जिस का दीआ पैनै खाइ ॥
तिसु सिउ आलसु किउ बनै माइ ॥1॥
खसमु बिसारि आन कंमि लागहि ॥
कउडी बदले रतनु तिआगहि ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभू तिआगि लागत अन लोभा ॥
दासि सलामु करत कत सोभा ॥2॥
अंम्रित रसु खावहि खान पान ॥
जिनि दीए तिसहि न जानहि सुआन ॥3॥
कहु नानक हम लूण हरामी ॥
बखसि लेहु प्रभ अंतरजामी ॥4॥76॥145॥
प्रभ के चरन मन माहि धिआनु ॥
सगल तीरथ मजन इसनानु ॥1॥
हरि दिनु हरि सिमरनु मेरे भाई ॥
कोटि जनम की मलु लहि जाई ॥1॥ रहाउ ॥
हरि की कथा रिद माहि बसाई ॥
मन बांछत सगले फल पाई ॥2॥
जीवन मरणु जनमु परवानु ॥
जा कै रिदै वसै भगवानु ॥3॥
कहु नानक सेई जन पूरे ॥
जिना परापति साधू धूरे ॥4॥77॥146॥
खादा पैनदा मूकरि पाइ ॥
तिस नो जोहहि दूत धरमराइ ॥1॥
तिसु सिउ बेमुखु जिनि जीउ पिंडु दीना ॥
कोटि जनम भरमहि बहु जूना ॥1॥ रहाउ ॥
साकत की ऐसी है रीति ॥
जो किछु करै सगल बिपरीति ॥2॥
जीउ प्राण जिनि मनु तनु धारिआ ॥ सोई ठाकुरु मनहु बिसारिआ ॥3॥
बधे बिकार लिखे बहु कागर ॥
नानक उधरु क्रिपा सुख सागर ॥4॥
पारब्रहम तेरी सरणाइ ॥
बंधन काटि तरै हरि नाइ ॥1॥ रहाउ दूजा ॥78॥147॥
अपने लोभ कउ कीनो मीतु ॥
सगल मनोरथ मुकति पदु दीतु ॥1॥
ऐसा मीतु करहु सभु कोइ ॥
जा ते बिरथा कोइ न होइ ॥1॥ रहाउ ॥
अपुनै सुआइ रिदै लै धारिआ ॥
दूख दरद रोग सगल बिदारिआ ॥2॥
रसना गीधी बोलत राम ॥
पूरन होए सगले काम ॥3॥
अनिक बार नानक बलिहारा ॥
सफल दरसनु गोबिंदु हमारा ॥4॥79॥148॥
कोटि बिघन हिरे खिन माहि ॥
हरि हरि कथा साधसंगि सुनाहि ॥1॥
पीवत राम रसु अंम्रित गुण जासु ॥
जपि हरि चरण मिटी खुधि तासु ॥1॥ रहाउ ॥
सरब कलिआण सुख सहज निधान ॥
जा कै रिदै वसहि भगवान ॥2॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी महला 5 ॥ हे माँ ! जिस परमात्मा का दिया हुआ (अन्न) मनुष्य खाता है, (दिया हुआ कपड़ा मनुष्य) पहनता है उसकी याद में आलस करना किसी भी तरह शोभा नहीं देता।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।