजात-रूपी फल हासिल कर लेते हैं। 3। हे नानक ! (प्रभू-दर पर अरदास कर और कह, हे प्रभू !) इस जीव की कोई ऐसी सियानप, कोई ऐसी दलील नहीं चल सकती (जिससे ये इन डाकूओं के पँजे से बच सके। हे प्रभू ! आप स्वयं) कृपा कर, जीव आपके गुण गाएं (और इनसे बच सकें)। 4। 83। 152।

थाती पाई हरि को नाम ॥

गउड़ी महला 5 ॥
थाती पाई हरि को नाम ॥
बिचरु संसार पूरन सभि काम ॥1॥
वडभागी हरि कीरतनु गाईऐ ॥
पारब्रहम तूं देहि त पाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के चरण हिरदै उरि धारि ॥
भव सागरु चड़ि उतरहि पारि ॥2॥
साधू संगु करहु सभु कोइ ॥
सदा कलिआण फिरि दूखु न होइ ॥3॥
प्रेम भगति भजु गुणी निधानु ॥
नानक दरगह पाईऐ मानु ॥4॥84॥153॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !अगर आपने परमात्मा की कृपा से) परमात्मा के नाम धन की थैली हासिल कर ली है, तो आप संसार के कार्य-व्यवहारों में भी (निसंग हो कर) विचरें। आपके सारे काम सिरे चढ़ जाएंगे। 1। (हे भाई !) परमात्मा की सिफत सालाह का गीत बड़े भाग्यों से गाया जा सकता है। हे पारब्रहम् प्रभू ! अगर आप स्वयं हम जीवों को अपनी सिफत सालाह की दाति दें तो ही हमें मिल सकती है। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा के चरण अपने हृदय में दिल में टिकाए रखें। (प्रभू चरण-रूपी जहाज पर) चढ़ के आप संसार समुंद्र से पार लांघ जाएँगे। 2। (हे भाई !) हरेक प्राणी गुरू की संगति करें। (गुरू की संगति में रहने से) सदा सुख ही सुख होंगे, दुबारा कोई दुख व्याप नहीं सकेगा। 3। हे नानक ! प्रेम-भरी भक्ति से सारे गुणों के खजाने परमात्मा का भजन करें, (इस तरह) परमात्मा की हजूरी में आदर-सत्कार मिलता है। 4। 84। 153।

जलि थलि महीअलि पूरन हरि मीत ॥

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गउड़ी महला 5 ॥
जलि थलि महीअलि पूरन हरि मीत ॥
भ्रम बिनसे गाए गुण नीत ॥1॥
ऊठत सोवत हरि संगि पहरूआ ॥
जा कै सिमरणि जम नही डरूआ ॥1॥ रहाउ ॥
चरण कमल प्रभ रिदै निवासु ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) जो प्रभू-मित्र जल में, धरती में, आकाश में, हर जगह व्यापक है, उसके गुण सदा गाने से सब किस्म की भटकनें नाश हो जाती है। वह परमात्मा हर समय जीव के साथ रखवाला है (हे भाई !) जिस परमात्मा के सिमरन की बरकति से मौत का डर नहीं रह जाता (आत्मिक मौत नजदीक नहीं फटक सकती)। 1। रहाउ। (हे भाई !) प्रभू के सुंदर चरणों का जिस मनुष्य के हृदय में निवास हो जाता है,

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १९६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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